बौद्ध धर्म का विकास एवं उसके पतन का कारण

बौद्ध धर्म का विकास एवं उसके पतन के कारण

बौद्धधर्म का विकास

गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात बौद्धधर्म का प्रचार बंद नहीं हो गया, बल्कि इसके विकास की प्रक्रिया और तीव्र हो उठी। बुद्ध की मृत्यु के कुछ वर्षों पश्चात राजगृह में बौद्धों की पहली सभा हुई, जिसमें बुद्ध के प्रधान शिष्य उपाली ने अपनी स्मृति से विनयपिटक (संघ के नियम) का पाठ किया। आनंद, बुद्ध के दूसरे प्रधान शिष्य, ने सुत्तपिटक (धर्म के सिद्धांत) का पाठ किया। इन्हें बाद में संगृहीत कर ग्रंथ का रूप दिया गया। अब इन्हीं को आधार मानकर संघ का संगठन किया गया और धर्म का प्रचार हुआ। बौद्धों की दूसरी सभा बुद्ध की मृत्यु के एक शताब्दी पश्चात वैशाली में हुई। इस सभा में मठीय अनुशासन से संबद्ध बातों पर मतभेद हुआ, जिसके परिणामस्वरूप संघ दो वर्गों में विभक्त हो गया। परंपरावादी स्थविरवादी कहलाए और जो नई परिस्थितियों से समझौता करते हुए संघ के संगठन में परिवर्तन चाहते थे, उन्हें महासंधिक कहा गया। बौद्धों की तीसरी सभा पाटलिपुत्र में सम्राट अशोक के संरक्षण में बुलाई गई। इस सभा में भी अनेक मतभेद पैदा हुए, परन्तु अंततः स्थविरवादियों की जीत हुई और रूढ़िवादी संप्रदाय के रूप में यह प्रतिष्ठित हुआ। अशोक ने इस सभा में विशेष दिलचस्पी ली। इसी सभा में संघ में फूट डालने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का निश्चय हुआ। इस सभा में अभिश्रम्मपिटक (दार्शनिक व्याख्या) को अंतिम रूप दिया गया। अशोक के समय तक अनेक विहारों की स्थापना हो चुकी थी। प्रो० ए० एल० बैशम के अनुसार, “धर्म का रूप ग्रहण करने में बौद्धधर्म ने उस समय की सभी लोकप्रचलित आस्थाओं से कुछ प्राप्त किया तथा उसकी अनुरूपता ग्रहण की।” बौद्धों ने चैत्यों की उपासना-पद्धति को अपना लिया। कहा जाता है कि स्वयं अशोक ने 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया। बोधिवृक्ष की यात्रा भी बौद्धों का एक पावन कर्तव्य बन गया। बौद्ध के जीवन से संबद्ध अन्य स्थल- कपिलवस्तु, सारनाथ तथा कुशीनगर-भी धार्मिक स्थल के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। स्वयं बौद्धधर्म इस समय तक एक समर्थ धर्म के रूप में स्थापित हो चुका था।

मौर्य साम्राज्य के पतन के तत्काल बाद यद्यपि बौद्धधर्म को नव-ब्राह्मणवाद के उदय और पुष्यमित्र शुंग के अत्याचारों का सामना करना पड़ा, तथापि इससे इसकी लोकप्रियता में कोई विशेष कमी नहीं हुई। स्तूपों और विहारों का निर्माण तथा धर्मप्रचार का कार्यक्रम पूर्ववत चलता ही रहा। उसी समय बौद्धों के सौभाग्य से कनिष्क जैसा सम्राट हुआ, जिसने बौद्धधर्म के एक नए रूप का विकास किया। ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में बौद्धधर्म मध्य एशिया तक पहुँच गया। धर्म के इस प्रसार में व्यापारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। कश्मीर और मथुरा में बौद्धों के एक दूसरे संप्रदाय श्रावस्तीवादी का प्रचार हुआ। कनिष्क की संरक्षकता में बौद्धों की चौथी और अंतिम सभा हुई। इस समय तक बौद्धधर्म में अनेक मतों का विकास हो चुका था। चौथी सभा में ये विवाद पुनः उभरकर सामने आए। फलतः, इसी सभा में बौद्धधर्म दो शाखाओं – हीनयान और महायान-में विभक्त हो गया। हीनयानी अब भी बौद्धधर्म की प्राचीन परम्परा को बनाए रखना चाहते थे, परन्तु महायानी अब युद्ध को ईश्वर के रूप में देखने लगे। फलतः बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण कर (गांधार और मथुरा शैली में) उनकी पूजा की व्यवस्था की गई। महायान बौद्धधर्म अधिक उदार और विकासशील था। इसने तत्कालीन परिवर्तनों को आत्मसात कर धर्म को एक नया स्वरूप दिया। इस समय से महायान धर्म का ही प्राचार अधिक हुआ; हीनयान का महत्व घटने लगा। भारत में इसका प्रभाव कम हो गया, परन्तु श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में यह अपना अस्तित्व बनाए रख सका। महायान-संप्रदाय का प्रचार मध्य एशिया, चीन एवं जापान में हुआ।

