1991 से अब तक भारत-अमेरिका संबंध

1991 से अब तक भारत-अमेरिका संबंध

1991 से अब तक भारत-अमेरिका संबंध

1947 से 1990 तक उतार-चढ़ाव से गुजरने के बाद अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के उत्तर-शीत युद्ध तथा उत्तर-सोवियत संघ युग में भारत-अमरीका सम्बन्धों में कुछ सुखद परिवर्तन आया। बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में गहरे तथा बड़े-बड़े परिवर्तनों के प्रभावाधीन, भारत तथा अमरीका दोनों ने ही एक-दूसरे के महत्त्व तथा उपयोगिता को समझना शुरू कर दिया। इसकी विवेचना निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत की जा सकती है।

  1. 1990 के दशक के परिवर्तन तथा अमरीका के अवबोधन-

    1990 के आस-पास भारत के आन्तरिक वातावरण तथा इसके साथ-साथ बाहरी वातावरण के प्रभाव में अधीन भारत की नीति में परिवर्तन तथा आर्थिक उदारवाद अपनाए जाने के कारण अमरीका प्रसन्न हो गया तथा इसने भारत की आवश्यकताओं की ओर अधिक ध्यान देने का निर्णय किया। भारत के समाजवादी अर्थव्यवस्था को मंडीकृत अर्थव्यवस्था में बदलने के प्रयत्नों, भारत द्वारा इजराईल के साथ सम्बन्ध बढ़ाने का निर्णय, सियोनवाद (Zionism) तथा आतंकवाद को बराबर मानने के विरुद्ध मतदान तथा इसके साथ खाड़ी में सामूहिक युद्ध के अमरीका के निर्णय के पक्ष में तथा फिर दोषी इराक (Iraq) के विरुद्ध सामाजिक, आर्थिक व्यापार दण्ड विधान थोपने के पक्ष में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का मतदान, तथा हिन्द महासागर में भारत-अमरीका के सांझे नौ-सैनिक अभ्यास के पक्ष में भारत के निर्णयों ने लोकतान्त्रिक भारत को अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय का अधिक स्थायी तथा सुचारु सदस्य बनाने तथा इसका समर्थन करने के लिए अमरीका के नीति निर्माताओं को विशिष्ट रूप से प्रभावित किया। एशिया की मुख्य शक्ति के रूप में, एक तेजी से विकासशील आर्थिक औद्योगिक शक्ति के रूप में, सम्भावित परमाणु शक्ति के रूप में, ‘नाम’ के महत्त्वपूर्ण सदस्य के रूप में, विकासशील राष्ट्रों में सबसे अधिक विकसित राष्ट्र के रूप में, तथा दो में से एक सबसे बड़ी उपभोक्ता मंडी वाले लोकतान्त्रिक देश जिसका अमरीकी उपभोग कर सकते थे, इन सब तत्त्वों ने उत्तर-शीत युद्ध काल में अमरीका की नीति में परिवर्तन लाने के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

इन सबके अतिरिक्त पाकिस्तान की ओर से परमाणु शक्ति के रूप में उभरने के खतरे, इस्लामिक कट्टरवादी देश के रूप में इसकी भूमिका तथा इसका एक ऐसे देश के रूप में सामने आना जिसने खाड़ी युद्ध में अपने सैनिक भेजकर परन्तु इसके साथ-साथ मुस्लिम देश होने के कारण इराक को समर्थन देकर दोहरी भूमिका निभाई, इन सब से अमरीका काफी असन्तुष्ट हो गया। फिर केन्द्रीय एशिया तथा पश्चिम एशिया में इस्लामी कट्टरवाद को सुदृढ़ होने के प्रति अमरीकी आशंकाएँ, साम्यवाद का लगभग अन्त तथा साम्यवाद के प्रतिभार या संतुलन के रूप में इस्लामी राज्यों की आवश्यकता न रहना, अमरीका की दृष्टि में भारत का साम्यवादी चीन का समकक्ष होना, फिलीपीन में अमरीकी अड्डों की समाप्ति, एशिया में राजनीतिक स्वरूप को प्रभावित करने की आवश्यकता, जापान आदि के साथ आर्थिक शीत युद्ध के उभरने की संभावना आदि सभी ने विश्व राजनीति, विशेषतया एशिया की राजनीति में भारत के महत्त्व तथा सम्भावित भूमिका ने अमरीकी लोगों को उचित रूप से अवगत करवा दिया। अमरीका ने यह अनुभव किया कि ”इस्लामी पश्चिम एशिया तथा ईसाई पश्चिम जिस में अमरीका भी शामिल है, के बीच भारत है, जिसका प्रभाव बड़ा सन्तुलित हो सकता है।” ऐसा अवबोधन भारत तथा अमरीका के बीच मिलन बिन्दु बन गया।

