मौर्य काल में मूर्तिकला व चित्रकला एवं शिक्षा साहित्य

मौर्य काल में मूर्तिकला व चित्रकला एवं शिक्षा साहित्य 

मौर्य काल में मूर्तिकला व चित्रकला एवं शिक्षा साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ

मूर्तिकला एवं चित्रकला मौर्य लक्षण कला के अंतर्गत अशोक के पाषाण-स्तम्भों के शीर्श को मंडित करने वाली पशुओं की मूर्त आकृतियों को सम्मिलित किया जा सकता है। कला अभिप्रायों में बटी हुई रस्सी की डिजाइन मणि माला की डिजाइन कँटीली पत्ती और खूजर की पत्ती की तरह की डिजाइन तथा मधुबेल आदि उल्लेखनीय हैं, जिनका स्तम्भ शीर्ष की पशु-आकृति के नीचे की पट्टी को अलंकृत करने के लिए प्रायः उपयोग किया गया है। मिट्टी की मूर्तियाँ, मनके तथा उत्तरी काली चमकीली पात्र-परम्परा मौर्य कला के विषय में प्रकाश डालती हैं। पाषाण निर्मित यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाओं तथा पटना के समीप स्थित लोहानीपुर से प्राप्त प्रसिद्ध दो दिगम्बर प्रतिमाओं के धड़ों को अनेक विद्वान मौर्य काल की कलाकृतियाँ नहीं मानते हैं।

अशोक के अनेक स्तम्भ- शीर्ष पशु आकृतियों से अलंकृत हैं। ये पशु आकृतियाँ मूर्तिकला के अनोखे उदाहरण हैं। बसाढ़-बखिरा, लोरिया-नंदनगढ़, संकिसा, रमपुरवा, साँची तथा सारनाथ के स्तम्भ शीर्ष की पशु आकृतियाँ उपलब्ध हैं। गया जिले की बराबर पहाड़ी की लोमश ऋषि की गुफा के प्रवेश-द्वार के ऊपर अंकित हाथियों की आकृतियाँ भी मार्य काल की तक्षण कला के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। अशोक के स्तम्भों के शीर्ष पर सिंह, गज, वृषभ एवं अश्व आदि की मूर्तियाँ अकेले अथवा चार-चार के समूह में बनी हुई मिली है। बसाढ़-बखिरा के स्तम्भ के शीर्ष पर बनी हुई सिंह की अपेक्षाकृत अपरिष्कृत आकृति एवं अस्थिर मुद्रा के आधार पर इसकी कलाविदों ने मूर्ति कला की प्रारम्भिक अवस्था का द्योतक माना हैं शीर्ष- पट्टिका चौकोर एवं अनलंकृत हैं शीर्ष-पट्टिका का उसके नीचे स्थित घण्टाकृति से उचित संयोजन नहीं हो पाया है। शीर्ष पर बैठा हुआ सिंह स्तम्भ-यष्टि से अलग-थलग प्रतीत होता हैं संकिसा के हस्ति-मंडित शीर्ष को इसके बाद रखा जा सकता है। इसकी शीर्ष-पट्टिका चौकोर के स्थान पर गोलाकार एवं पद्य, पुष्प आदि से अलंकृत है। हाथी की आकृति हष्ट-पुष्ट है एवं उसके विभिन्न अंगों के निर्माण में उचित अनुपात है। किन्तु गजाकृति एवं स्तम्भ-पट्टिका में सामंजस्य का अभाव खटकता है। उड़ीसा के पुरी जिले में अशोक के शासन के ग्यारहवें वर्ष में उत्कीर्ण धौली के शिलालेख के समीप चट्टान को तराश कर हाथी के अग्रभाग को बनाया गया है। इस मूर्ति में सूंड को अत्यन्त स्वाभाविक ढंग से बनाया गया है मानो यह हाथी सूंड से लपेटकर कोई वस्तु उठा रहा हो। हाथी के आगे का दाहिना पैर किंचित् झुका हुआ है, बाँयाँ पैर सीधा है। हाथी को मस्त चाल से चलता हुआ बनाया गया है। यह मूर्ति अपनी विशालता एवं ओजस्विता के लिए प्रसिद्ध है।

