भारत नेपाल संबंध- स्वरूप, निर्धारक तत्व

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भारत नेपाल सम्बन्ध

भारत नेपाल सम्बन्ध 

डॉ० एम० एस० राजन के शब्दों में, “भाषा, धर्म तथा देवी-देवताओं तथा खानपान के क्षेत्र में जितने नजदीक भारत तथा नेपाल हैं उतना दुनिया का कोई तीसरा देश नहीं।” वास्तव में भारत में और नेपाल के गहरे रिश्ते हैं तथा दोनों अच्छे पड़ोसियों की भांति रहते रहे हैं। दोनों में कभी युद्ध नहीं हुआ। स्वतन्त्रता के बाद भारत ने सदैव ही नेपाल के साथ अच्छे सम्बन्धों को बनाये रखने तथा नेपाल के विकास के लिए योगदान दिया है।

  1. भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्ध—

    भारत तथा नेपाल भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक लुभावने और दृढ़ धागों से बंधे हैं। सामूहिक रूप से ये तीन तत्व ही निर्धारक बनते हैं या अधिक स्पष्टता से कहें तो भारत-नेपाल सम्बन्धों का निर्धारण करने वाले यही प्रमुख तत्व हैं। भौगोलिक दृष्टि से दोनों देश अपरिहार्य रूप से एक ही भौगोलिक इकाई हैं। दोनों देशों को एक-दूसरे का भू-वितरण ही कहा जा सकता है और यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोई उप-महाद्वीप का समुद्र की तरफ से सर्वेक्षण करता है अथवा पर्वतों की ओर से। दोनों के बीच एक खुली सीमा होने के कारण दोनों देशों के लोगों का जीवन सीमान्त-क्षेत्रों में एक जैसा ही है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो वर्तमान समय तक दोनों का इतिहास व्यावहारिक रूप से एक जैसा ही रहा है। दोनों देशों का जन्म एक ही स्रोत से हुआ है। एक देश पर शासन करने वाले राजवंश दूसरे देश में मिले रहे हैं तथा उन्होंने उन क्षेत्रों पर राज्य किया है जोकि अब एक-दूसरे की सीमा में आते हैं। विगत काल में एक देश के लोग दूसरे देश में जीविका उपार्जन अथवा व्यापार अथवा आध्यात्मिकता की तलाश में आते-जाते रहे हैं। भौगोलिक एकता तथा सांझे ऐतिहासिक अतीत ने एक समान प्रकार की संस्कृति को जन्म दिया है।

  2. साझे अवगम-

    निश्चय ही उपरिलिखित तीनों तत्व भारत तथा नेपाल के सम्बन्धों को सुदृढ़ता तथा संतुष्टि प्रदान करने के स्रोत रहे हैं। दोनों ही देशों ने अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के उद्देश्यों की समानता तथा सम्पर्कों के आधार पर मित्रता तथा सहयोग के विकास करने की आवश्यकता को सदैव स्वीकार किया है। दोनों यह मानते हैं कि एक की सुरक्षा दूसरे की शक्ति तथा स्थिरता से जुड़ी हुई है। भारत के लिए नेपाल की सुदृढ़ता स्थिरता, उन्नति तथा मैत्री, दक्षिण एशिया में इसके राष्ट्रीय हितों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। विशेषतया 1962 के बाद भारत ने उत्तरी सीमा की सुरक्षा के लिए नेपाल के महत्व को समझ लिया है। तिब्बत पर चीन का आधिपत्य तथा यदा-कदा उसके द्वारा भारत की चौकियों पर आक्रमणों ने भारत को सीमान्त अन्तःराज्य (Buffer State) नेपाल के स्वरूप के महत्व के बारे में अहसास दिला दिया है। भारत तथा नेपाल की सीमा एक खुली सीमा है तथा नेपाल की उत्तरी सीमा तिब्बत के साथ-साथ है। इसलिए यदि नेपाल चीन के प्रभाव में या किसी अन्य शत्रु-शक्ति के प्रभाव में आ जाता है तो भारत की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो जाता है। इसी दृष्टि से भारत की सुरक्षा व्यवस्था में नेपाल की महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति है। भारत नेपाल पर आंख नहीं रखता, भारत तो केवल यह चाहता है कि नेपाल गुट-निरपेक्ष राष्ट्र के रूप में बना रहे तथा भारत के साथ इसकी मित्रता तथा सहयोग पहले से भी अधिक सुदृढ़ हो। भारत नेपाल की प्रभुसत्ता तथा स्वतन्त्रता का पूर्ण सम्मान करता है तथा पंचशील को, दूसरे साझे ऐसे ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक सम्पर्कों के अतिरिक्त, भारत-नेपाल सम्बन्धों का आधार मानता है। नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना के बाद तो भारत ने इस हिमालियाई राज्य के साथ और अधिक सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाने का निश्चय किया हुआ

