विवेकानन्द के सामाजिक विचार

विवेकानन्द का सामाजिक चिन्तन

विवेकानन्द का सामाजिक चिन्तन

(SOCIAL PHILOSOPHY OF VIVEKANAND)

मन, प्राण और शरीर से हमें काम में लग जाना चाहिए। और जब तक हम एक ओर ही आदर्श के लिए अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार न रहेंगे तब तक हम कदापि आलोक नहीं देख पाएँगे।”

  –विवेकानन्द

विवेकानन्द के हृदय में एक आँधी थी, उनकी आत्मा में एक आग थी और वह भारत को जगाना-ऊपर उठाना चाहते थे। समाज-सुधार और देश के पुनर्जागरण के सम्बन्ध में उनके विचार बिलकुल स्पष्ट थे । सामाजिक कार्यों को आध्यात्म-साधना के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में स्वीकार किया जाए।

समाज का सावयवी स्वरूप

विवेकानन्द स्पेन्सर की भाँति ही समाज को एक सावयव मानते थे। उनका विचार था कि “अनेक व्यक्तियों का समूह समष्टि (सम्पूर्ण) कहलाता है और अकेला व्यक्ति उसका एक भाग है। आप और हम अकेले व्यष्टि हैं, समाज एक समष्टि है ।” व्यक्ति की भाँति समष्टि का भी एक आँगिक जीवन है, उसका भी विकासशील मस्तिष्क और आत्मा है। सामाजिक प्रगति तभी सम्भव है जब उसके घटक कुछ बलिदान करें क्योंकि त्याग अथवा बलिदान किये बिना समष्टि के कल्याण की कामना व्यर्थ है। विवेकानन्द का कर्मानुसार फल में गहन विश्वास था और इसलिए उन्होंने माना कि किसी विशेष समाज में व्यक्ति का जन्म उसके पिछले कर्मों के आधार पर होता है। इससे प्राभास मिलता है कि विवेकानन्द की दृष्टि में समाज कोई मानव निर्मित संस्था न होकर ईश्वर द्वारा व्यक्तियों के पिछले कर्मों के आधार पर निर्मित संस्था है। इस प्रकार की भावना के मूल में विवेकानन्द का यह विश्वास अभिव्यक्त होता है कि मनुष्य और समाज का अस्तित्व

शुभ के लिए है, अत: शुभ कर्म करके ही व्यक्ति अपना और समाज का कल्याण कर सकता है। सुकर्म प्रगति की ओर ले जाने वाला है, कुकर्म प्रगति का विनाशक है-हमें अधोगति की और धकेलता है। व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं जीता बल्कि दूसरों के लिए भी जीता है और इसी में उसकी मनुष्यता छिपी है। समाज विभिन्न व्यक्तियों का समूह है जिसके विकास के लिए व्यक्तियों द्वारा आत्म त्याग अनिवार्य है। मानवीय सम्बन्धों का अन्तिम लक्ष्य और परिणाम सामूहिक सुख होना चाहिए, निरा व्यक्तिगत सुख नहीं।

भारतीय समाज की बुराइयों और पतन के कारणों पर प्रहार

स्वामी विवेकानन्द सामाजिक संगठन और सामाजिक मामलों में धर्म को घुसेड़ना पसन्द नहीं करते थे और इसी कारण वे जात-पात, सम्प्रदाययाद और छुआछूत तथा सब तरह की विषमताओं के विरुद्ध थे। तत्कालीन भारतीय समाज की पतनोन्मुख दशा देखकर विवेकानन्द को असह्य कष्ट होता था। उन्होंने भारत के पतन के प्रमुख कारणों को ढूँढा और उनके निराकरण पर बल दिया। पतन के ये कारण थे-छुआछूत, श्रद्धा का अभाव, अंग्रेजियत और पाश्चात्य भौतिकवादी संस्कृति के प्रति अत्यधिक आकर्षण, बेईमानी, शारीरिक विकास की उपेक्षा, छात्र-भावना का पतन और कुछ सीखने के प्रति उदासीनता, भय-ग्रंथी अथवा स्वयं को हीन मानने की मनोदशा, मौलिकता तथा साहस की कमी, आलस्य, संकीर्ण दृष्टिकोण, धर्म की उपेक्षा तथा दुर्बलता और पिछड़ापन ।