उत्तर प्रदेश के देहरादून (अब उत्तराखंड में) जिले में स्थित कालसी के शिलालेख के पास चट्टान में एक हाथी की मूर्ति उत्कीर्ण है जिसके नीचे ब्राह्मी अक्षरों में गजतमे (गजोत्तमः) अर्थात् श्रेष्ठ हाथी यह लेख खुदा हुआ है।

यह रिलीफ मूर्ति भी कला की दृष्टि काफी उन्नत है। रमपुरवा के स्तम्भ शीर्ष पर बनी साँड़ की मूर्ति को कलात्मक दृष्टि से संकिसा के हाथी के बाद रख सकते हैं। आजकल यह मूर्ति राष्ट्रपति भवन में रखी हुई है। इस मूर्ति के निर्माण में मूर्तिकार ने आकार एवं छबि के अंकन में उल्लेखनीय विवेक का परिचय दिया है। साँड़ को उसके पूरे भार के साथ बड़े शान्त और नैसर्गिक शक्ति के साथ जमीन पर खड़ा कर के दिखलाने की कल्पना के साथ बनाया गया है। साँड़ के भीतर का ओज और जीवट अत्यन्त संयम तथा गौरव के साथ मूर्त हुआ है।वृत्ताकार यष्टि-पट्टिका के साथ जिस पर यह साँड़ खड़ा हुआ है, पूर्ण समंजस्य स्थापित नहीं हो पाया है तथापि सकिसा गजशीर्ष से निश्चित रूप से अच्छा है। लौरिया-नन्दनगढ़ के स्तम्भ शीर्ष पर स्थित एकाकी सिंह की मूर्ति को कलाविदों ने इसके बाद स्थान दिया है। लहराते अयाल, पीन वक्ष, क्षीण कटि आदि सिंह के स्वाभाविक गुणों का सुन्दर निरूपण किया गया है। सिंह की आकृति का स्तम्भ के विभिन्न हिस्सों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में कलाकार को इसमें भी पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त हो पायी हैं रमपुरवा से जो दूसरा स्तम्भ मिला है उसका शीर्ष सिंह-मंडित है। सिंह पूर्ण स्वाभाविक एवं गतिशील मुद्रा में निर्मित है। हंसों की पंक्ति से युक्त वृत्ताकार चौकी पर पंजों के बल बैठे हुए सिंह की मांसपेशियों एवं पुट्ठों का निरूपण अत्यन्त कुशलता के साथ किया गया है। अयाल, पैरों और पंजों का निर्माण रूढ़िबद्ध ढंग से किया गया है। कलात्मक दृष्टि से फिर भी इसमें परिपक्व मूर्तिकला के दर्शन होते हैं।

साँची और सारनाथ के पाषाण-स्तम्भों के शीर्ष पर पीठ से पीठ सटाये हुए चार-चार सिंहों का निर्माण मूर्तिकला में विविधता उत्पन्न करने की दृष्टि से किया गया है। साँची और सारनाथ के शीर्ष-फलकों का अलंकरण भिन्न-भिन्न प्रकार का है। साँची में दाना चुगते हंस मिथुन एवं मधुबेल के अलंकरण-अभिप्राय को दोहराया गया है। सिंहों के मुख खण्डित होने पर भी शारीरिक सौष्ठव; मांसपेशियों के उभार तथा सँवार कर सजाये हुए अयाल कलाकार की कलात्मक क्षमता, सूझबूझ एवं प्रतिभा के सारनाथ के पाषाण स्तम्भ की शीर्ष चौकी पर बनी हुई चार सिंह आकृतियाँ अपने कलात्मक साहित्य के लिए विश्व प्रसिद्ध है। पीठ से पीठ सटाकर बैठे हुए सिंह कलात्मक सौन्दर्य तथा भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। चारों सिंहों के शरीर के सभी अंगों के प्रदर्शन में पूर्ण सामजस्य है। मूर्तिकला की तकनीक का पूर्ण विकसित रूप सारनाथ की सिंह मूर्तियों में दृष्टिगोचर होता है, किन्तु सिंहों की छवि आडम्बरपूर्ण तथा रूढ़िबद्ध है। बलशाली सिंहों की शिराएँ उभरी हुई तथा माँसपेशियाँ खिंची हुई हैं। अयालों का अंकन सजीव न होकर आलंकारिक है। सिंहों के मुँह फाड़ने तथा मूंछों के ऐंठने का ढंग भी रूढ़िगत है। सिंहों के नीचे की वृत्तकार चौकी में सरपट दौड़ता घोड़ा, मुदित गवेन्द्र, मदमस्त गज और विक्रान्त सिंह उत्कीर्ण हैं। दो पशुओं के बीच में 24 आरे वाला एक एक चक्र बना हुआ है। इस प्रकार चार पशु तथा चार चक्र चौकी की सजावट के लिए बनाये गए हैं। भारत सरकार ने अशोक के चार सिंहों वाले सारनाथ के स्तम्भ-शीर्ष को राजचिन्ह के रूप में ग्रहण किया है। यह स्तम्भ-शीर्ष सारनाथ संग्रहालय में सुरक्षित है।

