जिला प्रशासन

िला प्रशासन

िला प्रशासन

लोक प्रशासन की दृष्टि से भारत का जिला प्रशासन दुहरी इकाई है। राज्य सरकार की राजधानी से नीचे का क्षेत्रीय प्रशासन होने के नाते जिला प्रशासन सरकार की समग्रता का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरी ओर जिला ही वह छोटी इकाई है, जो युगों से भारत में स्थानीय स्वराज्य का प्रारूप प्रस्तुत करता रहा है। इस प्रकार सामाजिक और राजनीतिक जीवन के दो महत्वपूर्ण कार्य, ‘सुरक्षा’ एवं ‘विकास’ जिला प्रशासन की परिधि में आते हैं। प्रशासनिक स्वतन्त्रता एवं कार्य-कुशलता के लिए इसे जनसंख्या एवं भूगोल की दृष्टि से भी उपयुक्त एवं पर्याप्त इकाई माना जाता है। राज्य एवं केन्द्रीय सरकार से मिलने वाली नीति निर्देश को जिला प्रशासन कार्यान्वित करता है। किन्तु दूसरी ओर राज्य स्तरीय नीतियों के निर्माता विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी राजनीतिक दृष्टि से अपना आधार एवं प्रभाव जिला स्तर से ग्रहण करते हैं। पंचायती राज के प्रादुर्भाव ने इस स्तर को सशक्त किया है और जन प्रतिनिधियों की राजनीति के कारण जिला प्रशासन की नौकरशाही का लोकतन्त्रीकरण हुआ।

जिला प्रशासन का ढाँचा

(Structure  of District Administration)

भारत में जिला प्रशासन का एक सम्पूर्ण ढाँचा एक पदसोपान युक्त व्यवस्था के रूप में देखा जा सकता है। सामान्यतः इसके स्तर तीन तथा कभी-कभी दो या चार भी होते हैं। वैसे अधिकांश राज्यों में जिले के तीन स्तर मिलते हैं। प्रथम, जिला-इसका मुख्यालय जिले के प्रमुख नगर में होता है। दूसरे, जिले के किसी अन्य स्थान पर उपखण्ड का मुख्यालय और तीसरा, तहसील कार्यालय है। ये तीनों स्तर जिले में सामान्य प्रशासन की दृष्टि से बनाये जाते हैं, किन्तु विकास कार्यों के लिए अधिकतर राज्यों में प्रशासन की इकाई ‘ब्लाक’ है।

जिला प्रशासन के तीनों चरण स्तरों पर अधिकारी वर्ग भी उल्लेखनीय हैं। प्रथम स्तर का क्षेत्राधिकार सम्पूर्ण जिला है तथा इससे अधिकारी हैं जिलाधीश, जिला कृषि अधिकारी, जिला परिषद् के अध्यक्ष, स्वास्थ्य अधिकारी आदि। बड़े जिलों में दो मध्यवर्ती स्तर पाये जाते हैं जबकि छोटे जिलों में यह स्तर एक ही होता है। इस स्तर पर उपखण्ड अधिकारी या उपखण्ड दण्डनायक होता है। उपखण्ड अधिकारी सामान्यज्ञ प्रशासक होता है। वह तहसीलदार और जिलाधीश के मध्य राजस्व मामलों में तथा जिलाधीश और स्थानीय पुलिस अधिकारी के मध्य कानून और शान्ति के मामलों में एक कड़ी का कार्य करता है। उपखण्ड को तहसीलों में बाँटा जाता है। इस स्तर के प्रमुख अधिकारी तहसीलदार, विकास अधिकारी, प्रधान आदि उल्लेखनीय हैं। तहसील का मुख्य अधिकारी तहसीलदार कहलाता है और वह अधीनस्थ सेवा का सदस्य होता है। तहसीलदार को उसके कार्यों में नायब या उप-तहसीलदार, कानूनगो एवं पटवारी सहायता देते हैं। समस्त राजस्व कार्यों तथा सरकार द्वारा सौंपे गये अन्य सम्बन्धित कार्यों के लिए तहसीलदार कलेक्टर के माध्यम से राज्य सरकार के प्रति उत्तरदायी होता है। निम्न स्तर पर गाँव में ग्राम पंचायतें, मुखिया, पटवारी, ग्राम सहायक आदि आते हैं।

जिलाधीश के कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व

(Duties and Responsibilities of the Collector)

