नगरपालिका

नगरपालिका

नगरपालिका (Municipality)

भारत के विभिन्न नगरों में नगरपालिकाओं का प्रारम्भ किसी न किसी रूप में ब्रिटिश शासनकाल में ही हो चुका था। देश में कोई ऐसा राज्य नहीं है, जहाँ ऐसा निकाय न हो। राजस्थान में मुख्य शहरों में नगरपालिका को नगर परिषद् कहा जाता है, जबकि साधारणतः छोटे-शहरों अथवा कस्बों में इन्हें नगरपालिकाएँ या म्युनिसिपल बोर्ड कहा जाता है। नगर परिषद् और नगरपालिका के संगठन, कार्यों तथा अधिकारों में कोई आधारभूत अन्तर नहीं पाया जाता है। नगरीय स्थानीय स्वायत्त शासन की इन संस्थाओं का नामकरण नगर की जनसंख्या पर निर्भर करता है।

नगरीय स्थानीय स्वशासन के इतिहास में उस समय एक महत्वपूर्ण पृष्ठ जुड़ गया, जबकि भारतीय संसद् ने 74वाँ संशोधन अधिनियम, 1992 में पारित किया, इसे 74वें संविधान संशोधन का नाम दिया जाता है। इस संविधान संशोधन द्वारा संविधान में 12वीं अनुसूची जोड़कर शहरी या नगरीय क्षेत्र की स्वशासन की संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है। इस संविधान संशोधन के मुख्य प्रावधानों में सभी संस्थाओं का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किये जाने, मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पर्यवेक्षण तथा निर्देशन में प्रति 5 वर्ष बाद इन संस्थाओं के निर्वाचन सम्पन्न कराये जाने, महिलाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए इन संस्थाओं में स्थानों को आरक्षित किये जाने तथा जनसंख्या के अनुपात में तीन प्रकार की नगरपालिकाओं के गठन करने जैसे पहलू गिनाये जा सकते हैं। निस्सन्देह, नगरीय क्षेत्र की संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया जाना एक महत्वपूर्ण घटना है। इससे जहाँ इन संस्थाओं को एक नई शक्ति प्राप्त होगी, वहीं दूसरी ओर सारे देश में एकरूपता साझेदारी होगी। इस संविधान संशोधन के पारित होने के बाद अनेक राज्यों ने इसका अनुसरण किया है। इससे देश में एकरूपता की स्थिति बनी है।

नगरपालिकाओं की स्थापना

नगरपालिकाओं का गठन ऐसे नगरों में किया जाता है जहाँ शहर में रहने वाले लोगों के लिए जन-सुविधाओं की व्यवस्था करना बहुत आवश्यक हो जाता है, किन्तु ऐसे शहरों की समस्याएँ इतनी गम्भीर नहीं होती हैं कि उनके लिए नगर निगम का गठन करना पड़े फिर भी नगरपालिका के गठन के लिए आबादी की एक सीमा का निश्चित होना आवश्यक है।

कुछ राज्यों ने नगरपालिका की स्थापना के लिये जनसंख्या एवं आय दोनों ही कसौटियाँ निर्धारित की हैं। आय की शर्त को गैर-मुनासिब या अनुचित नहीं कहा जा सकता। नगरवासियों से अपेक्षित है कि वे नगरपालिका की स्थापना तथा रख-रखाव के लिए आवश्यक साधन भी जुटाएँ। नगरपालिका की स्थापना तभी किया जाना उचित है जब वहाँ की जनता उसके लिए समुचित साधन जुटाने के योग्य और इच्छुक हो । आय की कसौटी तब महत्वपूर्ण समस्या बन जाती है जबकि कम जनसंख्या वाले स्थान में नगरपालिका बना दी जाती है। ऐसी स्थिति में नगरपालिका की आय के स्रोतों का बड़ा भाग राज्य सरकार से अनुदान के रूप में प्राप्त होता है।

राज्य सरकार को यह अधिकार होता है कि वह नगरपालिका के अधिकार क्षेत्र के प्रदेश को परिभाषित कर सके। कानून द्वारा राज्य सरकार को यह शक्ति है कि वह नगरपालिकाओं को अधिनियम के उन उपबन्धों से मुक्ति प्रदान कर दे जो उसके लिए अनावश्यक हैं। कुछ नगरपालिकाएँ अवर्गीकृत भी हैं। सरकार कभी भी आदेश निकाल कर उन्हें किसी भी श्रेणी की नगरपालिका घोषित कर सकती है।

