मुगलकाल में चित्रकला का विकास

मुगलकालीन चित्रकला

मुगलकालीन चित्रकला (1526-1707 ई०)

मुगल शासकों के काल में मृतप्राय चित्रकला में नवजीवन आ गया। वस्तुतः मध्यकालीन भारत में चित्रकला के विकास का श्रेय मुगल सम्राटों को हैं। मुगलकालीन बादशाहों को (औरंगजेब को छोड़कर) अन्य कलाओं के साथ-साथ चित्रकला में भी रूचि थी। बाबर से औरंगजेब तक के काल में चित्रकला के उत्थान की पराकाष्ट व पतन दोनों का दिग्दर्शन होता है। चित्रकला अकबर के काल में विकसित होकर उसके उत्तराधिकारी जहाँगीर के युग में चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई। पर्सी ब्राउन ने स्पष्ट रूप से लिखा है, “सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अकबर के काल में चित्रकला का विकास प्रारम्भ हुआ और जहाँगीर के शासन में पराकाष्ठा पर जा पहुँचा।”

बाबर के समय की चित्रकला

प्रथम मुगल सम्राट बाबर एक महान विजेता ही नहीं अपितु साहित्यकार एवं कला-प्रेमी भी था। उसे अन्य कलाओं की तुलना में चित्र-कला से विशेष लगाव था। बाबर ने अपनी आत्मकथा तुजके-बाबरी में बहजाद नामक एक चित्रकार का वर्णन किया है जो अपने समय की भारतीय कलाकारों ने चित्रकला की नवीन शैली को जन्म दिया और ईरानी अलंकरण का स्थान भारतीय यथार्थवाद ने ले लिया। धीरे-धीरे इस कला का पूर्ण रूप से भारतीयकरण हो गया।

इस्लाम धर्म के कट्टर समर्थन चित्रकला के पक्ष में नहीं हैं। शरियत में जीवधारियों के चित्र बनाना वर्जित है, परन्तु अकबर के उदार संरक्षण ने इस कला को राजाश्रय प्रदान किया तथा वस्तु अर्थो में चित्रकला को धर्मानुकूल भी बताया, “कई व्यक्ति चित्रकला को घृणा की दृष्टि से देखते हैं। मैं ऐसे लोगों को पसन्द नहीं करता हूँ मेरे विचार में यह चित्रकार के पास खुदा से मिलने का अदभुत साधन है, क्योंकि जब कोई चित्रकार किसी जीव को चित्रित करता है तब उसके अंग-प्रत्यंग बनाते हुए वह महसूस करता है कि अपनी कृति को वह सजीव नहीं कर सकता और उस जीवनदाता खुदा के विषय में सोचने लगता है। इस प्रकार उसके ज्ञान में वृद्धि होती है।” अबुल फजल ने लिखा है, “किसी वस्तु के समान दूसरी बनाना तस्वीर कहलाता है बादशाह अपने युवाकाल से चित्रकला के प्रति झुकाव रखता है। और उसे अध्ययन और आनन्द का माध्यम मानते हुए उसे प्रोत्साहन प्रदान करता है। इसीलिए यह कला (चित्रकला) उन्नत हुई और कई चित्रकारों ने अत्यधिक ख्याति अर्जित की प्रत्येक कलाकार के कार्य को सप्ताह में एक बार बादशाह के सम्मुख एक दरोगा और कलर्क के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है और तब वह कार्य की कोटि के अनुसार या तो चित्रकार को पुरस्कृत करता है अथवा उसके वेतन में वृद्धि करता है।”

