पुरातत्व (Archaeology)

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पुरातत्व 

पुरातत्व का अर्थ और परिभाषा 

पुरातत्व एक ऐसा अध्ययन है, जिसमें योजनाएँ एवं परिस्थितियाँ उत्खनन में महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है। साधारणतया इसे अध्ययन की वह विधा माना जाता है, जो पुराने काल की भूमि में गड़ी सामग्रियों को उजागर कर उनके सहारे हमारे अतीत को मुखरित करता है। पर यह जान लेने पर कि पुरातत्व क्या कुछ हमारे अतीत के इतिहास के लिए करता है यह भी जानना आवश्यक है कि पुरातत्व है क्या?

‘पुरातत्व’ शब्द अंग्रेजी के “आर्कियोलाजी” (Archaeology) का पर्यायवाची है। अंग्रेजी शब्द आर्कियोलाजी यूनानी भाषा के दो शब्दों के युग्म से बना है, ‘आर्कियोस’ (Archaios) लोगोस’ (Logos) आर्कियोस का अर्थ है- पुरातन तथा लोगोस का अर्थ है ज्ञान। इस प्रकार आर्कियोलाजी का अर्थ हुआ पुरातन ज्ञान । अत: जो विषय मनुष्य के प्रारम्भिक जीवन से सम्बन्धित हो वह पुरातत्व के अन्तर्गत आएगा। ‘पुरातत्व’ शब्द में पुरा+तत्व शब्दों का भी अभिप्राय ऐसा ही है, जो पुरातन तथ्यों का उजागर करता है। लेकिन आजकल पुरातत्व शब्द का प्रयोग शब्दिक अर्थों से भिन्न प्रयोग किया जाता है।

प्रारम्भ में रोम और यूनान के पुरानिधियों और पुरावशेषों से पुरातत्व का अभिप्राय लेते थे, क्योंकि वहाँ के संग्रहालयों में पुराववेशों के संरक्षण के संदर्भ में इसका प्रयोग होता था, पीछे इसका विकास हुआ। पहले इसका क्षेत्र था उपलब्ध पूर्व-रोमन पुरानिधियाँ। पर जैसे-जैसे अन्यत्र दबी सामग्रियाँ मिस्र, भारत, यूनान आदि के टीलों के नीचे से मिली तो इसके क्षेत्र में परिवर्तन आया। अब इसका तात्पर्य उन समस्त पुरानी वस्तुओं से किया जाने लगा जिसका निर्माता और प्रयोक्ता मानव रहा (पुरातत्व की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। विभिन्न विद्वानों ने इसे अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया।गोरेडन चाइड ने कहा है कि “पुरातत्व भौतिक अवशेषों के माध्यम से मानव के क्रियाकलापों का अध्ययन कहा जा सकता है।” इस प्रकार इसके द्वारा हमारा अतीत उजागर होता है तथा इसका एक कमबद्ध ज्ञान प्राप्त होता है।

अतीत के पुननिर्माण के लिए पुरावशेषों का व्यवस्थित अध्ययन ही पुरातत्व है। मनुष्य का बीता काल भी इसका अतीत है, पर यहाँ अतीत से अभिप्राय है। इतिहासकाल से पहले का काल जिसका कोई क्रमबद्ध लिखित ज्ञान उपलब्ध नहीं है। इसे प्रागैतिहासिक काल कहते हैं। पर इसके बाद भी जब तक अपठनीय लेखन मिलता है, इसे आद्य इतिहास काल कहते हैं और इसका भी आधार पुरातत्व ही होता है।

आगे बढ़कर मानव के अतीत के भौतिक अवशेषों को जोड़ कर ग्लिन डैनियल ने आर्कियोलाजी का प्रयोग दो संदर्भो में किया है।

(i) मानव के अतीत के भौतिक अवशेषों के अध्ययन के रूप में तथा

(ii) मानव के प्रागैतिहासिक काल से सम्बन्धित पुरावशेषों के अध्ययन के रूप में। यह एक व्यापक व्याख्या है। इसमें पुरातत्व के अध्ययन विषय के रूप में अतीत से आज तक की सामग्रियों को लिया गया है।

