मौर्य कालीन स्थापत्य कला

मौर्य कालीन स्थापत्य कला

मौर्य कालीन स्थापत्य कला

मौर्यकाल में कला की भी यथेष्ट प्रगति हुई। मौर्ययुगीन आर्थिक संपन्नता ने कला के विकास को प्रभावित किया। वस्तुतः, हड़प्पा की सभ्यता के पश्चात पहली बार भारतीय कला के स्पष्ट प्रमाण इस समय मिलते हैं। वास्तुकला और मूर्तिकला की अनोखी प्रगति हुई। इस समय राजकीय कला (court art) के साथ-साथ लोककला का भी विकास हुआ। पुरातात्विक साक्ष्यों से मौर्यकालीन कला पर प्रकाश पड़ता है।

राजकीय कला : मौर्य राजप्रसाद

वास्तुकला राजकीय कला के अंतर्गत राज्य या शासकों के प्रयास से सुन्दर कला-कृतियाँ बनाई गईं। इस श्रेणी में हम चंद्रगुप्त द्वारा निर्मित पाटलिपुत्र के राजप्रासाद, अशेक द्वारा स्थापित प्रस्तर-स्तंभ (लाट) स्तूप एवं गुफाओं को रख सकते हैं। मौर्ययुग के भवनों में पकाई गई ईंटो के व्यवहार का प्रमाण यद्यपि बड़े पैमाने पर मिलता है, तथापि लकड़ी और पत्थर का उपयोग भी भवन-निर्माण के लिए किया जाता था। इसका सबसे बढ़िया नमूना काष्ठनिर्मित पाटलिपुत्र का राजप्रासाद है, जिसकी प्रशंसा यूनानी लेखक करते हैं। उनके अनुसार पाटलिपुत्र नगर की सुन्दरता अद्वितीय थी। इसके राजप्रासाद की तुलना में सूसा और एकबतना भी फीके थे। पाटलिपुत्र नगर गंगा और सोन के संगम पर बसा था। पुनपुन नदी भी इसके नजदीक ही थी। मेगास्थनीज के अनुसार नगर 91/2 मील (15.2 किलोमीटर)लंबा और 1/2 मील (0.8 किलोमीटर) चौड़ा था। नगर की सुरक्षा के लिए लकड़ी की चारदीवारी बनी हुई थी। इनमें जगह-जगह छिद्र बनाए गए थे, जिससे तीरंदाज नगर की सुरक्षा कर सके। चारदीवारी के बाहर चारों तरफ एक गहरी खाई (600 फुट चौड़ी एवं 60 फुट गहरी) बनाई गाई थी। नगर में प्रवेश के लिए अनेक (64) प्रवेश-द्वार बने हुए थे। दीवारों पर बुर्ज भी बने हुए थे। इनकी संख्या 570 थी। कुम्हारा, बुलंदीबाग और अन्य समीपवर्ती स्थानों के उत्खननों में इस चारदीवारी और लकड़ी के स्तंभ के प्रमाण मिले हैं। बुलंदीबाग के उत्खननों से 150 फीट (लगभग 45.75 मीटर) लंबा लकड़ी का प्राचीर मिला है। इस प्राचीर का निर्माण लकड़ी के खंभों की दो पंक्तियों से हुआ था। खंभे 141/2 फीट (4.4 मीटर) की दूरी पर लगाए गए थे। खंभों के बीच के अंतर को लकड़ी के स्लीपरों से पाटा गया था। खंभे करीब 12 1/2 फीट (3.8 मीटर) जमीन के ऊपर और 5 फीट (1.52 मीटर) जमीन के अंदर थे।

अशोक ने इस राजप्रासाद का विस्तार किया तथा अनेक नए भवन भी बनवाए। उसके समय में भवन में पत्थरों का भी इस्तेमाल हुआ। कुम्हार से ही एक विशाल भवन (हॉल) जो 80 प्रस्तर-स्तंभों पर टिका हुआ था, प्रकाश में आया है। अनेक स्तंभ अब भी अपनी जगह पर टिके हुए हैं। कुम्हार के उत्खननों से करीब 40 स्तंभ जमीन में धंसे हुए पाए गए हैं। यह भवन संभवतः एक सभाकक्ष था। इसकी लंबाई करीब 140 फीट (42.67 मीटर) और ऊँचाई 120 फीट (36.58 मीटर) थी। अनुमानतः इसका फर्श और छत लकड़ी का बना हुआ था। भवन के स्तंभ बलुआ पत्थर के बने हुए हैं और उन पर चमकदार पॉलिश है। फाहियान भी अशोक के भवनों में पत्थरों के उपयोग की चर्चा करता है। इन भवनों से वह इतना अधिक प्रभावित हुआ था कि वह कहता है कि इन्हें देवताओं ने बनाया था, मनुष्य ने नहीं। ह्वेनसांग भी अशोक द्वारा बनवाए गए भवनों का उल्लेख करता है।