अबुल फजल अकबर के दरबार में सत्रह प्रसिद्ध चित्रकारों का वर्णन करता है जिनमें से अधिकांश हिन्दू थे। ये अपने धन्धे में इतने निपुर्ण थे कि इनकी तूलिका से निर्जीव विषय भी सजीव हो गये जान पड़ते थे। इन चित्रकारों के निर्मित चित्रों की तुलना सहज ही यूरोप में बने चित्रों से की जा सकती थी। इनमें सर्वप्रथम मीर सैयद अली, ख्वाजा अब्दुल समद, दसवन्त और आसवन थे। इनके अतिरिक्त केसू लाल, मुकन्द, फारूख, मुश्की, मधु, महेश, जमन, खेमकरण, तारा, सांवला, हरवंश आदि प्रसिद्ध चित्रकार थे। ये सभी चित्रकार अपनी-अपनी कला में सिद्ध हस्त थे। मानव आकृतियों को बनाने, पुस्तकों को चित्रित करने और पशुओं के चित्र बनाने में ये सभी पारंगत थे। अकबर के दरबारी चित्रकारों की कुशलता का वर्णन करते। अबुल फजल ने लिखा है, “हिन्दुओं पर यह सत्य विशेष रूप से लागू होता है कि उनके द्वारा बनाये गये चित्र हमारी वस्तुओं को कल्पना से भी अधिक अच्छे होते हैं। संसार में वस्तुतः बहुत कम उनके समकक्ष होंगे।”

अकबर के शासनकाल में चित्रकला का जो विकास हुआ, उसमें अकबर की व्यक्तिगत रूचि का महत्वपूर्ण योगदान है। अबुल फजल ने लिखा है, “सम्राट ने अपने यौवन के प्रारम्भ से ही इस कला में विशेष रूचि प्रदर्शित की है। वह इसे प्रत्येक रूप में प्रोत्साहन देता है, क्योंकि वह इसे अपने अध्ययन और मनोरंजन का साधन मानता दरोगा और मुन्शी सप्ताह में एक बार चित्रकारों के चित्र सम्राट के सामने प्रस्तुत करते हैं। वह उनकी कला के अनुसार उन्हें पुरस्कृत करता अथवा उनका मासिक वेतन बढ़ाता है।” अकबरकालीन चित्रकला को सुविधा के लिए चार भागों में विभक्त किया जा सकता है। (i) चित्रपट (Rol), (ii) ग्रन्थ-चित्र (Miniatures), (iii) व्यक्ति-चित्र (Portraits), तथा (iv) भित्ति-चित्र (Frescos)।

चित्रपट- ‘हम्जानामा’ अकबर के समय की प्रारम्भिक कृति है जिसके चित्र चित्रपट की श्रेणी में आते हैं। ये चित्र ईरानी-शैली से प्रभावित हैं, परन्तु वेशभूषा भारतीय है। सूती कपड़े पर निर्मित ये चित्र चित्रपट के परम्परानुकूल बनाये गये हैं।

ग्रन्थ-चित्र- ग्रन्थ-चित्र अकबर द्वारा अनुवादित हिन्दू ग्रन्थों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। महाभारत में अनेक चित्रों को अकबर ने बनवाया। रामायण के अनुवाद को भी चित्रित किया गया तथा अबुल फजल कृत ‘पंज-तन्त्र’ के अनुवाद को ‘अयार दानिश’ नाम देकर चित्रित किया गया। ऐतिहासिक ग्रन्थों में ‘तारीखे खानदाने तिमूरिया’, ‘तुजके बाबरी’ का फारसी अनुवाद, ‘अकबरनामा’, ‘तारीखे रशीदी’ और ‘खम्सा निमाजी’ आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ चित्रित किये गये थे। डॉ० रामनाथ ने लिखा है, “अकबर के पुस्तकालय में लगभग तीस हजार पुस्तकें थीं, जिनमें सैकड़ों ग्रन्थ चित्रित थे। इससे उस महान सम्राट ने चित्रकला को प्रोत्साहन दिया, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।”

व्यक्ति-चित्र- अकबर ने व्यक्ति-चित्रों को भी प्रोत्साहन दिया। उसके समय में अनेक मानव-चित्रों को बनाकर संग्रहित किया गया। डॉ० रामनाथ ने लिखा है, “सम्राट ने स्वयं अपना व्यक्ति-चित्र बनवाया और आदेश दिया कि राज्य के बड़े अधिकारी भी अपने-अपने व्यक्ति-चित्र बनवायें। व्यक्ति-चित्रों की एक बड़ी एलबम तैयार की गयी। जिनकी मृत्यु हो गयी वे इन व्यक्ति-चित्रों के द्वारा जीवित हो गये और जो अभी जीवित हैं वह अमर हो गये।”

