गुप्त काल में मूर्तिकला एवं चित्रकला

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गुप्तकालीन मूर्तिकला एवं चित्रकला

गुप्तकालीन मूर्तिकला एवं चित्रकला:

मूर्ति कला

मूर्ति कला की दृष्टि से गुप्त काल में पर्याप्त सृजन हुआ। मथुरा, सारनाथ और पाटलिपुत्र भारतीय उत्कृष्ट कारमूलक अभिव्यक्ति के मुख्य केन्द्र थे। गुप्त कला की उत्कृष्टता प्रारम्भिक यज्ञ और वृक्ष पूजा के लोक-प्रचलित मतों के बीच समन्वय की स्पष्टता में निहित है। बौद्ध और जैन धर्मो की निरीश्वरवादिता और ब्राह्मण पुनरुत्थान सभी भागवतवाद के उत्कर्ष और साहित्य के द्वारा संयोजित हुए। साहित्य की तरह कला में भी यह समन्वय स्पष्ट है।

गुप्तकालीन कला संयत और नैतिक है। कुषाणकालीन मूर्तियों में शरीर के सौदर्य का जो रूप था उसके विपरीत गुप्त काल की मूर्तियों में नग्नता नहीं है। गुप्त कालीन मूर्तिकारों ने मोटे उत्तरीय वस्त्र का प्रदर्शन किया। सारनाथ केन्द्र की मूर्तियों पर गांधार कला का प्रभाव नहीं मिलता। यहाँ की मूर्तियों में सुसज्जित प्रभामंडल बनाए गए जबकि कुषाणकालीन मूर्तियों में प्रभामंडल सादा था। मानव आकृति में बुद्ध प्रतिमाओं के समान महत्वपूर्ण हिन्दू देवी-देवताओं को भी मूर्तियों में ढाला गया वैष्णव धर्म के विकास के कारण वैष्णव मूर्तियों का निर्माण स्वाभाविक था। देवताओं को मानव आकार दिया गया हालाँकि उनकी अनेक भुजाएँ बनाई जा सकती थीं जिनमें उस देवता के गुण से संबंधित प्रतीक बना दिए जाते थे। गुप्त काल की शिल्प कला का जनम विशेषतः मथुरा शैली द्वारा स्थापित प्रतिमानों पर आधारित था। मुख्यतः विष्णु के अवतारों की प्रतिमाएं बनाई गई। शिव संप्रदाय में लिंग पूजा का महत्व होने के कारण शिल्प के लिए संभावनाएँ नहीं थी।

विष्णु की प्रसिद्ध प्रतिमा देवगढ़ के दशावतार मन्दिर में है। इस ‘अनंतशायी’ मूर्ति में विष्णु को शेषनाग की शैया पर दर्शाया गया है। वे कुंडल, मुकुट, माला, कंकण, हार आदि में सुशोभित है। एक ओर शिव और इंद्र आदि की प्रतिमाएँ हैं। इनके समीप ही दो शस्त्रधारी पुरुष बने हैं। कार्तिकेय मयूर पर आसीन है तथा नाभि से निकले कमल के ऊपर चार मुख वाले ब्रह्मा विराजमान है। लक्ष्मी उपके चरण दबा रही है। काशी से प्राप्त गोवर्धन पर्वत को गेंद के समान उठाए हुए कृष्ण की मूर्ति भी काफी सुन्दर है।

अवतारों में वराह की अनेक प्रतिमाएं बनाई गई। उदयगिरि में प्राप्त मूर्ति में शरीर मनुष्य का है तथा मुख वराह का। यह मूर्ति गुप्तकालीन मूर्तिकारों की प्रतिभा का स्मारक हैं वराह के कंधे के ऊपर भूमि देवी की आकृति हैं पृथ्वी को प्रलय से बचाने के लिए वराह अपने दाँतों पर पृथ्वी को उठाए है जिसे नारी रूप में बनाया गया है। वराह का बायाँ पैर शेषनाग के मस्तक पर है। तरंगित रेखाओं से समुद्र बनाया गया है। गंगा और यमुना दोनों नारी रूप में वराह भगवान की अभिषेक करने के लिए जल-कलश लिए हुए है। वराह के बाई ओर अप्सराएँ तथा दाई ओर ब्रह्मा, शिव आदि देवता और ऋषि हैं। वराह की वास्तविक आकृति में निर्मित मूर्ति एरण से प्राप्त हुई है जिसका निर्माण मातविष्णु के भाग घन्यविष्णु ने किया था।

गुप्तकालीन बौद्ध मूर्तियाँ अपनी उत्कृष्टाता के लिए प्रसिद्ध है। उनमें सजीवता तथा मौलिकता मिलती है। गुप्तकालीन बौद्ध लक्षण कला का प्रभाव दक्षिण पूर्व एशिया की कला पर भी पड़ा। गुप्त काल के अभिलेखों में बुद्ध की मूर्तियों की स्थापना के अनेक उल्लेख मिलते हैं। 448 ई० के मानकुंवर के लेख के अनुसार बुद्धिमित्र नामक भिक्षु ने बुद्ध मूर्ति स्थापित की थी। 476 ई० के सारनाथ के लेख में अभयमित्र नामक भिक्षु द्वारा बुद्ध की मूर्ति स्थापना का उल्लेख है। इस युग की बुद्ध मूर्तियों के बाल धुंघराले हैं, उनके प्रभामंडल अलंकृत हैं तथा मुद्राओं में विविधता है। इस समय की तीन बुद्ध मूर्तियाँ प्रसिद्ध है- मथुरा संग्रहालय की मूर्ति, बरमिंघम संग्रहालय की ताम्र मूर्ति और सारनाथ की प्रतिमा।

