मंत्री-लोक सेवक

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मंत्री-लोक सेवक विवाद

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था सैद्धान्तिक रूप से बहुत आदर्शवादी तथा सुदृढ़ दिखाई देती है किन्तु व्यावहारिक स्तर पर इस लोकतांत्रिक एवं लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था में अनेक व्याधियाँ व्याप्त हैं। संसदीय लोकतंत्र प्रणाली में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि सरकारी विभागों के मंत्री बनाए जाते हैं। मंत्री महोदय को प्रशासनिक तथा अन्य प्रबन्धकीय सहायता तथा परामर्श उपलब्ध कराने के लिए, प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी ‘सचिव’ के रूप में नियुक्त रहते हैं। अधिकांशतः भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के वरिष्ठ अधिकारी ही विभागों या मंत्रालयों के सचिव बनाये जाते हैं। अपने दीर्घ प्रशासनिक अनुभवों तथा कार्यकौशल से ये अधिकारी, राजनीतिक मंत्री को मंत्री पद के दायित्व निर्वहन करने में सहायता करते हैं। जब मंत्री तथा सचिव (लोक सेवक) दोनों की विचारधारा समान होती है तथा दोनों ही कर्मठता से कार्य करने में रुचि प्रदर्शित करते हैं तब वह विभाग उत्तरोत्तर विकास की ओर अग्रसर होता है किन्तु विपरीत विचारधाराओं या कार्यप्रणाली के मंत्री-लोक सेवक का एक विभाग में मिलन होता है तो नित्य संघर्ष तथा विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। स्वतंत्रता के 50 वर्षों के पश्चात् भी भारतीय राजनेताओं तथा नौकरशाहों के मध्य मधुर तथा समन्वित सम्बन्धों का विकास नहीं हो पाया है। केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों में कार्यरत मंत्रियों तथा सचिवों के मध्य होने वाले विवाद प्रायः प्रकाश में आते रहते हैं।

मंत्री-लोक सेवक के मध्य इन विवादों को “राजनेता-नौकरशाह” अथवा “राजनीतिक कार्यपालिका-प्रशासनिक अधिकारी’ विवाद के नामों से भी जाना जाता है। यद्यपि राजनीतिक मंत्री भी सरकारी कोष से वेतन लेने के कारण लोक सेवकों की ही श्रेणी में आते हैं तथापि यहाँ परलोक सेवक से तात्पर्य प्रशासनिक कार्यपालिका में कार्यरत स्थायी अधिकारियों से है। प्रशासनिक तंत्र को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए ये दोनों ही समान भूमिका निर्वाहित करते हैं।

मंत्री-लोक सेवक में अंतर

क्र० कारक स० मंत्री               लोकसेवक
1. चयन राजनीतिक दल के प्रमुख के द्वारा होता है। योग्यता पर आधारित भर्ती प्रणाली से चयन होता है।
2. कार्यावधि राजनीतिक सत्ता के आधार पर निश्चित होती है जो प्रायः कुछ वर्षों की ही होती है। लोक सेवक सरकार के स्थायी कार्मिक होते हैं।
3. अनुभव प्रायः नौसिखिए राजनेत भी मंत्री बना दिए जाते हैं जो प्रशासनिक कार्य प्रणाली से अनभिज्ञ रहते हैं। मंत्री के साथ बहुधा वरिष्ठ एवं अनुभवी सचिव ही नियुक्त किया जाता है।

 

4. पदमुक्ति मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री तथा उनकी राजनीतिक पार्टी पर अधिक निर्भर करती है। एक निश्चित आयु पर लोक सेवकों को सेवानिवृत्ति होना पड़ता है।

 

5. लोकप्रियता जनता के द्वारा निर्वाचित होने  के कारण मंत्री अधिक लोकप्रिय तथा प्रत्यक्षतः जनता के सामने होते हैं। लोक सेवक प्रायः जनता से विलग तथा पर्दे के पीछे माने जाते हैं। यद्यपि जनसाधारण इनसे मिल सकता है।
6. कार्यालय समय मंत्री प्रायः राजनीतिक गतिविधियों से संलग्न रहने के कारण हमेशा एक निश्चित स्थान पर नहीं मिल पाते हैं। लोकसेवक अपने निर्धारित कार्यालय में नियत समय पर उपलब्ध रहते हैं।

 

7. कार्यकुशला मंत्री को प्रशासनिक कार्यों का प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया जाता है। लोक सेवक सम्बन्धित राज्य सरकार कार्य को करने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त होते हैं।