यहाँ प्रथम परिप्रेक्ष्य में पुरातत्त्व शब्द का व्यापक अर्थ है और दूसरे में इसके अन्तर्गत मात्र प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक काल के पुरावशेष सम्मिलित किए गए हैं । इस प्रकार इस परिभाषा के अन्तर्गत पाषाण काल से मानव जाति के विकास की व्यापक गाथा है, जिसे निम्न तीन क्रमिक कालों में विभाजित किया जा सकता है।

  1. प्री-हिस्टारिक युग ( पूर्व इतिहास काल)- यह लैटिक शब्द ‘श्री’ और हिस्ट्री’ को मिला कर बना है, जिसका तात्पर्य है लिखित इतिहास के पूर्व का काल ।
  2. प्रोटो-हिस्टारिक युग (पूर्व और इतिहासकाल के बीच का युग)- यह यूनानी शब्द ‘प्रोटो’ और हिस्ट्री के योग से बना है। नव पाषाण काल पूर्व इतिहास काल की अन्तिम कड़ी है, जहाँ से प्रागैतिहासिक काल प्रारम्भ हो कर कमिक इतिहास के प्रारम्भ के पूर्व तक माना जाता है।
  3. अर्ली हिस्टारिक युग (आद्यौतिहास काल)- इस काल में लिखना प्रारम्भ हो गया था पर साहित्य के विकास के न होने से लिखित इतिहास को ज्ञान नहीं मिलता।

इस प्रकार स्पष्ट है कि लेखन कला के पूर्व पनपने वाली संस्कृतियों का विवरण प्रस्तुत करना पुरातत्व का विषय है। इसी से डी० पी० भट्टाचार्या ने पुरातत्व को पारिभाषित किया है कि “शिक्षा की शाखा के रूप में पुरातत्व के अन्तर्गत इतिहास के उदय काल के पूर्व के मानव समाज और संस्कृतिक का अध्ययन और अन्वेषण किया जाता है।” इस प्रकार पुरातत्व वह शास्त्र है, जो भौतिक पुरावशेषों के आधार पर इतिहास काल के पूर्व के मानव की संस्कृतियों का अध्ययन करता है।

प्राचनी अवशेषे को जी० चाइल्ड ने दो श्रेणियों में विभाजित किया है-चल पुरावशेष और अचल पुरावशेष । इन्हीं के आधार पर लुप्त और अज्ञात संस्कृतियों का अध्ययन पुरातत्व करता है।

अब पुरातत्व केवल पुरातन ज्ञान को उजागर करनेवाला शास्त्र या विधि मात्र बन कर नहीं रहा गया है। आज के पहले की जो सामग्रियाँ हमें प्राप्त होती हैं अनेक आधारों पर इनकी वैज्ञानिक रीतियों से व्याख्या कर भार एवं सुरक्षा की व्यवस्था इसने अपने ऊपर लिया है। इसलिए इसकी परिधि सीमित न हो कर व्यापक हो जाती है। अत: इसके लिए रसायन शास्त्र भौतिक वनस्पति विज्ञान से जहाँ यह सहयोग की अपेक्षा करता है, वहीं नृशास्त्र इतिहास आदि को भी अपनी सीमा में रखता है। इन सबके सहारे पुराविद् को अपने निष्कर्षों को बढ़ाना होता है।

इसी से क्राफोर्ड नामक पुराविद ने इसको परिभाषित किया है। कि “पुरातत्व विज्ञान की वह शाखा है, जिसमें अतीत के गर्भ में विलुप्त मानव संस्कृतियों का अध्ययन किया जाता है और व्यवहार में उसका प्रभाव और उद्देश्य आदिकालीन तथा प्रागैतिहासिक संस्कृतियों का विवरण प्रस्तुत करता हैं।” इसके अनुसार पुरातत्व ज्ञान की वह शाखा है, जिसके द्वारा पुरावशेषों का अध्ययन कर उस काल के मानव संस्कृति के क्रम का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