मौर्य काल की मूर्ति कला पर भी विदेशी प्रभाव-विशेषकर ईरान की मूर्ति कला का प्रभाव-कुछ विद्वान मानते हैं। मौर्य कला के विकास में हेलेनिस्टिक कला का भी योगदान माना जाता ह। स्तम्भों के शीर्ष को मंडित करने वाले सिंहों की मूर्तियों के निर्माण में वैदेशिक प्रभाव विशेष रूप से परिलक्षित होता है। सिंहों की मूर्तियों की कल्पना, निर्माण शैली और तकनीक सभी नितान्त पेचीदी तथा परिष्कृत हैं। इन मूर्तियों में आदिम कला का रचमात्र भी आभास नहीं मिलता है। अशोक के साँची तथा सारनाथ के सिंहों के प्रतिमांकन, आकार और सौन्दर्यबोध में रूढिबद्धता दिखलाई पड़ती है। अतः यह अनुमान किया जाता है कि इनके निर्माण की प्रेरणा का स्रोत कहीं विदेश में रहा होगा।

धौली के हाथी तथा रमपुरवा के साँड की मूर्तियों क निर्माण में किंचित भिन्न सौन्दर्य-दृष्टि रही हैं इनके निर्माता शिल्पियों को आकृतियों की कमनीयता और सजीवता की पूरी जानकारी थी। भारतीय मूर्ति-परम्परा के जो आदर्श बाद में लोकप्रिय हुए उनके दर्शन इनमें होते हैं। संयत और शान्त गरिमा के भारतीय कला के मानदण्ड इनमें परिलक्षित होते हैं। इसलिए ऐसा कहा गया है कि इस शैली की मूर्तियाँ पत्थर में बनाने के पूर्व लकड़ी में अनेक पीढ़ियों से बनती रही होगी। पहले जो मूर्तियाँ लकड़ी एवं मिट्टी में बनती थीं, वे मौर्य काल में पत्थर पर बनने लगीं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि धौली का हाथी, रमपुरवा का साँड़ और संभवतः संकिसा का हाथी भारत की स्थानीय शैली तथा परम्परा में दक्ष भारतीय कलाकारों की कृतियाँ हैं। अन्य कृतियों का निर्माण वैदेशिक प्रेरणा से भारतीय मूर्तिकारों द्वारा किया गया हो, तो असंभव नहीं है।

मिट्टी की मूर्तियाँ पशु-पक्षियों तथा जलचरों की मिट्टी की मूर्तियों के साथ स्त्री-पुरुषों की मूर्तियाँ भी उत्खनन से मिली हैं। अहिच्छत्र, मथुरा, हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा, कौशाम्बी, भीटा, झूसी, शृंगवेरपुर, राजघाट, बुलन्दीबाग, कुम्हरार तथा अन्य अनेक स्थानों से मौर्य काल की मिट्टी की मूर्तियाँ मिली है। हाथी, घोड़ा, बैल, कुत्ता, भेड़ा तथा हिरण आदि पशुओं, कच्छप एवं सर्प आदि सरीसृपों और चिड़ियों की हस्त-निर्मित मूर्तियाँ मिली हैं। अधिकांश मूर्तियाँ लाल रंग की है जिनके ऊपर गेरू के गाढ़े घोलक का प्रलेप चढ़ाया हुआ मिलता है। आँखों को वृत्त के अन्दर छेद करके बनाया गया है। गहरे रेखांकन और छोटे-छोटे गोल ठप्पे लगाकर इनको अलंकृत किया गया है। बक्सर से प्राप्त इस काल की पशु-मृण्यमूर्तियाँ पीले रंग की पड़ी रेखाओं से अलंकृत हैं।