मंत्री-लोक सेवक संबंधों की समस्या भारत में ही नहीं वरन् अधिकांश देशों में व्याप्त है। मंत्री प्रायः राजनीतिक दल में प्रतिष्ठा, अनुभव, आस्था तथा जनता में लोकप्रियता के आधार पर मंत्रिमंडल में पद प्राप्त करते हैं। अधिकांश मंत्रियों को प्रशासनिक कार्यकलापों के निर्वहन में पूर्ण विशेषज्ञता प्राप्त नहीं होती है साथ ही मंत्री अपने राजनीतिक दल की मान्यताओं एवं कार्यक्रमों से घनिष्ठ रूप से जुड़ा रहता है, अतः वह अपने विभाग का अध्यक्ष होने के बावजूद भी पर्याप्त समय नहीं दे पाता है। दूसरी ओर मंत्री का सहयोगी एवं विभाग का सचिव (लोक सेवक) प्रशासनिक कार्यकलापों में निपुण, पूर्णकालिक कार्यकर्ता तथा नौकरशाही से जुड़ा कार्मिक होता है। मंत्री-लोक सेवक के मध्य होने वाले विवादों को निम्न बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. प्रशासनिक विशेषता

    योग्यता पर आधारित भर्ती प्रणाली से प्रशासन में प्रवेश पाये हुए तथा आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त लोक सेवक प्रशासनिक कार्यों के विशेषज्ञ होते हैं। विभाग में कार्य करते हुए अधिकांश लोक सेवक उस विभाग की सूक्ष्मताओं, विशेषताओं एवं कमियों से भली-भाँति परिचित हो जाते हैं। नीति निर्धारण तथा कार्यक्रम निर्माण में लोक सेवक ही मंत्री को आवश्यक तथ्य, सूचना एवं परामर्श प्रदान करते हैं। बहुधा नये मंत्री, लोक सेवकों के समक्ष स्वयं को असहाय पाते हैं क्योंकि मंत्री पद धारण करने से पूर्व उन्हें किसी प्रकार का प्रशासनिक प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया जाता है। ब्रिटेन के संदर्भ में सिडनी लॉ ने लिखा है- “वित्त मन्त्रालय में द्वितीय श्रेणी के क्लर्क का पद प्राप्त करने के लिए एक नवयुवक को अंकगणित की परीक्षा में उत्तीर्ण होना पड़ेगा, किन्तु वित्त मंत्री अधेड़ आयु का एक ऐसा सांसारिक व्यक्ति भी हो सकता है जो अंकों के विषय की उस थोड़ी बहुत जानकारी को भी भूल चुका है जो उसने स्कूल में प्राप्त की थी और उस मंत्री के समने दशमलवों से भरे हिसाब का वर्णन, जब पहली बार रखा जाता है तो वह (मंत्री) उन छोटे-छोटे बिन्दुओं का अर्थ जानने के लिए उत्सुक हो जाता है।”

  2. अहं का टकराव

    जनसाधारण से प्राप्त समर्थन के आधार पर निर्वाचित हुए सांसद अथवा विधायक जब मंत्री पद धारण करते हैं तो उनमें एक विशिष्ट मानसिकता विकसित हो जाती है। यह मानसिकता राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं तथा जनसाधारण द्वारा भी पल्लवित की जाती है। इस तरह प्रशासनिक तंत्र में पद स्थापित लोक सेवक में विशिष्ट अहं भाव से पीड़ित पाये जाते हैं। दोनों पक्षों में व्याप्त यह अहं जब अति का रूप ले लेता है तो संघर्ष की स्थिति बन जाती है। राजस्थान के मुख्य सचिव तथा एक कैबिनेट मंत्री के मध्य भी विवाद का कारण आपसी अहं रहा था। एक राजनीतिक दल के पदाधिकारी ने किसी ठेके में हुए अनियमितता में सम्बन्धित मंत्री को लिप्त मानते हुए मुख्यमंत्री को शिकायत की थी। मुख्य सचिव ने उस पत्र को उसी मंत्री के विभाग के सचिव के पास ‘परीक्षण करने हेतु अग्रेषित कर दिया था। यद्यपि जाँच के पश्चात शिकायत सही नहीं पायी गयी थी फिर भी मंत्री महोदय ने मुख्य सचिव के इस कृत्य को सही नहीं मानते हुए मुख्यमंत्री को अपनी आपत्ति पत्र द्वारा प्रकट की थी तथा मंत्री महोदय ने मुख्य सचिव को “बड़े बाबू’ के समान माना था। इसी प्रकार मध्य प्रदेश के एक मंत्री ने शासकीय अधिकारियों को “वेश्या” के समान मानते हुए विवादास्पद बयान दिया था जिसके कारण लोकसेवकों में आक्रोश व्याप्त हो गया था।

  3. कार्यशैली एवं अभिवृत्ति

    प्रशासनिक व्यवस्था में दो प्रकार के व्यक्ति पाये जाते हैं। एक तो वे जो पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी तथा परिश्रम से अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं तथा दूसरे वे जो केवल अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु भ्रष्ट आचरण का सहारा लेते हैं। यदि मंत्री तथा लोक सेवक दोनों ही ईमानदार तथा अनुशासन पंसद हों तो वह विभाग उन्नति की राह पर अग्रसर हो जाता है और यदि दोनों ही भ्रष्ट प्रकृति के हों तो वहाँ भ्रष्टाचार को मान्यता प्राप्त हो जाती है तथा रिश्वत तथाकथित “सुविधा शुल्क” के रूप में परिणित हो जाती है, लेकिन मंत्री तथा लोक सेवक भिन्न-भिन्न विचारधराओं के हों तो संघर्ष की स्थितियाँ उत्पन्न होने लगती हैं। इसीलिए अधिकांश मुख्यमंत्री पद धारण करते ही अपनी पसंद का मुख्य सचिव नियुक्त करना चाहते हैं ताकि नई सरकार की इच्छानुरूप कार्यक्रम सम्पादित हो सकें।

