लोक उपक्रमों पर मन्त्रिपदीय नियन्त्रण

लोक उपक्रमों पर मन्त्रिपदीय नियन्त्रण

लोक उपक्रमों पर मन्त्रिपदीय नियन्त्रण

भारत में प्रजातान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था विद्यमान है। जिसके अन्तर्गत संसद जनता का प्रतिनिधित्व करती है। जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि ही सरकार का गठन करते हैं जिसका प्रधान राष्ट्रपति होता है। प्रत्येक मन्त्री के पास कुछ विभागों का स्वतन्त्र एवं अतिरिक्त उत्तरदायित्व होता है। यह मंत्री इन विभागों के सम्पूर्ण कार्य की देखभाल करता है। लोक निगम (Public Corporation) के सम्बन्ध में अधिनियमों में सरकार को प्रदान किये गये अधिकारों का प्रयोग उपयुक्त मंत्री करता है। सरकारी कम्पनी के सम्बन्ध में कम्पनी के अंश भारत के राष्ट्रपति के नाम से खरीदे जाते हैं। अतः मंत्री राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप अंशधारियों के रूप में सरकारी कम्पनी के अधिकारों का प्रयोग करता है। इस प्रकार सिद्धान्ततः सरकारी कम्पनी के सम्बन्ध में राष्ट्रपति अथवा सरकार को प्राप्त अधिकारों का प्रयोग व्यवहार में सम्बन्धित (उपयुक्त) मंत्री ही करता है। मन्त्रिपदीय नियन्त्रण व्यवस्था के अन्तर्गत मंत्रियों की नियुक्ति संसद द्वारा की जाती है।

आर्नेस्ट डेविस के अनुसार संसदीय नियन्त्रण वास्तविक से अधिक सैद्धान्तिक है जबकि मन्त्रिपदीय नियन्त्रण व्यवहार में जनता द्वारा स्वीकृत नियन्त्रण से अधिक वास्तविक है। इसी सम्बन्ध में प्रो० हैन्सन का कथन है कि यह केवल मंत्री निर्देशों से ही सम्भव है कि उपक्रम चालू लोक नीति की आवश्यकताओं के अनुसार कार्य कर सकें। इसका विकल्प या तो कोई नियन्त्रण न होना अथवा बिना राजनैतिक उत्तरदायित्व वाली संस्थाओं द्वारा नियन्त्रण होना है किन्तु इन दोनों को ही हानिकारक अथवा अव्यावहारिक होने के कारण नहीं अपनाया जा सकता।

लोक उद्योगों पर नियन्त्रण हेतु सम्बन्धित उद्योग के मंत्री को प्राप्त अधिकारों को प्रमुखतः निम्न दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  • मन्त्रिपदीय प्रशाकीय नियन्त्रण (Ministerial Administrative Control)
  • मन्त्रिपदीय वित्तीय नियन्त्रण (Ministerial Financial Control)

लोक उद्योगों से सम्बन्धित विभाग का मंत्री स्वयं को प्राप्त अधिकारों को निम्नांकित अवसरों पर नियन्त्रण के लिए उपयोग करता है।

लोक निगम

(Public Corporation)

अधिनियमों एवं सरकारी कम्पनी सीमा अन्तर्नियमों में सरकार अथवा राष्ट्रपति को प्राप्त अधिकारों को मन्त्री निम्न अवसरों पर उपयोग करता है-

  1. संचालकों एवं उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति/सेवा मुक्ति करते समय।
  2. नीति सम्बन्धी निर्देशन देते समय ।
  3. कुछ वित्तीय मामलों में अनुमोदन (स्वीकृति) देते समय ।

लोक उद्योगों के उत्तरदायित्व के संभालने पर निम्न अवसरों पर अपने अधिकारों का प्रयोग करता है-

