1947 के बाद से भारत तथा पाकिस्तान के संबंध को प्रभावित करने वाले कारक

भारत-पाकिस्तान के संबंध को प्रभावित करने वाले कारक

प्रारंभिक वर्षों में भारत तथा पाकिस्तान के मध्य संबंध

भारत की विदेश नीति का एक सबसे अधिक कठिन भाग पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों का संचालन करना रहा है। जैसा कि के० आर० पिलाई (K. R. Pillai) का कहना है, “निश्चय ही भारत के पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध हमारी विदेश नीति का सबसे अधिक देखने योग्य मुख्य भाग रहा है।” “पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध’ भारत की विदेश सम्बन्धों का एक निर्धारक रहा है। नार्मन डी० पामर (Norman D. Palmer) ने भी कहा है, “भारत के पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों ने भारत की सारी विदेश नीति के प्रायः सभी पक्षों तथा इसके सारे अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रभावित कर रखा है।” 1947 ई० में भारत के विभाजन द्वारा पाकिस्तान के निर्माण से भारत तथा पाकिस्तान के बीच दुर्भावना पैदा हो गई। यह विभाजन साम्प्रदायिकता तथा मुस्लिम लीग के दो राष्ट्रीय सिद्धान्त का परिणाम था, जिसने दोनों देशों के बीच काफी कटुता बढ़ाई थी। पहले-पहल तो भारत की विचारधारा, पाकिस्तान के खो जाने की हानि के बारे में थी तथा पाकिस्तान की विचारधारा ‘भारत की ओर से खतरे तथा धमकी’ द्वारा निर्देशित थी। पाकिस्तान को यह डर था कि भारत ने बँटवारे को स्वीकार नहीं किया इसलिए वह पाकिस्तान को नष्ट करने की कोशिश करेगा। अतः पाकिस्तान ने भारत विरोधी विदेश नीति को अपनाया कीथ कालर्ड (Keith Callard) ने कहा है, “यह सुझाव देना नितान्त गलत होगा कि भारत के प्रति पाकिस्तान की भावना मात्र घृणा की भावना है। उनका रवैया गहरी प्रतिद्वन्द्विता लिए हुए अत्यन्त द्वेष से भरपूर है।” इससे भारत को अपना शत्रु माना, इसलिए इसकी विदेश नीति का उद्देश्य भारत से खतरे के विरुद्ध पाकिस्तान की सुरक्षा तथा अखण्डता को निश्चित बनाना था।

भारत तथा पाकिस्तान के संबंधों के अवरोधक कारक

1947 से 65 तक के भारत-पाक सम्बन्धों के इतिहास का विश्लेषण हम उन समस्याओं तथा झगड़ों के स्वरूप की समीक्षा करके कर सकते हैं, जिन्हें दोनों देशों को आपस में आक्रामक, तनावपूर्ण तथा झगड़ालू अन्तक्रियाओं तथा युद्धों में लगाए रखा।

1947 से 65 तक के काल में भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों के स्वरूप को निर्धारित करने वाले मामले तथा समस्याएं निम्नलिखित रहीं-

  • जनसंख्या का स्थानान्तरण तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों की समस्या।
  • भारत तथा पाकिस्तान के शरणार्थियों द्वारा छोड़ी हुई जायदाद की पुनः प्राप्ति अथवा क्षतिपूर्ति की समस्या।
  • विभाजन के समय राजकीय जायदाद के बंटवारा का मुद्दा ।
  • नहरों पानी का झगड़ा।
  • सीमा-विवाद।
  • भारतीय राजाओं की रियासतों के एकीकरण की समस्या।
  1. जनसंख्या के स्थानान्तरण से उत्पन्न समस्या-