भित्ति-चित्र- फतेहपुरसीकरी के अनेक भवनों में अकबरकालीन भित्ति-चित्र हैं। दीवारों पर बनाये गये चित्र ग्रन्थ-चित्रों के समान हैं। मुख्य चित्र खेल, शिकार अथवा उत्सवों के उत्कीर्ण किये गये हैं। प्रकृति एवं देवी-देवताओं का भी चित्रण कहीं-कहीं देखने को मिलता है। ख्वाबगाह और रंगीनमहल की दीवारों पर इनके अवशेष अभी शेष हैं।

अकबर कालीन चित्रकला

शैली की विशेषताएँ-अकबर के युग में विकसित चित्रकला-शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् थीं।

  1. चित्रों की भाव-भंगिमा के साथ-साथ गुणों को भी प्रदर्शित किया जाता था।
  2. फारसी शैली के पेड़-पौधों और फूल-पत्तियों को पृष्ठभूमि में दर्शाया जाता था।
  3. चित्रों में छाया और प्रकाश के नियमों का ध्यान रखा जाने लगा था।
  4. चित्रों में सजीवता आ गयी थी।
  5. चमकदार रंगों का प्रयोग किया जाता था।

अबुल फजल अकबरकालीन चित्रकला के सम्बन्ध में लिखता है, “सूक्ष्म भावों का प्रदर्शन, कला की श्रेष्ठता, सामान्य स्पष्टता आदि जो इस युग के चित्रों में हैं, अद्वितीय है। निर्जीव वस्तुएँ सजीव प्रतीत होती थीं।” वी०ए० स्मिथ लिखते हैं, “केवल साउथ केनर्सिग्टन में ही अकबरनामा के हस्ताक्षरयुक्त जो चित्र हैं, वहीं अकबर के शासनकाल के प्रत्येक मुख्य चित्रकार के गुणों के आलोचनात्मक परीक्षण के लिए पर्याप्त होंगे। लेकिन किसी भी आधुनिक आलोचक ने अभी तक इस युग के विभिन्न रेखाकारों और चितेरों की शैलियों का सही विश्लेषण करने का प्रयास नहीं किया है।”

शाहजहाँ कालीन चित्रकला

शाहजहाँ का युग स्थापत्य-कला का स्वर्ण-युग था इसलिए चित्रकला को उसने अपने दरबार में संरक्षण तो दिया परन्तु प्रोत्साहन नहीं दिया। दरबार में शाही चित्रकारों की संख्या कम हो गयी। पर्सी ब्राउन ने लिखा है, “शाहजहाँ के गद्दी पर बैठने के साथ ही चित्रकला में पतन के युग का प्रारम्भ हुआ” शाहजहाँ के युग में चित्रकला में सजीवता, सरसता और मौलिकता समाप्त हो गयी थी परन्तु प्रान्तों में सामन्तों के शक्तिशाली प्रभुत्व के अन्तर्गत यह कला फिर भी उत्तरोत्तर विकसित होती रही। अनेक चित्रकारों ने मुगलों के दरबार से हट जाने के कारण बड़े-बड़े सामन्तों एवं जमींदारों के यहाँ आश्रय प्राप्त किया। कुछ चित्रकारों ने बाजार में चित्र-शालाएँ खोल लीं और जीविकोपार्जन के लिए साधारण जनता के लिए चित्र बनाने लगे। इस प्रकार शाही महलों की कला और कलाकार दोनों जनसाधारण की वस्तु बन गये।

गहरे रंगों का प्रयोग- शाहजहाँ ने अपने दरबार में बचे हुए चित्रकारों को राजमहल एवं राजसभा को चित्रित करने का कार्य सौंपा। शाहजहाँ के दरबारी चित्रों में गहरे रंगों और स्वर्ण का अत्यधिक प्रयोग है। चित्रों में स्वाभाविक सौन्दर्य का स्थान कृत्रिमता ने ले लिया है। कहीं-कहीं

रंगों के स्थान पर रत्न और मणियों के प्रयोग से कला को अत्यन्त बोझिल बना दिया गया है। पर्सी ब्राउन की मान्यता है कि “गहरे और भड़कीले रंगों का प्रयोग जो शाहजहाँ के युग की विशेषता थी, कला के पतन की परिचायक थी।”