  1. विवेकानन्द ने भारत में व्याप्त अस्पृश्यता और रूढ़िवादिता पर कटु प्रहार किया। रूढ़िवाद को उन्होंने ‘रसोई धर्म’ और अस्पृश्यवाद कहकर उसकी भर्त्सना की। विवेकानन्द ने आत्मा को छू देने वाले शब्दों में कहा, “भारत में यह रोना-धोना मचा है कि हम बड़े गरीबी हैं, परन्तु गरीबों के लिए कितनी दानशील संस्थाएँ हैं? भारत के करोड़ों गरीबों के दुःख और पीड़ा के लिए कितने लोग असल में रोते हैं ? क्या हम मनुष्य हैं ? हम उनकी जीविका और उन्नति के लिए क्या कर रहे हैं ? हम उन्हें छूते भी नहीं और उनकी संगति से दूर भागते हैं। क्या हम मनष्य हैं? वे हजारों ब्राह्मण भारत की नीच और दलित जनता के लिए क्या कर रहे हैं ? ‘मत-छू’ ‘मत-छू’ एक ही वाक्य उनके मुख से निकलता है। उनके हाथों हमारा सनातन धर्म कैसा तुच्छ और भ्रष्ट हो गया है। अब हमारा धर्म किसमें रह गया है ? केवल छुआ-छूत में, और कहीं नहीं।”
  2. विवेकानन्द ने लोगों को कूप-मण्डूक न बने रहकर खुली आँखों से दुनिया को देखने के लिए कहा और पीछे की ओर न देखकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनका सन्देश था कि जीवन प्रगतिशील है और आज का हमारा जीवन पिछली अनेक सदियों में की गई प्रगति तथा विकास का परिणाम है। अतः हमें रूढ़िवादिता और प्रगतिशील विचारों से दूर रहकर सदैव प्रगति-पथ का राही बनना चाहिए। समाज में व्याप्त अन्धविश्वासों को ठुकराकर प्रत्येक बात को तर्क और बुद्धि की तराजू पर तोलकर ग्रहण करना चाहिए। पर रूढ़िवाद पर प्रहार करते हुए भी विवेकानन्द ने पश्चिम के अन्धानुकरण की प्रवृत्ति के विरुद्ध उसे तरजीह दी, क्योंकि उनका विचार था कि एक रूढ़िवादी व्यक्ति में कम से कम इतनी शक्ति तो होती ही है कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके जबकि यूरोपीय सभ्यता अथवा पश्चिमी संस्कृति का अन्धा भक्त तो बिलकुल निशक्त हो जाता है। वह अपनी रीढ़ की हड्डी भी खो चुका होता है। उसके हाथों में पश्चिम से नकली मोतियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता।
  3. स्वामी विवेकानन्द के हृदय में गरीबों और दलितों के लिए असीम सहानुभूति थी। इस दृष्टि से वे गाँधी के अग्रवाहक थे। वे सबसे बड़े समाजवादी थे जो अमीर और गरीब के भेद को ठुकराकर पद दलितों को सीने से सन्देश देते थे और अपने कर्ममय जीवन में, अपने मिशन में उन्होंने यह करके भी दिखलाया। विवेकानन्द की ललकार थी-“गरीब और अभावग्रस्त, पीडित और पद-दलित, सब आओ, हम सब रामकृष्ण की शरण में एक हैं ।” उन्होंने कहा-“हम पूजा के इस तामझाम को यानी देव-मूर्ति के सामने शंख फूंकना, घण्टा बजाना और आरती करना छोड़ दें। हम शास्त्रों के पठन-पाठन और व्यक्तिगत मोक्ष के लिए तब तरह की साधनाओं को छोड़ दें और गाँव-गाँव में जाकर गरीबों को सेवा, गरीबों और पीड़ितों की सेवा करने का