    विभाजन के साथ-साथ जो सबसे गम्भीर तथा दुःख भरी समस्या पैदा हुई, वह थी जनसंख्या का स्थानान्तरण । शुरू में 1947 के पहले महीनों में स्थानान्तरण, आधुनिक इतिहास में, सबसे अधिक संख्या में था। इसमें दोनों ओर से आने-जाने वाले लोगों की संख्या लगभग 120 लाख थी। इतनी बड़ी संख्या में स्थानान्तरण के बाद भी धार्मिक अल्पसंख्यकों की समस्या किसी भी राज्य में हल नहीं हो सकी, करीब 4 करोड़ मुसलमान भारत में ही रहे तथा 1 करोड़ हिन्दू पाकिस्तान में। 1947 की दुःखद घटनाओं के कारण साम्प्रदायिक उत्तेजना अपनी चरम सीमा पर थी। विभाजन के समय की साम्प्रदायिकता के कारण आज भी कभी- कभी साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठते हैं।

नेहरूलियाकत समझौता, 1950- स्वतन्त्रता के बाद जब भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करके अल्पसंख्यकों की समस्या हल करने का प्रयत्न कर रहा था, तब पाकिस्तान ने मुस्लिम गणतन्त्र बनाने का निर्णय लिया। दोनों ही देशों के अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार के समाचारों के कारण भारत तथा पाकिस्तान के द्विपक्षीय सम्बन्धों में गम्भीर तनाव पैदा करना आरम्भ कर दिया। दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार के सम्बन्ध में एकमत होने के लिए प्रधानमन्त्री नेहरू तथा पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री लियाकत अली खाँ ने अप्रैल 1950 में एक बैठक की तथा नेहरू-लियाकत समझौता किया गया। इस समझौते के अन्तर्गतक अल्पसंख्यकों को संवैधानिक आश्वासन दिया गया तथा यह वायदा किया गया कि शरणार्थियों की जायदादों को या तो वापस किया जायेगा या स्थानान्तरण किया जायेगा और उनकी अपहृत औरतों को भी वापस किया जायेगा। इसने प्रवासियों के जान-माल की रक्षा का भी वायदा किया। इसमें कहा गया कि बंगाल तथा पश्चिमी बंगाल में अल्पसंख्यक का योग स्थापित किये जायेंगे, ताकि प्रवासियों के लिये की गई व्यवस्था का ध्यान रखा जा सके।

  1. भारत तथा पाकिस्तान के शरणार्थियों की छोड़ी हुई जायदाद के लिए क्षतिपूर्ति अथवा वसूली की समस्या-

    जनसंख्या के स्थानान्तरण की समस्या के साथ सम्बन्धित एक अन्य गम्भीर समस्या शरणार्थियों द्वारा छोड़ी गई जायदाद की वसूली या क्षतिपूर्ति की थी। विभाजन के परिणामस्वरूप करीब एक करोड़ गैर-मुस्लिम पाकिस्तान से भारत तथा करीब 25 लाख मुस्लिम भारत से पाकिस्तान गए । साम्प्रदायिक दंगों के कारण स्थानान्तरण के समय लोगों को अपनी अचल-सम्पत्ति अपने-अपने देश में ही छोड़नी पड़ी। गैर मुस्लिमों के करीब 50000 लाख रुपये की जायदाद पाकिस्तान में छोड़ी तथा भारत छोड़ने वाले मुस्लिम शरणार्थियों ने 10000 लाख रुपये की जायदाद छोड़ी। स्थानान्तरित जायदाद के सम्बन्ध में बातचीत 29 अगस्त, 1947 को शुरू हो गई परन्तु समस्या के जटिल स्वरूप के कारण तथा दोनों सरकारों के दृष्टिकोणों में भिन्नता के कारण इस बातचीत का कोई परिणाम न निकला। भारत चाहता था कि दोनों देशों की सरकारें स्थानान्तरित सम्पत्ति अपने अधिकार में ले लें तथा उसके बाद शरणार्थियों द्वारा किए गए दावों के आधार पर क्षतिपूर्ति नियत कर दें। पाकिस्तान ने यह सुझाव दिया कि इस समस्या का एक-एक केस हाथ में लिया जाए तथा छोड़ी हुई जायदाद को या तो स्थानान्तरित किया जाए या बेच दिया जाए।

