भारत-पाक का अनाक्रमण संधि

भारत-पाक का अनाक्रमण संधि

20वीं शताब्दी के नौवें दशक में भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों के इतिहास तथा स्वरूप का विश्लेषण अनाक्रमण समझौते/शांति, मित्रता तथा सहयोग की सन्धि पर दोनों देशों की अन्तक्रियाओं के विश्लेषण द्वारा किया जा सकता है।

अनाक्रमण सन्धि का मुद्दा

अथवा,

शांति, मित्रता तथा सहयोग की सन्धि का मुद्दा

भारत तथा पाकिस्तान में अनाक्रमण समझौते के मुद्दे पर सभी प्रकार का वाद-विवाद सर्वप्रथम दो प्रश्नों के उत्तर की प्रकृति से शुरू होना चाहिए-

  1. भारत तथा पाकिस्तान में युद्ध की सम्भावना कितनी प्रबल थी, जिससे अनाक्रमण समझौते की आवश्यकता अनुभव हुई।
  2. भारत द्वारा प्रस्तुत उन अनाक्रमण समझौते के प्रस्तावों का क्या बना जो भारत ने पाकिस्तान के 1980 के प्रस्ताव के पूर्व पाकिस्तान को पेश किये थे?

प्रथम प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें कुछ तत्त्वों, समस्याओं तथा झगड़ों के बारे में विचार करना होगा जो भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों के बीच कटुता पैदा करते आ रहे थे। इन्हीं तत्त्वों के कारण दोनों देशों के बीच एक और युद्ध की सम्भावना विद्यमान थी।

  1. विरासत

    अप्राकृतिक विभाजन तथा तीन युद्ध (1948, 1965 तथा 1971) भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों की पृष्ठभूमि बन रहे हैं। पाकिस्तान के बहुत से लोग यह सोचते थे कि भारत, पाकिस्तान को खोकर अपने आप से समझौता नहीं कर पाया था तथा इसलिए यह एक सुदृढ़ तथा अखंड पाकिस्तान की स्थापना को रोकने में अधिक रुचि रखता था। पाकिस्तान में बहुत से लोग 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने के लिए युद्ध की बात करते रहे थे। बहुत से ऐसे भी थे जो कश्मीर के सैनिक समाधान के पक्ष में हैं तथा इसकी सम्भावना को स्वीकार करते थे। भारत में भी बहुत से लोग यह विश्वास करते थे कि भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों का इतिहास तनावों से ग्रस्त होना स्वाभाविक था जिससे युद्ध हो सकता था। यह विश्वास पुराने अनुभवों पर आधारित था।

  2. पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही का अस्तित्व

    जब से पाकिस्तान बना तब से लेकर यह अधिकार समय तक सैनिक तानाशाही के अधीन तथा कभी-कभी असैनिक शासन के अन्तर्गत रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तान पर शासन करने वाली सरकार का स्वरूप पाकिस्तान का अपना आन्तरिक मामला था तथापि भारत पूर्णतया असम्बन्धित भी नहीं रह सकता था क्योंकि पहले से ही पाकिस्तान का सैनिकवाद भारत के लिए तनाव तथा दबाव का विवाद बना रहा था। पाकिस्तान के सैनिक शासकों ने सदैव लोगों को पाकिस्तान पर भारतीय आक्रमण का डर दिखा कर अपनी वैधता को सुदृढ़ करने का प्रयत्न किया था। इस प्रकार वे पाकिस्तान में सैनिक शक्ति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता का औचित्य सिद्ध कर सके। 1965 ई० तथा 1971 ई० के युद्धों के समय फील्ड मार्शल अयूब खान तथा जनरल याहिया खाँ क्रमशः पाकिस्तान में सत्ता में थे। पाकिस्तान में जनरल जिला का सैनिक शासन भी भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों को बढ़ावा देने का कोई अच्छा कारक सिद्ध नहीं हुआ। वर्तमान सरकार भी पाकिस्तान की सेना के प्रभाव में थी तथा भारत के प्रति इसका रुख आक्रामक ही था। पाकिस्तान की एक बड़ी सैनिक शक्ति बनाने की दौड़ को भारत के बहुत से लोग सदैव आशंका की दृष्टि से देखते थे।

  3. कश्मीर पर मतभेद

    कश्मीर पर लगातार मतभेद भी एक नकारात्मक तत्त्व रहा है जिसके कारण बहुत से लोग भारत तथा पाकिस्तान के बीच एक और युद्ध की बात करते रहते हैं। पाकिस्तान के सभी नेता ”कश्मीर को मुक्त करवाने के लिए भारत के साथ युद्ध की बात करते रहते हैं।