यहाँ उल्लेखनीय है कि पुरातत्व में जो कुछ भी अध्ययन किया जाता है, वह विशेष रूप से प्रागैतिहासिक और आद्यैतिहास के विषय में होता है। ऐतिहासिक काल में यह उसकी अप्रामाणिक तथा उलझी कड़ियों को प्रामाणिकता देने, गुत्थी को सुलझाने और ज्ञान को आगे बढ़ाने में सहायक होता है। अतः पुरातत्व उस काल का विवरण प्रस्तुत करता है, जिसका कोई लिखित विवरण प्राप्त होता। इसमें स्मारकों, सिक्कों, मूर्तियों, गृह प्रयोगों की सामग्रियों, उपकरणों, मानव निर्मित, और प्रयुक्त उपयोगी, सामग्रियों का जो एक न्यवसित काल की होती है। अध्ययन किया जाता है। इसी से ‘आर्कियोलोजी इन इण्डिया’ नामक पुस्तक में इसकी परिभाषा दी गई है।

स्टूअर्ट पिगट के अनुसार, “आर्कियोलाजी के अन्तर्गत प्रधानत:मानवकृत भौतिक अवशेषों और पुरानिधियों का अध्ययन अतीत के इतिहास को समझने के लिए किया जाता है। चाहे ये पाषणकालीन पत्थर के उपकरण एवं औजार हों या मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े हों या मानवनिर्मित झोंपड़ी के भाग हों अथवा वास्तुकला से सम्बन्धित भव्य कलाकृतियाँ हो।”

 ओ० जी० एस० क्रोपर्ड के अनुसार, “पुरातत्व विज्ञान की वह शाखा है कि जिसमें अतीत के गर्भ में विलुप्त मानव संस्कृतियों का अध्ययन किया जाता है। इसी के सहारे विकास, क्रमिकता, काल-निर्धारण आदि अनेक पक्षों के अध्ययन में सहायक मिलती है।

इधर कुछ लोगों ने सांख्यिकी से इसे जोड़ कर इसका नाम नव पुरातत्व देने की वकालत की है। विनफोर्ड आदि ने इसमें बड़े पैमाने पर परीक्षण करने तथा सामान्य नियमों पर आधारित कल्पनाओं पर शोध नियमों के विकास की वकालत करना शुरू किया है। पर डॉ० भट्टाचार्य ने इसके स्थान प्रक्रियात्मक पुरातत्त्व विज्ञान को अधिक सही माना है, क्योंकि जो आज नया है वह कल नया नहीं रहेगा। पर साख्यिकी से जोड़ने के विरोध में यह मत उभरा है कि पुरातत्व वैज्ञानिकों के सामने अनेक ऐसे तथ्य उभरे हैं कि इसमें व्यवहारिकता की खोज ही वास्तविक उद्देश्य है। इसकी वास्तविक व्याख्य नियमबद्धता की परिक्रिया में नहीं हो सकती।