पशु-मृण्मूर्तियों के अतिरिक्त मानव मृणमूर्तियाँ भी मिली हैं। अधिकांश पशु-मूर्तियाँ हाथ से बनी हुई हैं किन्तु इस काल की कतिपय मानव-मृण्यमूर्तियाँ साँचे में ढालकर बनाई गई हैं। हाथ से बनी हुई मिट्टी की मूर्तियों के छोटे-छोटे हाथ पैर मिलते हैं। आँखों को छोटे से गोल छेद से, बालों को रेखांकन द्वारा तथा नाक को चुटकी से दबा कर बनाया जाता था। स्त्री मृणमूर्तियों में बड़े-बड़े कर्णपटल, गोलाकर कर्णफूल, गले में कामदार भारी हारावली तथा भव्य शिरोवेशभूषा चिपकवाँ विधि से बनायी जाती थी। अधिकांश मृणमूर्तियों का उपयोग खिलौनों के रूप में होता रहा होगा, किन्तु इस बात की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है यदि इनमें से कुछ के निर्माण के पीछे धार्मिक विश्वासों का भी हाथ रहा हो।

मनके, गोमेद, रेखांकित करकेतन, तामडा पत्थर, तथा मिट्टी के बने हुए मनके मौर्य काल के स्तरों से कौशाम्बी, सैंसी, शृंगवेरपुर, राजघाट, वैशाली, कुम्हरार, चम्पा आदि के उत्खनन से प्राप्त हुए हैं। षडज, पंचभुजाकार, चतुरत्न, वृत्ताकार तथा बेलनाकार मनके अधिक लोकप्रिय थे। इनके अतिरिक्त हड्डी तथा हाथीदाँत के बने हुए मनके भी यदाकदा मिलते हैं। ये तत्कालीन लोगों की परिष्कृत रूचि के परिचायक हैं। अधिकांश मनके कलात्मक दृष्टि से उल्लेखनीय हैं।

मृदभाण्ड गंगा के मैदानी भाग में स्थित ‘केन्द्रीय क्षेत्र’ में उत्तरी काली चमकीली पात्र-परम्परा का प्रचलन छठवीं शताब्दी ई0पू0 में हो गया था किन्तु उत्तर और पश्चिम के ‘परिधीय क्षेत्र’ में इसका चलन मौर्य काल (324-185ई.पू.) के दौरान हुआ। पश्चिम में अफगानिस्तान के बेग्राम से लेकर पूर्व दिशा में बांग्ला देश के बानगढ़ तथा पहाड़पुर तक इस प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। उत्तर में नेपाल की तराई में स्थित तिलौराकोट से लेकर दक्षिण-पश्चिम में नासिक तक इस प्रकार के बर्तनों का चलन था। काले रंग के अतिरिक्त सुनहरे, रुपहले, गुलाबी, पिंगल, बादामी तथा गहरे भूरे रंग के पात्र मिलते हैं। उत्तरी काली चमकीली पात्र-परम्परा के बर्तनों का निर्माण भली-भाँति तैयार की गई, अच्छी तरह से गुंथी एवं मर्दित मिट्टी से सत्वर गति (तेज गति) के चाक पर किया जाता था। बर्तन अत्यन्त पतले तथा हल्के होते थे। इनमें धातु के बने हुए बर्तनों की तरह की सफाई और खनक मिलती है। आभिजात्य वर्ग के व्यक्तियों के भोजनालयों में प्रयुक्त होने वाली इस पात्र-परम्परा में थालियाँ, कटोरे, हाँडियाँ, कलश और दवात की तरह के ढक्कन मिलते हैं। मिट्टी के ये बर्तन कलात्मक दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इनमें एक विशेष प्रकार की चमक मिलती हैं। अधिकांशतः इस पात्र-परम्परा के बर्तन अनलंकृत और सादे मिलते हैं किन्तु हस्तिनापुर, कौशाम्बी, श्रावस्ती तथा चम्पा आदि से चित्रण एवं अलंकरण से युक्त बर्तन भी मिले हैं। धारियाँ, बिन्दु समूह, रेखाएँ, वृत्त, अर्द्धवृत्त, लहरिया तथा छल्ले आदि अलंकरण-अभिप्राय सँजोये अलंकरण-अभिप्राय सँजोये हुए मिले हैं।

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