किसी भी क्षेत्र में नगरपालिका बनाने या किसी क्षेत्र में नगरपालिका समाप्त कर देने का अधिकार राज्य सरकार को होता है। राजस्थान प्रान्त में राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 1959 की धारा 5 और 6 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए राज्य सरकार समय-समय पर गजट में विज्ञप्ति निकाल कर-

  • किसी भी स्थानीय क्षेत्र को नगरपालिका घोषित कर सकती है।
  • किसी भी नगरपालिका की सीमाएँ निर्धारित कर सकती है।
  • किसी भी नगरपालिका में कोई भी क्षेत्र शामिल कर सकती है या उससे पूर्णतः अलग कर सकती है।
  • अन्य प्रकार से किसी भी नगरपालिका की सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।
  • यह घोषित कर सकती है कि किसी भी नियत तिथि से किसी स्थानीय क्षेत्र में नगरपालिका नहीं रहेगी।

नगरपालिकाओं का संगठन

(Organisation)

नगरपालिका जनता की सभा है जो नगरपालिका अधिनियम द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर नगर-शासन के लिए नियमों-उपनियमों का निर्माण करती है। प्रत्येक नगरपालिका में एक परिषद् होती है जिसमें वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित सदस्य (पार्षद) सम्मिलित होते हैं। परिषद् वह सर्वोच्च सत्ता है जो उन सभी कार्यों के लिए उत्तरदायी है, जो नगरपालिका को सौंपे गए हैं। देश के विभिन्न राज्यों में नगरपालिकाओं के संगठन, कार्यकाल आदि में भिन्नता देखने को मिलती है तथापि सामान्य रूपरेखा मिलती-जुलती है। राजस्थान राज्य में नगरपालिकाओं के संगठन, कार्यकाल आदि पर प्रकाश डालें तो लगभग एक सामान्य चित्र हमारे सामने स्पष्ट हो जाएगा।

  1. नगरपालिकाओं का निर्वाचन-

    राजस्थान में नगर परिषद् या नगरपालिका मण्डल के सदस्यों की संख्या का निश्चय सरकार द्वारा किया जाता है। चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रति तीसरे वर्ष किए जाते हैं। चुनाव गुप्त मतदान द्वारा होते हैं। चुनाव के लिए कस्बे या नगर को विभिन्न क्षेत्रों अथवा वार्डों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक वार्ड से एक प्रतिनिधि चुना जाता है। सीटों तथा वार्डों के निर्धारण के सम्बन्ध में राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर विज्ञप्तियाँ जारी होती रहती हैं। नगर परिषद्, नगरपालिका-मण्डल में स्त्रियों और पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है। जिस क्षेत्र में अनुसूचित जातियों या जनजातियों का बहुमत होता है, उस क्षेत्र को प्रायः इन जातियों के लिए सुरक्षित कर दिया जाता है अर्थात् ऐसे क्षेत्रों में केवल इन जातियों के प्रतिनिधि ही चुनाव लड़ सकते हैं। यदि कोई स्त्री चुनाव जीत कर नहीं आई हो तो स्त्रियों के प्रतिनिधित्व देने की दृष्टि से नगरपालिका के निर्वाचित सदस्य अपने बहुमत से दो स्त्री सदस्यों को मनोनीत करते हैं। स्पष्ट है कि नगरपालिका (चाहे नगर परिषद् हो या नगरपालिका मण्डल) का संगठन निर्वाचित और मनोनीत सदस्यों से होता है।

  2. सदस्यों के लिए योग्यताएँ-

    राजस्थान में नगरपालिका (अर्थात् नगर परिषद् हो या नगरपालिका मण्डल) के सदस्य होने के लिए किसी व्यक्ति में निम्नांकित योग्यताओं का होना जरूरी है-