पुरातत्व का विषय क्षेत्र

मनुष्य अपने जन्मकाल से ही जीवन, संस्कृति और कला के विकास की ओर बढ़ता जा रहा है। उसने इनका विकास कब, कैसे और किस रूप में किया है इसका प्रकाशन ही इतिहास विषय है। -डॉ० परमेश्वरी लाल गुप्त। इसका प्रकाशन बहुत कुछ ऐतिहासिक युगों में पोथियों के माध्यम से हुआ है। पर ये पोथियाँ भारतीय मनीषियों द्वारा इतिहास के नाम से न हो कर धम्र ग्रन्थों, साहित्यिक रचनाओं के नाम में लिखी गई हैं। इनके लेखक भी प्राय: किसी न किसी धर्म या क्षेत्र के प्रभाव से प्रभावित होने के कारण यथातथ्य विवरण नहीं प्रस्तुत कर सके हैं। इसके भी पहले का ज्ञान लिखित रूप में आधा-अधूरा या पूर्वाग्रहग्रसित भी हमें प्राप्त नहीं होता, क्योंकि तब लेखन-कला का पूर्ण विकास नहीं हुआ था या लेखन कला से लोग अपरिचित थे। इस काल को क्रमश: आद्य-इतिहास तथा पूरा-इतिहास के नाम से जाना जाता है। इस काल का इतिहास पृथ्वी में छिपी सामग्रियों के मध्यम से ही ज्ञात होता है, जिन्हें पूराताविक सामग्रियाँ कहा जाता है। ये ऐसी सामग्रियाँ हैं, जो पृथ्वी के गर्भ में छिपी होती हैं जिनको उनके दबे स्थान से बाहर निकल कर, साफ कर उनके विषय में स्वयं उनकी भाषा के आधार पर समझना होता है। इस प्रकार अलिखित एवं लिखित दोनों ही कालों के इतिहास की रचना के ये मूल स्रोत हैं, जो मूक और समसामयिक होने के कारण अत्यन्त प्रामाणिक, निष्पक्ष और स्पष्ट विवरण देते हैं। इनमें वैज्ञानिक प्रयोग का भी सहारा लेना पड़ता है। इसका प्रयोग करने वाला पुराविद् कहलाता है, जो उनके सत्य के निरीक्षण और विस्तृत आलेखन के सिद्धान्त पर कार्य करता है।

पुरातत्व को आज मोटे रूप से पृथ्वी के तल से निकाली जाने वाली कलात्मक सामग्रियों, उपयोगी, वस्तुओं-जिन्हें अतीत में कभी प्रयोग किया था और उनके अवशेष युग पुरातन से धरती में दबे पड़े हैं, से जोड़ा जाता है। ये चाहे कलाकृतियों हों या युग पुरातन के भाग्नावशेष या प्रयोग का सामग्रियाँ जिनमें बर्तन भाण्डे से लेकर वस्त्रों के अवशेषों, अस्त्रों के दुकड़ों तक शामिल किए जाते हैं। इनसे एक और जहाँ न्यवसित लोगों की कलात्मक रुचि, विकासात्मक क्रिया का ज्ञान होता है, वहीं दूसरी ओर तत्कालीन संस्कृति का भी परिचय मिलता है। इसके अध्ययन में मूर्त के साथ कल्पना का सहारा लेने में पराविद् की सूक्ष्म पैठ की बात विशेष आवश्यक होती है। बिना इसके इन स्थल सामग्रियों की अपने समय में होने वाली क्रियाएँ न आगे बढ़ती हैं न तत्कालीन वित्रण ही पूर्ण रूप से उभर कर सामने आता है। जैसे मिट्टी में बनी गोल-गोल सुराखों के स्थान को देख कर पुराविद् अपनी काल्पनिक दृष्टि से ही उनको मकानों के प्रयोग में लाए गए बॉसों के गाड़ने का स्थान मानने को बाध्य होता है । यह मानना उसकी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति तथा प्रासंगिक कल्पना का एक महत्त्वपूर्ण अंग होता है। इस प्रकार वह पुरातत्व के अन्दर न केवल कलात्मक सामग्रियों की शैली और उपयोगिता का अध्ययन करता है। अपितु कल्पना के सहारे विधि का भी आकलन प्रस्तुत करता है।

सबसे पहले पुरातत्व से अभिप्राय था-केवल धरती में छिपी या ऊपर बिखरी कलात्मक सामग्रियों को इकट्ठा करके संग्रहालय में सजाना। यह क्रिया प्राचीन राम और यूनान के पुरास्थलों से प्राप्त सामग्रियों के संदर्भ में की जाती थी। तब वे ही पुरास्थल माने जाते थे तथा पुरातात्विक क्रियाएँ उन्हीं नगरों तक सीमित थी । वहाँ के पुरास्थलों से इनको इकट्ठा करके सजाने तथा सौन्दर्य प्रदर्शन के लिए उपयोग किया जाता थ। यद्यपि पश्चिमी यूरोप में इस प्रणाली से प्राप्त कलात्मक सामग्रियाँ वहाँ होने वाले अनेक व्याधातों के कारण विनष्ट हो चुकी थी। अत: पुरातन सभ्यता के अवशेष जो वहाँ के टीलों के गर्भ में छिपे थे, उनका पता लगाकर उन्हें खुदाइ के द्वारा बाहर किया गया और उनके आधार पर उस काल के इतिहास के निर्माण के प्रयास किया। इसी क्रम में सुमेरिया, बेबीलोनिया, हडप्पा आदि सभ्यताओं का ज्ञान हमकों प्राप्त हो सका।