  3. भारत के साथ सम्बन्धों की महत्ता के प्रति नेपाल का मत-

    नेपाल भी भारत के साथ अपने सम्बन्धों की महत्ता को पहचानता है। उसे पता है कि भारत की ओर से उसका रास्ता गुजरता तथा सामान्यतया कोई भी व्यक्ति तथा किसी भी तरह की वस्तु अधिकतर भारत के रास्ते से ही नेपाल में पहुंच पाती है। समुद्र से दूर एक भूखण्ड होने के नाते, नेपाल को यह पता है कि उत्तर की सीमा अर्थात् नेपाल-चीन सीमा के रास्ते विश्व व्यापार करना असम्भव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। भारत द्वारा प्रदत्त व्यापार तथा पारगमन (Trade and Transit) की सुविधाओं पर नेपाल का विश्व व्यापार तथा आर्थिक सहयोग काफी सीमा तक निर्भर करता है। नेपाल का वर्तमान लोकतांत्रिक नेतृत्व भी सदैव भारतीय लोकतंत्र तथा भारतीय सद्भावना का आदर करता है और आज भी कर रहा है। नेपाल भी अपनी भौगोलिक स्थिति के साथ सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक सम्बन्धों की महत्ता को पहचानते हुए, अपने दक्षिण एशिया के महान् पड़ोसी भारत के साथ सम्बन्धों का विकास करने का इच्छुक है। भारत की सुरक्षा के साथ ही नेपाल की सुरक्षा जुड़ी हुई है। नेपाल भी उत्तर में चीन के खतरे को महसूस करता है, विशेषकर चीन की तिब्बत नीति को देखते हुए। नेपाल तथा भारत जल प्रबंधन समझौतों के द्वारा जल साधनों का उचित तथा पूर्ण उपयोग कर अपने-अपने देशों की ऊर्जा तथा जल आपूर्ति समस्याओं को हल कर सकते हैं। विशेषकर, लोकतंत्रीय व्यवस्था अपनाने के बाद, नेपाल भारत के साथ और अधिक मित्रतापूर्ण तथा सहयोगात्मक सम्बन्ध स्थापित करने का इच्छुक बना है और इस सम्बन्ध में सफल भी हो रहा है। भारत, बंगलादेश भूटान तथा नेपाल ने अब मिल कर उपक्षेत्रीय अधिक सहयोग तथा व्यापार को विकसित करने का साझा उद्देश्य बनाया है। महाकाली नदी सन्धि, व्यापार तथा पारगमन सुविधाओं की दो अलग-अलग सन्धियों, Gujral Doctrine तथा Growth Quardrangle की धारणा ने भारत नेपाल सम्बन्धों को 1996-98 में एक स्वस्थ दिशा और गति प्रदान की। यही स्थिति आज भी है क्योंकि 1998 तथा 1999 में सत्तारूढ़ बी0 जे0 पी0 गठबन्धन सरकारें भी आभरत-नेपाल सम्बन्धों को प्राथमिकता के साथ सुदृढ़ बनाये रखने का प्रयास करती रही है तथा आज भी ऐसा ही किया जा रहा है।

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दुर्भाग्य से भारत तथा नेपाल के सम्बन्धों का मार्ग, विशेषकर 1995 तक, कुछ अधिक समतल नहीं रहा। कुछ एक उत्तेजक तत्वों के कारण दोनों देशों के सम्बन्ध अत्यधिक मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगात्मक बनने से वंचित रह गये। उनके सम्बन्ध साधारणतया मैत्री तथा सहयोगपूर्ण रहे परन्तु न तो पूर्णतया मधुर रहे तथा न अत्यधिक सहयोगात्मक। इनमें उतार-चढ़ाव आते रहे। यहाँ तक कि नेपाल को शान्ति-क्षेत्र स्वीकार किये जाने की नेपालियों की मांग भारत तथा नेपाल के सम्बन्धों में कटुता पैदा किये रही। निम्नलिखित कुछ ऐसे तत्वों का वर्णन किया जा सकता है जिन्होंने भारत तथा नेपाल के सम्बन्धों को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है।

