भारत का नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक

भारत का नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक

भारत का नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक

(Controller & Auditor General of India)

लोक व्यय पर नियन्त्रण के लिए विभागीय व्यय के लेखों का परीक्षण एक कार्यपालिका के स्वतन्त्र निकाय द्वारा किया जाता है। भारत में यह कार्य नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक को सौंपा गया है। यहाँ लेखा-परीक्षण विभाग की रचना 1753 में हो चुकी थी, किन्तु स्वतन्त्र निकाय के रूप में इसकी स्थापना 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत की गई। सन् 1935 के अधिनियम द्वारा इसका स्तर बढ़ा दिया गया। सन् 1947 के स्वतन्त्रता अधिनियम में इसको अधिक शक्तियाँ सौंपी गईं। जब देशी रियासतें भी भारत संघ में शामिल हो गई तो लेखा-परीक्षण के क्षेत्र में सारा देश आ गया। सन् 1950 के नए संविधान में महालेखा परीक्षक के पद का नाम बदलकर नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक (सी० एण्ड एजी०) कर दिया गया। उसे सर्वोच्च न्यायाधीशों की भाँति एक सांविधानिक अधिकारी का पद दिया गया है।

कार्यालय का संगठन

(Organisational of Office)

नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक भारतीय लेखा एवं अंकेक्षण विभाग का सर्वोच्च अधिकारी होता है। इस विभाग का मुख्यालय नई दिल्ली में है। अंकेक्षण कार्य को प्रभावी एवं सक्षम बनाने के लिए इसमें अनेक क्षेत्रीय कार्यालय, शाखा कार्यालय, आवासीय अंकेक्षण कार्यालय हैं। वर्तमान में नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक कार्यालय के अधीन 103 क्षेत्रीय कार्यालय (Regional Offices), 71 शाखा कार्यालय (Branch Offices) तथा 380 आवासीय अंकेक्षण कार्यालय (Housing Auditing Offices) हैं।

नियुक्ति तथा सेवा शर्ते

(Appointment and Conditions of Service)

नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा जारी किये गये निर्देश से होती है। राष्ट्रपति उसे प्रधानमंत्री के परामर्श पर नियुक्त करता है। यह भारत के मुख्य न्यायाधीश की भाँति अपने कार्य की शपथ लेता है। इस पद के लिए संविधान में कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई, किन्तु सामान्यतः प्रशासकीय अनुभव रखने वाले व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया जाता है। इसके पद का कार्यकाल छः वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु का है। इस पर उसका कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। पद पर नियुक्त होने के पश्चात् वह किसी सरकारी पद का पात्र नहीं होता। इसका वेतन एवं सेवा शर्ते संविधान के अनुच्छेद 148 से 151 तक में वर्णित उपबन्धों के अनुसार संसद के कानूनों द्वारा निर्धारित की जाती हैं। इसके वेतन, पेन्शन, अनुपस्थिति, छुट्टी अथवा सेवानिवृत्ति आदि बातों से उसकी नियुक्ति के पश्चात् कोई भी अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इसके कार्यालय का प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि में से दिया जाता है। इसके वेतन, भत्ते व पेन्शन आदि पर होने वाले व्यय के सम्बन्ध में संसद मतदान नहीं कर सकती। यह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर वेतन प्राप्त करता है और सेवानिवृत्ति की विशेष शर्तों का भी अधिकारी है। उसके स्थायित्व तथा पदावधि की व्यवस्था भी संविधान द्वारा की गई है। उसे बाहरी प्रभावों तथा दबावों से मुक्त रखे जाने का प्रयत्न भी किया जाता है।

कार्य एवं शक्तियाँ

(Functions and Powers)

संविधान के अनुच्छेद 149 में नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक की शक्तियों का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार संघ और राज्यों के तथा अन्य अधिकारी भी निकाय आदि के लेखों के विषय में ऐसे कर्त्तव्यों का पालन करेगा तथा ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जैसी कि संसद द्वारा निर्मित विधि के अनुसार की जायेगी। वह राष्ट्रपति के अनुमोदन से संघ तथा राज्यों के लेखे रखने का तरीका निश्चित करता है। नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक के मुख्य कर्तव्य महालेखा परीक्षा तैयार करना तथा लेखा परीक्षण करना है। यह व्यावसायिक अथवा गैर सरकारी लेखा परीक्षक के कार्यों पर लागू नहीं होती। वह कार्यपालिका के व्यवहार के औचित्य की सूचना संसद को देने के लिए स्वतन्त्र है। संविधान के विशेष प्रावधान उसकी सत्ता को सीमित नहीं करते वरन् उसे सम्पूर्ण देश के वित्तीय प्रशासन की विशेष शक्ति सौंपते हैं। नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक के कार्यों एवं शक्तियों को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत व्यक्त किया जा सकता है-

