अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के कल्याण के लिए कदम

अनुसूचित जातियाँ एवं जनजातियाँ के कल्याण के लिए कदम

अनुसूचित जातियाँ एवं जनजातियाँ के कल्याण के लिए

कार्यक्रम एवं प्रशासन

संविधान के अनुच्छेद 341 तथा 342 के उपबन्धों के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा जारी किये गये 15 आदेशों द्वारा अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों का अलग-अलग उल्लेख किया गया है। 1981 की जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या लगभग 23.51 प्रतिशत थी।

सांविधानिक संरक्षण

संविधान में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य कमजोर वर्गों का शैक्षिक तथा आर्थिक दृष्टि से उत्थान करने और उनकी सामाजिक असमर्थताओं को दूर करने के उद्देश्य से उन्हें सुरक्षा तथा संरक्षण प्रदान करने की व्यवस्था की गयी है। मुख्य संरक्षण इस प्रकार हैं-

  1. अस्पृश्यता का उन्मूलन तथा इसके किसी भी रूप में प्रचलन का निषेध। [अनुच्छेद 17]
  2. इन जातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की रक्षा और उनका सभी प्रकार के शोषण तथा सामाजिक अन्याय से बचाव । [अनुच्छेद 46]
  3. हिन्दुओं की सार्वजनिक, धार्मिक संस्थाओं के द्वारा समस्त हिन्दुओं के लिए खोलना। [अनुच्छेद 25 (ख)]
  4. दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों तथा सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश अथवा पूर्ण या आंशिक रूप से राज्य निधि से पोषित अथवा साधारण जनता के उपयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नान घाटों, सड़कों तथा सार्वजनिक समागम स्थानों के उपयोग के बारे में किसी भी निर्योग्यता, दायित्व, निर्बन्धन अथवा शर्त को हटाना। [अनुच्छेद 15 (2)]
  5. किसी भी अनुसूचित जनजाति के हित में सभी नागरिकों के स्वतन्त्रतापूर्वक आने-जाने, बसने और सम्पत्ति अर्जित करने के सामान्य अधिकारों में विधि द्वारा कटौती करने की व्यवस्था। [अनुच्छेद 19 (5)]
  6. राज्य द्वारा पोषित अथवा राज्य निधि से सहायता पाने वाले किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश पर किसी भी तरह के प्रतिबन्ध का निषेध । [अनुच्छेद 29 (2)]
  7. राज्यों के पिछड़े वर्गों के लिए उन सरकारी सेवाओं में, जहाँ उनका प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है, आरक्षण करने का अधिकार देना तथा राज्य के लिए यह अपेक्षित करना कि वह सरकारी सेवाओं में नियुक्तियाँ करने के मामले में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के दावों को ध्यान रखे। [अनुच्छेद 16 तथा 335]
  8. अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों को 25 जनवरी, 2000 तक लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में विशेष प्रतिनिधित्व देना। [अनुच्छेद 330,331 तथा 334]
  9. अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा हितों की रक्षा के लिए राज्यों में जनजाति सलाहकार परिषदों तथा पृथक विभागों की स्थापना करना और केन्द्र में एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति करना। [अनुच्छेद 164 तथा 338 और पंचम अनुसूची]
  10. अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन और नियन्त्रण के लिए विशेष उपबन्ध । [अनुच्छेद244 और पंचम तथा षष्ठ अनुसूची]

अस्पृश्यता कानून को सन् 1976 में अधिक व्यापक बना दिया गया है। अब इसका नाम बदलकर ‘नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955’ कर दिया गया है। अब इस अधिनियम के तहत राज्य सरकारों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों को केन्द्रीय सरकार सहायता उपलब्ध कराती है। 20 राज्यों के नागरिक अधिकारों के संरक्षण से सम्बन्धित मामलों में पीड़ित अनुसूचित जातियों के लोगों को कानूनी सहायता देने की व्यवस्था की है। नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम के उपबन्धों का उल्लंघन करने के लिए मुकदमे दायर करने और उन पर निगरानी रखने के लिए 19 राज्यों ने विशेष कक्ष/दस्ते स्थापित किये हैं। संविधान के अनुच्छेद 330 तथा 332 के अन्तर्गत अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या के अनुपात में इनके लिए लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के स्थान आरक्षित किये जाते हैं। वर्तमान में लोकसभा के 542 स्थानों में से 79 अनुसूचित जातियों के लिए तथा 40 जनजातियों के लिए तथा 315 जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। पंचायती राज लागू होने पर अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए ग्राम पंचायतों तथा अन्य स्थानीय निकायों में स्थान आरक्षित करने की व्यवस्था है ताकि इनमें उनका समुचित प्रतिनिधित्व हो सके।