  2. राजकीय सम्पत्ति के बंटवारे की समस्या-

    भारत की सम्पत्ति के भारत तथा पाकिस्तान के बीच बँटवारे की समस्या ने भी भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों को उसके प्रारम्भिक वर्षों में तनावग्रस्त तथा मनमुटाव वाले बनाए रखा। 14 अगस्त, 1947 को भारत के पास नकद 40000 लाख रुपया था, जिसमें से पाकिस्तान 10000 लाख रुपया चाहता था। भारत पाकिस्तान को इतनी बड़ी राशि नहीं देना चाहता था। इसलिए इस समस्या को एक मध्यस्थ न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) के सामने पेश किया गया, जिसने यह निर्णय दिया कि 7500 लाख रुपया पाकिस्तान को उसके हिस्से के रूप में दे दिया जाए। कुछ थोड़ी बहुत हिचकिचाहट के बाद भारत इस समझौते को मानने के लिए तैयार हो गया। तथापि पाकिस्तान ने 55 करोड़ रुपये का हिस्सा देने से इन्कार कर दिया जो स्वतन्त्रता के पहले भारत पर ऋण था। बँटवारे के समय यह निर्णय किया गया कि भारत सारे विदेशी ऋणों का भुगतान करेगा तथा पाकिस्तान अपने हिस्से की रकम तीन बराबर की किश्तों में भारत को देगा। पाकिस्तान द्वारा अपना हिस्सा देने से इन्कार करने के कारण दोनों देशों के बीच कटुता बढ़ गई। इसी प्रकार सैनिक भण्डारों के विभाजन की समस्या तथा बैंकों की सेवाओं को समाप्त करने के कारण भी दोनों देशों के बीच सम्बन्ध कटु हो गये। व्यापार तथा आर्थिक सम्बन्ध स्थापित करने की समस्या ने भी तनाव पैदा कर दिया। वे क्षेत्र, जो पाकिस्तान के हिस्से में गये थे, गेहूँ तथा कपास के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थे तथा भारत के दूसरे भागों को इनकी चीजों की पूर्ति करते थे। इसी प्रकार भारत को विभाजन के बाद गत्रा, कोयला, कच्चा लोहा उत्पादन करने वाले क्षेत्र मिल गए।

  3. नहरी पानी का झगड़ा-

    पंजाब के पश्चिमी पंजाब में, जो पाकिस्तान का हिस्सा बना था, तथा पूर्वी पंजाब जो भारत के साथ ही रहा था के बँटवारे ने दोनों के बीच नहर के पानी को बाँटने की समस्या को जन्म दिया। यह समस्या पंजाब के अप्राकृतिक विभाजन के कारण पैदा हुई।