  4. पाकिस्तान को अमरीका की ओर से अत्याधुनिक शस्त्रों की आपूर्ति पर मंतभेद

    अफगानिस्तान समस्या के परिणामस्वरूप पाकिस्तान को यह विश्वास था कि इसकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया था तथा इस पर दबाव बना हुआ था, तथा इसीलिए पाकिस्तान की रक्षा शक्ति को बड़े पैमाने पर सुदृढ़ करने की आवश्यकता थी। अमरीका ने इस दृष्टिकोण को मान्यता प्रदान की तथा पाकिस्तान को एक सीमान्त देश माना जिसे सैनिक रूप से सोवियत संघ द्वारा फारस की खाड़ी के गर्म पानी तक बड़ने से रोकने के लिये सुदृढ़ होना चाहिए। परिणामस्वरूप अमरीका ने पाकिस्तान को अत्याधुनिक शस्त्र, लड़ाकू हवाई जहाज, मिसाइलों तथा राडार कम कीमतों पर देने शुरू कर दिए। भारत के लिए यह खतरा बनने की बात बनी। पुराने अनुभव यह स्पष्ट संकेत देते थे कि पाकिस्तान भारत की सैनिक शक्ति को समाप्त करने के लिये शस्त्र प्राप्त करने से कभी भी हिचकिचाया नहीं बल्कि ऐसा करने की कोशिश उसने सदैव की थी। इसने सदैव शस्त्र प्राप्त कर भारत की सैन्य शक्ति पर वर्चस्व प्राप्त करने की कोशिश की थी। शस्त्रों की अत्याधुनिक प्राप्ति ने सदैव पाकिस्तान को भारत के सात झगड़ों तथा अन्य मामलों को युद्ध द्वारा सुलझाने के लिए प्रेरित किया था। पाकिस्तान में अमरीका द्वारा अत्याधुनिक तथा तकनीकी रूप से उन्नत शस्त्रों को तेजी से भेजे जाने को भारत तथा एक बड़ा गम्भीर मामला माना गया जो दक्षिण का शक्ति संतुलन बिगाड़ सकता था तथा जो एक नया युद्ध आरम्भ कर सकता था।

  5. एक दूसरे की परमाणु नीति का भय

    जब मई 1974 में भारत ने अपना पहला शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट (PNE) किया था तब से ही पाकिस्तान परमाणु भारत की तरफ से अपने सुरक्षा खतरे की रट लगाये हुए था। यह बार-बार इन विचार को मानने से इन्कार कर रहा था कि भारत की परमाणु नीति शांतिपूर्ण नीति थी, जोकि भारत के औद्योगिक तथा आर्थिक विकास के लिए परमाणु तकनीक के लाभों के प्रयोग सहायतार्थ ही बनाई गई थी। इसके विपरीत, जैसा कि मि० भुट्टो ने नामकरण किया था पाकिस्तान इस्लामी बम का विकास करने के लिए 1974 से लगा हुआ था।