  • जब वह लोक निगमों के वार्षिक लेखे तथा प्रतिवेदन संसद के समक्ष प्रस्तुत करता है,तथा
  • जब वह संसद सदस्यों द्वारा पूछे गये लोक उद्योग से सम्बन्धित प्रश्नों का संसद में जवाब देता है।

मन्त्रिपदीय प्रशासकीय नियन्त्रण

लोक उद्योगों पर नियन्त्रण के अन्तर्गत मन्त्री निम्न प्रकार से प्रशासकीय नियन्त्रण करता है-

  1. संचालकों एवं उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति तथा सेवा मुक्ति

    लोक निगमों से सम्बन्धित अधिनियम तथा सरकारी कम्पनी के सीमा अन्तर्नियम में केन्द्रीय सरकार राष्ट्रपति को संचालकों की नियुक्ति तथा सेवा मुक्ति करने का अधिकार है। दामोदर घाटी निगम अधिनियम 1948 के अनुसार निगम में एक अध्यक्ष(Chairman) तथा दो सदस्य होंगे जिनकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार करेगी।

इसी प्रकार वायु निगम अधिनियम 1953 में व्यवस्था है कि प्रत्येक निगम में 5 से कम तथा 9 से अधिक सदस्य नहीं होंगे। जिनकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जावेगी तथा उनमें से केन्द्रीय सरकार किसी एक को अध्यक्ष नियुक्त करेगी।

अन्य लोक उद्योगों के सम्बन्ध में इसी प्रकार की व्यवस्था है। सरकारी कम्पनियों के अन्तर्नियमों की व्यवस्था में राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है। उदाहरण के लिए, हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन, राँची में राष्ट्रपति को समय-समय पर कम्पनी के संचालकों की संख्या (जो दो से कम नहीं होगी) लिखित रूप से निश्चित करने तथा उनकी नियुक्ति का अधिकार है। संचालकों की नियुक्ति के लिए न तो कोई योग्यता सीमा सम्बन्धित अधिनियमों में दी गयी है और न सीमा अन्तर्नियमों में ही। निजी क्षेत्र की कम्पनियों के संचालकों द्वारा योग्यता अंश (Qualification Shares) रखना अनिवार्य है किन्तु सरकारी कम्पनियों के संचालकों के पास ऐसी योग्यता का भी होना आवश्यक नहीं है। केवल कुछ साधारण अयोग्यताओं (Disqualifications) का विभिन्न लोग निगमों के अधिनियमों में उल्लेख आवश्यक है जैसे विकृत मस्तिष्क का होना अथवा दिवालिया होना, तथा वित्तीय अथवा ऐसे हित का होना जिसका प्रभाव उसके सदस्य की हैसियत से कार्य करने पर पक्षपात पूर्ण हो।

इसके अतिरिक्त यदि कोई सदस्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निगम के किसी प्रसंविदा (Contract) से हितबद्ध (Interested) हो तो उसके लिए इसकी सूचना निगम को देना आवश्यक है। सामान्य व्यवस्था के अनुरूप इस बात को निगम की मिनट बुक में लिख दिया जाता है तथा जिस समय उस पर विचार हो रहा हो, वह सदस्य उस सभा में भाग नहीं लेगा। दामोदर घाटी निगम में संसद अथवा राज्य विधान सभा का सदस्य नहीं सकता तथा औद्योगिक वित्त निगम में अध्यक्ष के अतिरिक्त अन्य किसी निगम या सरकारी कम्पनी में

इस प्रकार का कोई प्रतिबन्ध भी नहीं है। किन्तु अब तो भारत सरकार द्वारा लोक निगमों के संचालक मण्डल में संसद सदस्यों को संचालक के रूप में न रखने का निश्चय कर लिया है।