गुप्त साम्राज्य के अधीन बौद्धधर्म के विकास को पुनः धक्का लगा, क्योंकि अधिकांश गुप्त-शासकों ने ब्राह्मणधर्म को ही प्रश्रय दिया; तथापि इसका प्रभाव पूर्णतः लुप्त नहीं हुआ। सातवीं शताब्दी के चीनी यात्री हुएनसांग के विवरण से ज्ञात होता है कि कन्नौज, नालंदा और बंगाल में इस धर्म का गौरव पूर्ववत बना हुआ था; परन्तु स्वातघाटी, गांधार, कश्मीर, पंजाब, मध्यक्षेत्र, मथुरा, कौशाम्बी, बनारस, पाटलिपुत्र आदि जगहों में इस धर्म का प्रभाव कमजोर हो गया था। पहले के बौद्धविहार अब वीरान एवं खंडहर बन चुके थे और उनमें रहने वाले भिक्षुओं की संख्या घट गई थी। विहारों से अधिक संपन्न और अधिक संख्या में मंदिर थे। इसका कारण था कि हर्षवर्द्धन के पश्चात और उसके राज्य के बाहर किसी भी प्रभावशाली शासक ने इस धर्म को प्रोत्साहन नहीं दिया। आठवीं शताब्दी से तांत्रिक प्रभाव के कारण महायान धर्म का रूप भी परिवर्तित हो गया। अब वह वज्रयान, सहजयान या मंत्रयान के रूप में विख्यात हो गया। ब्राह्मणधर्म की ही तरह बौद्धधर्म का स्वरूप भी कर्मकांडी हो गया। वस्तुतः, ब्राह्मणधर्म और बौद्धधर्म की विभाजक रेखा ही समाप्त हो गई। फलतः ब्राह्मणधर्म के पुनरुत्थान ने बौद्धधर्म को गौण बना दिया। फिर भी, पाल-शासकों के संरक्षण में बंगाल और बिहार में वज्रयान-शाखा का विकास हुआ। नालंदा और विक्रमशिला महाविहार इसके प्रमुख केन्द्र थे। कालांतर में बौद्धधर्म मात्र विहारों तक सीमित रह गया। 11-12वीं शताब्दी के तुर्क आक्रमणकारियों ने इन विहारों को नष्ट कर बौद्धधर्म का बचा-खुचा प्रभाव भी समाप्त कर दिया। नालंदा, विक्रमशिला, उदयंतपुरी और अन्य केंद्र नष्ट हो गए। बड़ी संख्या में बौद्धभिक्षु मारे गए। जो बच गए वें नेपाल तथा तिब्बत भाग गए। भारत से इस धर्म का व्यापक प्रभाव समाप्त हो गया और यह फिर कभी अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त नहीं कर सका।

बौद्धधर्म के पतन के कारण

जिस प्रकार बौद्धधर्म के विकास को अनेक कारणों ने प्रभावित किया था, उसी प्रकार इसके पतन के लिए भी अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित

  1. बौद्धधर्म में प्रविष्ट बुराइयाँ

    बौद्धधर्म का उन्दव एवं विकास ब्राह्मणधर्म में प्रचलित दुर्गुणों की प्रतिक्रिया का परिणाम था। इसलिए, आरम्भ में इस धर्म को जनता का समर्थन मिला, परन्तु कालांतर में इस धर्म में भी वे ही दुर्गुण प्रविष्ट हो गए, जिनका इसने विरोध किया था। फलतः, यह अपनी उपयोगिता और लोकप्रियता खो बैठा। बुद्ध के पश्चात इस धर्म में भी अनेक आडंबरों का प्रवेश हो गया। महायानियों ने बुद्ध को एक देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया, उनकी मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा करने लगे। इतना ही नहीं, अनेक वैदिक देवताओं को भी बौद्धों ने अपना लिया। 6-7वीं शताब्दी से तांत्रिक प्रभाव के कारण इसका स्वरूप और भी विकृत और दूषित हो उठा। वस्तुतः बौद्धधर्म के विकास ने बौद्धधर्म और ब्राह्मणधर्म के विभाजन को मिटा दिया। यौगिक क्रियाओं के संपादन, धार्मिक क्रियाकलाप और अनुष्ठानों तथा मंत्रों ने हिन्दूधर्म और बौद्धधर्म को समान स्तर पर ला दिया। फलतः बौद्धधर्म अपना आकर्षण खो बैठा। तथाकथित नए धर्म की तरफ आकृष्ट होने की अपेक्षा जनता ने नव-ब्राह्मणधर्म को ही अपनाना उचित समझा।

