भारतीय संस्कृति पर इस्लाम का प्रभाव

इस्लाम का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

इस्लाम का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

भारतीय संस्कृति संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। इसकी अपनी कुछ मौलिक विशेषताएँ हैं। धर्म और अध्यात्मवाद इसके मूल तत्व हैं। भारतीय संस्कृति अपनी एकीकरण व समन्वय की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। भारत में समय-समय पर विभिन्न जातियों-शक, हूण, यूनानी, सीथियन, पार्थियन आदि ने प्रवेश किया परन्तु भारतीय संस्कृति ने अपनी विशाल पाचन-शक्ति के द्वारा इन्हें अपने में इस प्रकार हृदयंगम कर लिया कि आज इनकी कोई स्वतन्त्र संस्कृति देखने को नहीं मिलती है परन्तु भारत में मुसलमानों के आते-आते भारतीय संस्कृति की यह पाचन-शक्ति प्रायः समाप्त हो गयी थी। अन्य विदेशी आक्रमणकारियों की भांति इनको हिन्दू संस्कृति अपने में आत्मसात नहीं कर सकी।

इस्लाम ने भारतीय संस्कृति पर जो प्रभाव डाले उनको निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है (1) व्यापार पर प्रभाव, (2) शासन पर प्रभाव, (3) कलाओं पर प्रभाव, (4) साहित्य एवं भाषा पर प्रभाव, (5) समाज एवं धर्म पर प्रभाव, (6) युद-कला पर प्रभाव।

  1. व्यापार पर प्रभाव-

    इस्लाम के भारत में आगमन के बाद उसका बाह्य संसार से पुनः सम्पर्क स्थापित हुआ जो चोल-शासकों के पतन के बाद समाप्त हो गया था। डॉ० चोपड़ा ने लिखा है, “17वीं शताब्दी के प्रारम्भ में व्यापारी प्रति वर्ष कम से कम 14,000 ऊंटों पर माल लाद कर भारत से कन्धार ले जाते थे। भड़ौंच, सूरत, धौल, गोआ आदि बन्दरगाहों से अरब, फारस, टर्की, मिस्र, अबीसीनिया आदि देशों को भारतीय वस्तुएँ निर्यात की जाती थीं, मुगल शासकों ने यूरोप के देशों के साथ व्यापार को प्रोत्साहित किया और वहाँ के व्यापारियों को भारत के तट पर अपनी फैक्ट्रियाँ स्थापित करने के आदेश दिये जिससे भारत का विदेशों से पुनः सम्पर्क स्थापित हुआ।’ प्रो० हुमायूँ कबीर ने लिखा है कि “इस्लाम के भारत में प्रवेश के परिणामस्वरूप दोनों में व्यापारिक सम्बन्ध ही स्थापित नहीं हुए अपितु रीति-रिवाज व परम्पराएँ भी प्रभावित हुई।” परन्तु हुण्डी और बहीखाता मुसलमानों के लिए एक उलझनपूर्ण रहस्य बने रहे। इस सन्दर्भ में बी0 एन0 लूनिया का मत है, ” मुस्लिम आक्रान्ता केवल योग्य सैनिक ही थे जो व्यापार से मूलतः घृणा करते थे जो विस्तृत हिन्दू साख-प्रणाली को जिस पर वाणिज्य आश्रित था, समझने में असफल रहे। निःसन्देह मुसलमान शासन में व्यापारी वर्ग को अत्यधिक मुद्रा-दण्ड देना पड़ता था परन्तु फिर भी हिन्दू बनिया समाज की रचना में उस युग में वैसा ही अनिवार्य अंग बना रहा, जैसा वह आज है।”

  2. शासन पर प्रभाव-

    मुसलमानों के भारत में प्रवेश से पूर्व भारत राजनीतिक रूप से छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित था। छोटे-छोटे राजपूत राजा निरन्तर गृह-कलह में लीग रहकर अपनी शक्ति का उत्तरोत्तर हास कर रहे थे। इस्लाम के आगमन से ये सब एक सूत्र में बंध गये। सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है, “अकबर के सिंहासनारूढ़ होने के समय से मुहम्मद शाह के समय तक (1556-1749 ई०) दो सौ वर्ष के मुगल शासन ने सम्पूर्ण उत्तरी भारत और अधिकांश दक्षिण को भी राजकीय भाषा, प्रशासन विधि और मुद्रा की एकता प्रदान की। श्री दिनकर ने भी इस सम्बन्ध में लिखा है, “राजनीति के क्षेत्र में इस्लाम का सबसे बड़ा प्रभाव एकता की दिशा में पड़ा। हर्षवर्धन के बाद से इस देश में सुदृढ़ केन्द्रीय सत्ता का लोप हो गया था। मुस्लिम राज्य की स्थापना से देश में केन्द्रीय सत्ता फिर से मजबूत होने लगी और इस प्रकार इस्लाम के आने से देश में राजनैतिक एकता में वृद्धि हुई।