  1. नेपाल के भय—

    सशक्त भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक सम्पर्कों के होते हुए भी नेपाल इस क्षेत्र में भारत की भूमिका के बारे में सदैव शंकालु रहा है। छोटा-सा राज्य होने के कारण यह भारत से कुछ भयभीत रहता है। यद्यपि दोनों देशों के बीच कभी युद्ध नहीं हुआ फिर भी नेपाल को सदा यह भय रहता है कि भारत-चीन के विरुद्ध अपने हितों की सुरक्षा के लिए नेपाल में हस्तक्षेप कर सकता है। इसके अतिरिक्त नेपाल को यह भी भय लगा रहता है कि भारत इसके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है। नेपाल में लोकतांत्रिक आन्दोलन के प्रादुर्भाव तथा विस्तार को भारतीय राष्ट्रीट आन्दोलन का ही परिणाम समझा गया है। स्वतन्त्रता के बाद राज्य में उदार लोकतांत्रिक आन्दोलन को भारत के समर्थन ने नेपालियों के इस भय को अतिरिक्त शक्ति प्रदान की है। समुद्री व्यापार करने के लिए भी भारत पर अपनी निर्भरता ने नेपालियों में बय का संचार किया है। इनका विश्वास रहा है कि कुछ एक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भारत इस पर आर्थिक तथा राजनीतिक दबाव डाल सकता है। सिक्किम के भारत में विलय होने से भी नेपाल में कुछ आतंक छाया। चीन तथा पाकिस्तान अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नेपालियों के इस भय से लाभ उठाने के भरसक प्रयत्न करते रहे हैं जिससे दो ‘हिन्दू’ बहुसंख्या वाले देश भारत तथा नेपाल के बीच गहरे मित्रतापूर्ण तथा सहयोगात्मक सम्बन्धों की स्थापना तथा विकास में बाधा उत्पन्न हो। परन्तु 1990 के पश्चात् नेपाल में लोकतंत्रीय सरकार के उदय से तथा राजतंत्रीय निरंकुशवाद का लोकतंत्रीय सरकार द्वारा स्थानापत्र बनाने, जोकि नेपाल में पूर्ण लोकतंत्रीय व्यवस्था को निश्चित बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, से इस आशा को बल मिला कि भारत तथा नेपाल के मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगात्मक सम्बन्ध परिपक्व रूप से विकसित होंगे। नेपाल का डर अब भारत के प्रति विश्वास में बदल रहा है।

  2. नेपाल के प्रति भारत की प्रारम्भिक रुचि का अभाव-

    अपनी स्वतन्त्रता के आरम्भिक दिनों में भारत की विदेश नीति ने नेपाल के साथ सम्बन्धों को कोई अधिक महत्व नहीं दिया। नेपाल में रुचि के अभाव के पीछे दो कारक थे:

  • भारत नेपाल की मित्रता के प्रति अत्यधिक आश्वस्त था। वह भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक सम्पर्कों को, जो कि दोनों देशों-भारत तथा नेपाल के बीच विद्यमान थे, एक सुदृढ़ आधार मानता था जिन पर दोनों देशों ने अपने सम्बन्ध बनाये रखने तथा विकसित करने थे। इस भावना ने कि नेपाल की विदेश नीति अपने हितों को भारत के साथ सम्बन्धों पर आधारित मानती है, भारत को नेपाल के साथ अपने सम्बन्धों से प्रति आत्म-संतुष्ट बना दिया।
  • दूसरे, भारत विश्व के मामलों में इतना उलझ गया कि इसने अपने छोटे पड़ोसियों जैसे नेपाल के साथ अपने सम्बन्धों को व्यावहारिक रूप से अनदेखा कर दिया। डॉ0 एल0 एस0 बराल के शब्दों में, “स्वतन्त्रता के बाद कुछ वर्ष तो भारत की विदेश नीति मुख्यतः शत्रुतापूर्ण पाकिस्तान की विद्यमानता, सोवियत संघ तथा अमरीका के मध्य शीत युद्ध, चीन में सत्ता का केन्द्रीकरण, चीन द्वारा तिब्बत पर अधिकार तथा तीसरे विश्व में अमरीका के नेतृत्व वाली सुरक्षा सन्धि व्यवस्था द्वारा ही निर्धारित होती रही।” इस व्यवस्था में भारत को नेपाल को अपेक्षित महत्व प्रदान करने का अवसर ही नहीं मिला। यहाँ तक कि तिब्बत पर चीन का आधिपत्य हो जाने से भी भारत ने नेपाल के साथ सम्बन्ध बढ़ाने के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया। भारत के नेताओं ने शायद यह महसूस किया कि चीन की तिब्बत में कार्यवाही से नेपाल चीन की भूमिका से भयभीत हो जाएगा तथा प्रत्युत्तर में इसको भारत के साथ सम्बन्ध स्थापित करने की आवश्यकता अनुभव होगी। इन परिस्थितियों के अन्तर्गत भारत की विदेश नीति ने यह कल्पना कर ली कि नेपाल भारत का मित्र देश बना रहेगा तथा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कुछ विशेष प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं थी। नेपाल की भारत के साथ मित्रता को ऐतिहासिक आवश्यकता माना गया। तथापि नेपाल भारत के इस प्रकार के व्यवहार से असन्तुष्ट था। शुरू-शुरू में तो इसने किसी और विकल्प के न होने से इस स्थिति को स्वीकार कर लिया तथापि बाद में जब चीन विश्व राजनीति में एक बड़ी शक्ति बन कर उभरने लगा तो नेपाल ने चीन के साथ मित्रता तथा सहयोग बढ़ाने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। इसने तब अपनी सुरक्षा तथा हितों को सुरक्षित करने के लिए भारत के हितों तथा सम्बन्धों की कोई परवाह नहीं की। इसलिए हम कह सकते हैं कि कुछ सीमा तक भारत की नेपाल में रुचि के अभाव के कारण ही नेपाल अन्य विकल्प ढूँढ़ने के लिए ही अग्रसर हुआ। 1947 से 1955 के दौरान भारत तथा नेपाल के सम्बन्ध इस दिशा में भारत द्वारा उपक्रम के अभाव में वैकल्पिक रूप से प्रभावित हुए। बाद में भारत ने इस हानि को पूरा करने का भरसक प्रयास किया परन्तु इसे आंशिक सफलता ही मिल पाई।
  1. नेपाल के साथ “विशिष्ट सम्बन्धों” की अभिधारणा-

