सूफी धर्म- उद्भव, प्रभाव एवं प्रमुख सिद्धांत

सूफी धर्म- उद्भव एवं प्रमुख सिद्धांत

सूफी धर्म

“सूफीवाद इस्लामी धार्मिक जीवन की वह अवस्था है जिसमें बाहरी गतिविधियों की अपेक्षा आन्तरिक क्रियाओं पर विशेष बल दिया जाता है, वस्तुतः वह इस्लामी रहस्यवाद की ओर संकेत करता है।”

‘सूफी’ शब्द का अर्थ

‘सूफी’ शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में इतिहासकारों एवं विद्वानों में मतभेद है। डॉ० बुद्ध प्रकाश ने लिखा है, “सूफी’ शब्द सूफ से बना है, और ‘सूफ’ का अर्थ है ऊन। शामी जगत में ऊन का लबादा सरल जीवन और भागवत-प्रेम का प्रतीक माना जाता था, अतः उसे धारण करने वाले लोग सूफी कहलाते थे।” ए० एम० ए० शुस्तरी का मत है, “कुछ लोग सूफी शब्द की उत्पत्ति ‘सफवी’ से मानते हैं और कुछ ‘साफा’ से, जिसका अर्थ पवित्रता से है।” कुछ विद्वानों के अनुसार, “मुहम्मद साहब के सहयोगियों में से कुछ लोगों ने सांसारिक जीवन को त्यागकर ‘सूफ’ नामक गुफा में तपस्या करनी प्रारम्भ कर दी, और उन्हें सूफी कहा जाने लगा। एक अन्य मत यह भी है कि मदीना में ‘सुफ्फा चबूतरे’ पर बैठने वाले सन्तों को सूफी कहा जाता था। परन्तु उपर्युक्त मतों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सूफी सन्त की सर्वमान्य विशेषता यह है कि वह सदैव ईश्वर के ध्यान में डूबा रहे और स्वयं को सांसारिक गतिविधियों से अलग रखे। ‘सूफी’ धर्म में अत्यधिक समर्पण था, प्रेम में जोश था, कविता, नाच-गाना उनकी उपासना थी और ईश्वर में लिप्त होना उनका आदर्श था।”

सूफी मत का उद्गम

सूफी मत के उद्गम के सम्बन्ध में भी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। प्रो० हुमायूँ कबीर का मत है, “सूफी मत का आधार कुरान में था परन्तु भारतीय विचारधारा का इस पर गम्भीर प्रभाव पड़ा है।” परन्तु डॉ० यूसुफ हुसैन उसे विदेशी और भारतीय प्रभाव से मुक्त बताते हुए लिखते हैं, “सूफी धर्म का जन्म इस्लाम के वक्ष में हुआ था।”

दिल्ली में तुर्की शासन की स्थापना के बाद इस्लामी देशों के भिन्न-भिन्न भागों से सूफी फकीर यहाँ आये और हिन्दुस्तान के विभिन्न भागों में निवास करने लगे। इस्लामी देश में उनके मत का स्वरूप भले ही कुछ भी रहा हो परन्तु भारत में प्रवेश करने और यहाँ निवास के बाद निश्चय ही वह भारतीय परम्पराओं से प्रभावित हुए। इस सम्बन्ध में डॉ0 आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है, “एक इष्टदेव का विचार और आत्मा तथा परमात्मा के बीच प्रियतमा और प्रियतम जैसे सम्बन्ध होने की बात हिन्दू धर्म की अपनी विशेषता है, जिसे भारत के सूफियों ने अपना लिया था। साथ ही शान्ति एवं अहिंसा का सूफी फकीरों का सिद्धान्त भी हिन्दू धर्म की विशेषता है। सूफी धर्म में बिल्ला-ए-माकूस जैसी शारीरिक यातनाओं और उपवास का होना भी भारतीय प्रभाव की ओर संकेत करता है। डॉ० निजामी ने लिखा है कि “सूफी धर्म की चिश्तिया शाखा ने अनेक हिन्दू रीति-रिवाजों को अपना लिया था। शेख (खानकाह के प्रधान) को झुककर नमस्कार करना, आगत को जल देना, कमण्डल रखना, नवागन्तुक का मुण्डन, भक्त-मंडलियाँ और चिल्ला-ए-माकूस हिन्दू व बौद्धों से मिलती-जलती प्रथाएँ हैं।”