  1. 1990 के दशक के परिवर्तन तथा भारतीय अवबोधन-

    इसी तरह भारत के भूतपूर्व मित्र सोवियत संघ के विघटन, भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव, भारत की यह अनुभूति कि अमरीका भारत की आर्थिक सहायता का सबसे बड़ा साधन बन सकता है, उत्तर-सोवियत संघ युग में चीन तथा पाकिस्तान की तुलना में भारत की सुरक्षा आवश्यकता, यह अहसास कि एकध्रुवीय युग में दुनिया की एकमात्र सर्वोच्च शक्ति अमरीका के साथ अच्छे सम्बन्ध आवश्यक हैं, सोवियत संघ के उत्तराधिकारी के रूप में भारत की अर्थिक, सुरक्षात्मक तथा व्यापारिक आवश्यकताओं को पूरा करने में रूस की असमर्थता, विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के ऋणों तथा सहायता की (जो निश्चित रूप से अमरीका से प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित रहती है) भारत की आवश्यकता, संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में स्थायी स्थान प्राप्त करने की भारत की इच्छा, जिसकी पूर्ति अमरीका के सहयोग के बिना सम्भव नहीं थी, आदि सभी तत्त्वों ने भारत को भी बाध्य कर दिया कि वह भारत-अमरीका सम्बन्धों के विभिन्न क्षेत्रों आर्थिक, राजनीतिक तथा तकनीकी एवं सैनिक में अमरीका की मैत्री एवं सहयोग प्राप्त करने का प्रयत्न करे तथा अमरीका के साथ सम्बन्धों का विकास करे।

इस प्रकार भारत तथा अमरीका दोनों ने ही उत्तर-शीत युद्ध तथा उत्तर-सोवियत संघ युग में एक-दूसरे के महत्त्व को अधिक अच्छे रूप से पहचानना आरम्भ कर दिया। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करके अपने सम्बंधों को सुधारने का प्रयल करने का निर्णय किया। भारतीय तथा अमरीकी लोगों के बीच मनोवैज्ञानिक तथा भावनात्मक सम्बन्ध, जो कि अमरीकी स्वतन्त्रता की घोषणा तथा बाद में ब्रिटेन के साथ युद्ध के द्वारा 1789 में अमरीका के अस्तित्व में आने के बाद पनपे थे, इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए प्रेरणा स्रोत बने। मई 1992 तक विश्व के दो सबसे बड़े लोकतन्त्रों के बीच बढ़ते सुरक्षा सहयोग का युग शुरू करने के लिए भारत तथा अमरीका हिन्द महासागर के बीच साझे नौ-सैनिक अभ्यास करने की स्थिति में आ गए थे। भारत द्वारा आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाने ने भी यह आवश्यक बना दिया कि अमरीका जैसे राज्य के साथ आर्थिक सम्बन्धों को अधिक उच्चस्तरीय तथा व्यापक बनाया जाए।

1991-98 के बीच भारत-अमरीका सम्बन्धों का स्वरूप तथा प्रगति

(The Nature and Progress of Indo-U.S. Relations, 1991-98)

भारत तथा अमरीका के बीच सम्बन्धों में कुछ सकारात्मक परिवर्तन सोवियत संघ के विघटन की प्रक्रिया के साथ ही शुरू हो गए थे। भारत ने विकास के समाजवादी रास्ते की विश्वसनीयता की समाप्ति के साथ ही कोई स्वीकार्य विकल्प ढूँढ़ने की आवश्यकता महसूस की थी। 1991 में भारत के बजट में अवमूल्यन लाइसैंसों तथा नियन्त्रण की समाप्ति, निजीकरण, विदेशी निवेश के लिए उत्पादन क्षेत्र को कदम उठाए गए। ये सारे कदम अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) तथा विश्व बैंक के मार्गदर्शन के खोलना, बहु-राष्ट्रीय निगमों (MNCH) को भारत में निवेश के लिए निमन्त्रण देना आदि कई अन्तर्गत उठाए गए। 1992 के बजट में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई तथा व्यापार, औद्योगिक तथा वाणिज्य के क्षेत्रों में और अधिक उदारवाद का आरम्भ किया गया। वास्तव में, 1991-98 तक की अवधि के दौरान भारत ने उदारीकरण, निजीकरण तथा विश्वीकरण के सिद्धांतों के आधार पर अपनी अर्थव्यवस्था को संचालित किया तथा इस प्रगति ने अमरीका को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया। भारत द्वारा अपनाई गई नीतियों विशेषतया आयात नीति में उदारता, विनियन्त्रण तथा रुपये का आंशिक अवमूल्यन की अमरीका के प्रशासन तथा व्यापार के बाजार में बहुत प्रशंसा हुई। अमरीका को भारत अमरीकी वस्तुओं के निर्यात का बड़ा उपभोक्ता लगने लगा तथा अमरीकी विशेषज्ञों के भारत आने का मार्ग खुल गया। अमरीका से बहुत से अधिकारी नई दिल्ली आने लगे। सभी ने विभिन्न क्षेत्रों में भारत-अमरीका मैत्री का सहयोग की आवश्यकता की बात की। अमरीका की दृष्टि में परिवर्तन ने भारत-अमरीका सम्बन्धों के 4 नए सकारात्मक आयोग दिए थे। नई विश्व व्यवस्था के आविर्भाव से संयुक्त राज्य के प्रशासन ने पाकिस्तान तथा चीन की तुलना में भारत के महत्त्व को पहचानना शुरू कर दिया।