व्यक्ति-चित्र- शाहजहाँ के काल में भी कुछ व्यक्ति-चित्रों का निर्माण हुआ जो चित्रकला की दृष्टि से अच्छे स्वीकार किये गये हैं। व्यक्ति-चित्र स्थिर मुद्रा में बनाये जाते थे और उनकी प्रतियाँ स्टेन्सिल से तैयार की जाती थीं। मानव-चित्रों की भांति पशु-पक्षियों के चित्रों में भी कृत्रिमता का बोलबाला था। स्वाभाविक और प्रकृति-चित्रों के स्थान पर पशु-पक्षियों के ऐसे चित्र इस समय में बनाये गये जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था। मानों स्वयं पशु-पक्षी चित्र बनवाने के लिए उपस्थित हुए हों।

शाहजहाँ के दरबार के चित्रकारों में फकीर उल्ला को प्रथम स्थान प्राप्त था। इसके अतिरिक्त मीर हाशिम, अनूप और चित्रमणि आदि अन्य प्रसिद्ध चित्रकार थे। सामान्यतः यह काल चित्रकला के पतन का था। डॉ० रामनाथ ने लिखा है, “वास्तुकला में सम्राट की मूल रूचि के फलस्वरूप इस युग के चित्रों में वास्तु-विषयों का बाहुल्य हो जाता है।”

डॉ० मोतीचन्द ने लिखा है, “निरन्तर बनाते रहने से शाहजहाँ के काल की चित्रकला-शैली में चित्रों की रेखाकृतियाँ बहुत ही बारीक खींची जाने लगी थीं। रेखाओं को मुक्त रूप से नहीं खींच दिया जाता था वरन उनका अध्ययन किया जाता था। सौन्दर्य एवं नाजुकता की अभिव्यक्ति को सबसे अधिक महत्व दिया जाता था। कहीं-कहीं ये रेखाएँ इतनी बारीक हो गयी हैं कि कुँची के बारीक प्रयोग को देखने के लिए आतिशी शीशे की आवश्यकता पड़ जाती हैं।”

औरंगजेब कालीन चित्रकला

औरंगजेब की कट्टरता एवं धर्मान्धता के कारण चित्रकला के पतन का युग प्रारम्भ हुआ। राजाश्रय छिन जाने के बाद भी चित्रकला का पूर्ण रूप से पतन नहीं हुआ, क्योंकि छोटे स्थानीय राजाओं और सामन्तों का उदार संरक्षण उसे मिलता रहा। कुरान के अनुसार चित्रकला के संरक्षण प्रदान करना वर्जित था, परन्तु फिर भी, औरंगजेब के अनेक चित्र प्राप्त हुए हैं जिनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि चित्रकला को कोई प्रोत्साहन न देने के बाद भी वह अपने चित्र बनवा लेता था।

औरंगजेब चित्रों के निर्माण में ही बाधक सिद्ध नहीं हुआ अपितु उसने पूर्वनिर्मित अनेकानेक चित्रों को नष्ट करने का भी प्रयत्न किया। बीजापुर व गोलकुण्डा में बने हुए चित्रों को उसने नष्ट करवा दिया और अकबर के मकबरें में चित्रों को छिपाने के लिए उसने सफेदी पुतवा दी। इस प्रकार चित्रकला को प्रोत्साहन देने के स्थान पर उसे ध्वंस करने का उसने प्रयास किया। अमीरों के संरक्षण में चित्रकारों ने जो कलाकृतियों बनायी वह धन और प्रोत्साहन के अभाव में अत्यन्त निम्न स्तर की रह गयी थीं। औरंगजेब के उत्तराधिकारी फर्रुखसियार (1713-1719 ई०) ने चित्रकला को पुनः संरक्षण प्रदान किया और अनेक चित्रों का निर्माण कराया जो कलात्मक एवं सजावट में पूर्व-मुगलकाल के चित्रों से अत्यन्त निम्न कोटि के थे।

लखनऊ हैदराबाद, मैसर और अवध के प्रान्तीय राजवंशों के उदार संरक्षण के कारण इस कला का पुनर्जन्म हुआ परन्तु यह कला मुगलकालीन चित्रकला की परछाई मात्र थी। इस पर यूरोप की कला का अत्यधिक प्रभाव था और शीघ्र ही इसका अन्त भी हो गया।

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