भक्ति-आन्दोलन के प्रमुख सन्त

भक्ति-आन्दोलन के प्रमुख सन्त एवं उनकी विचारधारा

भक्ति-आन्दोलन के प्रमुख सन्त एवं उनकी विचारधारा

रामानुज

भक्ति-आन्दोलन के प्रथम महत्वपूर्ण सन्त रामानुज थे। इनका जन्म 1017 ई० में त्रिपुती नगर (आन्ध्र प्रदेश) में हुआ था। यह दक्षिण भारत के प्रसिद्ध वैष्णव धर्म-प्रचारक थे। प्रारम्भ में यह शंकराचार्य के सिद्धान्तों के समर्थक थे; परन्तु कालान्तर में इन्होंने शंकराचार्य के अद्वैतवाद का खण्डन किया तथा विशिष्टाद्वैतवाद का प्रचार करना प्रारम्भ किया। इनका मानना था कि

ये परमात्मा अद्वितीय रूप में महान है। वह जन्मदाता, पालक एवं संहारक है। ये सगुण ईश्वर के उपासक थे तथा इच्छा-रहित भक्ति पर बल देते थे। इनका कथन था कि शूद्र भी गुरु की इच्छा के सम्मुख समर्पित होकर मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं परन्तु डॉ० युसुफ हुसैन ने लिखा है कि उन्होंने अपने उपदेश संस्कृत भाषा में दिये और उच्च वर्ग के हिन्दुओं को अपना शिष्य बनाया और शूद्रों को यह अवसर नहीं दिया।

निम्बार्काचार्य

भक्ति-आन्दोलन के दूसरे प्रमुख सन्त निम्बार्क थे। ये रामानुज के समकालीन थे। इनका जन्म मद्रास में हुआ था। इन्होंने अद्वैतवादी दर्शन का खण्डन किया। ये राधा और कृष्ण के उपासक थे। इन्होंने ‘भेदाभेद’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। इनका मानना था कि ब्रह्म सर्वशक्तिमान है। सगुण ब्रह्म ही ईश्वर है। जीव, जगत और परमात्मा इनकी दृष्टि में एक होते हुए भी भिन्न थे।

माधवाचार्य

तेरहवीं शताब्दी के प्रमुख सन्त माधवाचार्य भक्ति-आन्दोलन के प्रमुख सन्त थे। ये द्वैतवाद के समर्थक थे। इनके द्वैतवाद का आधार भागवद् पुराण था। ये विष्णु के उपासक थे। इन्होंने ईश्वर और जगत दोनों को सत्य बताया। आवागमन के बन्धन से मुक्ति प्राप्त करने का मार्ग इन्होंने भक्ति को बताया तथा भक्ति-मार्ग से मोक्ष प्राप्त करने के लिए लोगों को प्रेरित किया। शंकराचार्य से माधवाचार्य तक के सभी सन्त दक्षिण के थे।

रामानन्द

उत्तरी भारत में भक्ति-आन्दोलन के प्रथम प्रसिद्ध सन्त रामानन्द हुए। इनका जन्म प्रयाग में कान्यकुब्ज परिवार में हुआ था। इन्होंने प्रयाग और बनारस में शिक्षा प्राप्त की थी और कई स्थानों का भ्रमण किया था। ये रामानुज के शिष्य थे। इन्होंने जाति-भेद का खण्डन किया और भारतीय समाज में प्रचलित कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। इन्होंने स्त्रियों को धार्मिक विचार-विमर्श में भाग लेने दिया। इनके 12 प्रसिद्ध शिष्यों में उच्च वर्ग के लोगों के अतिरिक्त धन्ना नामक जाट, सेना नाई, रैदास चमार और कबीर जुलाहा था। इस प्रकार रामानन्द ने वैष्णव धर्म के द्वार सभी वर्गों के लिए समान रूप से खोल दिये थे। वे राम के अनन्य भक्त थे। उनका कथन था कि सभी व्यक्ति ईश्वर के भक्त हैं, अतः भाई-भाई है। इन्होंने अपने विचारों के प्रसार के लिए हिन्दी को माध्यम बनाया। इससे पूर्व संस्कृत में उपदेश दिये गये जिन्हें जनसाधारण समझने में पूर्ण रूप से असफल रहा। जहाँ एक ओर हिन्दी के माध्यम से प्रचार करने पर जनसाधारण का कल्याण हुआ वहीं दूसरी ओर हिन्दी-साहित्य के विकास में भी एक महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त हुई।

