गुप्तकालीन वास्तुकला की विशेषता

गुप्तकालीन वास्तुकला की विशेषता

गुप्तकालीन वास्तुकला

गुप्त काल की वास्तुकला के अंतर्गत राजप्रासादों (महलों), नागरिक शालाओं स्तूपों, चैत्यों, गुफाओं और मन्दिरों का उल्लेख किया जा सकता है। लौकिक वास्तुकला के उदाहरण बहुत कम उपलब्ध है।

राजप्रासाद एवं नागरिक शाखाएँ-

पाटलिपुत्र तथा उज्जयिनी के गुप्त काल के राजप्रासाद प्रसिद्ध रहे है। साहित्यिक साक्ष्यों से ऐसा इंगित होता है कि राजप्रासाद अनेक मंजिलों वाले, ऊँचे तथा आकार में विशाल होते थे। कालिदास ने ऊँचे प्रासादों का उल्लेख ‘सौध’ एवं ‘हर्म्य’ नाम से किया है। राजप्रासाद में अनेक कक्ष होते थे। इसके दो प्रमुख भाग होते थे। अंतःपुर, 2. बहिर्भाग। नगरों में प्रशासनिक, सार्वजनिक तथा नगरवासियों के व्यक्तिगत भवन होते थे। भवनों के निर्माण के लिए ईंट, पत्थर तथा लकड़ी का उपयोग होता था। उत्तर भारत के जिन प्राचीन नगरों के का उत्खनन हुआ है, उनके गुप्त काल के स्तरों से उपलब्ध साक्ष्यों से यह इंगित होता है कि आवासीय भवनों के निर्माण के लिए पूर्ववर्ती कुषाण काल की ईंटों के टुकड़ों तथा टूटी-फूटी ईंटों का उपयोग किया जाता था। इसके स्तूपः ‘स्तूप’ का शाब्दिक अर्थ है ‘ढेर’। प्राचीन बौद्ध परम्परा के अनुसार गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनके भस्मीभूत अवशिष्ट अस्थि-अवशेषों को उत्तर भारत के तत्कालीन राजाओं ने आपस में बाँट लिया था और प्रत्येक राजा ने अपने अंश के ऊपर एक-एक स्तूप का निर्माण कराया था। प्रारम्भिक स्तूप मिट्टी के चबूतरों के रूप में थे। गुप्त काल में भी अनेक स्तूपों का निर्माण हुआ जिनमें से बहुत से अब विनष्ट हो गये हैं, किन्तु कतिपय अभी भी विद्यमान हैं। गुप्त काल का एक महत्वपूर्ण स्तूप पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में मीरपुर खास नामक स्थान पर स्थित है। यह चौकोर आधार पर बना हुआ है। इस स्तूप के निर्माण में नक्काशी से अलंकृत ईंटें प्रयुक्त हुई हैं। सारनाथ के धमेख स्तूप को विद्वानों द्वारा गुप्त काल में निर्मित बतलाया गया है। यह स्तूप समतल धरातल पर बिना किसी आधार के स्थित है। ईंटों से निर्मित यह स्तूप 45 मीटर ऊँचा है। इसके चारों कोनों पर बुद्ध की प्रतिमाओं को स्थापित करने के लिए देव-प्रकोष्ठ बने हुए हैं।

गुफा निर्माण कला-

बाह्मण तथा बौद्ध दोनों ही धर्मो से सम्बन्धित गुफाओं का निर्माण किया गया है। बाह्मण गुहा मंदिरों में उदयगिरि का गुहा मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। इसका निर्माण वीरसेन ने कराया था। जो शैव मतावलंबी था। बौद्ध गुहा मन्दिर में अजन्ता और बाघ की गुफाएँ आती हैं। 16,17 गुफा संख्या गुप्तकालीन मानी जाती है गुप्तकाल से पहले ही गुफाओं का सम्बन्ध हीनयान धर्म से है। इसलिए बुद्ध की प्रतिमा नहीं प्राप्त होती है। बुद्ध का प्रदर्शन प्रतीकों के माध्यम से हुआ है जिसने पादुका सिंहासन स्तूप, बोधिवृक्ष चर्मचक्र प्रमुख है गुहा दीवारों पर नाम तथा यक्षों की प्रति का अंकन बौद्ध तथा ब्राह्मण धर्मों के आपसी सामज्जस्य का सम्बोधक माना जा सकता है।।