उपरोक्त विवेचन से यह भली भाँति स्पष्ट है कि लोक उद्य के संचालक मण्डल में संचालक की नियुक्ति के लिए किसी भी प्रकार के योग्यता बन्धन के अभाव में सम्बन्धित मंत्री समुचित छूट प्राप्त किये हुए होता है। वास्तव में मन्त्री ही संचालकों के चयन में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। प्राय; लोक निगमों के संचालकोंश की नियुक्ति से पूर्व उसके अध्यक्ष (Chairman) की राय अनौपचारिक ढंग से जान ली जाती है। कुछ में ऐसा नहीं भी होता है। किन्तु वित्तीय संस्थाओं में इस प्रकार की व्यवस्था है कि वित्त विभाग का सचिव सम्बन्धित उपक्रम के अध्यक्ष तथा मन्त्रिमण्डल के सचिव द्वारा अनुमोदिक संचालकों की नियुक्ति का प्रस्ताव मन्त्री के समक्ष रखता है। वास्तव में यदि इस व्यवस्था को अन्य लोक उद्योगों में भी प्रयुक्त किया जाय तो इन उद्योगों के संचालन में यह एक विशिष्ट सुविधा होगी। इस सम्बन्ध में अनुमान समिति का मत है कि संचालकों विशेषतः गैर-सरकारी की नियुक्ति अध्यक्ष की राय से होनी चाहिए क्योंकि उद्योग की सफलता के लिए अन्ततोगत्वा वही उत्तरदायी है।

  1. निर्देशन का अधिकार (Power of Direction)-

    राष्ट्र हित में लोक उद्योगों के सम्बन्ध में नीति निर्धारण का अधिकार सरकार को है। इसके साथ ही आवश्यकतानुसार इन उद्योगों को निर्देशन देना भी इस अधिकार का एक भाग है। लेकिन इस सम्बन्ध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि निर्देशन की प्रकृति हस्तक्षेप की न हो। अतः इस सम्बन्ध में दो महत्वपूर्ण प्रश्नों की उत्पत्ति स्वाभाविक है-(अ) किन-किन बातों का निर्देश किया जा सकता है, तथा (ब) निर्देश देने की क्रियाविधि (Procedure) क्या हो ।

वास्तव में लोक उद्योगों के प्रबन्ध को निर्देशन नीति तथा राष्ट्रहित सम्बन्धी विषयों पर ही दिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार का निर्देशन प्रबन्धकीय अधिकारियों के कार्य में हस्तक्षेप होगा जिसका प्रभाव प्रबन्धकीय कुशलता पर पड़ेगा। प्रायः सभी लोक अधिनियमों में सरकार द्वारा निर्देशन किये जाने का उल्लेख है। किन्तु इस उल्लेख में किसी प्रकार की एकरूपता नहीं है। सरकारी कम्पनियों के पार्षद अन्तर्नियमों (Article of Association) में सरकार द्वारा निर्देश के अधिकार का उल्लेख रहता है। इस सम्बन्ध में सभी कम्पनियों के पार्षद अन्तर्नियमों में इस प्रकार की व्यवस्था है। समय-समय पर राष्ट्रपति ऐसे निर्देश जारी कर सकता है जिन्हें वह व्यवसाय, उसके संचालन अथवा उसके संचालकों के लिए