जिलाधीश को अनेक कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना पड़ता है। वास्तविकता तो यह है कि उनके कार्य परिभाषित होने के स्थान पर अपरिभाषित अधिक हैं। वह अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह चार रूपों में करता है। ये चार रूप हैं-कलेक्टर, जिला प्रशासनिक अधिकारी, जिला मजिस्ट्रेट और विकास अधिकारी।

कलेक्टर के रूप में वह लगभग बीस प्रकार के कार्यों का सम्पादन करता है। इनमें से कुछ कार्य हैं-राजस्व, नहरी बकाया एवं बकायों का संरक्षण, तकाबी ऋण का वितरण और वसूली, फसलों की क्षति का अनुमान लगाना तथा राहत के लिए सिफारिशें करना, विपत्ति तकाबी का वितरण, अग्निकांड से पीड़ित व्यक्तियों को राहत पहुँचाना, भू अधिग्रहण कार्य, वर्षा, फसल आदि से सम्बन्धित सभी प्रकार की कृषि सांख्यिकी का संग्रहण, कोषालय और उपकोषालय का अधीक्षण, जागीर उन्मूलन, मुआवजा भुगतान, मुद्रांक अधिनियम को प्रवर्तित करना, बाढ़, अकाल, आगजनी, अतिवृष्टि आदि प्राकृतिक विपदाओं के समय राहत कार्य आदि।

जिला के प्रशासनिक अधिकारी के रूप में वह लगभग तीस कार्यों का सम्पादन करता है। कुछ मुख्य कार्य हैं-जिले के तहसीलदारों एवं नायब तहसीलदारों की पद स्थापना, स्थानान्तरण एवं अवकाश, जिलाधीश कार्यालय, उपखण्ड कार्यालय, तहसील आदि कार्यालयों में दफ्तरी अमले की नियुक्ति करना व उन्हें दण्डित करना, कनिष्ठ अधिकारियों को कार्यालय प्रक्रिया, प्रशासनिक कार्य एवं व्यक्तिगत आचरण में प्रशिक्षित करना, जिले में सरकार के सामान्य हितों की देख-रेख करना, सरकार द्वारा अथवा सरकार पर गैर-सरकारी पक्ष द्वारा किये गये मुकदमों का नियन्त्रण एवं पर्यवेक्षण करना, समस्त जिला स्तरीय अधिकारियों के कार्यों में समन्वय स्थापित करना, जनता एवं अधिकारियों से भेंट करना, जिले में सरकारी वकील नियुक्त करना तथा वकीलों का पैनल तैयार करना आदि।

जिला मजिस्ट्रेट के रूप में वह पैंतीस से अधिक कार्यों का सम्पादन करता है। जैसे जिले में फौजदारी प्रशासन का संचालन करना, जेल और पुलिस का नियन्त्रण रखना, सार्वजनिक शान्ति और व्यवस्था भंग होने की आशंका होने पर आदेश प्रसारित करना, श्रम समस्याओं तथा हड़ताल आदि से सम्बन्धित कार्य, पेड़ों को काटने के लिए परमिट प्रदान करना, नजूल भूमि का प्रशासन, प्रेस अधिनियम को प्रवर्तित करना, पारपत्र एवं बीसा प्रदान करने की सिफारिश करना, अधिवास, अनुसूचित एवं पिछड़ी जाति और जनजाति सम्बन्धी प्रमाम-पत्र देना और स्थानीय संस्थाओं का निरीक्षण एवं नियन्त्रण आदि।