मन्दिर

गुप्त काल के मन्दिरों की कतिपय विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। इस काल के अधिकांश मन्दिरों का निर्माण किसी ऊँचे चबूतरे पर मिलता है। मन्दिर में पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। मन्दिर में देवमूर्ति की स्थापना के लिए सामान्यतः चौकोर अथवा वर्गाकार एक कक्ष मिलता है जिसको ‘गर्भगृह’ कहा जाता है। गर्भगृह की भीतरी दीवालें सादी होती हैं और प्रवेश-द्वार को आकर्षक तथा अलंकृत बनाने के साक्ष्य प्राप्त होते हैं। मकरवाहिनी गंगा, कूर्मवाहिनी यमुना, स्वस्तिक, मिथुन, पत्रवल्ली, कलश तथा हंसों के जोड़े प्रवेश द्वार की चौखटों एवं दोनों पाश्र्यों पर अंकित मिलते हैं। गुप्तकाल के मन्दिरों की एक अन्य विशेषता यह भी है कि भीतरगांव के मन्दिर के अपवाद को छोड़कर, शेष मन्दिर तराशे हुए पत्थरों के बने हुए हैं।

गुप्तकाल के कहे और समझे जाने वाले मन्दिरों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

  1. प्रथम वर्ग में साँची का मंदिर संख्या 17, मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में स्थित तिगोवा का विष्णु मन्दिर, सागर जिले के एरण नामक स्थान पर स्थित विष्णु मन्दिर तथा दमोह जिले के सकोर स्थित शिव मन्दिर सम्मिलित हैं। इस वर्ग के मन्दिर बनावट की दृष्टि से अत्यन्त सादे हैं। इनमें गर्भगृह और उसके सामने चार स्तम्भों पर स्थित एक मण्डप मिलता है।
  2. द्वितीय वर्ग के अन्तर्गत मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में नचना नामक स्थान पर स्थित पार्वती मन्दिर, सतना जिले का भूमरा का शिव मन्दिर तथा बानगढ़ (जिला दीनाजपुर, बांग्लादेश) का इष्टका निर्मित ध्वस्त मन्दिर मुख्य रूप से आते हैं। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के रायगढ़ छपरा और बदोह के मन्दिर भी इसी वर्ग में रखे जा सकते हैं। इस वर्ग के मन्दिरों में गर्भगृह तथा मण्डप के अतिरिक्त गर्भगृह के चतुर्दिक ढंका हुआ प्रदक्षिणापथ भी मिलता है।
  3. तृतीय वर्ग में उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले का दशावतार मन्दिर, कानपुर जिले का भीतरगाँव का ईंटों का बना हुआ मन्दिर तथा बरेली जिले के अहिच्छत्र नामक स्थान ईंटों से निर्मित ध्वस्त मन्दिर रखे जा सकते हैं। इनका निर्माण छठवीं शताब्दी में हुआ। इनके अलावा मध्य प्रदेश के दमोह जिले में कुण्डलपुर का मन्दिर, शिवपुरी जिले का महुआ का शिव मन्दिर तथा मंदसोर जिले में स्थित मकानगंज का मन्दिर इस वर्ग में सम्मिलित किये जा सकते हैं। तृतीय वर्ग के मन्दिरों में गर्भगृह की सपाट छत के स्थान पर पिरामिडनुमा शिखर मिलता है।