रामानन्द के प्रयासों से भक्ति-आन्दोलन ने एक लोकवादी रूप प्राप्त किया। जाति-प्रथा के बन्धन शिथिल हो जाने के कारण शूद्रों में भी जागृति हुई। यद्यपि उन्होंने कोई स्थापित मान्यता भंग नहीं की, परन्तु उनकी उदार सहिष्णु नीति के परिणामस्वरूप जाति-बन्धन शिथिल हुए और समाज में आपसी सहयोग की भावना का उदय हुआ। डॉ० यूसुफ हुसैन ने लिखा है, “अपने भ्रमण के समय में रामानन्द ने इस्लामी विचारों का ज्ञान अवश्य प्राप्त किया होगा और सम्भवतः वे उनसे अज्ञात रूप से प्रेरित भी थे।”

वल्लभाचार्य

इनका जन्म वाराणसी में हुआ था। बाल्यकाल में ही इन्होंने प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों का विस्तृत अध्ययन कर लिया था। प्रारम्भ में इन्हें विजयनगर के शासक कृष्णदेव का संरक्षण प्राप्त था परन्तु बाद में इन्होंने वृन्दावन को अपना केन्द्र बनाया और गृहस्थ-जीवन में प्रवेश किया। आध्यात्मिक एवं बौद्धिक चिन्तन करते। हुए इन्होंने कहा कि जीव भी उतना ही सत्य है जितना कि ब्रह्म, क्योंकि जीव ब्रह्म का ही एक अंश है। इन्होंने भक्ति-मार्ग को ही मोक्ष-मार्ग बताया और सगुण ब्रह्म की भक्ति पर विशेष बल दिया। वल्लभाचार्य के विचारों ने धार्मिक क्रान्ति के साथ-साथ ललित-कलाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की।

कबीर

रामानन्द के शिष्यों में कबीर का नाम सर्वप्रसिद्ध है। वह भक्ति-आन्दोलन के महत्वपूर्ण प्रवर्तक थे। इनके प्रारम्भिक जीवन के सम्बन्ध में अनेकानेक विवाद प्रचलित है। यह कहा जाता है कि इनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी की कोख से हुआ था जिसने लोक-लाज के भय से इन्हें लहरतारा नामक तालाब के किनारे पर फेंक दिया था। नीरू नामक एक मुसलमान जुलाहा इन्हें उठाकर ले गया और उसने इनका पालन-पोषण किया। इनकी जन्मतिथि विवादास्पद है परन्तु 15वीं शताब्दी के अन्तिम चरण को इनका जन्म स्वीकार किया जाता है।

कबीर ने अपने उद्देश्यों के माध्यम से हिन्दू मुस्लिम एकता स्थापित करने का हर सम्भव प्रयास किया। वे चाहते थे कि दोनों धर्मों के अनुयायी धर्म के वास्तविक अर्थ और स्वरूप को भली प्रकार समझ लें ताकि उनमें व्याप्त परस्पर द्वेष समाप्त हो जाये। कबीर की मान्यता थी कि दोनों धर्म आडम्बरों में उलझे हुए हैं। यदि उनमें व्याप्त दोषों को दूर कर दिया जाये, तब अवश्य ही वे एक-दूसरे के निकट आ जायेंगे और ईश्वर के सच्चे स्वरूप को पहचान लेंगे।