  • वह व्यक्ति उस पालिका के क्षेत्र में मतदाता हो।
  • वह फौजदारी अदालत से एक वर्ष से अधिक सजा पाया हुआ न हो। (ऐसी सजा पाया हुआ व्यक्ति तीन वर्ष समाप्त होने के बाद चुनाव लड़ सकता है।)
  • वह व्यक्ति राज्य या स्थानीय संस्था की नौकरी में न हो अथवा कदाचार के आरोप में नौकरी से निकाला न गया हो। (पदच्युत व्यक्ति तीन वर्ष बाद चुनाव लड़ सकता है।)
  • वह व्यक्ति दिवालिया अथवा पागल न हो।
  • वह व्यक्ति नगरपालिका की ओर से या उसके विरुद्ध किसी मामले में वकील न हो अथवा नगरपालिका के किसी रूप में ठेके या व्यापार आदि से सम्बन्धित न हो।

सदस्य चुन लिए जाने के बाद किसी प्रकार की अयोग्यताएँ पाई जाएँ तो निर्वाचित सदस्य को अपना पद त्याग करना पड़ता है।

  1. पदावधि-

    नगरपालिकाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का है, सरकार को यह भी अधिकार है कि वह किसी नगरपालिका को अवधि से पूर्व ही भंग करके प्रशासक नियुक्त कर दे।

  2. एक वार्ड से अधिक के लिए निर्वाचन में खड़े होने पर प्रतिबन्ध-

    राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 1959 की धारा 25 में व्यवस्था है कि कोई भी व्यक्ति एक से अधिक वार्डों से चुनाव नहीं लड़ सकता। यदि उसने अपना नामांकन पत्र एक से अधिक वार्डों के लिए प्रस्तुत किया है जो उसे निर्वाचन के लिए निश्चित तिथि से पूर्व एक वार्ड के अन्य समस्त वार्डों से अपना नामांकन पत्र वापस ले लेना आवश्यक है।

  3. पद की शपथ और त्यागपत्र-

    अधिनियम के अनुसार नगरपालिका के प्रत्येक सदस्य को अपने कर्तव्यों को सम्भालने से पूर्व जिलाधीश अथवा सरकार द्वारा मनोनीत किसी अन्य व्यक्ति के समक्ष निर्धारित प्रपत्र में शपथ लेनी होती है और उस पर अपने हस्ताक्षर करने होते हैं। यह व्यवस्था भी है कि कोई सदस्य नगरपालिका की प्रथम बैठक की तिथि से तीन मास की अवधि में शपथ ग्रहण नहीं कर पाता तो उसका स्थान रिक्त समझा जाएगा। अधिनियम के अनुसार, कोई भी सदस्य लिखित रूप में अपनी सदस्यता से त्यागपत्र का नोटिस अध्यक्ष को दे सकेगा और ऐसा त्याग-पत्र नोटिस के 15 दिन बाद प्रभावशाली होगा। यह आवश्यक है कि नोटिस प्रथम अथवा द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा उचित रूप में प्रमाणीकृत हो । राजस्थान उच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयानुसार ऐसा त्याग-पत्र उसके प्रभावशाली होने से पूर्व वापस लिया जा सकता है। अधिनियम में दिए गए कुछ प्रावधानों के अधीन रहते हुए राज्य सरकार समुचित आधारों पर किसी सदस्य को हटा भी सकती है। शाम जिला

  4. पदाधिकारी-

    अधिनियम की धारा 65 में व्यवस्था है कि प्रत्येक नगरपालिका मण्डल के लिए एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष होगा जिनका चुनाव निगमों के अनुसार, मण्डल सदस्यों द्वारा अपने स्वयं में से ही किया जाएगा। इसी प्रकार प्रत्येक नगर परिषद् के लिए एक सभापति और एक उप-सभापति होगा जिनका चुनाव नियमों के अनुसार, परिषद् के पार्षदों द्वारा अपने स्वयं में से ही किया जाएगा। ये पदाधिकारी नगरपालिका के कार्यकाल और अपनी सदस्यता-पर्यन्त अपने पद पर काम करते हैं। दो-तिहाई बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव द्वारा सदस्य उन्हें हटा सकते हैं। वे स्वयं भी त्याग-पत्र दे सकते हैं और सरकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप अपने कार्य की लापरवाही के लिए उन्हें हटा सकती है। बड़ी नगरपालिकाओं में एक कर्मचारी ऑफिसर अथवा सचिव भी होता है। इनकी नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती है। नगरपालिका की आवश्यकतानुसार अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी, इन्जीनियर, ओवरसियर, स्वास्थ्य अधिकारी, सैनेटरी इन्सपैक्टर आदि होते हैं। इनकी नियुक्ति बोर्ड करता है।