वहादत-उल-वुजूद का सिद्धान्त

इस्लामी रहस्यवाद को सूफी धर्म कहा जाता है। इस रहस्यवाद का जन्म ‘वहादत-उल-वुजूद’ अथवा आत्मा-परमात्मा की एकता से हुआ है। डॉ० श्रीवास्तव ने लिखा है, “इसमें ‘हक’ को परमात्मा और ‘खल्क’ को सृष्टि माना गया है। अर्थात् सृष्टि की विभिन्नता में ईश्वर की एकरूपता निहित है और सभी देखे जाने वाले नज्जारों के पीछे वही वास्तविकता है।”

सूफी ईश्वर के प्रेम में इस सीमा तक निमग्न हो जाते हैं कि उन्हें एक क्षण के लिए भी सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह नहीं होता है। ‘फतुहात-ए-मक्किया’ में इस प्रेम को व्यक्त करते हुए कहा गया है, “ईश्वर के सिवाय कुछ कहीं है। ईश्वर के सिवाय किसी का अस्तित्व नहीं है।” सूफी मतावलम्बी रविया अपने ईश्वर-प्रेम को व्यक्त करती हुई कहती है, “ईश्वर के प्रेम में मैं इस सीमा तक निमग्न हूँ कि किसी भी अन्य वस्तु के प्रति मेरा प्रेम अथवा घृणा प्रकट नहीं होती है।”

इस प्रकार हम देखते हैं कि सूफी धर्म का आधार प्रेम है और ईश्वर के पास पहुँचने के लिए वे प्रेम-मार्ग अथवा भक्ति-मार्ग का सहारा लेते हैं। साधारणतया उलेमा लोग सूफी मत के विरोधी थे और सूफियों के आचरण को इस्लाम के प्रतिकूल मानते थे। इन्होंने प्रसिद्ध सूफी फकीर निजामुद्दीन औलिया के आचरण को धर्म-विरुद्ध सिद्ध करने के अनेक प्रयास किये, परन्तु असफल रहे।

खानकाह पद्धति

मुस्लिम सूफी फकीरों ने अपने निवास के लिए हिन्दू पद्धति के अनुसार आश्रम बनवाये, जिन्हें खानकाह कहा जाता था। अन्तर केवल इतना था कि हिन्दू ऋषि-मुनियों के आश्रम शहर के कोलाहलपूर्ण वातावरण से दूर वनों में होते थे परन्तु सूफियों ने अपने खानकाह हरिजन बस्तियों के समीप बनाये थे। सूफी सन्त अपने परिवार सहित इन खानकाहों में निवास करते थे। सामान्यतः इनका जीवनयापन भिक्षा में प्राप्त सामग्री से होता था। कुछ फकीर खेती भी करते थे परन्तु सुहरावर्दी सम्प्रदाय के सूफी फकीर राजभेंट स्वीकार करते थे इसलिए उनका जीवन अत्यन्त वैभवपूर्ण ढंग से व्यतीत होता था। चूंकि सूफीवाद का उद्देश्य आन्तरिक शुद्धता एवं ईश्वर से मिलन है, अतः इसे प्राप्त करने के लिए उसे निम्नलिखित दस अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ता है:

  1. तोबा अर्थात् पश्चाताप।
  2. वाश अर्थात् विरक्ति।
  3. जुहद अर्थात् पवित्रता।
  4. फक्र अर्थात् निर्धनता।
  5. सब्र अर्थात् धैर्य।
  6. शुक्र अर्थात् कृतज्ञता।
  7. खौफ अर्थात् भय।
  8. रजा अर्थात् आशा।
  9. तवक्कुल अर्थात् सन्तोष।
  10. रिजा अर्थात् ईश्वर-इच्छा के प्रति समर्पण।

डॉ० श्रीवास्तव ने लिखा है कि “आध्यात्मिक विकास की इन विभिन्न अवस्थाओं से गुजरने में सूफी ईश्वर के प्रति अधिकाधिक प्रेम और उसमें लीन हो जाने की आतुरता को अत्यधिक अनुभव करते हैं। जिस प्रकार प्रेमी अपनी प्रियतमा से मिलने के लिए सदैव आतुर रहता है उसी प्रकार सूफी भी ईश्वर के अधिकाधिक सामीप्य के लिए बेचैन रहता है।’

सूफी धर्म के सिद्धान्त

सूफी धर्म के निम्नलिखित प्रमुख सिद्धान्त हैं :

  1. ईश्वर की वास्तविकता तथा ईश्वर एवं प्राणी मात्र की एकता में विश्वास करना।
  2. ध्यान, भजन, नृत्य, गीत और प्रेम के द्वारा ईश्वर से साक्षगत्कार करके मोक्ष प्राप्त करना।
  3. सांसारिक प्रलोभन से दूर रहकर हृदय की शुद्धता को बनाये रखना।
  4. गुरु को विशेष महत्व प्रदान करना।
  5. प्रार्थना, उपवास एवं दान करना।
  6. शारीरिक यातनाओं के द्वारा आत्मा की शुद्धि करना।
  7. क्रोध, गर्व, ईर्ष्या आदि दुर्गुणों को दूरकरना।