  3. धर्म पर प्रभाव-

    डॉ० ताराचन्द की मान्यता है कि इस्लाम के प्रभाव के कारण हिन्दू धर्म में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए। मनुष्य मात्र की समानता, मूर्ति पूजा का खण्डन और एकेश्वरवाद इस्लाम के मुख्य सिद्धान्त थे, जिससे भक्ति-आन्दोलन के प्रवर्तक सन्त अत्यधिक प्रभावित थे। परन्तु डॉ० चोपड़ा का मत है कि “ऐतिहासिक दृष्टि से यह कहना असंगत होगा कि मध्य-युग के हिन्दुओं में “एकेश्वरवाद’ और जाति-विरोधी आन्दोलन का जन्म इस्लाम के कारण हुआ।” वस्तुतः शंकराचार्य का एकेश्वरवाद अद्वैतवाद का विकसित रूप था तथा इस्लाम के एकेश्वरवाद से पूर्णतया भिन्न था। डॉ० ताराचन्द का यह कथन कि गुरु-भक्ति एवं गुरु-पूजा इस्लाम की शाखा सूफीवाद की नकल है, युक्तिसंगत नहीं है क्योंकि इतिहास साक्षी है कि प्राचीन काल से हिन्दू गुरु-पूजक थे।

मुसलमान शासकों ने इस्लाम को राजधर्म घोषित किया तथा निम्न वर्गीय हिन्दुओं को इस्लाम की ओर प्रेरित किया। अपने ही हिन्दू भाइयों के कट्टरपंथी होने के कारण धर्म-परिवर्तन उन्हें सुखकर प्रतीत हुआ तथा उच्च राजकीय पदों के प्राप्त होने की आशा ने इस भावना को बल दिया। इस्लाम के आगमन से हिन्दू धर्म में एक चेतना आयी जिसके परिणामस्वरूप भारत में सुधार-आन्दोलन व भक्ति-आन्दोलन का जन्म हुआ। जाति-प्रथा का विरोध, छुआछूत-उन्मूलन और कर्मकाण्डों के विनाश में इस्लाम धर्म का योगदान अभूतपूर्व है। हिन्दू धर्म के लिंगायत सम्प्रदाय पर इस्लाम धर्म का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा। इस सम्प्रदाय में प्रचलित विधवा-विवाह और तलाक इस्लामिक परम्पराओं के अनुकूल था। वास्तव में यह प्रश्न अत्यन्त विवादास्पद है कि इस्लाम ने हिन्दू धर्म को किस सीमा तक प्रभावित किया या उसके स्वरूप में क्या परिवर्तन उपस्थित किये। डॉ० श्रीवास्तव ने इस सन्दर्भ में लिखा है, “वस्तुतः आठ शताब्दियों के बाद हिन्दू और मुसलमानों के सम्पर्क के बाद आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में हिन्दू समाज पर मुस्लिम धार्मिक विचारों, खानपान, वस्त्र और जीवन के तरीकों का कोई विशिष्ट प्रभाव दिखायी नहीं पड़ता।” परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारतीय संस्कृति इस्लाम के प्रभाव में पूर्णतया मुक्त नहीं थी।