  5. समितियाँ-

    कार्य की सुविधा की दृष्टि से प्रत्येक नगरपालिका में विभिन्न समितियों का निर्माण किया जाता है। प्रत्येक समिति को अलग-अलग कार्य सौंपा जाता है। सभी समितियाँ बोर्ड अथवा कौन्सिल के नियन्त्रण में और उसके आदेशानुसार अपना कार्य करती हैं। बोर्ड अथवा कौन्सिल को यह पूरा अधिकार होता है कि वह उनके निर्णयों में परिवर्तन या संशोधन कर दे।

अधिनियम की धारा 73 में व्यवस्था है कि प्रत्येक कौन्सिल अर्थात् नगर परिषद् की कार्यकारिणी समिति होगी जिसमें ये सदस्य सम्मिलित होंगे (i) परिषद् का सभापति, (ii) परिषद् का उप-सभापति, (iii) परिषद् द्वारा निर्वाचित परिषद् के 7 सदस्य (पार्षद) तथा परिषद् द्वारा निर्मित समितियों के अध्यक्ष । परिषद् का नगरपालिका आयुक्त कार्यकारिणी समिति का पदेन सचिव होता है।

कार्यकारिणी समिति के अतिरिक्त प्रत्येक परिषद् धारा 73(3) के अनुसार निम्नलिखित समितियों का निर्माण भी करती है- (i) वित्त समिति, (ii) स्वास्थ्य और सफाई समिति, (iii) भवन तथा निर्माण समिति, (iv) नियम तथा उप-नियम समिति, (v) सार्वजनिक वाहन समिति। कार्यकारिणी समिति और ऊपर वर्णित अन्य समितियाँ ऐसी शक्तियों, कर्तव्यों और कृत्यों को प्रयोग में ला सकेंगी और उनका पालन तथा निष्पादन करेंगी जो परिषद् द्वारा उन्हें प्रदान किए जाएँ। उल्लेखनीय है कि कार्यकारिणी समिति का गठन केवल शहरी नगरपालिकाओं अर्थात् नगर परिषदों की अवस्था में ही अनिवार्य है, नगरपालिका मण्डलों में नहीं। उपर्युक्त पाँचों समितियों का शहरी नगरपालिकाओं अर्थात् नगर परिषदों में होना अनिवार्य है। साथ ही अन्य समितियाँ नगर परिषदों की सुविधानुसार गठित की जा सकती।

  1. नगरपालिका की बैठकें-

    अधिनियम की धारा 70 के अनुसार, सामान्य कार्य निपटाने के लिए प्रत्येक माह में नगरपालिका की कम से कम एक साधारण बैठक होनी चाहिए। अध्यक्ष का कर्त्तव्य है कि वह सब सामान्य बैठकों के लिए तिथियाँ नियत करे। अध्यक्ष, जब भी यह उचित समझे, एक विशेष सामान्य बैठक आमन्त्रित कर सकता है। ऐसी विशेष सामान्य बैठक अध्यक्ष द्वारा सदस्यों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई सदस्यों की लिखित प्रार्थना पर आमन्त्रित की जाती है। प्रत्येक बैठक की अध्यक्षता अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की अनुपस्थिति में, उस समय उपस्थित सदस्यों में से किसी एक ऐसे सदस्य द्वारा की जाती है जिसे बैठक में उस अवसर पर अध्यक्ष चुन लिया जाए। समस्त प्रश्नों का निर्णय उपस्थित या मत देने वाले सदस्यों (अध्यक्ष सहित) के बहुमत से किया जाता है। बराबर मत होने की स्थिति में अध्यक्ष को द्वितीय मत देने का अधिकार होता है। बैठक की गणपूर्ति के लिए सदस्यों की सम्पूर्ण संख्या के एक-तिहाई सदस्यों का उपस्थित होना आवश्यक है।

नगरपालिका की शक्तियाँ

(Powers)

सभी राज्यों में नगरपालिकाओं की शक्तियाँ और अधिकार एक जैसे हैं। राजस्थान राज्य में नगरपालिकाओं की शक्तियाँ निम्नलिखित हैं-