  4. जवाबदेयता की कमी

    भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में यह एक गंभीर समस्या है। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि आज भी ब्रिटिश परम्पराएँ हमारे प्रशासन का अभिन्न अंग हैं। प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारियों को बार-बार एक विभाग से दूसरे विभाग में भेजने की प्रवृत्ति शासकों की ही देन है। वर्तमान में भी जारी इस परम्परा के कारण लोक सेवक दीर्घावधि एक विभाग में रह नहीं पाते हैं। परिणामस्वरूप वे हमेशा कागजों में ठीक बने रहना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में कहाँ तो लोक सेवक विधिक प्रयासों की अपेक्षा नियम सम्मत प्रयासों को अधिक महत्व देते हैं।

विभाग के शीर्ष पर पदासीन मंत्री ही विभाग की सफलता या असफलता के लिए उत्तरदायी हैं, क्योंकि वही नीति निर्माता भी है। सिद्धान्त किसी भी मंत्री को अपनी असफलताओं के लिए लोक सेवकों को उत्तरदायी नहीं ठहराना चाहिए लेकिन ऐसा कई बार हुआ है जबकि मंत्री सार्वजनिक रूप से सचिवों पर छींटाकशी करते हैं। सचिवों की बाध्यता यह है कि वे जनता के बीच या विधायिका में जाकर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर सकते हैं। इस परिस्थिति का परिणाम यह होता है कि दोनों ओर से जवाबदेयता में कमी आती है तथा अविश्वास का क्षेत्र बढ़ता है। लोक सेवकों की कार्यप्रणाली अस्थिर सरकारों के कारण भी प्रभावित होती है। ऐसे में लोकसेवकों की जवाबदेयता और भी कम हो जाती है। लोक प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए मंत्री तथा लोक सेवक दोनों ही समान रूप से उत्तरदायी हैं किन्तु लोक सेवकों की असहयोगी प्रवृत्ति के समय मंत्री चाहकर भी उन्हें पदमुक्त नहीं कर सकता है, जबकि प्रशासनिक असफलता के समय सम्बन्धित मंत्री को संसद या विधानसभा में उत्तरदायी रूप से प्रश्नोत्तर देना होता है। विवादों की स्थिति में राजनेताओं की इच्छा ही सर्वोपरि रहती है, क्योंकि सत्ता में रहते हुए वे सरलतापूर्वक सचिव का स्थानान्तरण करवा देते हैं। विवाद या संघर्ष की इन स्थितियों में कई बार लोक सेवक प्रेस के माध्यम से मंत्री के विरुद्ध मोर्चा लेते देखे गये हैं।

मंत्री-लोक सेवक विवाद

क्र० सं० राजनीतिज्ञों का पक्ष  लोकसेवकों का पक्ष 
1.         भारतीय लोक सेवक परिणामोन्मुखी नहीं हैं। बहुधा सरकारी कार्यक्रम राजनीतिक उद्देश्यों से बनवाये जाते हैं। ऐसे में उनकी सफलता संदिग्ध बनी रहती है।
2.         जनप्रतिनिधि होने के कारण कुछ तात्कालिक निर्णय, नियमों से हटकर भी लेने होते हैं। नियम विरुद्ध कार्य करने से गलत परम्परा का विकास होता है जो अंततः प्रशासनिक अव्यवस्था को जन्म देता है।
3.         प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा फाइलें जटिल तथा उलझे हुए रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। अतः निर्णय लेना कठिन हो जाता है। राजनीतिज्ञों के पास समय भाव रहता है। प्रायः वे पूर्ण तन्मयता तथा इच्छ से विभागीय कार्य नहीं निबटाते हैं।

 

4.         लोक सेवक, मंत्री के आदेशों की अवहेलना करते रहते हैं। राजनीतिक द्वेष तथा विवादों के कारण कुछ मंत्री गलत कार्य करवाना चाहते हैं जो संभव नहीं होते हैं।
5.         प्रशासनिक असफलता के लिए उत्तरदायी लोक सेवक (सचिव) को   दण्डित (पदमुक्त) नहीं कर सकते हैं। मंत्रियों द्वारा सार्वजनिक रूप से सचिवों को बदनाम किया जाता है जबकि सचिव चाहकर भी जनता, प्रेस तथा विधायिका में अपना पक्ष नहीं रख सकते।
6.         विभाग की समस्त गतिविधियों की अन्तिम जिम्मेदारी मंत्री की है। उसे ही विधायिका में प्रश्नोत्तर देना होता है। जबकि लोक सेवक गलतियाँ करते हैं। मंत्री के नितांत गलत निर्णयों पर भी चुनौती नहीं दे सकते हैं। केवल अपना पक्ष मंत्री को समझा सकते हैं।

 

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