स्वतन्त्रता के बाद कलेक्टर के विकास कार्य महत्वपूर्ण बने हैं। सामुदायिक विकास कार्यक्रमों और पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना के फलस्वरूप जिलाधीश विकास अधिकारी के रूप में कार्य करने लगा है। जिले में विकास कार्य का समन्वय करना, विकास कार्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं का निराकरण करना, विकास कार्यों के सम्बन्ध में सामयिक एवं तात्कालिक प्रतिवेदन उच्च अधिकारियों को भेजना आदि उसके प्रमुख उत्तरदायित्व हैं। वह जिले के विकास तथा समाज कल्याण विभागों के अध्यक्षों को निर्देशन, परामर्श एवं सहयोग प्रदान करता है। जिले के विकास अधिकारियों के सम्बन्ध में जिलाधीश को प्रशासनिक और अनुशासनात्मक नियन्त्रण की शक्तियाँ प्राप्त हैं। उसको पंचायती राज संस्थाओं के कार्यों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। वह अनेक राज्यों में जिला परिषद् का पदेन सदस्य होता है। वह जिला परिषदों की बैठकों में भाग लेता है। वह पंचायत समितियों एवं पंचायतों पर बाहर से नियन्त्रण रखता है तथा वह देखता है कि उक्त संस्थाएँ अपने क्षेत्राधिकार में रहकर अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करती हैं या नहीं।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कलेक्टर द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले कार्यों की सूची पर्याप्त लम्बी है। आज वह अतीत की भाँति एक लाइन अभिकरण न रहकर एक स्टॉफ अधिकरण बन गया है। आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व जिला राजस्व कार्यालय पुनर्गठन समिति बम्बई ने जिलाधीश के कार्यभार का विश्लेषण किया था। समिति के विश्लेषणानुसार जिलाधीश को प्रति वर्ष 2,975 घण्टे कार्य करना पड़ता है।

जिलाधीश की बदलती भूमिका : विकास प्रशासन का परिप्रेक्ष्य

विकास प्रशासन के सन्दर्भ में कलेक्टर का विकास कार्यों में महत्वपूर्ण स्थान है। जिला स्तर पर सामुदायिक विकास कार्यों में समन्वय तथा सहयोग लाने के लिए योजनाओं के निर्माण एवं उनकी उचित रूप से क्रियान्विति के लिए वही जिम्मेदार है। विकास कार्यों में आने वाली बाधाओं के निराकरण का प्रयास भी वही करता है। क्या जिले में एक ही व्यक्ति नियमनकारी (Regulatory) तथा विकास कार्यों का दायित्व भलीभाँति निभा सकता है? क्या कलेक्टर के नियमनकारी तथा विकास कार्यों को अलग-अलग कर देना समीचीन होगा? क्या वर्तमान में विविधज्ञ प्रशासक (जनरलिस्ट एडमिनिस्ट्रेटर) की पृष्ठभूमि वाले कलेक्टर विकास कार्यों की तकनीकी सूक्ष्मताओं को भली-भाँति समझते हैं। ऐसा भी सुझाव आया है कि नियमनकारी कार्य कलेक्टर को सौंपे जायें तथा विकास कार्यों का दायित्व उसी के समतुल्य दर्जे वाले विकास, मूलक कार्यों में विशिष्टता रखने वाले विशेषज्ञ प्रशासक को सौंपा जाये। अशोक मेहता समिति ने अपने प्रतिवेदन में सुझाया था कि जिला स्तर एक “मुख्य कार्यपालक अधिकारी” का पद निर्मित किया जाना चाहिए जिसके नियन्त्रण में जिले का विकास सम्बन्धी समस्त प्रशासन रहेगा। इससे जहाँ तक विकास कार्यों का सीधा सम्बन्ध है उनसे कलेक्टर को मुक्त किया जा सकेगा।

महाराष्ट्र राज्य में जिलाधीश को विकास कार्यों से पूर्णतः मुक्त कर दिया गया है। जिला स्तर पर विकास कार्यों का उत्तरदायित्व प्रमुख कार्यकारी अधिकारी को सौंपा गया है। यह अधिकारी जिलाधीश के स्तर का वरिष्ठ अधिकारी होता है। जिलाधीश और प्रमुख कार्यकारी अधिकारी के जिला स्तरीय कार्यों में स्पष्ट एवं विवेक-सम्मत विभाजन रेखा खींच दी गयी है। विकास कार्यों से सम्बन्धित सभी विभागों के जिला स्तर अधिकारी तथा उनके अमले को पूर्णतः प्रमुख कार्यकारी अधिकारी के नियन्त्रण में रखा गया है। प्रमुख कार्यकारी अधिकारी जिला परिषद् के अन्तर्गत आने वाले स्थानीय विकास कार्यों के लिए उत्तरदायी है जबकि जिलाधीश बड़ी राज्य योजनाओं और अन्य प्रशासकीय कार्यों के लिए उत्तरदायी है। इस व्यवस्था से जिलाधीश की स्थिति पर किसी प्रकार का अन्तर नहीं पड़ा है। सत्य तो यह है कि अब वह अपना कार्य अधिक कुशलता और प्रभावपूर्ण ढंग से करता है। अब शनैः-शनैः अन्य राज्य भी महाराष्ट्र प्रतिरूप की ओर आकर्षित होने लगे हैं। इस ओर आन्ध्र प्रदेश ने पहल की है। जिला स्तर पर नियामकीय कार्यों हेतु जिलाधीश तथा विकास कार्यों हेतु मुख्य कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति की जा रही है।