    1947-55 तक के काल के दौरान भारत की विदेश नीति नेपाल के साथ विशिष्ट सम्बन्धों के अवगम से प्रभावित थी। 6 सितम्बर, 1950 को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने संसद में अपने भाषण में कहा था, “हम नेपाल को एक स्वतन्त्र देश मानते हैं तथा उसकी समृद्धि की कामना करते हैं। किन्तु एक बच्चा भी समझता है कि कोई भी भारत से गुजरे बिना नेपाल नहीं जा सकता। इसलिए किसी भी देश के नेपाल के साथ सम्बन्ध इतने गहरे नहीं हो सकते जितने हमारे हैं। हम चाहते हैं कि भारत तथा नेपाल के मध्य जो भौगोलिक तथा सांस्कृतिक अंतरंग सम्पर्क हैं, बाकी के देश भी उसकी ओर ध्यान दें।’ इस कथन से नेपाल के साथ विशिष्ट सम्बन्धों की अवधारणा स्पष्ट हो गई। इस विचार से यह अभाव भी मिला कि भारत नेपाल को भारतीय प्रभाव का क्षेत्र मानता था। इस प्रकार की विचारधारा तथा ब्रिटिश बपौती के आधार पर सुरक्षा व्यवस्था की अवधारणा के कारण ही भारत ने नेपाल के प्रति वही पुरानी अंग्रेजों जैसी नीति अपनाई। इस प्रकार की नीति 1950 में स्वतन्त्र भारत द्वारा नेपाल के साथ की गई सन्धि में परिलक्षित हुई तथा इसने पुरानी सन्धियों की भावना तथा विषय-वस्तु को ही नवीकृत किया। एल0 एल0 बराल लिखते हैं, “स्वतन्त्र भारत प्रत्यक्ष रूप से उन सन्धियों को बदली हुई परिस्थितियों में भी अपनी सीमाओं की रक्षा करने का तथा हिमाचल के तीन राजतंत्रों (नेपाल, सिक्किम तथा भूटान) को अपने प्रभावाधीन रखने का निश्चित साधन मानता था, जैसा कि पहले माना जाता रहा था।”

  2. चीनी तत्व तथा भारत-नेपाल सम्बन्ध-

    1949 में चीन एक बड़ी साम्यवादी शक्ति के रूप में उभरा तथा इस परिवर्तन के शीघ्र बाद ही उसने अपनी शक्ति तथा प्रभाव बढ़ाने के प्रयत्न शुरू कर दिये। इसने तिब्बत पर दावा करने तथा एशिया में अपनी शक्ति बढ़ाने के प्रयत्नों को शुरू करने में देर नहीं लगाई। भारत को खतरे का अनुमान हुआ। एक ओर तो भारत ने चीन के साथ मैत्री बढ़ाने के प्रयत्न शुरू कर दिये तथा दूसरी ओर हिमालय में बसे राज्यों को अपनी मित्रता के निकट घेरे में लाना शुरू कर दिया। पांचवें दशक में भारत ने कूटनीति द्वारा तथा नेपाल के साथ अपने निकटता के ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्धों पर बल देकर नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव को सीमित करने का प्रयत्न किया। तथापि अब तक नेपाल ने अपनी सुरक्षा तथा हितों की रक्षा करने के लिए भारत तथाचीन दोनों के साथ मैत्री करने की आवश्यकता को महसूस कर लिया था।