  1. नियम बनाने की शक्ति-

    प्रत्येक नगरपालिका को ऐसे नियम बनाने का अधिकार है जो राजस्थान नगरपालिका अधिनियम अथवा राज्य सरकार द्वारा धारा 297 के अन्तर्गत बनाए गए नियमों के विरुद्ध नहीं होंगे। नगरपालिका को अपने कार्य संचालन के बारे में तथा अपनी शक्तियों या कर्तव्यों को सौंपने के सम्बन्ध में और समितियों की नियुक्तियों एवं निर्माण के सम्बन्ध में भी अनेक अधिकार हैं। नगरपालिका सामान्यतः अपने पदाधिकारियों तथा कर्मचारियों के पथ-प्रदर्शन के लिए नगरपालिका के प्रशासन से सम्बन्धित समस्त विषयों पर नियम बना सकती है। किसी पदाधिकारी अथवा कर्मचारी, जिससे प्रतिभूति लेना उचित समझा जाए, द्वारा दी जाने वाली प्रतिभूति (सिक्योरिटी) की राशि तथा आकृति का निश्चय भी नगरपालिका द्वारा किया जा सकता है। किसी पदाधिकारी अथवा कर्मचारी को नियुक्त करने, दण्ड देने या विमुक्त करने के तरीकों और शर्तों का निश्चय किया जा सकता है। ये सभी शक्तियाँ नगरपालिका को (चाहे म्युनिसिपल बोर्ड हो या म्युनिसिपल कौंसिल हो) अधिनियम की धारा 88 के अन्तर्गत प्राप्त हैं, लेकिन यह है कि इस धारा के अन्तर्गत किसी नगरपालिका द्वारा बनाया गया नियम तब तक प्रभाव में नहीं आएगा जब तक कि राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित न हो जाए।

प्रत्येक नगरपालिका को समय-समय पर ऐसी उपविधियाँ बनाने का अधिकार है जो राजस्थान नगरपालिका अधिनियम के प्रतिकूल नहीं हों। अधिनियम की धारा 90 में उन विषयों को विस्तार से बताया गया है जिनके सम्बन्ध में नगरपालिका को सामान्यतः उपविधियाँ बनाने की शक्ति है, परन्तु नगरपालिका द्वारा बनाई गई कोई भी उपविदि तब तक प्रभावशील नहीं होगी जब तक कि वह राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत नहीं कर दी जाए।

राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 1959 की धारा 91 में यह व्यवस्था दी गई है कि उपर्युक्त नियम और उपविधियाँ मुद्रित होंगे तथा सर्वसाधारण के निरीक्षण के लिए नगरपालिका कार्यालय में खुले रखे जायेंगे और उनकी मुद्रित प्रतियाँ लागत मूल्य पर विक्रय के लिए रखी जाएँगी।

  1. सम्पत्ति को अवाप्त और धारण करने की शक्ति-

    अधिनियम की धारा 92 के अनुसार प्रत्येक नगरपालिका चल और अचल दोनों प्रकार की सम्पत्ति अवाप्त और धारण कर सकती हैं चाहे वह नगरपालिका की सीमाओं के अन्दर हो या बाहर।

नगरपालिका को प्राप्त अथवा नगरपालिका के निमित्त की गई समस्त धनराशियाँ नगरपालिका कोष का अंग होंगी अर्थात् राजस्थान नगरपालिका अधिनियम के अन्तर्गत दिए गए अथवा लगाए गए समस्त कर, मार्ग-कर तथा अन्य कर, जुर्माने, शुल्क, नगरपालिका द्वारा बेची गई भूमि या अन्य सम्पत्ति से प्राप्त रकमें तथा उससे प्राप्त होने वाला सम्पूर्ण किराया आदि नगरपालिका निधि का अंग होती है, परन्तु शर्त यह है कि कोई भी बात राज्य सरकार द्वारा तय की गई किसी योजना द्वारा स्वीकृत या आरोपित किसी दायित्व पर किसी प्रकार से प्रभाव न डाले । नगरपालिका अपनी निधि तथा सम्पत्ति का प्रयोग राज्य सरकार की पूर्व-स्वीकृति से ऐसे काम में ला सकती है जो सार्वजनिक हित में हो तथापि इस सम्बन्ध में कुछ शर्ते धारा 94 में निर्धारित की गई हैं। धारा 96 के अन्तर्गत नगरपालिका को अतिरिक्त कोषों को जमा करने अथवा उनका विनियोग करने की शक्ति दी गई है और धारा 97 के अनुसार अधिनियम के प्रावधानों के अधीन, नगरपालिका को रकम उधार लेने की शक्ति भी प्राप्त है।