  2. संघ का भ्रष्टाचारपूर्ण जीवन

    आरम्भ में बौद्धसंघ का संगठन धर्मप्रचार हेतु किया गया था। संघ के सदस्यों के लिए आचरण-संबंधी कठोर नियम बनाए गए थे, जिससे सदाचारी जीवन व्यतीत करते हुए वे धर्म का प्रचार कर सकें; परन्तु बौद्धधर्म के स्वरूप में परिवर्तन होने से संघीय जीवन में भी बदलाव आया। इस परिवर्तन के अनेक कारण थे। सबसे प्रमुख कारण था- इन संघों को दान में मिलनेवाला धन। धनी व्यापारियों के दान से संघ साधनसंपन्न हो गए।

  3. फलतः बौद्ध भिक्षु आदर्शमय जीवन त्याग कर भोग

    विलास की जिंदगी व्यतीत करने लगे। संघ में स्त्रियों के प्रवेश ने पतन की प्रक्रिया और भी तेज कर दी। भिक्षु-भिक्षुणी सदाचारी जीवन व्यतीत न कर भ्रष्टाचारी बन गए। वज्रयान-संप्रदाय के विकास ने शारीरिक सुख एवं मादक द्रव्यों के सेवन को सहज और व्यावहारिक बना दिया। फलतः, संघ के सदस्यों का जीवन-दर्शन ही बदल गया। संघ परस्पर विवाद और कलह के भी अड्डे बन गए। इन कारणों से जन-समुदाय का विश्वास और उनकी श्रद्धा बौद्धधर्म से समाप्त हो गई और धीरे-धीरे वे अपना महत्व खो बैठे।

  4. नएनए संप्रदायों का उदय

    बौद्धधर्म के पतन का एक प्रधान कारण था इसकी एकता का खंडित होना। बुद्ध की मृत्यु के पश्चात बौद्धों में आपसी विभेद उठ खड़ा हुआ।  वैशाली की सभा में ही यह विवाद प्रकट हुआ, जिसके परिणामस्वरूप स्थविरवादियों और महासंधियों का उदय हुआ। दोनों के विभेद चौथी सभा में स्पष्ट रूप से ऊभरकर सामने आए। फलतः बौद्धधर्म दो प्रमुख संप्रदायों-हीनयान और महायान में विभक्त हो गया। धीरे-धीरे हीनयान का प्रभाव कम होता गया और यह भारत से विलुप्त हो गया। महायान भी अपने वास्तविक स्वरूप में नहीं बना रह सका। आठवीं शताब्दी से तांत्रिक प्रभाव के कारण इसका स्वरूप भी परिवर्तित हो गया। प्रमुख संप्रदायों के अतिरिक्त अन्य छोटे-बड़े संप्रदायों का भी उदय हुआ। इनके आपसी विरोध और कलह ने जनता को इस धर्म से विमुख कर दिया और इसका पतन अवश्यंभावी बना दिया।

  5. संस्कृत का सहारा लेना

    आरंभिक अवस्था में बौद्धधर्म की अपार सफलता का एक कारण यह था कि इसने जनसाधारण की भाषा-पालि के माध्यम से प्रचार-कार्य किया। बौद्धों के ग्रंथ भी पालि-भाषा में ही लिखे गए थे। अतः, जनसाधारण के लिए बौद्धधर्म सरल और ग्राम बना रहा; परन्तु कालांतर में महायान-सम्प्रदाय के उदय के पश्चात बौद्धों ने भी दुरूह और कठिन संस्कृत भाषा का सहारा लिया। बौद्धग्रंथों की रचना भी संस्कृत में होने लगी। इससे इसका व्यापक और लोकप्रिय स्वरूप कमजोर पड़ने लगा। वज्रयान-संप्रदाय के उदय के साथ बौद्धों का संस्कृत से संबंध और भी गहरा हो गया। जनसाधारण धर्म की गूढ़ बातों को समझने में असफल रहा और उसने इस धर्म से अपना संबंधविच्छेद कर लिया।