  1. समाज पर प्रभाव-

    हिन्दू समाज पर इस्लाम के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए डॉ० ताराचन्द ने लिखा है, “भारतीय संस्कृति के विकास पर मुस्लिम विजय-अभियानों का अत्यधिक प्रभाव पड़ा। इसने सभी व्यवस्थाओं को अस्त-व्यस्त कर दिया। हिन्दू धर्म को धक्का लगा और धार्मिक वर्ग का महत्व समाप्त हो गया।” इस्लाम के आगमन के कारण भारतीय सामाजिक व्यवस्था में अनेकानेक कुरीतियों का समावेश हुआ। हिन्दू धर्म में पवित्रता को बनाये रखने के लिए ब्राह्मणों ने हिन्दू धर्म को अत्यन्त कठोर बना दिया। उनके जटिल कर्मकाण्ड और आडम्बरयुक्त सिद्धान्तों ने हिन्दू धर्म को अत्यन्त जटिल बना दिया था। बाल विवाह एवं जौहर प्रथा का प्रचलन इस्लाम के प्रभाव के कारण हुआ। कामुक तातारों की काम-पिपासा से सुरक्षा के लिए पर्दा-प्रथा को महत्त्व प्राप्त हुआ। वेशभूषा एवं रीति-रिवाज भी इस्लाम के सम्पर्क में अछूत नहीं रहे। डॉ० चोपड़ा ने लिखा है, “इस्लाम का सांस्कृतिक प्रभाव पोशाक और भोजन में, मेलों एवं त्यौहारों को मनाने में, विवाह एवं रीति-रिवाजों तथा दरबारी शिष्टाचारों में भी दिखायी देता है। मुस्लिम समाज में प्रचलित ‘अकीका और बिसमिल्लाह’ हिन्दुओं के ‘मुण्डन’ और ‘विद्यारम्भ’ संस्कारों के ही प्रतिरूप है। हफ्त-ओ-नूह नववधू के सोलह श्रृंगारों का दूसरा रूप है। मुसलमान व हिन्दू समान रूप से पाजामा, अचकन, पाग व चीर पहनने लगे थे। यद्यपि इस्लाम में आभूषण पहनना वर्जित था, परन्तु हिन्दुओं के सम्पर्क के कारण धनी मुसलमान आभूषणप्रिय हो गये थे। डॉ० वाहिद मिर्जा ने लिखा है कि “कलन्दरों और फकीरों जैसे साधु-संन्यासियों के प्रभाव के कारण सरल शुद्ध इस्लामिक अब मिश्रित धार्मिक सम्प्रदाय बन गया था जिसमें चमत्कार और अन्धविश्वास सन्त-पूजा से समन्वित होकर अधिक महत्वपूर्ण हो गये।”

  2. कला पर प्रभाव—

    हिन्दू एवं इस्लाम के निरन्तर सम्पर्क के कारण कला के क्षेत्र में नये मार्ग उन्मुख हुए और दोनों कलाओं ने एक-दूसरे पर व्यापक प्रभाव डाले। डॉ० ताराचन्द ने तत्कालीन निर्मित भवनों की निर्माण-शैली का सूक्ष्म अध्ययन करने के पश्चात लिखा है कि “वस्तुतः तत्कालीन हिन्दू या मुस्लिम स्थापत्य कला एक पेड़ की दो शाखाएँ हैं जिनका उदय एक ही जड़ से हुआ था। उनके उद्देश्य भिन्न हो सकते हैं परन्तु उनका महत्व एक ही था।” मुस्लिम स्थापत्य-कला के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए पर्सी ब्राउन ने लिखा है, “वृन्दावन मन्दिरों में बहुत कुछ अपना मौलिक है, पर कुछ अन्य हिन्दू इमारतों में गोविन्ददेव के मन्दिर की अपेक्षा मुसलमानों की प्रचलित शैली का प्रभाव अधिक स्पष्ट है।”

स्थापत्य-कला पर प्रभाव- गुलाम-युग की इमारतों पर भारतीय कला का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। खलजी-युग में भारतीय शैली के विरुद्ध प्रतिक्रिया होने के कारण अरबी कला को महत्व प्राप्त हुआ। तुगलककालीन इमारतें पूर्ण रूप से इस्लामी शैली की है परन्तु लोदी-काल आते-आते पुनः भारतीय शैली को महत्व प्राप्त हुआ। हैवेल के अनुसार, मध्य-युग की कला पर हिन्दू प्रभाव का बाहुल्य है परन्तु स्मिथ व फर्ग्युसन का मत इसके विपरीत है। सर जॉन मार्शल का मत है कि “भारतीय मध्ययुगीन कला हिन्दू व मुस्लिम दोनों संस्कृतियों से प्रभावित हुई।”

चित्रकला पर प्रभाव- चित्रकला पर दोनों संस्कृतियों के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है, “यद्यपि मुगल-काल में चित्रकला का आधार फारसी शैली था, परन्तु वास्तव में यह हिन्दू और फारसी विचारों का सम्मिश्रण था। इसका विकास मुगल व राजपूत शैलियों के समन्वय के कारण हुआ।” प्रारम्भिक मुगल चित्रकला शैली की कठोरता का स्थान कालान्तर में भारतीय शैली की कोमलता ने ले लिया था और उदार अकबर ने दोनों शैलियों के समन्वय को राष्ट्रीय शैली का रूप प्रदान किया।