नहर के पानी की समस्या का साधारण रूप में विवरण इस प्रकार दिया जा सकता है- भारत स्थित पूर्वी पंजाब सिंचाई के कार्यों में अविकसित था जबकि पाकिस्तान के अधिकृत पश्चिमी पंजाब में सिन्ध के मैदान में विभाजन से पूर्व ही अधिकतर नहर व्यवस्था थी, परन्तु बहुत-सी नहरें भारत स्थित नदियों से निकलती थीं तथा पत्तन भी भारत में स्थापित तथा नियन्त्रित थे। 1947 में दोनों ही देशों ने यथापूर्व स्थिति बनाए रखना स्वीकार किया। पाकिस्तान ने भारत को सतलज तथा रावी नदियों में से आने वाले पानी के लिए मुआवजा देना स्वीकार कर लिया था। अप्रैल, 1948 को इस समझौते के समाप्त होने के बाद भारतीय पंजाब की सरकार ने पाकिस्तान को पानी की आपूर्ति बन्द कर दी। पाकिस्तान के किसानों ने पानी के प्रश्न को सुलझा पाने की अपनी सरकार की असफलता के विरुद्ध प्रतिक्रिया करनी शुरू कर दी। इससे पाकिस्तान की सरकार पर दबाव बढ़ गया तथा 4 मई, 1948 को मंत्रीस्तरीय बातचीत के बाद भारत तथा पाकिस्तान में एक नया समझौता किया गया। इस समझौते के अन्तर्गत भारत ने पाकिस्तान को पानी देना स्वीकार तो कर लिया किन्तु पाकिस्तान को अपने सिंचाई संसाधन बनाने के लिए कहा। इस बात पर सहमति हो गई कि भारत पाकिस्तान को धीरे-धीरे पानी की आपूर्ति कम करता जाएगा तथा अन्त में पानी आपूर्ति बिलकुल बन्द कर देगा। बाद में पाकिस्तान ने इस समझौते का उल्लंघन किया तथा इसने कहा कि यह पाकिस्तान का अधिकार है कि वह भारत की नदियों से बिना किसी बाधा के लगातार पानी प्राप्त करे। इसने भारत के उन नए बाँधों तथा नहरों की योजनाओं को चुनौती देनी शुरू कर दिया जिनके द्वारा राजस्थान तथा पूर्वी पंजाब को सिंचाई सुविधाएं प्रदान किया जाना था। पाकिस्तान पूर्व स्थिति बनाए रखना चाहता था तथा उसकी इच्छा थी कि इस समस्या को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के सामने पेश किया जाना चाहिए परन्तु इस माँग को भारत ने अस्वीकार कर दिया था।

  1. सीमा विवाद-

    विभाजन के बाद दोनों देशों ने गम्भीरतापूर्वक रैडक्लिफ एवार्ड के आधार पर अपनी सीमा निर्धारण करने का कार्य शुरू किया। सुसंगत समझौतों के द्वारा दोनों क्षेत्रों के बीच बातचीत हुई, दोनों देशों ने इस महान् कार्य को करीब 25 वर्षों के समय में पूरा किया। पूर्वी पंजाब तथा पाकिस्तान के बीच सीमा निर्धारण का कार्य जून, 1960 ई० में पूरा हो गया तथा राजस्थान पाकिस्तान की सीमा निर्धारण का कार्य 1963 ई० में पूरा हुआ।

तथापि दोनों देश कच्छ-सिन्ध सीमा निर्धारण करने में असफल रहे। भारत का विचार था कि बम्बई की सरकार ने फरवरी 1914 ई० के प्रस्ताव द्वारा इस विषय को अन्तिम रूप दे दिया था। पाकिसतान ने इस विषय को नहीं माना तथा यह मत दिया कि इस मामलों पर अभी झगड़ा चल रहा है। यह कि कच्छ-सिन्ध सीमा का कभी भी निर्धारण नहीं किया गया था। 1964 के शुरू में पाकिस्तान ने रन ऑफ कच्छ के उत्तर में छाद-बेट (Chhad Bet) क्षेत्र पर अधिकार करने के लिए अपनी सेनाएं भेजीं परन्तु जून 1965 में भारत तथा पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम हो गया जो 1 जुलाई, 1965 को लागू हुआ। इसके बाद यह बात स्वीकार की गई कि अब यह मामला 3 न्यायाधीशों वाले न्यायाधिकरण (Arbitration Tribunal) के सामने उठाया जाएगा, जिसका निर्णय दोनों देशों को मानना पड़ेगा। इस न्यायाधिकरण ने जून 1968 को अपना निर्णय दिया तथा पाकिस्तान के विरुद्ध इस मत का निर्णय दिया कि रन-कच्छ की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा इसके मध्य से गुजरती है। फिर भी इस विवादास्पद क्षेत्र का 350 वर्ग मील का क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिया गया। यद्यपि भारत को यह निर्णय न्यायपूर्ण नहीं लगा, फिर भी उसने उसी रूप में इसलिए मान लिया क्योंकि जून 1965 के सम्झौते की यही शर्त थी। वास्तव में, पाकिस्तान द्वारा कच्छ पर आक्रमण केवल इसलिए किया गया ताकि वह भविष्य में भारत पर उस आक्रमण के लिए अपनी सेना तथा शस्त्रों का परीक्षण कर सके जो सितम्बर 1865 में किया गया।