  1. यह केन्द्र तथा राज्य सरकारों के लेखों की गणना करता है। उसकी सहमति के बिना किसी भी रकम की अदायगी नहीं की जा सकती।
  2. नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक संघ तथा राज्य सरकारों के लेखों का प्रबन्ध करके समय-समय पर निर्देश जारी कर सकता है।
  3. नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक संघ के लेखों से सम्बन्धित प्रतिवेदन राष्ट्रपति को तथा राज्य सरकार के लेखों से सम्बन्धित प्रतिवेदन सम्बन्धित राज्यपाल को देता है, जो क्रमशः संसद तथा राज्य विधानसभा के समक्ष इसके प्रतिवेदन को प्रस्तुत करते हैं।
  4. नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक जनलेखा समिति की बैठक में भी उपस्थित होता है तथा समिति को अपने कर्तव्य पालन में सहायता प्रदान करता है।
  5. नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक के पास लेखा परीक्षा सम्बन्धी अनेक शक्ति रहती है। महालेखा परीक्षक की शक्तियाँ व्यावसायिक लेखा परीक्षक की शक्तियों से कुछ अधिक व्यापक होती हैं।
  6. नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक उन व्ययों पर नियन्त्रण रखता है, जो संविधान अथवा कानून के विरुद्ध हों।
  7. नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक संघ सरकार को सरकारी कम्पनियों के लिए व्यावसायिक लेखा निरीक्षकों की नियुक्ति से परामर्श भी देता है।
  8. नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक की अनुमति द्वारा स्थायी संस्थाओं के लेख भी परीक्षण हेतु दिये जाते हैं।

पद की स्वतन्त्रता

(Freedom of Post)

नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक को बाह्य दबावों तथा प्रभावों से मुक्त रखा जाता है। उसके पद की प्रकृति इस प्रकार की है कि जब तक उसे कार्यपालिका के नियंत्रण से स्वतन्त्र नहीं रखा जाये, तब तक वह कार्यपालिका के विभिन्न अधिकारियों द्वारा किये जाने वाले व्यय का विश्लेषण तथा आलोचनात्मक जाँच प्रभावपूर्ण ढंग से नहीं कर पायेगा। संविधान में उसकी स्वतन्त्रता के सम्बन्ध में अग्रलिखित उपबन्ध हैं-

  1. उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के परामर्श से की जायेगी। उसे तब तक पदच्युत नहीं किया जा सकेगा, जब तक उसकी असमर्थ्यता का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों द्वारा प्रमाणित न हो जाये।
  2. उसका वेतन भारत की संचित निधि में से दिया जायेगा, जिसमें उसके कार्यकाल में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा।
  3. अवकाश प्राप्त करने के बाद वह किसी संघ अथवा राज्य सरकार के लाभ के पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकेगा।
  4. यह संसद का सेवक है तथा इसका संसद से सीधा सम्बन्ध है।
  5. इसके कार्यालय का प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि में से किया जायेगा।

मूल्यांकन

नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक का पद प्रशासन पर वित्तीय नियन्त्रण स्थापित करने की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है, किन्तु उसे प्रशासन को समझने की निश्चयात्मक रीति से व्यवहार करना चाहिए। उसका कार्य केवल यह सुनिश्चित करना ही नहीं है कि संसद द्वारा किये गये विनियोजन बिना अनुपूरक मत के बढ़ाये गये नहीं हैं या व्यय नियमों के अनुरूप ही हुए हैं, बल्कि संसद के प्रतिनिधि के रूप में स्वयं को इस बात से संतुष्ट कर लेना है कि इसमें बुद्धिमानी, सच्चाई एवं मितव्ययिता से भी काम लिया गया है अथवा नहीं। लेखा परीक्षा और प्रशासन को निकट लाने के लिए एक नये सकारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। यही कारण है कि हाल ही में लेखा परीक्षा की जाँच और आक्षेपों पर विचार करने हेतु एक नई प्रक्रिया विकसित की गई है। जन-लेखा समिति महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन को अधिक प्रभावशाली बनाती है।