नगरपालिकाओं के कार्य

(Functions)

प्राथमिक एवं अनिवार्य कार्य अधिनियम की धारा 98 के अनुसार प्राथमिक कार्य निम्नानुसार हैं-

  • सार्वजनिक स्थानों और भवनों में प्रकाश की व्यवस्था करना, पानी तथा सफाई का प्रबन्ध करना और गन्दगी दूर करना।
  • सार्वजनिक भवनों और स्थानों पर जल छिड़कना।
  • हानिकारक वनस्पति को हटाना और समस्त सार्वजनिक बाधाओं को कम करना ।
  • आग बुझाना और आग से नागरिकों की जान-माल की रक्षा करना।
  • उद्वेगकारी अथवा खतरनाक व्यापारों या वृत्तियों का नियमन करना।
  • सार्वजनिक गलियों, बाजारों, नालियों, स्नान-घर, बूचड़खानों, तालाबों, कुँओं, धोने के स्थानों आदि का निर्माण और उनकी व्यवस्था करना।
  • सार्वजनिक शौचालयों और मूत्रालयों का प्रबन्ध करना।
  • सार्वजनिक मार्गों अथवा स्थानों और ऐसे स्थानों से, जो निजी सम्पत्ति नहीं हैं, जो जनता के उपभोग के लिए मुक्त हैं, रुकावटों और आगे निकले हुए भागों को हटाना।
  • खतरनाक भवनों को सुरक्षित करना या हटाना तथा अस्वास्थ्यकर बस्तियों या स्थानों का उद्धार करना।
  • मुर्दो को जलाने या गाड़ने के स्थानों का प्रबन्ध करना ।
  • जन्म और मरण का हिसाब रखना।
  • अनाथों और असहायों के निवास का प्रबन्ध करना।
  • सार्वजनिक औषधालयों की स्थापना और व्यवस्था करना और जनसाधारण को चिकित्सा सम्बन्धी सहायता देना।
  • सार्वजनिक टीकों का प्रबन्ध करना।
  • पागल कुत्तों को पकड़ने और ऐसे कुत्तों द्वारा काटे गए लोगों की चिकित्सा का प्रबन्ध करना।
  • मल और कूड़े-कर्कट से मिश्रित खाद तैयार करने के लिए प्रबन्ध करना।
  • सार्वजनिक वाचनालयों की स्थापना आदि।

विशेष कार्य- प्रत्येक नगरपालिका के दो विशेष कर्त्तव्य निभाने पड़ते हैं-

  1. भयंकर बीमारी की अवस्था में विशेष चिकित्सा की व्यवस्था करना और बीमारी की रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठाना ।
  2. अकाल या अतिवृष्टि के समय असहाय लोगों की सहायता करना।

गौण या ऐच्छिक कार्य- प्रायः प्रत्येक नगरपालिका के मुख्यतया ऐच्छिक या गौण कार्य निम्नलिखित हैं-

  1. नई सड़कों एवं गलियों का निर्माण करना तथा सड़कों पर वृक्ष लगवाना।
  2. सार्वजनिक पार्को, बगीचों, पुस्तकालयों, अजायबघरों, धर्मशालाओं, विश्राम-गृहों आदि का निर्माण एवं प्रबन्ध करना।
  3. गन्दी बस्तियों को समाप्त करना तथा ऐसे कार्य करना जो जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा या सुविधा के लिए आवश्यक हों।
  4. प्राथमिक पाठशालाओं की स्थापना करना और व्यवस्था करना।
  5. पशु-घरों की स्थापना करना।
  6. मेले और प्रदर्शनियों को लगाना।
  7. सार्वजनिक स्वागत समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रमों आदि का प्रबन्ध करना।
  8. स्थानीय कला और उद्योग-धन्धों के लिए कर्ज देना, आदि।

उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार अधिनियम की धारा 100 के अनुसार, किसी भी नगरपालिका को प्राथमिक और विशेष कर्त्तव्य सम्बन्धी प्रावधानों से मुक्त कर सकती है कि अमुक प्राथमिक या विशेष कार्य नगरपालिका के विवेकानुसार किया जाने वाला कार्य समझा जाएगा।

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