  6. बीजिंगपिंडीवाशिंगटन धुरी तथा भारतसोवियत संघ में बढ़ती मित्रता तथा सहयोग

    1962 से पाकिस्तान चीन के साथ धुरी जैसे सम्बन्ध जोड़ने में लगा हुआ था। यह अपने लिए चीनी समर्थन, सहायता तथा सहयोग प्राप्त करने के लिए भारत तथा चीन के आपसी मतभेदों को अनावश्यक लाभ उठाने के लिए प्रयुक्त करता रहा था। पाकिस्तान को चीनी हथियारों की आपूर्ति के रूप में दोनों देशों में महत्त्वपूर्ण सैनिक सम्बन्ध थे। पाकिस्तान ने चीन के साथ उसका मनपसन्द सीमा समझौता करके तथा काराकोरम (Karakoram) मुख्य मार्ग तथा खजुर्बे दर्रे (Khunjerab Pass) को खोल कर, कश्मीर पर तथा दक्षिण एशिया की सुरक्षा के सम्बन्ध में पाकिस्तानी विचारों के लिए चीनी समर्थन को प्राप्त कर लिया था। चीन तथा अमरीका के बीच सातवें दशक के शुरू में पाकिस्तान ने एक दलाल की भूमिका निभाई तथा तब से ही यह उनके बीच सम्पर्क-सूत्र बना रहा था। बढ़ती हुई सोवियत शक्ति तथा एशिया में उसीक उपस्थिति के खतरों के सम्बन्ध में चीन-अमरीका के विचारों में समानता ने विशेषतया अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के बढ़ने से, बीजिंग-पिंडी-वाशिंगटन धुरी के उदय में सहायता की थी। क्योंकि सोवियत संघ भारत से मैत्री तथा सहयोग कर रहा था, इसलिए बीजिंग-पिंडी-वाशिंगटन धुरी सदैव भारत तथा सोवियत संघ की आलोचना करती थी। पाकिस्तान तथा चीन इस बात की कल्पना करते थे कि भारत तथा सोवियत संघ के बीच बढ़ती मैत्री पिंडी-विरोधी तथा बीजिंग-विरोधी (Anti-Pindi and Anti-Beijing) थी इसीलिए इनके विरुद्ध दोनों को अपनी शक्तियों को एकीकरण कर लेना चाहिए। पाकिस्तान को यह विश्वास था कि ईरान-इराक युद्ध तथा अफगानिस्तान में सोवियत संघ की उपस्थिति के कारण, पश्चिम एशिया में शान्ति की अस्थिरता के सम्बन्ध में अमरीका के डाइगो-गार्शिया अड्डे को सुदृढ़ करने तथा खाड़ी क्षेत्र में RDF तैनात करने, तथा दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को सुदृढ़ करने का निर्णय एशिया में शान्ति तथा स्थिरता के लिए उचित कदम था। पाकिस्तान का यह विचार भारत के विचारों से पूर्णतया विपरीत था कि अमरीका की एशिया में सुरक्षा नीति, एशिया में विशेषतया हिन्द महासागर में उच्च शक्तियों की शत्रुता को बढ़ाने वाली थी। भारत अपने पड़ोस में बढ़ती हुई बीजिंग-पिंडी-वाशिंगटन धुरी के पूर्णतया विरुद्ध था। इसका विश्वास था कि अमरीका द्वारा सोवियत संघ के विरुद्ध पाकिस्तान को एक सीमान्त राज्य होने के नाते शस्त्रों की आपूर्ति करने से दक्षिण एशिया में शक्ति सन्तुलन तथा शान्ति में अस्थिरता पैदा हो जाने का खतरा था । तथापि पाकिस्तान अमरीकी शस्त्रों को प्राप्त कर लेने के सम्बन्ध में भारत के विरोध को अमैत्रीपूर्ण कार्यवाही कहता था। यह मुख्यतः भारत को विभाजित करने के लिए तथा इस प्रक्रिया में F-16 लड़ाकू विमानों तथा दूसरे आधुनिक शस्त्रों को हासिल करने के औचित्य को सिद्ध करने के लिए ही पाकिस्तान ने यह इच्छा व्यक्त की थी कि वह भारत के साथ एक ‘अनाक्रमण समझौता’ करने के लिए तैयार था।