सभ्यता के निर्माताओं तथा किसी देश के आदिम वासियों और उनके फैलाव का ज्ञान तथा किसी स्थान विशेष का इतिहास अपनी सदियों पुराना हो सकता है यह जानना एक बड़ी ही टेड़ी खीर है। ऐसा न अनुश्रुतियों के माध्यम से पता चला है न साहित्य की पुरानी पोथियों में ही इसका उल्लेख मिलता है। इसका ज्ञान खुराई में मिले नरकंकालों को प्रयोगशाला में ले जा कर वैज्ञानिक जाँच से होता है जहाँ इनकी कार्बन तिथि वैज्ञानिक विधि से निकाल कर उनकी तिथि निर्धारित की जाती है। इसी आधार पर यह भी बताया जाता है कि यह स्थान कब से न्यवसित है। यहाँ बसने वाले किस कबीले के लोग थे और उनमें बदलाव कैसे-कैसे आया। जैसे सिन्धु सभ्यता के कुएँ में मिले नर कंकालों के आधार पर कहा जाता है कि बाहरी लोगों के आक्रमण के कारण यहाँ की सभ्यता समाप्त हुई और आर्य सभ्यता का उदय हुआ।

वाल्टर टेलर नामक अमेरिकी के विद्वान् ने पुरातत्व का क्षेत्र मात्र साक्ष्य एकत्रित करने की प्रणाली एवं तकनीकों का समूह कहा है। पर यह बात अपने में पूर्ण गलत है। यह पुराविद् का ही कार्य है, जो उत्खनन में प्राप्त सामग्रियों को उसके परिवेश के आधार पर कल्पना के सहारे उसकी तत्कालीन व्याख्या प्रस्तुत करता है तथा उसको सभ्यता के क्रम में ला कर बैठाता है । इसकी वकालत हीलर ने की है। उनके अनुसार यह प्रत्यक्षतः तथ्यों की खोज करता है। इसके रिकार्ड में प्राप्त सामग्रियों को वह कल्पना के सहारे सजीव करता है और उनके आधार पर सभ्यता की लुप्त कड़ी को सुलझाता है।

जो सामग्रियाँ पृथ्वी के तल से जिस रूप में निकलती हैं, वे अपने में सदियों खोज के कारण विचित्रता लिए होती हैं। उनको साफ करना, वैज्ञानिक शोध देना, उनको ठीक से सुरक्षित रखना भी इसी की सीमा का कार्य अब हो गया है।

इस प्रकार आज पुरातत्ज्ञ न केवल कला-सामग्रियों की खोज करता है, और उनके प्रदर्शनार्थ संग्रहालयों तथा घरों में सजावट से सम्बन्धित है, न तथ्यों का पृथ्वी के तल से खुदाई कर उनका संकलन करता है, न केवल इतिहास की संरचना के लिए सामग्रियों का संचय और रिकार्ड तैयार करता है । वरन् इतिहास की रचना के लिए पुरातन युग को इतिहासकारों तक पहुँचाता है तथा इन प्राप्त सामग्रियों के आधार पर वैज्ञानिक विधि से ज्ञात इनकी तिथियों के सहारे काल निर्धारण करता है तथा उन सामग्रियों की जो सहस्राब्दियों से अपने क्रम से बिछड़ गई हैं कल्पना के सहयोग से सभ्यता की संरचना को क्रम में सजाकर सभ्यता का इतिहास बनता है।

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