मन्त्रिपदीय नियन्त्रण की समस्याएँ एवं सुझाव

मन्त्रिपदीय नियन्त्रण से उत्पन्न समस्याएँ एवं उनके समाधान हेतु सम्भावित सुझाव निम्नलिखित हैं-

  1. किस लोक उद्योग को किस मन्त्री के नियन्त्रण में रखा जाय?-

    मन्त्रिपदीय नियन्त्रण में सम्भवतः यह सबसे प्रमुख तकनीकी समस्या है। अनेक लोक उद्योगों का सम्बन्ध एक से अधिक मंत्रालयों से पड़ता है। अतः समस्या यह उत्पन्न होती है कि वह लोक उद्योग किस मंत्रालय के आदेशों का पालन करें? यदि विभिन्न मंत्रालयों के मंत्री किसी मामले पर बुनियादी रूप से विचारों से अन्तर रखते हैं तो यह समस्या और भी गम्भीर हो जाती है। उदाहरण के लिए, कोयला उत्पादन से सम्बन्धित लोक उद्योग का इस्पात मंत्रालय, उद्योग मंत्रालय व वित्त मंत्रालय से कार्य पड़ सकता है। किन्तु यदि इन तीनों मंत्रियों के विचारों में किसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर बुनियादी मतभेद हो तो दुविधापूर्ण स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

  2. मन्त्रालय नियन्त्रण का स्वरूप क्या हो?-

    लोक उद्योगों पर मन्त्रिपदीय नियन्त्रण में मंत्रालय नियन्त्रण के स्वरूप का प्रश्न भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से मंत्री स्वयं प्रबन्ध मण्डल में रह सकता है या मंत्रालय के अधिकारी प्रबन्ध मण्डल में संचालक हो सकते हैं अथवा मंत्री अपनी इच्छा से प्रबन्ध मण्डल के सदस्यों को मनोनीत कर सकता है आदि प्रश्नों का समाधान आवश्यक है। प्रबन्ध मण्डल को आवश्यक निर्देश अथवा आदेशों के सम्बन्ध में अपने अधिकारों का प्रयोग तो मंत्री परिस्थिति में कर ही सकता है।

  3. मन्त्रालय नियन्त्रण में सम्मिलित किये जाने वाले विषय (Topics to be Included in Ministerial Control)-

    मंत्रालय नियन्त्रण में एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न इस प्रकार के नियन्त्रण में शामिल किये जाने वाले विषयों से सम्बन्धित है। मंत्रालय नियन्त्रण में किन विषयों को शामिल किया जाय, इनका कोई सामान्य उत्तर बतलाना कठिन है। श्री ए० एच० हैन्सन के अनुसार ऐसे प्रश्न के उत्तर को सामान्यतः चार घटक प्रभावित करते हैं। (i) राष्ट्र के आर्थिक विकास का स्तर, (ii) लोक उद्योगों के लिए आवश्यक शक्ति एवं समय की माँग, (iii) सरकारी मशीनरी की किस्म तथा मंत्री द्वारा इसके प्रयोग में कुशलता की व्यवस्था, (iv) सरकार द्वारा लोक उद्योगों को प्रदत्त महत्व तथा लोक उद्योगों के लिए चुनी गयी संस्था का प्रकार।

  4. मन्त्रिपदीय नियन्त्रण में कितनी स्वतन्त्रता दी जाय? (Extent of Autonomy under Ministerial Control)-

    यह समस्या लोक निगमों और सरकारी कम्पनियों के सम्बन्ध में उत्पन्न होती है। लोक उद्योगों को मन्त्रिपदीय नियन्त्रण में स्वतन्त्रता दिये जाने के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि दिन-प्रतिदिन के प्रशासनिक कार्यों में मन्त्री का हस्तक्षेप न हो, लेकिन सामान्य नीतियों के विषयों में उसका नियंत्रण बना रहे। मन्त्रिपदीय नियन्त्रण की सीमाओं का उल्लेख निगमों के सम्बन्धित अधिनियमों तथा सरकारी कम्पनियों के पार्षद अंतर्नियमों में किया जा सकता है।

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