मध्य प्रदेश के रायपुर जिले में स्थित ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मन्दिर और बिहार के शाहाबाद जिले में स्थित मुण्डेश्वरी मन्दिर गुप्तोत्तर काल में रखे जा सकते हैं।

साँची का मन्दिर–

साँची के महास्तूप के दक्षिण-पूर्व में कुछ हटकर सपाट छत वाला एक छोटे आकार का मन्दिर है जिसे मन्दिर संख्या 17 कहा जाता है। इसका गर्भगृह भीतर 2.55 मीटर वर्गाकार है। इसके सामने चार स्तम्भों पर खड़ा अपेक्षाकृत छोटे आकार का मण्डप है। स्तम्भ नीचे चौपहल और ऊपर अठपहल हैं। स्तम्भों को छोड़कर इस मन्दिर में किसी प्रकार का कोई अलंकरण नहीं है। इसके स्तम्भों पर घण्टाकृति तथा चौकोर शीर्ष पर पशुओं की आकृतियाँ उकेरी हुई हैं। शिखर के अभाव के कारण इसको पाँचवीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है।

तिगोवा का विष्णु-मन्दिर मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में तिगोवा नाम स्थान पर स्थित है। कनिंघम के अनुसार कभी यहाँ पर दो मन्दिर थे: 1. सपाट छत वाला, 2. आमलक-युक्त शिखर वाला। यह मन्दिर बनावट में अत्यन्त सादा, मन्दिर वास्तुकला की दृष्टि से प्रारम्भिक अवस्था का द्योतक है। वर्गाकार गर्भगृह लगभग 2.50 मीटर है जिसके सामने चार स्तम्भों पर एक मण्डप है। मण्डप के स्तम्भ नीचे चौपहल हैं, बीच में अठपहल और ऊपर सोलह पहल तथा अंत में लगभग गोलाकार हो गये हैं। शीर्ष पीठिका के ऊपर बैठे हुए सिंह हैं। गर्भगृह के प्रवेश-द्वार में तीन शाखाएँ हैं। शीर्श पीठिका के ऊपर बैठे हुए सिंह हैं। गर्भगृह के प्रवेश-द्वार में तीन शाखाएँ हैं जिनमें से केवल अगल-बगल की पट्टियाँ ही पुष्पवल्ली से अलंकृत हैं। प्रवेश-द्वार के दाहिने पार्श्व पर मकरारूढ़ गंगा तथा बाएँ पार्श्व पर कूर्म पर आरूढ़ यमुना की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। मन्दिर के द्वार का ललाटबिम्ब भी अलंकृत हैं, केवल बीच में गरुड़ का अंकन हुआ है। इसलिए द्वार के अलंकरण के आधार पर तिगोवा के मन्दिर के कालक्रम के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकता है।

एरण का विष्णु मन्दिर-

मध्य प्रदेश के सागर जिले में एरण नामक स्थान पर जो विष्णु मन्दिर था उसके गर्भगृह की दीवालें गिर गयी हैं। सामने के दो स्तम्भ जिन पर मण्डप बना था, अपने स्थान पर खड़े हुए हैं। ये स्तम्भ अत्यंत अलंकृत हैं। गर्भगृह का द्वार जो उपलब्ध है, पर्याप्त अलंकृत है। द्वार के लालटबिम्ब (सिर-दल) के बीच में गरुड़ की आकृति बनी हुई है। द्वार में तीन शाखाएँ हैं : नाग शाखा, पुष्प शाखा एवं पत्र शाखा। द्वार-शाखा में गंगा-यमुना का अंकन है।