अनाक्रमण समझौते

भारत-पाकिस्तान के सम्बन्धों में वास्तविक परिवर्तन 1 नवम्बर, 1982 को उस समय आया जब प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी तथा जनरल जिया ने छोटे से शिखर सम्मेलन स्तर पर बातचीत की तथा गौर-राजनीति तथा असैनिक सम्बन्धों के विकास की देखभाल के लिए भारत तथा पाकिस्तान का एक संयुक्त पैनल बनाना स्वीकार किया। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दिसम्बर 1982 में अनाक्रमण समझौते तथा शांति/सहयोग की सन्धि के प्रस्तावों पर सचिव स्तरीय बातचीत पुनः आरम्भ की जाए। दिसम्बर 1982 में दोनों देशों के विदेश सचिवों की दिल्ली में बैठक हुई जिसमें भारत-पाक संयुक्त आयोग के संगठन तथा कार्यों के लिए एक प्रारूप प्रस्तुत किया गया। उन्होंने भारत तथा पाकिस्तान द्वारा प्रस्तुत किए समझौते तथा शान्ति, मैत्री तथा सहयोग की सन्धियों के प्रारूपों का आदान-प्रदान किया। जनवरी 1983 में मि० नटवर सिंह (Mr. Natwar Singh) ने इस्लामाबाद का दौरा किया तथा दोनों देशों के बीच आपसी समझबूझ का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास किया। इस दौरे का उद्देश्य गुटनिरपेक्षता की व्याख्या तथा अन्य राजनीतिक तथा सुरक्षा सम्बन्धी मामलों पर दोनों देशों के बीच उठे मतभेदों को कम करना था। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में पाकिस्तान के शामिल हो जाने से इस बात की सम्भावना बढ़ गई थी की पाकिस्तान भारत-पाक समस्याओं को उठाने के लिए गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के मंच का प्रयोग करेगा। भारत इसको रोकना चाहता था तथा इसी कारण भी भारत द्वारा प्रस्तुत शांति तथा सहयोग संधि के मसविदे में भारत तथा पाकिस्तान के बीच झगड़ों के निपटारे के लिए साधन के रूप में द्विपक्षवाद के प्रयोग की निश्चित धाराएँ रखी गई थीं। इसके अतिरिक्त भारत की यह इच्छा थी कि पाकिस्तान विदेशों के सैनिक अड्डे अपनी भूमि पर न रहने दे तथा यह उत्तरदायित्व अपने कंधों पर ले ले। दोनों देशों के बीच शांति कि इच्छा को सत्य आकार प्रदान करने के लिए यह आवश्यक समझा गया। परन्तु पाकिस्तान ने यह विचार व्यक्त किया कि इस प्रकार के उपक्रम से इसे अपनी प्रभुसत्ता के अधिकारों को त्यागना पड़ेगा। भारत विश्वास करता था कि पाकिस्तान द्वारा गुटनिरपेक्षता को स्वीकार कर लेने से उसका यह कर्त्तव्य बन जाता है कि वह अपनी भूमि पर विदेशी अड्डों को बनने से रोके तथा इस प्रकार के भारतीय प्रस्तावों का अर्थ था देश में विदेशी अड्डों की स्थापना को रोकने के कर्त्तव्य की द्विपक्षीय पुष्टि करना। इसलिए भारत पाकिस्तान के साथ गुटनिरपेक्षता की स्वीकृति का उद्देश्य तथा गुटनिरपेक्षता के सम्बन्ध में अवधारणा के बारे में मतभेदों को समाप्त करने की इच्छा रखता था। इसके अतिरिक्त भारत को यह भी आशा थी कि वह इससे एशिया में महाशक्तियों की सामरिक समझ दूर रहने की आवश्यकता पर बल दे सकेगा।

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मार्च 1983 को जब गुट-निरपेक्षता के सातवें शिखर सम्मेलन में भारत लेने के लिए दिल्ली आए जनरल जिया की यात्रा के दौरान दोनों देशों के विदेश सचिवों ने उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किये तथा उनका आदान-प्रदान किया जिसके अनुसार भारत तथा पाकिस्तान के संयुक्त आयोग की स्थापना प्रस्तावित की गई थी। इस पर भी सहमति हुई कि इस संयुक्त आयोग की पहली बैठक जून 1983 में इस्लामाबाद में होगी।

भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों को और मजबूत करने तथा एक दूसरे के साथ और अधिक गहरे सहयोगात्मक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक सम्बन्धों का सुखद आरम्भ 1 जून, 1983 को हुआ जब भारत तथा पाकिस्तान के संयुक्त आयोग की पहली बैठक इस्लामाबाद में हुई। इस बैठक में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने न केवल संयुक्त आयोग की स्थापना की पुष्टि के दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया बल्कि कुछ एक अत्यधिक महत्त्व के मामलों में महत्त्वपूर्ण प्रगति भी की। डॉक्टर सतीश कुमार ने लिखा, “इस प्रकार भारत-पाक सम्बन्धों को नवीन अनिश्चितता तथा पारस्परिक सन्देह से निकाल लिया जिसमें कि ये कुछ समय से फंस गए थे।”

इस आयोग में चार उपायोगों की स्थापना की गई

  1. उद्योग, कृषि, संचार, स्वास्थ्य विज्ञान तथा तकनीक से सम्बन्धित आर्थिक मामलों पर,
  2. व्यापार पर,
  3. शिक्षा, सूचना, संस्कृति, खेलें तथा सामाजिक विज्ञान पर, तथा
  4. भ्रमण, पर्यटन तथा सलाहकार मामलों पर।