स्तूप-

अशोक ने अनेक स्तूपों का भी निर्माण करवाया। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार अशोक ने बुद्ध के अवशेषों पर 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया। यद्यपि यह संख्या कपोलकल्पित है, तथापि साँची, भरहुत और सारनाथ के स्तूप आरंभिक रूप में अशोक के समय ही बने। उसने भिक्षुओं के लिए विहार भी बनवाए। बोधगया के मंदिर के मूल-निर्माण का श्रेय भी अनेक विद्वान अशोक को ही देते हैं, यद्यपि यह संदिग्ध है।

अशोककालीन गुफाएँ-

कला के क्षेत्र में अशोक का दूसरा महत्वूपर्ण योगदान है- गुफाओं का निर्माण। ठोस पहाड़ की चट्टानों को कुशलतापूर्वक काटकर गुफाओं का निर्माण करवाया गया। बिहार में गया जिला के अंतर्गत बराबर की पहाड़ियों में ऐसी गुफाएँ बनवाई गईं, जहाँ से अशोक के अभिलेख भी मिले हैं। पहली गुफा अशोक के 12वें राजवप की है (न्यग्रोध-गुहा या सुदामा-गुहा) । इसे आजीवकों को दिया गया था। दूसरी गुफा (विश्व- झोपड़ी-गुहा) भी इसी वर्ष (अभिषेक के 12 वर्षों के बाद) आजीवकों को दी गई। तीसरी गुफा (कर्णचौपड़) 19वें शासनवर्ष में संन्यासियों को बाढ़ से सुरक्षा के उद्देश्य से दी गई थी। गुफाओं की निर्माण-शैली बौद्धशैली से मिलती-जुलती है। बाद में अशोक के पुत्र दशरथ ने भी नागार्जुनी (गया जिला) की पहाड़ियों में तीन गुफाएँ बनाकर आजीवकों को दान में दी। अशोक द्वारा बनवाई गई गुफाओं के आधार पर ही कालांतर में भाजा, कन्हेरी और कार्ले के चैत्यगृहों का निर्माण हुआ।

अशोक स्तंभ-

अशोक के समय की कला का सर्वोत्कृष्ट नमूना उसके द्वारा बनवाए गए विशाल प्रस्तर-स्तंभ अथवा लाट हैं। ये सभी स्तंभ पत्थर के एक ही टुकड़े से बनाए गए थे। इनके निर्माण में चुनार का बलुआ पत्थर उपयोग में लाया गया था। इन पर अशोक के आदेश खुदे हुए हैं। ये स्तंभ अनेक जगहों से प्राप्त हुए हैं, जैसे-दिल्ली-टोपरा, दिल्ली-मेरठ, लौरिया-अरेराज, लौरिया-नंदनगढ़, रमपुरवा, सारनाथ, कौशाम्बी इत्यादि। करीब 20 ऐसे स्तंभ पाए गए हैं। इन स्तंभों की ऊंचाई करीब 40-50 फीट और वजन लगभग 50 टन तक है। स्तंभों का आधार मोटा है, परन्तु ऊपरी भाग क्रमशः पतला होता चला गया हैं। इन स्तंभों पर चमकदार पॉलिश की गई है। स्तंभों के शीर्ष पर घंटा, गोल अण्ड या चौकी हैं, जिनमें कुछ पर पशुओं के कुछ पर चक्रों एवं हँसों की पंक्तियाँ अंकित हैं। उदाहरणस्वरूप, जहाँ सारनाथ-स्तंभ पर चार सिंह एक-दूसरे से सटे हुए बैठे हैं और एक चक्र धारण किए हुए हैं, वहीं रमपुरवा में स्तंभशीर्ष को एक साँढ़ सुशोभित कर रहा है। इसी प्रकार, लौरिया नंदनगढ़ स्तंभ के शीर्ष पर सिर्फ एक सिंह की ही अनुकृति है। वस्तुतः, अशोक के स्तंभ अपनी सुन्दरता, विशालता एवं पशुओं के जीवंत अनुकृति के लिए विश्वविख्यात है।

अनेक विद्वानों का विचार है कि अशोक के स्तंभ ईरानी और यूनानी कला से प्रभावित हैं। ऐसा मत मुख्यतः पाश्चात्य विद्वानों ने व्यक्त किया है। भारतीय विद्वान इस मत से सहमत नहीं हैं। उनकी धारणा है कि अशोक स्तंभों का निर्माण विशुद्ध भारतीय परम्पराओं के अनुरूप हुआ था, इन पर विदेशी कला का प्रभाव नहीं है। प्रो. नीहाररंजन राय ने मौर्यकालीन राजकीय कला पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह मूलरूप से व्यक्तिगत था, व्यक्तिगत इच्छाओं और अभिरुचियों के अनुसार इसे ढाला गया था। अनेक विद्वान मानते हैं कि अशोक के लाट पर जिस प्रकार की पशुआकृतियाँ हैं, वह हड़प्पा की पशुआकृतियों की परंपरा में है। वे यह भी मानते हैं कि पत्थर पर चमकदार पॉलिश करने की कला भारत में ईरानी संपर्क के पहले से ज्ञात थी।

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