अनुभवों तथा अनुसन्धानों से यह तथ्य सामने आया है कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अधिकांशतः नियामकीय कार्यों में अधिक व्यस्त रहते हैं तथा विकास कार्यों के लिए उचित ध्यान नहीं दे पाते हैं जिसका असर विकास प्रशासन पर नकारात्मक होता है। अतः अब यह माँग की जा रही है नियामकीय तथा विकास कार्यों के लिए अलग-अलग अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए। विकास कार्यों के लिए विशेषज्ञ नियुक्त किये जाने चाहिये। चूँकि भारत कृषि प्रधान देश है अतः कृषि तथा विकास हेतु जिला विकास अधिकारी के पद पर भारतीय कृषि सेवा अथवा कृषि विशेषज्ञ नियुक्त किये जाने चाहिए। इस प्रकार की व्यवस्था से जहाँ एक ओर सामान्यकों तथा विशेषज्ञों की समस्या सुलझेगी, दूसरी ओर विकास एवं प्रशासन में विशेषज्ञता के परिणामस्वरूप विकास प्रशासन को गति मिलेगी तथा ग्राम विकास अधिक तीव्र गति से हो सकेगा।

फिर भी कई राज्यों में अभी भी विकास कार्यों का कप्तान कलॅक्टर को ही रखा गया है। कई राज्यों में आज भी यह माना जाता है कि विकास कार्य व्यक्तिगत निर्देशन की अपेक्षा रखते हैं जो कि कलेक्टर के माध्यम से ही सुलभ हो सकती है। विकास कार्यों के लिए प्रभावशाली समन्वयक अपेक्षित है जिसकी पूर्ति केवल कलक्टर ही कर सकता है। यदि कलेक्टर के पास विकास कार्य ज्यों-के-त्यों बनाये रखे जाते हैं तो उसकी कार्यदक्षता बनाये रखने के लिए जिले का क्षेत्र छोटा किया जा सकता है, उसे प्रोटोकोल कार्यों से मुक्त किया जा सकता है तथा उसके द्वारा अध्यक्षता की जाने वाली समितियों की संख्या कम की जा सकती है। पंचायती राज के अन्तर्गत लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण के सफल संचालन के लिए कलेक्टर को उत्तरदायी बनाया जाना चाहिए।

संक्षेप में पंचायती राज संस्थाओं में जिलाधीश की चाहे कुछ भी स्थिति हो, जिला प्रशासन और पंचायती राज संस्थाओं में उसका महत्वपूर्ण स्थान है। इस सम्बन्ध में वी० टी० कृष्णामाचारी के ये विचार अत्यन्त महत्व के हैं-“जिलाधीश की भूमिका में परिवर्तन हुआ है किन्तु ह्रास नहीं हुआ है, क्योंकि उसको अब लोकतान्त्रिक संस्थाओं का पथ प्रदर्शन करने का कार्य प्राप्त है।” संकटकाल में आज भी सरकार जिलाधीश की ओर देखती है। आज भी जिलाधीश सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का दृढ़ता से मुकाबला करने की स्थिति में है जो इस संस्था की जागरूकता और जीवनदायिनी शक्ति का परिचायक है।

जिला प्रशासन में सुधार : लखीना पेटर्न

अहमदनगर के तात्कालिक जिलाधीश श्री अनिल कुमार लखीना ने अपने जिला कार्यालय में हाल ही में एक सुधार योजना लागू करके पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है। लखीना सुधार योजना में तीन प्रकार के सुधारों पर ध्यान दिया गया है-

  • नागरिक क्लर्क सम्बन्धों का नवीनीकरण,
  • कार्यालय प्रक्रिया को सरल करना जिससे फाइलें और रिकार्ड आसानी से उपलब्ध हो जायें,
  • कार्यालय में कार्मिकों के लिए अच्छी काम करने लायक परिस्थितियाँ तथा चुस्त भौतिक पर्यावरण।

इस सुधार का मुख्य ध्येय जिला प्रशासन को दायित्वपूर्ण बनाना और प्रशासन की नकारात्मक छवि को बदलना है।

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