  1. संगीत पर प्रभाव-

    संगीत में फारसी एवं हिन्दू रागों के समन्वय के परिणामस्वरूप नवीन राग-रागनियों का जन्म हुआ। ‘ख्याल’ संगीत इस युग की विशेष देन है। भारतीय वीणा और ईरानी तम्बूरे को मिलाकर ‘सितार’ का आविष्कार किया गया। कव्वाली और गजल भी इस्लाम की ही देन है।

  2. साहित्य एवं भाषा पर प्रभाव—

    हिन्दू-मुस्लिम समन्वय के युग में विभिन्न प्रकार के साहित्य का जन्म हुआ। राजाश्रय के अभाव में संस्कृत मृतप्राय हो चुकी थी। मुसलमान सुल्तानों ने अरबी व फारसी को राजभाषा घोषित कर दिया था। प्रान्तीय राजाओं ने संस्कृत को प्रश्रय प्रदान किया और मुस्लिम शासकों ने भी कुछ संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद कराया।

साहित्य के क्षेत्र में उर्दू के विकास पर इस्लामी संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट है। उर्दू की उत्पत्ति एवं विकास के सम्बन्ध में इतिहासकार एकमत नहीं हैं। मुसलमानों के भारत और विशेष रूप से दिल्ली आने के बाद फारसी शब्दों का खड़ी बोली, पंजाबी व ब्रजभाषा से मिश्रण होने के कारण उर्दू का उदय हुआ। उर्दू का उदय हिन्दू और मुसलमानों के सांस्कृतिक समन्वय का परिणाम कहा जा सकता है। सूफी सन्तों ने अपने धर्म-प्रचार के लिए उर्दू को ही माध्यम बनाया आ।

ऐतिहासिक साहित्य की रचना मुस्लिम संस्कृति की महत्वपूर्ण देन है। मुसलमानों के आगमन से पूर्व भारतीय समाज में इतिहास-लेखन की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था। पूर्व-मध्यकाल में ‘तबकाते नासिरी’, ‘ताजुल मासिर’, ‘तारीखे फिरोजशाही’ आदि कुछ महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे गये। अमीर खुसरो आदि विद्वानों ने भी कुछ ऐतिहासिक ग्रन्थों की रचना की जो दिल्ली सल्तनत-काल के इतिहास के अध्ययन के अमूल्य स्रोत हैं। मुगलकालीन ऐतिहासिक ग्रन्थों में बाबर कृत ‘तुजके बाबरी’, गुलबदन बेगम का ‘हुमायूँनामा’, अबुल फजल का ‘अकबरनामा’ व ‘आईन-ए-अकबरी’, निजामुद्दीन अहमद कृत ‘तबकाते अकबरी’, बदायूँनी का मुन्तखब-उत-तवारीख’, जहाँगीर की आत्मकथा ‘तुजके जहाँगीरी’ और ‘अब्दुल हमीद लाहौरी का पादशाहनामा’ अत्यधिक प्रसिद्ध है। –

मुस्लिम समाज की व्यापकता को स्पष्ट करते हुए यह कहा जा सकता है कि भारतीय समाज एवं प्रशासन का कोई भी अंग इससे अछूता नहीं रहा। तत्कालीन युद्ध-विद्या के क्षेत्र में इस्लाम का प्रभाव और भी क्रान्तिकारी था। डॉ० श्रीवास्तव ने लिखा है, “मुसलमानों के सम्पर्क का एक महत्वपूर्ण प्रभाव भारतीय युद्ध-प्रणाली पर पड़ा। मुगल युद्ध-प्रणाली ने 16वीं सदी की भारतीय राजनैतिक स्थिति में क्रान्ति उत्पन्न कर दी।” मुसलमानों द्वारा आग्नेयास्त्रों (तोपों) के प्रयोग ने एक नवीन युद्ध-प्रणाली को जन्म दिया जिसके फलस्वरूप हिन्दू युद्ध-व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

टाइटस का यह कथन उपर्युक्त वर्णन के पश्चात् कुछ पक्षपातयुक्त प्रतीत होने लगता है कि “सब कुछ कहने के पश्चात् इसमें तनिक भी सन्देह नहीं रह जाता है कि अपने ऊपर इस्लाम के प्रभाव की अपेक्षा हिन्दू धर्म ने इस्लाम पर कहीं अधिक प्रभाव डाला था।’ वस्तुतः धर्म, साहित्य, कला, संगीत—सभी क्षेत्रों में दोनों संस्कृतियों के प्रभाव एक-दूसरे पर व्यापक रूप से हुए।

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