बीड़ा उठा लें।” विवेकानन्द ने शिक्षितों को इन शब्दों में चुनौती दी-“जब तक करोड़ों लोग भूख और अज्ञान में गोते खा रहे हैं, तब तक मैं हर आदमी को एक विश्वास-घातक मानता हूँ जिसने उनकी गाढ़ी कमाई के पैसे से शिक्षा पाई है और अब उन्हीं पर कोई ध्यान नहीं देता।” विवेकानन्द ने अमीरों की उनके कपट, शोषण और अनाचार के लिए फटकारा । बड़े दर्द भरे शब्दों में उन्होंने कहा “भारतवर्ष में हम लोग गरीबों को, साधारण लोगों को, पतितों को क्या समझा करते हैं ? उनके लिए न कोई उपाय न बचने की राह, और न उन्नति के लिए कोई मार्ग ही। भारत के दरिद्रों का, भारत के पतितों, भारत के पापियों का कोई साथी नहीं उन्हें कोई सहायता देने वाला नहीं, वे कितनी ही कोशिश क्यों न करें उनकी उन्नति का कोई उपाय नहीं। वे दिन पर दिन डूबते जा रहे हैं। राक्षस जैसा नृशंस समाज उन पर जो लगातार चोटें कर रहा है, उसका अनुभव तो वे खूब कर रहे हैं, पर वे जानते नहीं कि चोटें कहाँ से आ रहीं हैं।” पर साथ ही विवेकानन्द को विश्वास था कि जब पद-दलित वर्ग, जनता का साधारण वर्ग उठ खड़ा होगा तो उनकी प्रगति को रोकने का साहस किसी में न रहेगा। गरीबों की सर्व-साधारण की शक्ति को जगाते हुए विवेकानन्द ने कहा “ऊँचे पद वालों या धनिकों का भरोसा न करना। उनमें जीवनी-शक्ति नहीं है वे तो जीते हुए भी मुर्दे के समान हैं। भरोसा तुम लोगों पर है; गरीब, पद-मर्यादा-रहित किन्तु विश्वासी तुम्हीं लोगों पर।”
  4. विवेकानन्द ने बाल-विवाह की भर्त्सना की और घोषित किया “जिस प्रथा के अनुसार अबोध बालिकाओं का पाणिग्रहण होता है, उसके साथ मैं किसी प्रकार के सम्बन्ध रखने में असमर्थ हूँ।” विवेकानन्द ने बाल-विवाह के दुष्परिणाम को स्पष्टतया सामने रखा और कहा “बाल विवाह से असामयिक सन्तानोत्पत्ति होती है और अल्पायु में सन्तान धारण करने के कारण हमारी स्त्रियाँ अल्पायु होती हैं, उनकी दुर्बल और रोगी सन्तान देश में भिखारियों की संख्या बढ़ाने का कारण बनती हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि-“आज घर-घर इतनी अधिक विधवाएँ पाये जाने का मूल कारण बाल-विवाह ही है, यदि बाल-विवाहों की संख्या घट जाए तो विधवाओं की संख्या भी स्वयमेव घट जायगी ।” बाल-विवाह-निराकरण, विधवा-विवाह आदि सुधारों के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करते हुए विवेकानन्द इन विषयों पर अपनी शक्ति व्यय करने के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि हमारा कर्त्तव्य तो यह है कि हम समाज के प्रत्येक घटक को, चाहे वह स्त्री या पुरुष, शिक्षित और सुसंस्कृत बनाएँ । जनता के इस प्रकार शिक्षित हो जाने, पर वह स्वयं अपने हानि-लाभ का विचार कर इस प्रकार की कुरीतियों को निकाल बाहर करेगी और तब दबाव से किसी बात को समाज पर लादने की आवश्यकता नहीं रह जायगी।”