मुकुन्द दर्रा मन्दिर राजस्थान के कोटा जिले में मुकुन्द-दर्रा के नाम से ख्यात एक पहाड़ी दर्रे के अन्दर एक छोटे आकार वाला मन्दिर स्थित है। यह मन्दिर एक आयताकार चबूतरे पर बना हुआ है। मन्दिर पर जाने के लिए बायें तथा दाहिने किनारे तक सीढ़ियाँ हैं। गर्भगृह अथवा मण्डप का निर्माण चार चौपहल स्तम्भों पर हुआ है। इसकी छत सपाट है। मण्डप से लगभग 1.25 मीटर हटकर तीन ओर दो-दो अर्द्ध-स्तम्भ हैं: उनके ऊपर शीर्ष हैं एवं जिन पर सिरदल हैं तथा सिरदल पर कमल अंकित चौकार पत्थर रखे हुए हैं। मन्दिर के चारों ओर प्रदक्षिणा-पथ है। मुकुन्द दर्रा मन्दिर को गुप्तकाल के प्रारम्भिक मन्दिरों की श्रेणी में रखा जाता है। मन्दिर की शैलीगत विशेषताओं तथा अलंकरण के आधार पर मुकुन्द-दर्रा के मन्दिर के निर्माण का समय पाँचवीं शताब्दी ईसवी का आरम्भ अनुमान किया जा सकता है।

नचना-कुठार का पार्वती मन्दिर मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की अजयगढ़ तहसील के मुख्यालय के समीप स्थित नचना-कुठार के पार्वती मन्दिर का निर्माण लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी में हुआ था। मन्दिर का निर्माण एक वर्गाकार चबूतरे पर किया गया है। मन्दिर की छत सपाट है। गर्भ गृह के द्वार को मूर्तियों एवं अन्य अलंकरणों स सजाया गया है।

भूमरा का शिव मन्दिर मध्य प्रदेश के सतना जिले में मध्य रेलवे के मानिकपुर जबलपुर रेलमार्ग पर स्थित ऊँचेहरा रेलवे स्टेशन से लगभग 9.50 किमी की दूरी पर भूमरा का प्रस्तर निर्मित शिव मन्दिर है। इसका अन्वेषण सन् 1920 में आर० डी० बनर्जी ने किया था। केवल ‘गर्भगृह’ ही अवशिष्ट रह गया है। गर्भगृह में एकमुखी शिवलिंग स्थापित है। मन्दिर की छत चिपटी है, द्वार की चौखट अलंकृत है। ललाटबिम्ब के रूप में शिव की भव्य मूर्ति है। गर्भगृह के प्रवेश-द्वार की शाखाओं के नीचे मकरवाहिनी गंगा तथा कूर्मवाहिनी यमुना की मूर्तियाँ निर्मित हैं।

देवबढ़ का दशावतार मन्दिर उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में बेतवा नदी के तट पर देवगढ़ नामक स्थान पर गुप्त काल का एक ध्वस्त विष्णु मन्दिर है जिसमें गुप्त काल की वास्तुकला के शिल्प का चरमोत्कर्ष दिखलाई पड़ता है। देवगढ़ के दशावतार मन्दिर का निर्माण  आनंद केंटिश कुमारस्वामी के अनुसार गुप्त काल के अंतिम वर्षों में हुआ था। इस मन्दिर का निर्माण लगभग 1.50 मीटर ऊँचे अधिष्ठान भीतरगाँव का मन्दिर उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के भीतरगांव नामक स्थान पर ईंटों से बने हुए मन्दिर की नक्काशी दर्शनीय है। मन्दिर का निर्माण एक वर्गाकार चबूतरे पर है। वर्गाकार गर्भगृह (4.50 मीटर), वर्गाकार मण्डप अथवा गूढ़ मण्डप तथा दोनों को जोड़ते हुए लघु अन्तराल, ये भीतरगाँव मन्दिर के प्रमुख अंग हैं। नक्काशीदार ईंटों से भीतरगाँव के मन्दिर के गर्भगृह’ तथा मण्डप की दीवालें निर्मित हैं। मन्दिर के ‘गर्भगृह’ की दीवाल ‘भद्ररथ’ एवं ‘कर्ण रथ’ के द्वारा ‘त्रिरथ’ बनायी गई थी। गुप्त काल में नक्काशीदार ईंटों के बहुतायत से उपयोग के साक्ष्य मिलते हैं। यह शिखरयुक्त मन्दिर हैं। मन्दिर के चारों ओर दोहरी बरसाती में छज्जे लगे हुए हैं। ईंटों की दर्शनीय जालियाँ बनी हुई हैं। उठते हुए शिखर पर सर्वत्र चैत्य मेहरावें बनी हुई हैं जिनमें से कुछ ही अब बच राही हैं। बाहरी दीवालों पर बने गवाक्षों या आलों में देवताओं की मिट्टी की बनी हुई मूर्तियाँ और रामायण एवं महाभारत के कथानकों से सम्बन्धित मूर्तियाँ जड़ी हुई हैं, जिनमें से अनेक अब चोरी हो गयी हैं। बड़ी-बड़ी मृण्यमूर्तियों से युक्त भीतरगाँव का मन्दिर असाधारण एवं अनोखा है।