संविधान के अनुच्छेद 335 के अनुसार केन्द्र तथा राज्य सरकारों के अधीन सेवाओं में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों को समुचित प्रतिनिधित्व देने के लिए आश्वासन दिया गया है। इन जनजातियों को शासकीय सेवाओं में प्रतिनिधित्व देने के लिए जो रियायतें प्रदान की गयी हैं, उनमें मुख्य हैं-आयु सीमाओं में छूट, योग्यता स्तर में छूट, कार्यकुशलता का निम्न स्तर पूरा करने पर उनका चयन, नीचे की श्रेणियों में उनकी नियुक्ति और पदोन्नति का विशेष प्रबन्ध/केन्द्र सरकार की सेवाओं में 1 जनवरी, 1983 की स्थिति के अनुसार अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व का ब्यौरा पृष्ठ 353 पर दिया हुआ है।

अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन

आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा तथा राजस्थान के कुछ क्षेत्र संविधान के अनुच्छेद 244 तथा पंचम अनुसूची के अन्तर्गत अधिसूचित किये गये हैं। सम्बन्धित राज्यों के राज्यपाल अपने राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में प्रतिवर्ष राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजते हैं।

असम, मेघालय तथा मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन संविधान की छठी अनुसूची के उपबन्धों के अधीन किया जाता है। अनुसूची के अन्तर्गत उन्हें स्वायत्तशासी जिलों में बाँट दिया गया है। इस प्रकार के आठ जिले हैं-असम में, उत्तरी कछार तथा मिकिर पहाड़ी जिले, मेघालय में संयुक्त खासी, जयन्तिया, जवाई और गारो पर्वतीय जिले, मिजोरम में चकमा, लाखेर और पावी जिले। प्रत्येक स्वायत्तशासी जिले में एक जिला परिषद् है जिसमें अधिक से अधिक 30 सदस्य होते हैं। जिनमें से अधिक से अधिक 4 सदस्य मनोनीत किये जाते हैं और शेष वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं। परिषदों को कुछ प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक अधिकार दिये गये हैं।

कल्याण तथा सलाहकार एजेन्सियाँ– भारत सरकार का गृह मन्त्रालय अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के विकास कार्यक्रमों की समग्र नीति बनाने, उनकी आयोजना तथा समन्वय करने के लिए प्रमुख मन्त्रालय हैं। प्रत्येक केन्द्रीय मन्त्रालय तथा विभाग अपने क्षेत्र के सम्बन्ध में प्रमुख मन्त्रालय अथवा विभाग है। गृह मन्त्रालय केन्द्रीय मन्त्रालयों तथा राज्य सरकारों के साथ सम्पर्क बनाये रखता है।

आयोग एवं आयुक्त- जुलाई 1978 में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए एक आयोग का गठन किया गया था जिसमें अध्यक्ष तथा अधिकतम चार अन्य सदस्य सम्मिलित थे। इन सदस्यों में एक विशेष अधिकारी भी है जिसे संविधान के अनुच्छेद 338 के अन्तर्गत नियुक्त किया जाता है तथा जिसे अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयुक्त के नाम से जाना जाता है। आयोग का कार्य संवैधानिक संरक्षणों, सरकारी सेवाओं में आरक्षण से सम्बन्धित सभी मामलों की जाँच-पड़ताल करना, अस्पृश्यता तथा उससे उत्पन्न घृणित भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के क्रियान्वयन के बारे में अध्ययन करना और अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के व्यक्तियों के प्रति किये जाने वाले अपराधों के लिए जिम्मेदार सामाजिक आर्थिक तथा अन्य संगत परिस्थितियों का पता लगाना है ताकि समुचित उपचारात्मक उपाय सुझायें जा सकें।

