शंकराचार्य का अद्वैतवाद सिद्धांत

शंकराचार्य का अद्वैतवाद सिद्धांत

शंकराचार्य का अद्वैतवाद सिद्धांत

दक्षिण भारत में उस समय वैष्णव-आलवरों तथा शैव-नायनारों के प्रभाव में हिन्दू धर्म का पुनर्जागरण हो रहा था। शंकराचार्य ने तत्कालीन चोल तथा पाण्ड्य राज्यों की सहायता प्राप्त दक्षिण भारतीय समाज में फैले जैन, बौद्ध, शाक्त, गाणपत्य तथा कापालिक सम्प्रदायों में बढ़ रहे अनाचार को रोकने का सफल प्रयास किया। तदुपरान्त वे मध्य भारत की ओर निकल पड़े तथा गुजरात प्रदेश में स्थित द्वारिकापुरी में शारदामठ की नींव डाली। उत्तर भारत के तीर्थों की पुनर्यात्रा करते हुए वे आसाम के कामरूप-क्षेत्र में प्रविष्ट हुये। वहाँ उन्होंने शाक्तों तथा तान्त्रिकों से शास्त्रार्थ किया तथा उन्हें अद्वैत वेदान्त दर्शन से अवगत कराया। आसाम से चलकर वे हिमालय पर्वत के बदरिकाश्रम पहुंचे तथा वहाँ ज्योतिर्मठ की स्थापना की। इस मठ के प्रथम अध्यक्ष के रूप में उन्होंने त्रोटकाचार्य को नियुक्त किया। उनकी अंतिम सारस्वत यात्रा बदरिकारम के उत्तर में स्थित केदार-क्षेत्र में संपन्न हुई, जहाँ पर रह कर कुछ समय पश्चात वे सदा सदा के लिए ब्रह्मलीन हो गये।

शंकराचार्य द्वारा विरचित ग्रन्थ

आदि शंकराचार्य द्वारा प्रणीत ग्रन्थों का निर्णय करना सम्प्रति अति दुष्कर कार्य है क्योंकि अब तक ऐसे लगभग दो सौ ग्रन्थ प्राप्त हो चुके हैं, जिनके प्रणयन का श्रेय उन्हें या उनके नामधारी अन्य आचार्यों को दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित विभिन्न मठाधीश शंराचार्यों ने भी अपने द्वारा विरचित ग्रन्थों को आदि शंकराचार्य की परम्परा में ही नामित करते गए। फलतः आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित ग्रन्थों का सम्प्रति ठीक-ठीक आकलन करना कठिन हो गया हैं इन कठिनाइयों के होते हुए भी विद्वानों ने निम्नलिखित प्रमुख ग्रन्थों को आदि शंकराचार्य की ही मूल कृति स्वीकार किया है-

  1. ब्रह्मसूत्र (शारीरिक) भाष्य,
  2. उपनिषद् भाष्य (ईश, केन, कठ, प्रश्न, माण्डूक्य, मुण्डक, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, नृसिंह पूर्वतापनीय, श्वेताश्वरतर उपनिषद् आदि),
  3. गीता-भाष्य,
  4. विवेक-चूड़ामणि,
  5. प्रबोध-सुधाकर,
  6. उपदेश-साहीत्र,
  7. अपरोक्षानुभूति
  8. पञ्वीकरण,
  9. प्रपञ्वसारतन्त्र,
  10. मनीषापञ्चम
  11. आनन्दलहरी स्तोत्र आदि।

शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त दर्शन-

आदि शंकराचार्य के आविर्भाव-काल में सम्पूर्ण भारतवर्ष नाना साम्प्रदायिक मतवादों में दिग्भ्रमित था। जैन, बौद्ध शाक्त तथा कापालिकों के प्रभाव से सारा देश प्रभावित था। फलतः वैदिक धर्म जिसका प्रतिपादन वेदान्त अथवा उपनिषदों में किया गया है, प्रायः लुप्तप्राय हो रहा था। वैदिक कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्ड दोनों पर नाना सम्प्रदायों के गहरे आरोप विकसित किये जा रहे थे। ऐसे कठिन सांस्कृतिक संक्रमण काल में शंकराचार्य ने वैदिक धर्म एवं वेदान्त दर्शन को पुनः प्रतिष्ठित किया। उन्होंने जिस दार्शनिक सिद्धान्त ‘अद्वैत वेदान्त’ की स्थापना की, उस पर दीर्घावधि से विश्व की मनीषा सतत मन्त्रमुग्ध है।

