भक्ति-आंदोलन का प्रभाव

भक्ति-आन्दोलन के प्रभाव

भक्ति-आन्दोलन के प्रभाव

इस जन-आन्दोलन ने समाज के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया। धार्मिक संकीर्णता का संक्रामक रोग जिसका प्रस्फुटन सैकड़ों वर्ष पूर्व हुआ था और जो भारतीय समाज को निरन्तर खोखला कर रहा था, उसमें शनैः-शनैः सहनशीलता की भावना का उदय होने लगा था। मुगल-काल तक आते-आते सल्तनत-काल की धर्मान्धता का स्थान शेरशाह एवं अकबर की उदार धार्मिक प्रवृत्तियों ने ले लिया था। फलतः मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दुओं ने भी देश के राजनीतिक उत्थान में एक महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की। अकबर की ‘सुलहकुल’ की नीति भक्ति-आन्दोलन से प्रेरित थी। संक्षेप में, इस आन्दोलन ने भारत की सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक स्थिति को निम्नतः प्रभावित किया।

  1. राष्ट्रीय एकता का उदय-

    भक्ति-आन्दोलन ने केवल धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में ही योगदान नहीं दिया अपितु राष्ट्रीय भावनाओं के उदय में भी सहायता प्रदान की। मराठों और सिक्ख जाति के अभ्युदय का श्रेय भक्ति-आन्दोलन को ही है। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में जो आन्दोलन हुए उनमें हिन्दुत्व की रक्षा करना भी एक कारण था। अतः स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता आन्दोलनों के बीजारोपण में भक्ति-आन्दोलन सहायक सिद्ध हुआ।

  2. हिन्दू संस्कृति की रक्षा–

    सन्त कवियों ने जिस काव्य का सृजन किया उससे दर्शन के क्षेत्र में विशेष उन्नति हुई। प्रान्तीय भावनाओं को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ और साहित्य में अभिवृद्धि हुई। विभिन्न सन्तों ने जो उपदेश दिये अथवा भजन लिखे वह भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि है जिनका भारतीय संस्कृति की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान है।

  3. सम्प्रदायों में समन्वय—

    इस आन्दोलन ने धार्मिक सहिष्णुता को जन्म दिया। फलतः समाज के दो मुख्य परस्पर विरोधी सम्प्रदाय हिन्दू और मुसलमानों में समन्वय और सामंजस्य की भावना का उदय हुआ जिसके कारण सामाजिक जीवन में समृद्धि, स्थिरता और शान्ति दिखायी पड़ने लगी। डॉ0 के0 के0 दत्ता ने लिखा है कि अठारहवीं शताब्दी के मध्य में मुस्लिम शासक सिराजुद्दौला एवं मीरजाफर होली का त्यौहार मनाते थे। अनेक हिन्दू मस्जिदों में ‘सिन्नी’ चढ़ाते थे। डॉ० सेन के अनुसार, दौलतराव सिन्धिया अपने अधिकारियों सहित हरे वस्त्र पहन कर मोहर्रम के जुलूस में भाग लेता था। इस प्रकार दोनों सम्प्रदायों को समन्वय का अवसर भक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ।

  4. सामाजिक कुरीतियों का अन्त—

    इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप परम्परागत रूप से चली आ रही ब्राह्मणों की प्रभुसत्ता और धार्मिक विशेषाधिकारों का अन्त हो गया। मोक्ष प्राप्त करना अब केवल उच्च वर्ग तक ही सीमित नहीं रहा था अपितु शूद्र भी सदाचार और भक्ति के द्वारा मोक्ष के अधिकारी मान लिये गये थे।

भक्ति-आन्दोलन के सन्तों के प्रभाव से भारतवासियों के हृदय में सेवा-भाव का उदय हुआ। मूर्ति-पूजा पूर्ण रूप से समाप्त तो नहीं हुई परन्तु बहुत सीमा तक सीमित हो गयी। सन्तों के प्रचार के कारण लोग यह अनुभव करने लगे कि मूर्ति-पूजा निरर्थक है। मुसलमानों के अत्याचारों को सहन करने के लिए इस आन्दोलन ने हिन्दुओं को नैतिक बल प्रदान किया और धर्म-परिवर्तन न्यूनतम स्थिति को पहुँच गया।

डॉ० आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव के अनुसार, भक्ति-आन्दोलन ने हमारी जन-भाषाओं के साहित्य के विकास में योग दिया और उन्हें अधिक सम्पन्न बनाया। अधिकांश सुधारकों ने जनभाषा में लोगों को उपदेश दिये और इससे हिन्दी, बंगाली, मराठी, मैथिली और गुजराती | आदि भाषाओं की सम्पन्नता में वृद्धि हुई। इस प्रकार हमारी जनभाषाओं के उत्थान के साहित्य में भक्ति-आंदोलन स्वर्ण युग सिद्ध हुआ।

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