जाति-प्रथा और पुरोहितों के पुरातन अधिकारवाद का खण्डन

स्वामी विवेकानन्द ने प्रचलित जातिवाद को देश और समाज के लिए आत्म-घातक मानते हुए कहा कि जाति भेद केवल एक सामाजिक विधान है जिसकी उपयोगिता भूतकाल में चाहे जो भी रही हो, अब तो वह भारतीय वायुमण्डल में दुर्गन्ध फैलाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करती। जाति भेद का नाश तभी सम्भव है जब लोग अपने खोए हुए सामाजिक व्यक्तित्व को पुनः प्राप्त करेंगे। जाति प्रथा के विनाश के बारे में विवेकानन्द की दृष्टि बहुत पैनी थी। उन्होंने भाँप लिया कि आधुनिक प्रतिस्पर्धा के युग में जाति-विचार अपने आप नष्ट होता जा रहा है, उसका नाश करने के लिए किसी धर्म-विज्ञान की आवश्यकता नहीं।

उल्लेखनीय है कि विवेकानन्द जाति-प्रथा के उस रूप के विरोधी थे जिससे हम सामान्यत: परिचित हैं, अन्यथा ‘जाति’ का वास्तविक अर्थ उनकी दृष्टि में बिलकुल भिन्न था। वे जाति का अर्थ सकारात्मक रूप में लेते हुए ‘विचित्रता की स्वच्छन्द ‘गति’ मानते थे। उसके मतानुसार “जाति का मूल अर्थ था एवं सैकड़ों वर्षों तक यही अर्थ प्रचलित रहा कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्रकृति के, अपने विशेषत्व को प्रकाशित करने की स्वाधीनता। चूँकि भारत ने जाति सम्बन्धी इस भाव का परित्याग कर दिया, अत: वह अधःपतन की स्थिति में आ गया।” विवेकानन्द ने कहा कि “आजकल का वर्णविभाग (Caste) यथार्थ जाति नहीं है, बल्कि जाति की प्रगति में वह एक रुकावट ही है। सचमुच, इसने सच्ची जाति अर्थात् विचित्रता की स्वच्छन्द गति को रोक दिया है। कोई भी दृढमूल प्रथा अथवा किसी जाति विशेष का विशेष अधिकार अथवा किसी भी प्रकार का वंश-परम्परागत जाति-विभाग उस सच्ची जाति की स्वच्छन्द गति को रोक देता है, और जब कभी कोई जाति इस अनन्त विचित्रता का सृजन करना छोड़ देती है, तब उसकी मृत्यु अनिवार्य है। अतएव मुझे अपने देशवासियों से यही कहना कि जाति उठा देने से ही भारत का पतन हुआ है। प्रत्येक दृढमूल सामन्तशाही अथवा विशेष अधिकार प्राप्त सम्प्रदाय जाति का घातक है-वह जाति नहीं है।”

जिस रूप में जाति भेद भारत में अपनी जड़ें जमा चुका था, उसे समूल नष्ट करना असम्भव था। अतः एक यथार्थवादी विचारक के रूप में विवेकानन्द ने कहा कि हमारा उचित प्रयास यह होना चाहिए कि मूल चतुर वर्ण-व्यवस्था पुनर्जीवित की जाए और निरन्तर वर्गों को ऊपर उठाकर उच्चतर वर्गों के स्तर पर लाया जाए। उनका कहना था कि ब्राह्मणों को नीचे गिराने की अपेक्षा यह उचित है कि प्रत्येक को उनके धरातल पर ले आना चाहिए । उच्चतर को निम्नतर के स्तर पर लाने से कोई लाभ नहीं होगा। एक ओर आदर्श है ब्राह्मण तथा दूसरी ओर आदर्श है चाण्डाल को उठाकर उसे ब्राह्मण स्तर तक ले आना ही सम्पूर्ण कार्य है। विवेकानन्द ने यह भी बताया है कि निम्नतर को उठा कर उच्चतर के स्तर पर किस प्रकार लाया जाए। उन्होंने सन्देश दिया कि निम्नतर जातियों को संस्कृति दो। रामानुज, चैतन्य, कबीर आदि सन्त और समाज-सुधारक जन-साधारण का स्तर ऊँचा उठाने में सफल हुए, लेकिन उनकी सफलता अधिक समय तक टिक नहींbसकी क्योंकि उन्होंने जन-साधारण और निम्नतर वर्गों को केवल ऊपर उठाने का प्रयास किया, उनके बीच संस्कृति का प्रसार करने के लिए कुछ नहीं किया। विवेकानन्द ने कहा कि संस्कृति का प्रसार केवल संस्कृति की शिक्षा द्वारा ही किया जा सकता है और स्थाई सुधार का यही मार्ग है।