अद्वैत सिद्धान्त : आत्मा एवं अनात्मा

शंकराचार्य ने ‘ब्रह्मसूत्र’ का भाष्य लिखते समय सर्वप्रथम आत्मा और अनात्मा की सम्यक विवेचना की है तथा सम्पूर्ण प्रपञ्च को दो भागों में बाँटा है – द्रष्टा और दृश्य। द्रष्टा वस्तुतः वह तत्व है, जो सम्पूर्ण प्रतीतियों का अनुभव करता है तथा दृश्य वह तत्व है, जो अनुभव का विषय हैं इनमें सम्पूर्ण प्रतीतियों का साक्षी तत्व आत्मा है तथा जो कुछ उसके अनुभव का विषय है, वह अनात्मा हैं आत्मा नित्य, निर्विकार, असंग- कूटस्थ, निश्चल, निर्विशेष तथा एक है, जबकि बुद्धि सहित भूतपर्यन्त सभी प्रपंच अनात्मा है तथा उसका आत्मा से सम्बन्ध नहीं है।

ज्ञान और अज्ञान-

शंकराचार्य के अनुसार संसार की सम्पूर्ण प्रतीतियों के स्थान में एक अखण्ड ब्रह्म (सच्चिदानन्द) का अनुभव करना ही ज्ञान है। इसके विपरीत उस सर्वाधिष्ठान पर दृष्टि न रखकर भेद में सातत्व-बुद्धि रखना ही अज्ञान है।

साधन-

 परम सत अथवा ब्रह्म-ज्ञान के लिए शंकराचार्य ने श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन को साक्षात् साधन बताया है, किन्तु इनकी सफलता ब्रह्मतत्व की तीव्र जिज्ञासा होने पर ही सम्भव है। इस जिज्ञासा की उत्पत्ति में प्रधान सहायक दैवी सम्पत्ति है। उनके अनुसार जो मनुष्य विवेक, वैराग्य, शम आदि षट्-सम्पत्ति तथा मुमुक्षा आदि साधनों से सम्पन्न है, उसी को चित्त-शुद्धि होने पर ब्रह्म-जिज्ञासा हो सकती है। इस प्रकार की चित्त-शुद्धि के लिए निष्काम कर्मानुष्ठान नितान्त उपयोगी साधन है।

भक्ति-

शंकराचार्य ने भक्ति को ज्ञानोत्पत्ति का प्रधान साधन बताया है। ‘विवेकचूड़ामणि’ में उनका कथन है कि अपने शुद्ध-स्वरूप का स्मरण करना ही भक्ति है। (स्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते)। इस प्रकार उन्होंने सगुणोपासना की उपेक्षा नहीं की है।

कर्म और संयास-

शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित आचार-पद्धति की मीमांसा करते हुए पदमदाचार्य ने ‘विज्ञानदीपिका’ में कर्म के स्वरूप की गंभीर मीमांसा की है। आचार्य शंकर ने अपने भाष्यों में स्थान-स्थान पर कर्मों के स्वरूप का त्याग करने पर बल दिया है। कर्म की प्रबलता सर्वतोभावेन ग्राम है। यह भी सच है कि कर्म से वासना उत्पन्न होती है और वासना से ही संसार उत्पन्न होता है। वासना के ही कारण जीवों का सांसारिक आवागमन बना रहता है। अतः सांसारिक आवागमन से मुक्ति पाने के लिए कर्म का विनाश करना (निर्हरण) परमावश्यक है। कर्म तीन प्रकार के होते हैं- संचित, क्रियमाण तथा प्रारब्ध। संचित और क्रियमाण कर्म को तो ज्ञान के द्वारा नष्ट किया जा सकता है। परन्तु प्रारब्ध कर्म को तो भेग के द्वारा ही क्षीण किया जाना संभव है (प्रारब्ध कर्मणां भोगादेव क्षयः)। पदमापदाचार्य ने ‘विज्ञानदीपिका’ में लिखा है कि कर्म का क्षय कर्मयोग, ध्यान, सत्संग, जप, अर्थ और परिणाम के अवलोकन से किया जा सकता है-