  1. रियासतों के एकीकरण की समस्या-

    विभाजन समझौते के एक भाग के रूप में यह बात स्वीकार की गई कि 15 अगस्त, 1947 को भारतीय राजाओं द्वारा शासित रियासत पर ब्रिटिश सरकार की प्रभुसत्ता समाप्त हो जाएगी तथा ये रियासतें अपनी इच्छा से पाकिस्तान या भारत में शामिल हो सकती हैं या फिर स्वतंत्र रह सकती थीं। सभी रियासतों, तीन जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर को छोड़कर, ने अपने-अपने भाग्य का निर्णय अपनी इच्छा से कर लिया। लेकिन इन तीनों रियासतों के किसी देश में शामिल होने की समस्या ने दोनों देशों के बीच के सम्बन्धों को तनावपूर्ण बना दिया।

नवम्बर 1947 में लार्ड माऊंटबेटन ने कश्मीर पर भारत-पाक विवाद का हल करने का प्रयत्न किया तथा इस उद्देश्य के लिए उसने पाकिस्तानी नेताओं के साथ बातचीत भी की। परन्तु इन प्रयत्नों का कोई परिणाम न निकला तथा दिसम्बर 1947 में यह स्पष्ट हो गया कि बातचीत द्वारा इस समस्या का हल नहीं किया जा सकता। परिणामस्वरूप 1 जनवरी, 1948 को भारत ने यह समस्या संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के सामने रखी। उसी समय कश्मीर का मामला सुरक्षा परिषद् में लटक गया।

पहले-पहल सुरक्षा परिषद् ने भारत तथा पाकिस्तान में कश्मीर समस्या को हल करने के लिए एक 5 सदस्यीय आयोग (UNCIP) की नियुक्ति की। इस आयोग ने दिसम्बर 1948 को कश्मीर में युद्ध विराम की घोषणा कर दी, जिसे 1 जनवरी, 1948 को लागू होना था, बाद में इसने तीन अन्तिम रिपोर्ट भी प्रस्तुत की। इसकी सिफारिशों पर सुरक्षा परिषद् ने कश्मीर पर मध्यस्थ के रूप में एम० सी० नोटन (M.C. Naughton) की नियुक्ति की। वे इस समस्या को सुलझा न सके। । अप्रैल, 1950 को सुरक्षा परिषद् ने ओवन डिक्सन (Oven Dixon) को नियुक्त किया, जिसे एम० सी० नोटन की रिपोर्टों में लागू करना था। वे भी सफल न हो सके। उसने अपनी रिपोर्ट में भारत तथा पाकिस्तान के बीच कश्मीर के बँटवारे का सुझाव दिया। दोनों ही देशों ने इस सुझाव को रद्द कर दिया। इसके बात सुरक्षा परिषद् द्वारा एफ० पी० ग्राहम को संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के प्रतिनिधि के रूप में भारत तथा पाकिस्तान के लिए नियुक्त किया गया तथा उसने यह सुझाव दिया कि दोनों ही देशों के बीच कश्मीर समस्या को हल करने के लिए सीधी बातचीत होनी चाहिए। 1953-56 तक भारत तथा पाकिस्तान दोनों देशों ने ही कश्मीर पर कई बार आपसी बातचीत की परन्तु किसी भी परिणाम पर नहीं पहुँच सके।