नानक

भक्ति-आन्दोलन के एक अन्य प्रमुख सन्त नानक थे। इनकी विचारधारा कबीर से मिलती-जुलती थी। अन्तर केवल इतना था कि कबीर अनपढ़ थे जबकि नानक को हिन्दी और फारसी का पर्याप्त ज्ञान था।

कबीर के समान नानक भी हिन्दू धर्म में सुधार करने के पक्षपाती थे। उनके उपदेशों का सार था कि संसार में न कोई हिन्दू है और न मुसलमान, अपितु सब उस एकमात्र परम शक्तिशाली परमात्मा की सन्तान है जो अनन्त, सर्वशक्तिमान, सत्य, कर्ता, निर्भय, निर्वेर, अयोनि, स्वयम्भू है।” अतः सबको बिना किसी जाति-पाँति के भेदभाव के प्रेम सहित निवास करना चाहिए, न कि धार्मिक संकीर्णता के कारण निरन्तर एक-दूसरे का विरोध करते रहना चाहिए।

चैतन्य कृष्ण के अनन्य भक्त थे। चैतन्य जातीय भेदभाव, कर्मकाण्ड तथा अन्धविश्वासों के विरोधी थे। वे कहा करते थे, “न मैं ब्राह्मण हूँ, न मैं क्षत्रिय हूँ, न मैं वैश्य या शूद्र हूँ, न मैं ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी या सन्यासी हूँ….मैं श्री कृष्ण के दास का भी दासानुदास हूँ।” चैतन्य ने कृष्ण-भक्ति का पाठ उच्च वर्ग को ही नहीं दिया अपितु शूद्रों को भी उन्होंने कृष्ण-भक्ति के लिए प्रेरित किया। वे पुरोहितों के नियंत्रण एवं धार्मिक आडम्बरों के विरुद्ध थे।

मीराबाई

मीराबाई की गणना सोलहवीं शताब्दी के प्रमुख सन्तों में की जाती है। मेड़ता के राठौर रतनसिंह की वह एकमात्र कन्या थी। उसका जन्म कुदकी गाँव (मेड़ता जिला) में हुआ था। 1516 ई० में उनका विवाह राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र युवराज भोजराज के साथ हुआ था। भोजराज की शीघ्र (1518-1523 के मध्य) मृत्यु के कारण युवावस्था में ही वह विधवा हो गयी थी।

तुलसीदास धर्मरक्षक के रूप में— तुलसीदास ने अपने समय में हिन्दू समाज में विद्यमान आन्तरिक बुराइयों को दूर करने का हर सम्भव प्रयास किया। वे इस्लाम के प्रसार से चिन्तित नहीं थे परन्तु हिन्दू धर्म को मजबूत चट्टान बनाना चाहते थे ताकि वह अन्य धर्मों द्वारा किये जाने वाले प्रहारों को सरलतापूर्वक सहन कर ले। इस सन्दर्भ में प्रो० शर्मा ने लिखा है, “उन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा अकबर और इस्लाम से न कर, हिन्दू धर्म के आन्तरिक शत्रुओं, मतान्तरों, द्वेष, कलह, अन्धविश्वास आदि से की थी।” इसीलिए अपने विश्व-प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से उन्होंने पाप की पुण्य पर और सत्य की असत्य पर विजय को दिखाकर हिन्दुओं के टूटे हुए दिल में आशा का संचार किया। वास्तव में तुलसीदास ने राम-राज्य है कि तुलसीदास अपने का आदर्श प्रस्तुत कर एक आदर्श राज्य का स्वरूप जनता के सामने प्रस्तुत किया। अतः स्पष्ट युग के महान नेता और सच्चे युगदृष्टा थे।