चित्रकला

वात्स्यायन के कामसूत्र में चित्रकला की गणना चौंसठ कलाओं में की गई है। इस युग के नाटकों और काव्यों में कहा गया है कि सभी सुशिक्षित कुलीन वर्ग के स्त्री-पुरुष इस कला में ज्ञान प्राप्त करते थे। वात्स्यायन के कामसूत्र के अनुसार चित्रकला का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन अध्यापन होता था और चित्रकला वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित थी।

गुप्त चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजंता से प्राप्त हुए हैं। विश्व कला के इतिहास में अजंता की अनुपम चित्रशाला अद्वितीय है। गुप्त और वाकाटक राज्यों के संयुक्त सांस्कृतिक प्रभाव के द्वारा उच्चतम कुशलता पाँचवी और छठी शताब्दी की कलाकृतियों में मिलती है। उत्कृष्ट रैखिक निरूपण और रंगों के गतिशील विस्तार ने अजंता के भित्तिचित्रों को भारत की सर्वोत्कृष्ट कलाकृतियों का रूप प्रदान किया है। अजंता के चित्रों के तीन विषय हैं-

  1. छतों, कोनों आदि स्थानों को सजाने के लिए प्राकृतिक सौदर्य जैसे वृक्ष, पुष्प, नदी, झरने, पशु-पक्षी आदि तथा रिक्त स्थानों के लिए अप्सराओं, गंधों तथा यक्षों के चित्र
  2. बुद्ध और बोधिसत्य के चित्र, और
  3. जातक ग्रंथों के वर्णनात्मक दृश्य । करुणा, प्रेम, लज्जा, अय, मैत्री, हर्ष, उल्लास, चिंता, घृणा जैसी मानवीय भावनाओं का चित्रकला के माध्यम से अद्वितीय प्रदर्शन हुआ हैं।

तकनीकी दृष्टि से अजंता के भित्तिचित्र विश्व में सर्वोच्च स्थान रखते हैं। सुन्दर कल्पना, रंगों व रेखााओं के सौदर्य इन चित्रों की विशेषता हैं नीले, सफेद, लाल, हरे, भूरे, रंगों में वृक्ष, पुष्प, पशु, सरिताएँ, मनुष्य, देवी-देवता आदि का चित्रण किया गया है। चित्रों में समृद्ध सजीवता है। अजंता की चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है- पदमपाणि अवलोकितेश्वर, अपने बालक के साथ अंधे तपस्वी माता-पिता मरणासन्न राजकुमारी, मूर्छित रानी, यशोधरा और राहुल, ज्ञान प्राप्ति के पश्चात यशोधरा और राहुल से मिलन, राधा द्वारा पैरों में पड़ी स्त्री को दंड रेखा, बोधिसत्व द्वारा सन्यास की घोषणा, तुशिता स्वर्ग में बुद्ध का स्वागत करने के लिए इंद्र की उड़ान, आदि छतों के स्तंभों, दरवाजों और खिड़कियों की चौखटों के अलंकरण से रचना और तकनीक के क्षेत्र में कलाकार की कुशलता स्पष्ट है। यद्यपि अजंता के चित्र मुख्यतः धार्मिक विषयों पर हैं परन्तु इनमें राजकुमारों, सामंतों, योद्धाओं और साधुओं के जीवन की झाँकी मिलती हैं। उच्च वर्ग की संपन्नता का प्रभाव पड़ता है परन्तु ग्रामीणों की सामान्य कठिनाइयों की कोई झलक नहीं मिलती है।

बाघ की गुफाओं के भित्तिचित्रों को भी गुप्तकालीन माना गया हूँ। ये गुफाएँ नौ है। जहाँ अजंता के चित्र मुख्यतः धार्मिक विषयों पर आधारित हैं। वहाँ बाघ के चित्र मनुष्य के लौकिक जीवन से लिए गए हैं। यहाँ के चित्रों में तत्कालीन वेशभूषा, केश-विन्यास तथा अलंकार- प्रसाधन आदि की जानकारी प्राप्त होती है जिससे इनका ऐतिहासिक महत्व अधिक है। अजंता के चित्रों की विभिन्न कालों में रचना हुई थी जिससे उनमें उतनी समानता नहीं है जितनी बाघ के चित्रों में। बाघ के चित्रों का संयोजन एक ही काल में हुआ था। यहाँ का सबसे प्रसिद्ध चित्र संगीत और नृत्य का एक दृश्य है। बाघ की गुफाएँ भी बौद्ध हैं क्योंकि इनमें बिहार, चैत्य, स्तूप और सभागृह है। कुछ बुद्ध की प्रतिमाओं के दृश्य हैं। परन्तु अधिकांश चित्र धर्मनिरपेक्ष हैं, जैसे नृत्यगान, भव्य राजकीय जुलूस, हाथियों की दौड़ शोकाकुल युवतियाँ आदि।

अन्य कलाएँ

संगीत नृत्य और अभिनय कला का भी विकास हुआ। समुद्रगुप्त को संगीत का ज्ञाता माना गया है। वात्स्यायन ने संगीत का ज्ञान प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक बताया है। मालविकाग्निमित्र से ज्ञात होता है कि नगरों में संगीत की शिक्षा के लिए कलाभवन होते थे। नृत्य की शिक्षा के लिए भी नगरों में आचार्य होते थे। मालविकाग्निमित्र में गणदास को संगीत का नृत्य का आचार्य बताया गया है। उच्च वर्ग की कन्याओं को नृत्य की शिक्षा दी जाती थी। नाटकों के अभिनय को उच्च कला माना गया था। नाट्यशालाओं के लिए प्रेक्षाग्रह तथा रंगशाला शब्द मिलते हैं।

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