तथापि भारत-अमरीकी सहयोग के मार्ग में कई रुकावटें विद्यमान रहीं। परिवर्तित अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में भारत के साथ सम्बन्धों के नए महत्त्व को अच्छी तरह समझने के बावजूद अमरीका ने भारत के विरुद्ध सुपर 301 (Super 301) लागू करने, परमाणु अप्रसार (NPT) तथा CTBT सन्धि पर हस्ताक्षर करने के लिए भारत को प्रभावित करने तथा भारत के मिसाइल प्रयोग पर रोक लगाने के लिए मिसाइल तकनीक नियन्त्रण व्यवस्था को भारत पर लागू किए जाने का प्रयत्न किया। 27 अगस्त, 1992 के ट्रिब्यून में छपे पत्र ‘अमरीका के अवबोधन में भारत’ के लेखक जे० डी० सेठी (J. D. Sethi) के शब्दों में, “भारत की अपने आप को एक ऐसी स्थिति में, जो हर प्रकार से बदल चुकी है तथा जो भारत के पक्ष में भी नहीं है, में ढालने की हिम्मत की परीक्षा लेने के लिए, संयुक्त राज्य अमरीका पुचकारने और डांटने की नीति लागू कर रहा है।” “वाशिंगटन, भारत-अमरीका सम्बन्ध बढ़ाने के बदले में भारत से सर्वोच्च कीमत ऐंठने का प्रयत्न कर रहा है, उसका विश्वास है कि भारत कमजोर तथा संवेदनशील है।”

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मई 1994, में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री पी० वी० नरसिम्हा राव ने अमरीका की यात्रा की तथा भारत-अमरीका सम्बन्धों को एक नई गतिशीलता प्रदान करने का प्रयास किया। एक संयुक्त घोषणा में भारत तथा अमरीका ने लोकतन्त्र, मानव अधिकार तथा आर्थिक उदाहरवाद की उपयोगिता को स्वीकार किया तथा इन्हें विश्व शान्ति, स्थायित्व तथा खुशहाली के लिये आधारभूत सिद्धांत माना गया। दोनों देशों के नेताओं ने यह माना कि भारत और पाकिस्तान को सभी मुद्दों, कश्मीर सहित, पर द्विपक्षीय वार्ता करनी चाहिए, जैसा कि शिमला समझौते में निहित है। पहली बार राष्ट्रपति क्लिंटन ने ऐसा कहा। इस यात्रा के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के लिए पर हस्ताक्षर किये गये। इस यात्रा ने तथा इस के बाद अक्तूबर 1994 में अमरीकी घोषणा ने, कि वह भारत के विरुद्ध Super 301 का प्रयोग अभी नहीं करेगा, भारत-अमरीका सम्बन्धों को अच्छा बनाने का मार्ग बना दिया, परन्तु बाद के महीनों में भारत-अमरीकी सहयोग तथा सम्बन्धों की गति धीमी ही बनी रही। जब सितम्बर 1997 में प्रधानमन्त्री श्री गुजराल संयुक्त राष्ट्र महासभा को सम्बोधित करने गये तो इस अवसर का लाभ उठाकर उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति श्री क्लिंटन से एक उच्चस्तरीय बैठक 22 सितम्बर को की। दोनों नेताओं ने आपसी सम्बन्धों पर तथा विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर वार्तालाप किया तथा दोनों में आर्थिक एवं व्यापारिक सम्बन्धों में तीव्र बढ़ोत्तरी करने के उद्देश्य का पूर्ण समर्थन किया। इस अवसर पर भारत तथा अमरीका के उच्चस्तरीय अधिकारियों तथा मन्त्रियों की भी बातचीत हुई। अमरीका ने यह आश्वासन दिया कि वह कश्मीर के सम्बन्ध में मध्यस्थता नहीं करना चाहता तथा इस मुद्दे के हल के लिये भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय वार्ता का समर्थन करता है। अमरीका ने भारत तथा उसके पड़ोसियों के साथ विकसित हो रहे आर्थिक सम्बन्धों एवं सहयोग की प्रशंसा की। भारत ने अमरीका के साथ अपने आर्थिक तथा व्यापारिक सम्बन्धों में नई सक्रियता लाने के उद्देश्य का पूर्ण समर्थन किया। CTBT के मुद्दे पर भी बातचीत हुई तथा भारत ने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट शब्दों में अमरीका को बतलाया। दोनों नेताओं ने परमाणु निःशस्त्रीकरण के लिये एक साझा कार्यक्रम बनाने की सम्भावना पर विचार करने का निर्णय लिया। इस भारत-अमरीका वार्तालाप ने निश्चय ही दोनों देशों के सम्बन्धों को एक अच्छी दिशा देने का प्रयास किया। ऐसा स्पष्ट दिखाई दिया कि दोनों देश राजनीतिक मुद्दों को एक तरफ रखकर आपसी आर्थिक एवं व्यापारिक सम्बन्धों को तेजी से बढ़ाने के लिये आगे आ रहे थे। राष्ट्रपति क्लिंटन द्वारा भारत आने का निमन्त्रण स्वीकार कर लिया जाना इस आशा का प्रतीक बना। ऐसा समझा गया कि अब भारत और अमरीका अपने आर्थिक सम्बन्धों को अच्छी गति देने का प्रयास कर रहे थे।