इसी बीच स्थिति काफी परिवर्तित हो गई। कश्मीर के लोगों ने अपनी नैशनल काफँस, अपनी संविधान सभा, चुनावों के परिणामों तथा जम्मू-कश्मीर को विधानसभा के प्रस्तावों द्वारा कश्मीर के भारत में विलय की पूर्ण स्वीकृति दे दी। इसलिए भारत ने पाकिस्तान की इस माँग को रद्द कर दिया कि कश्मीर में मत संग्रह करवाया जाए। 1954 में पाकिस्तान अमरीका के नेतृत्व में बनी सुरक्षा सन्धि सीटो व्यवस्था का सदस्य बन गया तथा अपनी गुट की स्थिति के द्वारा भारत को पश्चिमी दबावों द्वारा कश्मीर की समस्या का समाधान करने के लिये प्रयोग करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान के इस कार्य के प्रति भारत ने कड़ी रवैया अपनाया तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में सोवियत संघ का समर्थन प्रापत किया। परिणामस्वरूप, सुरक्षा परिषद् झगड़े का निपटारा न कर सकी। 1955 तक सुरक्षा परिषद् की कश्मीर समस्या को हल कर पाने की असफलता स्पष्ट हो गई दब पाकिस्तान ने अमरीका तथा ब्रिटिश दबावों को कश्मीर समस्या पर बातचीत करने के लिए भारत को बाध्य करने के लिए प्रयोग करने का निर्णय किया। विशेषतया 1962 में चीनी आक्रमण के बाद पाकिस्तान कश्मीर समस्या सुलझाने के लिए काफी उत्सुक हो गया। इस समय तक भारत ने यह बात दृढ़ता से कहनी शुरू कर दी थी कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तथा यह भारत की धर्म निरपेक्षता का प्रतीक है, किन्तु 1962 के बाद भारत ने कश्मीर पर बातचीत करने की पाकिस्तानी माँग को मान लिया। दोनों देशों के बीच कश्मीर पर छः बार बातचीत हुई। इस बातचीत से कोई परिणाम नहीं निकला। 1965 में पाकिस्तान ने सेना की सहायता से कश्मीर समस्या को सुलझाने का प्रयत्न किया। प्रशिक्षित घुसपैठियों की सहायता से इसने कश्मीर में गड़बड़ी फैलाने के प्रयत्न किए ताकि कुछ समय बाद कश्मीर को जीता जा सके। सितम्बर 1965 को इसने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारत पर आक्रमण कर दिया।

1966 में दोनों देशों ने ताशकन्द समझौता (Tashkent Agreement) किया तथा यह बात स्वीकार की कि वे सभी आपसी मामलों का हल द्विपक्षीय बातचीत से ढूँढेंगे परन्तु समझौते से भी दोनों देशों के बीच अच्छे पड़ोसियों जैसे मधुर सम्बन्ध नहीं बन सके। कश्मीर की समस्या भी सुलझ न सकी। सातवें दशक के अन्तिम वर्षों में भी भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्ध बंगलादेश समस्या के कारण एक बार फिर तनावपूर्ण हो गए। दिसम्बर 1971 में बंगलादेश युद्ध शुरू हो गया तथा इस बार भारत ने पाकिस्तान पर निर्णायक विजय हासिल की। पाकिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) में बुरी तरह पराजित हुआ। भारत पाकिस्तान के कुछ अत्यधिक महत्त्व तथा सामरिक महत्त्व के स्थान जीतने तथा बड़ी संख्या में युद्ध कैदी पकड़े जाने की स्थिति में आ गया। तथापि भारत-पाक सम्बन्धों में सामान्यता लाने के लिए भारत ने पाकिस्तान के साथ शिमला शिखर सम्मेलन करने का तथा1972 का शिमला समझौता करने का निर्णय किया। यह समझौता भारत-पाक सम्बन्धों को सामान्य बनाने के लिए द्विपक्षीय बातचीत का उदार प्रयत्न था। 1972 के बाद यह समझौता भारत तथा पाकिस्तान के बीच का मार्ग निर्देशन करने लगा।

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