1959 में चीन ने तिब्बत पर अपना प्रभुत्व जमा लिया तथा यह उस समय की बात थी जब चीन तथा भारत के बीच सीमा के मामले ने सीमा के झगड़े का रूप ले लिया था। नेपाल को इससे अपनी सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ तथा इसने भारत की विदेश नीति के अवगमों से अपनी विदेश नीति की स्वतन्त्रता का प्रदर्शन करने के लिए चीन के साथ मित्रता बढ़ाने के लिए पग बढ़ाने आरम्भ कर दिये। चीन ने नेपाल के इस दृष्टिकोण के परिवर्तन का उपयोग राज्य के साथ व्यापारिक तथा राजनीतिक सम्बन्ध बढ़ा कर किया। सन् 1962 में चीन तथा भारत के बीच सीमा के प्रश्न को लेकर लड़ा गया युद्ध तथा भारत द्वारा सहन किया गया अपमान, इस सब ने भारत के लिए स्थिति और भी शोचनीय बना दी। नेपाल की विदेश नीति में चीन की ओर झुकाव अब स्पष्ट नजर आने लगा। चीन ने नेपाल में अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयत्न किया। इसके लिए इसने नेपाल के राजतंत्र तथा इसकी पंचायत व्यवस्था का समर्थन किया तथा इसके साथ-साथ सहायता तथा व्यापार को चीन तथा नेपाल के बीच मित्रता तथा सहयोग बढ़ाने के लिए साधन के रूप में प्रयुक्त किया। चीन में नेपाल ने भारत का प्रति-सन्तुलन पाया। नेपाल भारत तथा चीन के बीच एक संतुलन के बारे में सोचने लगा। इसकी यह मांग कि इसे ‘शान्ति का क्षेत्र के रूप में स्वीकार किया जाए, इसी प्रकार के चिन्तन का प्रतीक बनी। भारत ने नेपाल के चीन तथा बाकी सभी राष्ट्रों के साथ मैत्री करने के अधिकार का पूर्ण रूप से सम्मान किया। पिर भी वहयह नहीं चाहता था कि किसी अन्य देश के साथ मित्रता करने से भारत की नेपाल के साथ मित्रता तथा सम्बन्धों का परिसीमन हो। 11 जून, 1959 को नेपाल के महाराजा तथा महारानी द्वारा जवाहरलाल नेहरू के सम्मान में काठमाण्डू में दिये गये भोज पर प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा, “हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारे दोनों देशों की गतिविधियाँ हमारी सीमाओं की तरह एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं तथा उनकी एक-दूसरे पर क्रिया तथा प्रतिक्रिया होती है। हम इस पक्ष को तथा इसके साथ-साथ इसके परिणामस्वरूप अस्तित्व में आए पुराने सम्बन्धों को भी भूल नहीं सकते। इस स्नेह ने हम दोनों को अतीत में लाभ पहुंचाया है तथा भविष्य में भी लाभ पहुंचाएगा। निस्सन्देह हमें दूसरे देशों के साथ भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखने चाहिए परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे आज के रिश्तों का आधार हमारा पुराना सम्बन्ध ही है जिसे हम छोड़ नहीं सकते।”

इस प्रकार भारत नेपाल द्वाराचीन के साथ मैत्री सहयोग के लिए किये गये किसी भी प्रयत्न से चिन्ता अनुभव करता रहा। नेपाल की विदेश नीति में चीन के प्रति झुकाव एक ऐसा कारक था जिसने भारत को इस बात के लिए विवश कर दिया कि वह नेपाल के इस दृष्टिकोण को नकार दे जिसके अनुसार नेपाल वाणिज्य तथा पारगमन की दो पृथक्-पृथक सन्धियाँ चाहता था तथा भारत ने 23 मार्च, 1989 को पूर्व सन्धियों को समाप्त हो जाने दिया। यह केवल नेपाली शासकों को इस बात का बोध करवाने के लिए था कि उनके हित चीन की अपेक्षा भारत के साथ अधिक जुड़े हुए थे।

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