संसदीय समिति- भारत सरकार ने अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के कल्याण के लिए संवैधानिक संरक्षणों के क्रियान्वयन की जाँच करने के लिए तीन संसदीय समितियाँ गठित की। पहली समिति 1968 में, दूसरी समिति 1971 में और तीसरी समिति 1973 में गठित की गयी। यह एक स्थायी संसदीय समिति है और इसके सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष होता है।

राज्यों में कल्याण विभाग- राज्य सरकारों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के प्रशासनों ने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण का कार्य देखने के लिए अलग विभाग बनाये हैं। विभिन्न राज्यों में इस सम्बन्ध में प्रशासनिक ढाँचा अलग-अलग है। बिहार, मध्य प्रदेश और उड़ीसा में संविधान के अनुच्छेद 164 में निर्धारित व्यवस्था के अनुसार जनजातीय कल्याण कार्य देखने के लिए पृथक् मन्त्री नियुक्त किये गये हैं। कुछ अन्य राज्यों ने केन्द्र की संसदीय समिति के अनुरूप राज्य विधान मण्डलों के सदस्यों की समितियाँ गठित की है।

अनुसूचित क्षेत्र वाले सभी राज्यों तथा तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने राज्यों में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण तथा उत्थान से सम्बन्धित मामलों के बारे में सलाह देने के लिए संविधान की पंचम अनुसूची में किये गये उपबन्धों के अनुसार जनजातीय सलाहकार परिषदें स्थापित की हैं।

अनुसूचित जाति तथा जनजातियों के कल्याण कार्यक्रम

(Welfare Programmes for S.C. & S.T.)

अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर केन्द्र तथा राज्य दोनों सरकारों द्वारा विशेष ध्यान दिया जाता है। इनके कल्याण के लिए प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में विशेष कार्यक्रम आरम्भ किये गये हैं और इन विशेष कार्यक्रमों पर किये गये निवेश की मात्रा में प्रत्येक योजना में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है।

इसके अलावा राज्य सरकारें अपने गैर-योजनागत बजट में से भी इन वर्गों के कल्याण पर काफी धन व्यय करती रहीं।

अनुसूचित जाति तथा जनजातियों के लिए महत्वपूर्ण योजनाएँ 

केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं में से कुछ महत्वपूर्ण योजनाएँ इस प्रकार हैं-

शिक्षण तथा उससे सम्बद्ध योजना- केन्द्र/राज्य सरकारों तथा सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों, बैंक सेवाओं, भारतीय जीवन बीमा/साधारण बीमा निगम के अधीन आने वाले विभिन्न पदों तथा सेवाओं में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व में सुधार लाने की दृष्टि से देश के विभिन्न भागों में परीक्षा-पूर्व शिक्षण केन्द्र स्थापित किये गये हैं जिनमें अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के उम्मीदवारों को संघ लोक सेवा आयोग, राज्य लोक सेवा आयोग तथा अन्य भर्ती निकायों द्वारा आयोजित की जाने वाली विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए तैयार किया जाता है। मार्च 1986 के अन्त तक स्वीकृत/स्थापित ऐसे केन्द्रों की संख्या 62 से अधिक थी।

  1. अनुसूचित जातियों के विकास के लिए नीति-

    अनुसूचित जातियों के विकास में तेजी लाने के लिए तीन-सूत्री नीति तैयार की गयी है (क) केन्द्रीय मन्त्रालयों तथा राज्यों की विशेष संघटक योजनाएँ, (ख) राज्यों की अनुसूचित जातियों की विशेष संघटक योजनाओं के लिए विशेष केन्द्रीय सहायता, तथा (ग) राज्यों में अनुसूचित जाति विकास निगम।