आवश्यक समझता है एवं जो अन्तर्निमयों में दी गई किसी व्यवस्था के विपरीत न हो तथा उसी प्रकार वह उन निर्देशों को परिवर्तित एवं रद्द भी कर सकता है। संचालक ऐसे निर्देशों को कार्यान्वित करेंगे।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जहाँ लोक निगम के सम्बन्ध में सरकार के निर्देशन सम्बन्धी अधिकार एकरूप (Uniform) नहीं है वहीं दूसरी तरफ सरकारी कम्पनियों के सम्बन्ध में ये अधिकार निगमों से बहुत अधिक विस्तृत हैं। अतः यह आवश्यक है कि सरकार अपने इन अधिकारों को निगमों के नीति सम्बन्धी मामलों तक ही सीमित रखें तथा दैनिक प्रबन्धकीय मामलों में हस्तक्षेप न करें। यदि मन्त्री के सुझाव से ही काम चल जाय तो निर्देश देना आवश्यक न होगा। निर्देशों तथा सुझावों में एक मुख्य अन्तर यह है कि विचारार्थ दिये गये सुझावों को मानने के लिए उद्योग बाध्य नहीं है। विचार करने के बाद यदि उद्योग उचित समझता है तो उसे कार्यान्वित करता है अन्यथा नहीं। किन्तु निर्देशों को ििन्वत करना अनिवार्य है। इस सम्बन्ध में ब्रिटेन की प्रथा उत्तम एवं अनुकरणीय है। वहाँ के लोक उद्योगों को निर्देश देने के पहले मंत्री सम्बन्धित उद्योग के संचालक मण्डल से परामर्श कर लेता है। इसका अर्थ यह है कि मंत्री संचालक मण्डल को पूर्ण विश्वास में लेकर कार्य करता है। इसका प्रमुख लाभ यह है कि इससे संचालक मण्डल कभी भी यह महसूस नहीं करेगा कि अमुक नीति उन पर थोपी गयी है तथा मंत्री के निर्देशों को सहर्ष कार्यान्वित करेगा।

मन्त्रिपदीय वित्तीय नियन्त्रण

मन्त्री के प्रशासकीय नियन्त्रण अधिकारों का उपरोक्त विवेचन में वर्णन किया गया है। अब हम मन्त्री के वित्तीय अधिकारों का विवेचन करेंगे जो प्रशासकीय नियन्त्रण अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण एवं प्रभावोत्पादक है। इन अधिकारों का प्रयोग प्रायः मन्त्री द्वारा निम्नांकित अवसरों पर किया जाता है-

  • अतिरिक्त पूँजी के निर्गमन का अनुमोदन (Approval of Issue of Additional Capital)
  • एक सीमा के बाद पूँजीकृत व्ययों का सरकारी अनुमोदन (Government’s Approval of Capital Expenditure Beyond a Certain Limit)
  • ऋण लेने के लिए सरकार का अनुमोदन (Government’s Approval for Borrowing)
  • वित्तीय परामर्शदाता की नियुक्ति (Appointment of Financial Adviser)
  • परिचालक आय-व्यय बजट का पूर्व अनुमोदन (Prior Approval of Operating Budget)
  1. अतिरिक्त पूँजी का अनुमोदन

    प्रत्येक लोक उद्योग द्वारा अतिरिक्त पूँजी निर्गमन करने के लिए सरकार का पूर्व अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। सम्बन्धित अधिनियम अथवा अन्तर्नियम में इस प्रकार के पूर्व अनुमोदन प्राप्त करने की व्यवस्था है। उदाहरण के लिए औद्योगिक वित्त अधिनियम के अनुसार जब निगम उचित समझे केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से शेष अंश निर्गमित किये जा सकते हैं। इसी प्रकार की व्यवस्था हैवी इन्जीनियरिंग कारपोरेशन लि० के अन्तर्नियम में है जिसके अनुसार संचालक राष्ट्रपति के अनुमोदन से (साधारण सभा में कम्पनी की अनुमति) अंश पूँजी बढ़ा सकते हैं।

  2. एक सीमा के बाद पूँजीकृत व्ययों का सरकारी अनुमोदन

    विभिन्न लोक निगमों के अधिनियमों में यह व्यवस्था है जिसके अधीन एक सीमा से ऊपर किये जाने वाले पूँजीकृत व्ययों के लिए सरकारी अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। उदाहरण के लिए वायु निगम अधिनियम के अनुसार दोनों वायु निगमों में से कोई भी बिना केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के (अ) 15 लाख रुपये से अधिक लागत की अचल सम्पत्ति (Immovable Property) वायुयान अथवा अन्य कोई वस्तु क्रय करने के लिए पूँजीकृत व्यय नहीं कर सकता, (ब) पाँच वर्ष से अधिक के लिए किसी अचल सम्पत्ति का पट्टा (Lease) नहीं कर सकता, (स) 10 लाख के ऊपर प्रारम्भिक या पुस्तक मूल्य की सम्पत्ति अथवा अधिकार विक्रय नहीं कर सकता। विभिन्न निगमों से उनके द्वारा किये जाने वाले पूँजीकृत व्ययों की यह अधिकतम सीमा अलग-अलग है। जैसे वायु निगमों में 15 लाख रुपया तथा आयल एण्ड नेचुरल गैस कमीशन में 30 लाख रुपये।