लेकिन भारत के राजनीतिक वातावरण में नवम्बर-दिसम्बर 1997 में हुए परिवर्तन न श्री क्लिंटन की भारत यात्रा को स्थगित करने का कार्य किया और भारत-अमरीकी सम्बन्धों में होने वाले सुधारों की आशा को आगे आने वाले समय पर निर्भर बना दिया। मार्च 1998 में भारत में प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की बी० जे० पी० – गठबंधन सरकार ने सत्ता सम्भाली तथा अमरीका के साथ सम्बन्धों को तेजी से विकसित करने की नीति पर चलने की घोषणा की। अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन सितम्बर-अक्तूबर 1998 में भारत की यात्रा पर आने वाले थे तथा ऐसी आशा की जाती थी कि सामाजिक-आर्थिक-व्यापारिक-औद्योगिक क्षेत्र में भारत-अमरीका सम्बन्धों को अधिक विकसित करने का प्रयास किया जायेगा। परन्तु भारत द्वारा 11-13 मई को परमाणु विस्फोट किए जाने पर पारस्परिक सम्बन्ध फिर प्रश्न चिन्ह के दायरे में आ गए। अमरीका ने भारतीय परमाणु विस्फोटों तथा नई परमाणु नीति का कड़ा विरोध किया तथा प्रतिक्रिया स्वरूप भारत पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिये, भारत को दी जाने वाली वित्तीय सहायता को आगे के लिए स्थगित किया तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् से एक प्रस्ताव पास करवा कर भारत को अपने परमाणु अस्त्र निर्माता की नीति को वापस लेने अर्थात् डिब्बा बन्द करने को कहा गया। भारत ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया, CTBT पर हस्ताक्षर न करने की नीति को अपनाए रखा, अपने आप को परमाणु शस्त्र धारक देश घोषित कर दिया, आगे परमाणु परीक्षण न करने की नीति की घोषणा कर दी, परन्तु साथ ही एक न्यूनतम परमाणु शस्त्र निवारण शक्ति रखने का निर्णय भी लिया। नई भारतीय परमाणु नीति ने भारत-अमरीकी सम्बन्धों के लिए बाधाएँ पैदा कर दीं। परन्तु इन को दूर करने के लिये दोनों ने उच्चस्तरीय कूटनीति का वार्तालाप का सहारा लिया तथा वार्तालाप के कई दौर भारतीय विदेश मन्त्री श्री जसवंत सिंह अमरीकी उप विदेश सचिव श्री स्ट्रोव टालवोट में हुए। इन वार्तालाप के दौरों ने दोनों देशों के सम्बन्धों को वातावरण को सकारात्मक दिशा तथा सेहत देने का कार्य किया। भारत की ओर अमरीकी रुख सकारात्मक हुआ तथा उत्तर-पोखरां काल के प्रतिबन्धों को ढीला किया गया। भारत-अमरीका सम्बन्धों में सुधार के चिन्ह फिर से दिखाई देने लगे तथा आगे जा कर ऐसा हुआ भी, जब 21वीं शताब्दी के आरम्भ में अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा का प्रोग्राम बना तथा उन्होंने मार्च 2000 में भारत की सरकारी यात्रा की। इस यात्रा ने देशों के दोनों सम्बन्धों को एक सुखद दिशा तथा गति प्रदान की। इस यात्रा के लगभग छः महीने के बाद सितम्बर 2000 में प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी ने अमरीका की यात्रा की तथा दोनों देशों में विकसित हो रहे सहयोग तथा समझ को और दृढ़ता प्रदान की।

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