सूफी सन्तों का उद्देश्य

सूफी फकीरों के सम्मुख दो मुख्य उद्देश्य थे—

  1. अपना आध्यात्मिक विकास, और
  2. इस्लाम एवं मानवता की सेवा।

सूफियों ने इस्लाम के प्रचार के लिए निम्न जाति के हिन्दुओं के निवास-स्थलों के पास अपनी खानकाहें बनवायीं। उन्होंने हिन्दी भाषा एवं हिन्दू रीति-रिवाज व रहन-सहन का ज्ञान प्राप्त किया ताकि वह निम्न जाति के हिन्दुओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकें। प्रेमपूर्ण व्यवहार एवं स्वर्ग के काल्पनिक चित्रों के द्वारा हिन्दुओं को इस्लाम की ओर उन्मुख किया जाता था। हिन्दुओं को अपनी ओर आकर्षित करने में ये जिस भाषा का प्रयोग करते थे वही भविष्य में उर्दू के रूप में विकसित हुई।

भारतीय समाज पर सूफी धर्म का प्रभाव

भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना के पश्चात् विभिन्न सूफी सन्तों ने भारत में प्रवेश किया। उन्हें राज्य की ओर से अनेक सुविधाएँ और संरक्षण प्रदान किया गया। सूफी सन्तों के प्रभाव, राजनीतिक दबाव एवं करों से बचने के लिए अनेक निर्धन लोगों ने इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया। सूफी सन्तों ने हिन्दू धर्म में व्याप्त कर्मकाण्ड का विरोध किया और निम्न वर्ग के लोगों को भी मोक्ष के लिए प्रेरित किया। हिन्दू निम्न वर्ग के प्रति इन्होंने प्रेम व दयालुता का जो दृष्टिकोण अपनाया उससे उनके सम्मान में वृद्धि हुई और अनेक हिन्दू सूपी सन्तों के अनुयायी बन गये। बाबा फरीद, मुईनुद्दीन चिश्ती आदि सूफी सन्त हिन्दू एवं मुसलमान दोनों की श्रद्धा के पात्र थे और लोग आज भी बिना जातीय भेदभाव के उनकी मजार पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए जाते हैं। सूफी सन्तों के उदार दृष्टिकोण के कारण जहाँ समाज में व्याप्त छुआछूत की भावना में कमी आयी, वहीं समानता के व्यवहार के कारण दो विरोधी धर्मों एवं संस्कृतियों में भ्रातृत्व-भाव में भी अभिवृद्धि हुई।

सुहरावर्दी और नक्शबन्दी शाखा ने सूफी धर्म से भारतीय प्रभाव को समाप्त करना चाहा परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। चिश्ती शाखा, जो हिन्दू वेदान्त का दूसरा रूप था, भारत में अपने महत्व को बनाये रखने में सफल रही और अधिकांश सूफी इसी से प्राभवित थे। चिश्ती सूफियों ने भारत में अपने महत्व को बनाये रखने के लिए बोलचाल में हिन्दी भाषा का सहारा लिया और अनेक हिन्दू परम्पराओं को अपनाकर अपने सम्प्रदाय को लोकप्रियता प्रदान कराने में सफल रहे। सूफियों ने ईश्वर के प्रति पूर्ण निष्ठा एवं भक्ति पर बल देकर भारतीय समाज में भक्ति परम्परा पर बल दिया। सर यदुनाथ सरकार का मत नितान्त युक्तिसंगत है कि “भक्ति- आन्दोलन और सूफी सन्तों ने विजेता एवं विजित दोनों को समीप ला दिया था।’ डॉ० युराफ हुसैन ने भी लिखा है, “मूल रूप से इन सूफियों के कारण ही, दिल्ली सल्तनत के अधःपतन के उपरान्त, मुस्लिम समाज आध्यात्मिक एवं नैतिक रूप से संगठित हो गया और देश के विभिन्न भागों में अनेक राजवंशों की आधारशिला रखी गयी। शासक तथा शासित वर्ग के बीच की खाई को एक तरफ तो इन सूफी सन्तों ने और दूसरी और हिन्दू भक्तों ने किसी हद तक पाट दिया।’

इस प्रकार हम देखते हैं कि सूफी धर्म के प्रवर्तकों ने अपनी उदारता के कारण तत्कालीन समाज पर व्यापक प्रभाव डाला और इस्लाम धर्म में व्याप्त कट्टरता को कम करने और दी विरोधी धर्मों में समन्वय एवं सामंजस्य स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की।

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