  3. ऋण लेने के लिए सरकारी अनुमोदन

    लोक उद्योगों द्वारा ऋण लेने से पूर्व सरकार का अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। अनेक निगमों एवं कम्पनियों के अधिनियमों तथा अन्तर्नियमों में इस प्रकार के अनुमोदन का उल्लेख है। उदाहरण के लिए दामोदर घाटी निगम अधिनियम के अनुसार इस अधिनियम के अंतर्गत कार्य करने के लिए निगम सरकार के अनुमोदन से बाजार या अन्य स्रोत से ऋण ले सकता है। इसी प्रकार हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन के अंतर्नियमों के अनुसार, राष्ट्रपति के अनुमोदन से (कम्पनी) के अधिनियम की धारा 292 की सीमा के अंतर्गत संचालक ऋण ले सकते हैं।

  4. वित्तीय परामर्शदाता की नियुक्ति

    प्रत्येक लोक उद्योग में सरकार द्वारा एक वित्तीय परामर्शदाता की नियुक्ति की जाती है। इसका कार्य वित्तीय मामलों में उपक्रम के प्रबन्धक को सलाह देना है। इसे स्वयं द्वारा उचित समझे जाने वाली वित्तीय सरकारी नीति से सम्बन्धित मामलों को सरकार के पास भिजवाने का अधिकार है। इस प्रकार वस्तुस्थिति यह हो जाती है कि बिना उसकी सहमति से कोई भी वित्तीय कार्य नहीं किया जा सकता। अतः वह परामर्शदाता कम तथा नियन्त्रक अधिक होता है। सरकार द्वारा संचालक मण्डल की वित्तीय परामर्शदाता की नियुक्ति का अधिकार दिया गया है। किन्तु जिन उपक्रमों में वित्तीय संचालक की नियुक्ति की जानी है वहाँ इसकी नियुक्ति का अधिकार मन्त्री के हाथ में ही है। इस वित्तीय संचालक को निषेधाधिकार (Veto) प्राप्त होता है जिसके कारण संचालक मण्डल की वित्तीय ने संचालक मण्डल में सरकारी वित्तीय स्वायत्तता समाप्त हो जाती है। भारत.. परामर्शदाताओं को उनके पुनरावेदन एवं अपने निरनुमोदित व्ययों के निषेधात्मक अधिकार के साथ प्रवेश कराने का प्रयास किया है। वर्तमान अनुभव के अनुसार यह पद्धति अच्छी नहीं है क्योंकि व्यय नियन्त्रण इतना महत्वपूर्ण कार्य है कि सरकारी हित रक्षक की उपस्थिति में लोक उद्योगों की स्वतन्त्रता प्रायः समाप्त हो जाती है। कुछ लोग लोक उद्योगों के संचालक मण्डल में वित्तीय संचालकों के तो पक्ष में हैं किन्तु उनके निषेधात्मक अधिकार के पक्ष में नहीं हैं। इससे लोक उद्योगों की स्वायत्तता को क्षति पहुँचती है।