सूरदास

सूरदास उच्च कोटि के सन्त थे परन्तु वे उपदेशक या सुधारक नहीं थे। सूरदासजी के प्रारम्भिक जीवन के सम्बन्ध में कोई विशेष वर्णन प्राप्त नहीं होता है। इनकी तीन महत्वपूर्ण कृतियाँ थी जो अत्यधिक जनप्रिय सिद्ध हुई : (1) सूर सारावली, (2) साहित्य लहरी, (3) सूरसागर। ‘सूरसागर’ प्रेम और भक्ति से भरपूर ग्रन्थ है। इसमें श्रीकृष्ण के बाल्यकाल का अत्यन्त सुन्दर वर्णन किया गया है। सूरं के पदों ने लोगों को कृष्ण की भक्ति की ओर प्रेरित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

तुकाराम

इनका जन्म पूना के समीप देही में 1608 ई0 के लगभग हुआ। सांसारिक बन्धनों से विरक्त होकर ये संन्यासी बन गये। ये कबीर की विचारधारा के मानने वाले थे। ये ईश्वर को सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान मानते हैं। जाति-भेद, कर्मकाण्ड एवं धार्मिक आडम्बरों के ये विरोधी थे। छत्रपति शिवाजी भी इनके श्रद्धालु शिष्यों में से एक थे। मराठा राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि के निर्माण में आपने महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की थी।

दादू

इनका जन्म अहमदाबाद में हुआ। कई स्थानों पर भ्रमण करने के बाद आप नारैना चले गये। ये कबीरपन्थी थे। गुरु की श्रेष्ठता और हिन्दू-मुस्लिम एकता पर आपने विशेष बल दिया। भक्ति-आन्दोलन के अन्य प्रवर्तकों की भाँति आपने भी सामाजिक कुरीतियों, मूर्ति पूजा एवं जाति-भेद की भावनाओं का विरोध किया। धार्मिक पक्षपात उन्हें सहन हीं था। बी0 एन0 लूनिया ने लिखा है, “दादू विभिन्न विरोधी सम्प्रदायों को भ्रातृत्व और प्रेम में बाँधकर एक करना चाहते थे।” अतः उन्होंने एक अलग पंथ का निर्माण किया जो दादू पन्थ के नाम से प्रख्यात है।

इस प्रकार भक्ति-आन्दोलन के कुछ प्रसिद्ध हिन्दू सन्तों का जो उपर्युक्त वर्णन किया गया है उससे यह पूर्णरूपेण स्पष्ट हो जाता है कि इन सन्तों ने परस्पर विरोधी हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों में समन्वय और सामंजस्य स्थापित करने का हर सम्भव प्रयास किया। अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने समानता, भ्रातृत्व, एकेश्वरवाद और मूर्ति-पूजा-खण्डन के सिद्धान्तों का आविष्कार किया। साथ ही एक स्वस्थ समाज की स्थापना हेतु उन्होंने जाति-प्रथा, तीर्थयात्रा, कर्मकाण्ड, आडम्बर तथा छुआछूत की निन्दा की।

हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के विकास में जो महत्वपूर्ण योगदान सन्तों के द्वारा दिया गया उस पर प्रकाश डालते हुए डॉ० यूसुफ हुसैन ने लिखा है, “उनका उद्देश्य सामूहिक जीवन का एक नये प्रकार से निर्माण करना और एक ऐसे समाज की स्थापना करना था जिसमें सबको समानता और न्याय प्राप्त हो और जिसमें रहकर समस्त धर्मों के मनुष्य अपना पूर्ण नैतिक और आध्यात्मिक विकास कर सकें।”

भक्ति-आन्दोलन के प्रवर्तकों के अथक प्रयासों के कारण कुछ नवीन सम्प्रदायों का उदय हुआ जिसको हिन्दू एवं मुसलमान दोनों ने स्वीकार किया, फलतः दोनों संस्कृतियों को परस्पर समीप रहकर समन्वय के लिए नये अवसर प्राप्त हुए।

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