इन उप-आयोगों द्वारा दी गई बातचीत के परिणामस्वरूप संयुक्त आयोग डाक दरों में 15 से 20 प्रतिशत कटौती करने तथा वर्तमान डाक तथा तार सुविधाओं में सुधार तथा वृद्धि करने को मान गया। दोनों देशों तथा तीसरे विश्व के दूसरे देशों के बीच सहकारी परियोजनाएं स्थापित करने के लिए उनके बीच सहयोग के अवसरों को ढूँढ़ने के लिए उद्योगपतियों तथा व्यापारियों को आने-जाने के लिए प्रोत्साहित करने की भी सहमति हुई। इस बात पर भी सहमति हुई कि लघु उद्योगों तथा कुटीर उद्योगों के विकास के लिए सूचना का आदान-प्रदान किया जाए तथा विज्ञान तथा तकनीक के क्षेत्र में सहयोग प्राप्त करने के लिए एक दूसरे के देश में यात्राओं का आदान-प्रदान हो। दोनों देशों के बीच यात्रा की सुविधाएं प्रदान करने के बारे में भी सहमति हुई। दोनों देशों द्वारा असैनिक बंदियों को आदान-प्रदान के उपायों में तीव्रता लाने के लिए दोनों पक्ष सहमत हुये। कृषि तथा जलयानों के क्षेत्र में सहयोग की स्थापना पर भी सहमति हुई तथा साथ-साथ सूचना, शिक्षा, सामाजिक विज्ञानों, संस्कृति तथा खेलों में भी सहयोग दिए जाने के बारे में सहमति हुई।

शिमला समझौते के बाद संयुक्त आयोग स्थापित करने का निर्णय भारत-पाकिस्तान में उच्चस्तरीय मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगात्मक सम्बन्धों का विकास करने के उद्देश्य की ओर दोनों देशों में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना गया।

भारत तथा पाकिस्तान के बीच आर्थिक, व्यापारिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्धों के संस्थानीकरण की सफलता में दोनों देशों के सम्बन्धों का एक महत्त्वपूर्ण भेदन था तथा इससे इस आशा को बल मिला कि पारस्परिक समायोजन से तथा सद्भाव से दोनों देश अनाक्रमण समझौते तथा शांति तथा मित्रता की संधि पर पैदा हुए मतभेदों को दूर करने की स्थिति में आ जाएंगे। एक सम्पूर्ण समझौते, अनाक्रमण समझौते के साथ-साथ, मित्रता, शांति तथा सहयोग की एक व्यापक संधि, करने की ओर कदम उठाना इन समस्याओं में गतिरोध दूर करने का हल लगने लगा।

तथापि अगस्त 1988 में राष्ट्रपति जिया की वायुयान दुर्घटना में मृत्यु तथा पाकिस्तान की नई प्रधानमन्त्री के रूप में श्रीमती बेनजीर भुट्टो ने अनाक्रमण समझौते बनाम शांति संधि पर होने वाली वार्ताओं को समाप्त कर दिया। श्रीमती भुट्टो ने विशेषरूप से यह कहा कि शिमला समझौते में, भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों को सामान्य करने तथा सहयोग बढ़ाने के लिए एक अच्छा आधार विद्यमान है। परन्तु वह अधिक देर तक सत्ता में न रह सकीं। उनकी सरकार को पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने भंग कर दिया तथा पाकिस्तान के आम चुनावों में बेनजीर की PPP को हार का मुख देखना पड़ा तथा उनके स्थान पर श्री नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री निर्वाचित हुए। उन्होंने भी अनाक्रमण समझौते तथा शान्ति सन्धि का नाम नहीं लिया। दिसम्बर 1989 से पाकिस्तान ने अपनी भारत विरोधी नीति को पहले से भी अधिक उग्र स्वरूप दे दिया। पहले तो यह पंजाब के उग्रवादियों को ही समर्थन और सहायता दे रहा था, अब इसने कश्मीर में गड़बड़ फैलाने की नीति भी अपना ली। कश्मीरी उग्रवादियों को समर्थन, शरण, प्रशिक्षण, सहायता तथा सहयोग देना इसकी विदेश नीति की मुख्य धारा बन गई। कश्मीर मुद्दे के प्रश्न पर भारत तथा पाकिस्तान में तीव्र मतभेद उत्पन्न हो गये। कश्मीर की भारत से आजादी के नाम पर कश्मीर को हथियाने के लिए पाकिस्तान ने अपने प्रयास तेज कर दिये तथा भारत-पाक युद्ध की सम्भावना को भी हवा देनी आरम्भ कर दी। इसने समय-समय पर यह सूचना भी जारी करनी आरम्भ कर दी कि पाकिस्तान के पास ‘कम से कम एक परमाणु बम था’ अथवा पाकिस्तान ने परमाणु बम बनाने की क्षमता प्राप्त कर ली थी। ऐसे वातावरण में अयुद्ध समझौता तथा शान्ति-मैत्री सन्धि की बात पूर्णतया खटाई में पड़ गई। ऐसा कहा जा सकता है कि ये दोनों प्रस्ताव अब इतिहास का असफल भाग बन गये।

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