अहिच्छत्र का मन्दिर उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में रामनगर कस्बे के पास अहिच्छत्र का प्राचीन टीला स्थित है। अहिच्छत्र के उत्खनन के फलस्वरूप ईंटों के बने हुए एक शिव मन्दिर के अवशेष मिले हैं। अहिच्छत्र का शिव मन्दिर ‘एडूक’ मन्दिर है। एक के ऊपर एक बने हुए तथा क्रमशः छोटे होते गए ईंटों के वर्गाकार पाँच चबूतरे अथवा भद्रपीठ प्राप्त होते हैं। पीठिका का प्रत्येक तल अपने ऊपर के चौकोर चबूतरे के चारों ओर प्रदक्षिणपथ का कार्य करता था। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इस मन्दिर में सबसे ऊपरी भद्रपीठ पर गर्भगृह में एक शिवलिंग स्थापित रहा होगा। मिट्टी की बनी हुई अनेक विशालकाय मूर्तियाँ मिली हैं। मकर पर बैठी हुई गंगा तथा कूर्म पर आरूढ़ यमुना की आदमकद प्रतिमाएँ मिली हैं जो आजकल नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। अहिच्छत्र के मन्दिर के निर्माण का समय 450 तथा 550 ईसवी के बीच में निर्धारित किया गया है।

सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर मध्य प्रदेश के रायपुर जिले में स्थित सिरपुर के लक्ष्मण मन्दिर के अतिरिक्त राममन्दिर एवं जानकी मन्दिर भी ईंटों द्वारा बनाये गए थे। सिरपुर के लक्ष्मण मन्दिर का अब केवल ‘गर्भगृह’ ही अवशिष्ट रह गया है। इस मन्दिर में भी संभवतः शिखर रहा होगा। गर्भगृह की बाहरी दीवालों पर सर्वत्र मेहराव बने हुए हैं। गर्भगृह के प्रवेश-द्वार तथा चौखट पर हिन्दू देवी-देवताओं की मृण्मूर्तियों की शोभा दर्शनीय है। इसको गुप्तोत्तर काल में रखा जा सकता है।

मन्दिरों के साथ ही साथ विजय-स्तम्भों के निर्माण की परम्परा गुप्त काल में जारी रही, यद्यपि केवल गिनी-चुनी संख्या में ही ये स्तम्भ बच पाये हैं। गुप्त शासकों के प्रशस्ति-स्तम्भों की परम्परा को प्रवर्तित करने का श्रेय दिया जा सकता है। मृदगुप्त ने अशोक के स्तम्भ पर ही अपनी प्रयाग-प्रशस्ति को खुदवा दिया था। छल्ली में मेहरौली नामक स्थान पर ‘चन्द्र’ नामक किसी शासक का लौह-स्तम्भ है।

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