  2. विशेष संघटक योजनाएँ (Special Components Plan)-

    विशेष संघटक योजनाओं में विकास के सामान्य क्षेत्रों के अन्तर्गत ऐसी योजनाओं के जिनसे अनुसूचित जातियों को लाभ हो, निर्दिष्ट करने, प्रत्येक क्षेत्र के अन्तर्गत सभी विभाज्य कार्यक्रमों के लिए निधियों की मात्रा का निर्धारण करने तथा विशिष्ट लक्ष्य निर्धारित करने की व्यवस्था है ताकि यह पता लग सके कि प्रत्येक क्षेत्र के अन्तर्गत इन कार्यक्रमों से कितने परिवारों को लाभ होगा। इन सबके पीछे मूल उद्देश्य यह है कि अनुसूचित जाति के परिवारों की आमदनी पर्याप्त रूप से बढ़ाने में उनकी मदद की जाये। विशेष संघटक योजनाओं के अन्तर्गत बुनियादी सेवाएँ तथा सुविधाएं उपलब्ध कराने और सामाजिक तथा शैक्षिक विकास के अवसर प्रदान कराने के कार्यक्रम भी शामिल किये जायेंगे। छठीं योजनावधि में विशेष संघटक योजना के लिए 4, 91 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

  3. विशेष केन्द्रीय सहायता (Special Central Assistance)-

    राज्यों द्वारा अनुसूचित जातियों के लिए विशेष संघटक योजनाओं को सरकार विशेष केन्द्रीय सहायता देती है। अनुसूचित जातियों के लिए राज्यों की योजनाओं व कार्यक्रमों के लिए विशेष केन्द्रीय सहायता अतिरिक्त रूप से दी जाती है तथा विशिष्ट योजनाओं के सुनिश्चित ढाँचे के मुताबिक यह सहायता नहीं दी जाती। राज्यों द्वार यह अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता उनकी विशेष संघटक योजनाओं के परिव्यय के साथ जोड़ी जाती है और इसका उपयोग केवल आय वृद्धि करने वाली आर्थिक विकास योजनाओं में किया जाता है।

  4. अनुसूचित जाति विकास निगम (Scheduled Castes Development Corporations)-

    अनुसूचित जाति विकास निगम इन जाति के परिवारों को अलपराशि वाली सहायता देकर वित्तीय संस्थानों से मिलने वाली सहायता में वृद्धि करते हैं। ये निगम 17 राज्यों तथा 2 केन्द्रशासित प्रदेशों में स्थापित किये गये हैं। अब ये निगम 17 राज्यों तथा ? केन्द्रशासित प्रदेशों में सथापित किये गये हैं। अब ये निगम कुल 12,000 रुपये अनावर्ती लागत की योजनाओं की अल्पराशि ऋण सहायता दे सकते हैं।

  5. जनजातीय विकास (Welfare of Scheduled Tribes)-

    पाँचवीं योजना के दौरान जनजातीय विकास के लिए भी एक नयी योजना बनायी गयी। इसके अनुसार जिन इलाकों में 50 प्रतिशत व इससे अधिक प्रतिशत जनजाति के लोग रहते हैं। ऐसे इलाकों के लिए 19 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में उप-योजनाएँ बनायी गयीं। जनजाति के लिए बनी उप-योजनाओं के मुख्य उद्देश्य हैं-(1) जनजाति क्षेत्रों और अन्य क्षेत्रों के बीच विकास के अन्तर को कम करना; (2) जनजातियों के रहन-सहन को ऊँचा उठाना।

इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए जनजातियों का शोषण समाप्त करने, विशेषकर भूमि, महाजनी, कृषि और वन की उपज में अनाचार समाप्त करने आदि को उच्च प्राथमिकता दी गयी है। जनजाति क्षेत्रों के समेकित विकास के लिए जनजाति उप-योजनाओं के अधीन सम्पूर्ण भौतिक और वित्तीय उपायों की व्यवस्था है। इन क्षेत्रीय उप-योजनाओं को धनराशि केन्द्रीय सहायता से प्राप्त होती है। पाँचवीं योजना के दौरान विशेष केन्द्रीय सहायता 120 करोड़ रुपये थी। छठी योजना में यह सहायता 470 करोड़ रुपये रखी गयी थी।

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