  5. परिचालक आयव्यय का पूर्व अनुमोदन

    लोक उद्योगों में परिचालन आय-व्यय पत्रों का सरकार से पूर्व अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। इस व्यवस्था का उद्देश्य भी लोक उद्योगों पर वित्तीय मामलों पर नियन्त्रण रखना है। अनेक लोक निगमों के अधिनियमों में इसकी व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, दामोदर घाटी निगम अधिनियम के अनुसार, प्रतिवर्ष अक्टूबर में वित्तीय परामर्शदाता की सलाह से निगम अगले वर्ष के लिए निर्धारित प्रारूप में एक आय-व्यय पत्र तैयार करेगा जिसमें अनुमानिक आय-व्यय तथा सहभागी सरकारों द्वारा वर्ष में दी जाने वाली राशि दिखायी जायेगी। वायु निगमों के अधिनियम में भी इसी प्रकार के आय-व्यय पत्र तैयार करने की व्यवस्था है। लोक उद्योगों को वित्तीय स्वायत्तता बढ़ाने के उद्देश्य से इस आय-व्यय पत्र को तैयार करने का अधिकार सरकार ने अब सम्बन्धित उपक्रम को ही दे दिया है। इसके पूर्व सरकारी अनुमोदन की भी अब आवश्यकता नहीं है। इन्हें केवल सरकार के पास तब ही पूर्व अनुमोदन के लिए भेजना आवश्यक होता है जब ऐसे आय-व्यय पत्र में घाटा हो तथा उसे सरकार को वहन करना है अन्यथा इन आय व्यय पत्रों को सरकार के पास केवल सूचनार्थ ही भेजना पड़ता है।

मन्त्रिपदीय उत्तरदायित्व

लोक उद्योगों पर मन्त्रिपदीय नियन्त्रण से उत्पन्न होने वाले उत्तरदायित्वों को निम्न तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

  1. संसदीय उत्तरदायित्व (Parliamentary Responsibility)-

    प्रत्येक मन्त्री संसद का प्रतिनिधि होने के कारण अपने नियंत्रण में संचालिक लोक उद्योगों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायित्व होता है। संसद के लोक उद्योगों की गतिविधियों के सम्बन्ध में विविध एवं महत्वपूर्ण सूचनाएँ सम्बन्धित उद्योगों के मंत्रियों से ही प्राप्त होती हैं। अतः मंत्री का यह उत्तरदायित्व है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय हित और राज्य के कल्याण को ध्यान में रखते हुए समस्त सूचनाएँ वास्तविक रूप में संसद के समक्ष प्रस्तुत करें।

  2. प्रशासनिक उत्तरदायित्व (Executive Responsibility)-

    किसी उद्योग के मंत्री द्वारा उस लोक उद्योग में प्रधान स्थिति के कारण अपने अधीनस्थों के द्वारा किये गये कार्यों के सम्बन्ध में उसका उत्तरदायित्व सामान्यतः चार स्वरूपों में उत्पन्न होता है-

    1. जब मंत्री अपने अधीनस्थ अधिकारियों को स्पष्ट रूप से लिखित आदेश देता है तो इन आदेशों के लिए मंत्री उत्तरदायी होगा।
    2. ऐसे कार्यों के लिए मंत्री उत्तरदायी होगा जो सरकार की नीतियों की विस्तृत सीमाओं के अंतर्गत आते हैं तथा जिनके सम्बन्ध में अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा निर्णय लिये जाते हैं।
    3. यदि अधीनस्थ अधिकारी किसी निर्णय को लेकर साधारण सी गलती कर दें जिससे उद्योग को कोई विशेष क्षति नहीं हो तो ऐसी स्थिति में भी मंत्री उत्तरदायी होगा।
    4. यदि कोई अधीनस्थ (Subordinate) नीतियों के विरुद्ध अथवा अपने अधिकारों से हटकर कार्य करता है तो इसके कार्यों के लिए भी मंत्री उत्तरदायी होगा। मंत्री को सम्बन्धित अधीनस्थ को दण्ड देने का अधिकार है।
  3. व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (Personal Responsibility)-

    जब मंत्री अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के कार्यों को न तो स्वीकृति देता है और न ही उनका खण्डन करता है अथवा अधीनस्थ द्वारा किये गये गलत कार्यों की जानकारी होने पर भी कोई कार्यवाही नहीं करता तो इन सभी वर्णित दशाओं में वह स्वयं व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता है।

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