विवेकानन्द पुरोहित कर्म और परम्परावादी ब्राह्मणों के पुरातन अधिकारवाद के सिद्धान्त के विरोधी थे। “उन्होंने पुरोहित धर्म की कटु शब्दों में निन्दा की, क्योंकि उससे सामाजिक अत्याचार को कायम रखने में सहायता मिलती थी और जनता की उपेक्षा होती थी। उन्होंने परम्परावादी ब्राह्मणों के पुरातन अधिकारवाद के सिद्धान्त का खण्डन किया क्योंकि यह सिद्धान्त शूद्रों अर्थात् देश की बहुसंख्यक जनता को वैदिक ज्ञान के लाभ से वंचित करता है। विवेकानन्द का कथन था कि सभी मनुष्य समान हैं, और सभी को आध्यात्मिक अनुभूति तथा परम ज्ञान का अधिकार है।” विवेकानन्द का लोकतान्त्रिक आध्यात्मवाद वास्तव में एक क्रान्तिकारी आदर्श था। वे यद्यपि भारत की सांस्कृतिक महानता के स्पष्टवादी प्रचारक थे, किन्तु साथ ही साथ उन्होंने प्रचलित सामाजिक अनुदारता के विरुद्ध विध्वंसकारी योद्धा की भाँति संघर्ष किया।

मूर्तिपूजा सम्बन्धी विचार

इस बात को स्वीकार करते हुए भी कि किसी प्रतिमा की पूजा से प्रत्यक्ष रूप से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती, स्वामी विवेकानन्द ने इसकी निन्दा नहीं की क्योंकि उनके अनुसार यह मन को ईश्वर की अनुभूति के लिए तैयार करती है। मूर्ति पूजा में निहित भावना यही है कि हम उसको परमात्मा नहीं, किन्तु परमात्मा की केवल प्रतिमा मान कर पूजते हैं। भूर्ति पूजा हमारे आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया में एक प्रारम्भिक अवस्था है। आध्यात्मिक विकास का आशय एक निम्नतर या हीनतर सत्य से एक उच्चतर सत्य की ओर प्रगति करना है और ईश्वर की अनुभूति के लिए मूर्ति पूजा ठीक वैसी है जैसे! बाल्यावस्था वृद्धावस्था की परिपक्व बुद्धि के लिए। मूर्ति-पूजा के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा-

“आजकल यह साधारण बात हो गई है कि सभी लोग अनायास ही इस बात को स्वीकार करते हैं कि मूर्ति पूजा ठीक नहीं हैं। मैं भी कभी ऐसा ही कहता और सोचता था और इसके दण्ड स्वरूप मुझे एक ऐसे पुरुष के पैरों तले बैठ कर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ी जिन्होंने मूर्ति पूजा से ही सब कुछ पाया था। मैं स्वामी रामकृष्ण परमहंस की बात कर रहा हूँ। यदि मूर्ति-पूजा द्वारा इस तरह रामकृष्ण परमहंस जैसे आदमी बन सकते हैं तो हजारों मूर्तियों की पूजा करो।”

स्वामी विवेकानन्द ने मूर्ति पूजा को धर्म के लिए एक सहायक तत्व माना जो प्राथमिक अवस्था में आवश्यक है, सदैव के लिए नहीं। यह मानव-स्वभाव का विधान है, लेकिन अपूर्ण मानव को इसी से ऊपर उठा सकते हैं।