  6. राज्याश्रय की समाप्ति

    राज्याश्रय की समाप्ति से भी बौद्धधर्म के विकास को गहरा धक्का लगा। प्रारम्भ में राजकीय संरक्षण के कारण इसे फैलने में बहुत मदद मिली थी। अशोक और कनिष्क ने इसे अपनाकर इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके पश्चात कोई भी ऐसा शासक नहीं हुआ, जो इस धर्म के विकास में पूरी अभिरुचि लेता। उलटे शुंग और गुप्त-शासकों ने ब्राह्मणधर्म को प्रश्रय दिया। यद्यपि हर्षवर्द्धन ने पुनः बौद्धधर्म को अपनाकर इसकी प्रतिष्ठा स्थापित करने की कोशिश की, तथापि यह धर्म उत्तरप्रदेश और बिहार के बाहर प्रगति नहीं कर सका। हर्षवर्द्धन भी इसे पूर्ण संरक्षण नहीं दे सका। दक्षिण के शासकों ने भी ब्राह्मण धर्म को ही बढ़ावा दिया। पाल-शासकों के प्रयास से बौद्धधर्म बंगाल और बिहार में प्रचलित रहा, परन्तु देश के अन्य भागों में ब्राह्मणधर्म (वैष्णव और शैव) ने इसका स्थान ले लिया। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि “सामंतीय प्रथा के सैनिक मूल्यों के कारण राजाओं को बौद्धधर्म का अहिंसा का सिद्धान्त ग्राह्य न था। राजपूत राजाओं के देवता विष्णु, शिव, कार्तिकेय, अहिंसा का उपदेश नहीं देते, अपितु दुष्ट का संहार और धर्म की रक्षा तथा सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा के लिए युद्ध को उचित समझते हैं।’ फलतः, बौद्धधर्म को राज्याश्रय प्राप्त नहीं हो सका, जिसके अभाव में यह धर्म आंतरिक और बाह्म विपत्तियों का सामना नहीं कर पाया।

  7. नवब्राह्मणवाद का विकास

    बौद्धधर्म को नव-ब्राह्मणवाद के बढ़ते प्रभाव का सामना करना पड़ा, जिसके समक्ष बौद्धधर्म टिक नहीं पाया। आरम में बौद्धधर्म को ब्राह्मणधर्म से खतरा इसलिए पैदा नहीं हुआ कि यह पतनोन्मुख अवस्था में था और जनता की सहानुभूति इसे प्राप्त नहीं थी। कालांतर में इस धर्म के घटते प्रभाव से चिंतित होकर ब्राह्मणधर्म को भी नई दिशा देने की कोशिश की गई। छठी शताब्दी ई0पू0 में ही भागवत और शैव संप्रदायों का उदय हुआ, परन्तु नए धर्मों की प्रभावशाली लहर के सामने ये विशेष प्रगति नहीं कर सके। शुंग-शासकों ने पुनः ब्राह्मणवाद को प्रतिष्ठित करने का प्रयास आरम्भ किया। उनके कार्यों को सातवाहनों, गुप्तों और अन्य शासकों ने आगे बढ़ाया। उत्तर और दक्षिण भारत में समान रूप से विष्णु और शिव की पूजा प्रचलित हो गई। इनके लिए मन्दिर और मूर्तियाँ बनीं। इन मन्दिरों को धनी व्यक्तियों और शासकों द्वारा प्रचुर मात्रा में दान दिया गया। इतना ही नहीं, ब्राह्मण धर्म ने भी बौद्धों की अनेक प्रथाओं-मूर्तिपूजा, रथयात्रा इत्यादि-को अपना लिया तथा बुद्ध को भी विष्णु का अवतार मान लिया। वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने में कुमारिलभट्ट और शंकराचार्य ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। हिन्दूधर्म के इन दार्शनिकों और विद्वानों के बढ़ते प्रभाव के समक्ष जर्जर बौद्धधर्म टिक नहीं पाया।

  8. विदेशी आक्रमण

    विदेशी आक्रमणों ने भी बौद्धधर्म के पतन में सहयोग दिया। बौद्धों को हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। मिहिरकुल नामक हूण-विजेता ने बौद्धों से चिढ़कर उनके विहारों को नष्ट करवा दिया तथा भिक्षुओं की हत्याएँ भी करवाई। कहा जाता है कि उसने प्रत्येक बौद्ध भिक्षु के सिर के बदले हत्या करने वाले को एक सौ स्वर्णमुद्राएँ प्रदान की। हूणों के आक्रमण से बौद्धों को अत्यधिक क्षति पहुँची। बाद में तुर्क-आक्रमणकारियों ने भी धन के लालच में और बौद्धों से कुपित होकर बौद्धविहारों को अपना निशाना बनाया। बंगाल और बिहार के प्रमुख बौद्धकेंद्र (नालंदा, विक्रमशिला इत्यादि) अग्नि की भेंट चढ़ा दिए गए। असंख्य भिक्षु मौत के घाट उतार दिए गए। जो बच सके, वे भागकर नेपाल और तिब्बत चले गए। भारत में तुर्की राज्य की स्थापना के साथ ही बौद्धधर्म भारत से विलुप्त हो गया।

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