“कर्ततो योगतो ध्यानात सत्संगाजपतोऽर्पतः।

  परिपाकावलोच्च कर्मनिर्हरणं जगुः।।”

शंकराचार्य की धारणा है कि जीवन न तो कर्म से, न ही ज्ञान और कर्म के समुच्चय से, प्रत्युत केवल ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त कर सकता है (ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः)। अस्तु, उन्होंने जिज्ञासु तथा सम्यक सम्बुद्ध दोनों के लिए ही कर्मसंन्यास की आवश्यकता पर बल दिया है। उनके अनुसार निष्काम कर्म मात्र चित्त-शुद्धि का हेतु है।

स्मृतिमत का प्रतिपादन-

शंकराचार्य ने भारतवर्ष में वर्णाश्रम धर्म-परम्परा, जो जर्जरावस्था में पहुंच चुकी थी, को एक बार पुनरुजीवित कर दिया। उन्होंने पञ्चदेवोपासना की परम्परा पर बल दिया, जिसमें विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश तथा दुर्गा-परमात्मा के इन पाँचों रूपों में से किसी एक को प्रधान मानकर और शेष को उसका अङ्गीभूत समझकर उपासना की जाती है। पञ्चदेवोपासना का मत स्मृति-धर्म कहा जाता है, क्योंकि स्मृतियों के अनुसार यह सभी के लिए ग्राम हैं उन्हीं के प्रयास के फलस्वरूप भारतवर्ष में जप, तप, व्रत, उपवास, यज्ञ, दान, संस्कार, उत्सव, प्रायश्चित आदि परम्पराओं का एक बार पुनः उद्धार संभव हो सका था।

दशनामी शिष्य-परम्परा-

आदि शंकराचार्य के जीवनकाल में ही उनके चार प्रधान विद्वान शिष्य तथा शंकराचार्य नामान्त पीठाधीश्वर नियुक्त हो चुके थे, जिनके नाम हैं – पद्मपाद (सनन्दन), हस्तामलक, सुरेश्वर (मण्डन मिश्र) तथा त्रोटक। इनमें पद्मपाद के शिष्य हुए-तीर्थ और आश्रम। हस्तामलक के शिष्य हुए-वदन और अरण्य। सुरेश्वर के शिष्य हुए-गिरि, सागर तथा पर्वत। इसी प्रकार त्रोटकार्चा के भी तीन शिष्य हुए-पुरी, भारती और सरस्वती। इस प्रकार इन्हीं दस शिष्यों के नाम से अवान्तर काल में शंकरानुगत संयासियों के दस सम्प्रदाय बन गए, जिन्हें ‘दशनामी-सम्प्रदाय’ अथवा ‘दशनामी अखाड़ा’ के नाम से जाना जाता है। शंकराचार्य द्वारा भारत के चारों दिशाओं में स्थापित चार पीठों में इन दस प्रशिष्यों की दशनामी परम्परा आज तक चली आ रही है। इनमें पुरी, भारती और सरस्वती की परम्परा शृंगेरीमठ के साथ, तीर्थ और आश्रम शारदामठ (द्वारका) के साथ, वन और अरण्य गोवर्द्धन-मठ के साथ तथा गिरि, पर्वत और सागर ज्योर्तिमठ (बदरिकाश्रम) के साथ जुड़े हुए है। प्रत्येक दशनामी संयासी आज भी इन्हीं मठों में से किसी न किसी से सम्बद्ध हैं। सनातन धर्म की रक्षा में इन मठों तथा संयासियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उपर्युक्त चार मठों के अध्यक्ष परम्परया ‘शङ्कराचार्य’ ही कहे जाते रहे हैं। प्रायः मठाधीश-शंकराचार्य की नियुक्ति उनकी विद्धत्ता तथा पूर्ण संयासी-वृत्ति के आधार पर हुआ करती है।

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