समाज को प्रगति की ओर ले जाने वाले कुछ अन्य विचार

  1. स्वामी विवेकानन्द ने अपने पत्रों और भाषणों में चुन-चुन कर ऐसे विचार व्यक्त किए जो विश्व के किसी भी समाज को प्रगति के महान् शिखर पर पहुँचा देने की क्षमता रखते हैं, बशर्ते कि उन पर आचरण किया जाय । विवेकानन्द दिमाग की खिड़कियाँ खुली रखने के पक्ष में थे। उनका कहना था कि जहाँ जो कुछ अच्छा मिले, सीखना चाहिए। कूप-मण्डूक बने रहने की प्रवृत्ति हमें पीछे की ओर धकेलती है।
  2. विवेकानन्द ने स्वयं पर विश्वास करने की प्रेरणा दी। आत्म-विश्वास रखने पर ही व्यक्ति में कुछ करने की क्षमता विकसित होती है और आत्म-विश्वासी समाज ही समस्त बाधाओं को लाँघ कर ऊपर उठता है। विवेकानन्द ने कहा “लोग कहते हैं- इस पर विश्वास करो, उस पर विश्वास करो, मैं कहता हूँ-पहले अपने आप पर विश्वास करो। अपने पर विश्वास करो-सर्वशक्ति तुम में है-इसको धारण करो और शक्ति जगाओ-कहो, हम सब कुछ कर सकते हैं। नहीं नहीं कहने से तो साँप में विष भी नहीं रह जाता।”
  3. विवेकानन्द ने केवल अधिकारों के लिए संघर्ष करने की अपेक्षा कर्तव्यों को विशेष महत्व दिया। उन्हें इस बात पर खेद था कि विश्व के विभिन्न समूहों और वर्गों के अधिकारों के समर्थकों में परस्पर तनाव और संघर्ष चलता रहता है, लेकिन अपने कर्तव्यों पर कोई बल नहीं देता। अधिकारों के परस्पर विरोधी सिद्धान्त पनप रहे हैं, किन्तु कर्तव्यों और दायित्वों के पालन के प्रति विशेष अभिरुचि का अभाव है। विवेकानन्द अपने अधिकारों के लिए आग्रह के पक्ष में थे, लेकिन कर्तव्यों की उपेक्षा उन्हें असह्य थी। उनका विश्वास था कि निष्काम कर्त्तव्य करते रहने पर अधिकारों की स्वयं सृष्टि हो जाती है।
  4. विवेकानन्द, गाँधी के समान ही, सत्य के पुजारी थे। किसी भी परिस्थिति में सत्य से विमुख होना उनकी कल्पना में भी नहीं था। वे केवल सत्य को ही चिरस्थाई मानते थे।। फरवरी, 1985 को न्यूयॉर्क से उन्होंने कुमारी मेरी हेल को लिखा था-“सौन्दर्य और यौवन का नाश होता है, जीवन और धन का नाश होता है, नाम और यश का नाश होता है, पर्वत भी चूर-चूर होकर मिट्टी हो जाते हैं, मित्रता और प्रेम भी नश्वर हैं। एकमात्र सत्य ही चिरस्थाई है।” विवेकानन्द की दृष्टि में सत्य पर आग्रह सफलता की कुंजी थी। उन्होंने कहा-“सतर्क रहो, जो कुछ असत्य है उसे पास न फटकने दो। सत्य पर डटे रहो, बस तभी हम सफल होंगे-शायद थोड़ा समय लगे, पर सफल हम अवश्य होंगे।”
  5. ओज और तेजस्विता के पुंज थे, लेकिन मीठी वाणी और प्रेमपूर्ण व्यवहार उन्हें सदैव प्रिय था। उनका उपदेश था-“संसार सिद्धान्तों की कुछ परवाह भी नहीं करता। वह मनुष्य ही को मानता है। जो मनुष्य उन्हें प्रिय होगा उसके वचन वे शान्ति से सुनेंगे, चाहे वे कैसे ही निरर्थक हों, परन्तु जो मनुष्य उन्हें अप्रिय होगा उसके वचन नहीं सुनेंगे । मनुष्य प्रेम को पहिचानता है, चाहे वह किसी भी भाषा में प्रकट हो।’ प्रेम, सहानुभूति और कृतज्ञता ज्ञापन-ये बातें व्यक्ति को सफलता की ओर बढ़ाती हैं। इसी प्रकार विवेकानन्द मार्ग की बाधाओं को धैर्यपूर्वक हटाने में विश्वास करते थे। अनावश्यक जल्दबाजी के पक्ष में वे नहीं थे। पवित्रता, धैर्य और अध्यवसाय-इन गुणों को वे व्यक्ति और समाज की उन्नति के लिए आवश्यक मानते थे।
  6. विवेकानन्द एक व्यावहारिक विचारक थे जिनकी अनुभूति थी कि विश्व में ‘सर्वांग सुन्दर’ कुछ नहीं हो सकता-शुभ-अशुभ का विद्यमान रहना अवश्यम्भावी है और साथ ही समाज में आप प्रत्येक व्यक्ति को सन्तुष्ट करने में सफल नहीं हो सकते। उनका कहना था कि ‘सर्वाग सुन्दर जीवन’ एक स्वविरोधी बात है, अतः हमें सदैव यही देखने के लिए प्रस्तुत रहना चाहिए कि “विश्व की घटनाएँ हमारे चरम आदर्श से निम्न श्रेणी की हैं, एवं यह जानकर सभी क्षेत्रों में सब वस्तुओं को हमें यथासम्भव अच्छी दृष्टि से ग्रहण करना चाहिए।”

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