इन्दिरा गाँधी के प्रथम कार्यकाल में भारत-अमेरिकी संबंध

भारत-अमेरिकी संबंध

1965 में भारत तथा अमेरिका के संबंधों एवं ठहराव तथा उदासीनता आ गयी थी, उसे 1966 में समाप्त करने का प्रयास किया गया। जनवरी 1966 ई० में श्रीमती इन्दिरा गाँधी भारत की प्रधानमन्त्री बनीं तो राष्ट्रपति जानसन ने न केवल उन्हें बधाई दी बल्कि उन्हें अमरीका द्वारा भारत की सहायता का भी आश्वासन दिया। उन्होंने श्रीमती गाँधी को अमरीका आने का निमन्त्रण दिया। 28 मार्च, 1966 को श्रीमती गाँधी अमरीका गई तथा भारत-अमरीका सम्बन्धों में सुधार के लिए राष्ट्रपति जानसन से बातचीत की। भारत उस समय खाद्यान्न की भीषण कमी के दौर से गुजर रहा था तथा उसे अमरीकी सहायता की आवश्यकता थी। तथापि इस यात्रा से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। भारतीय-अमरीकी शैक्षणिक संस्था की स्थापना के लिए एक योजना बनाई गई किन्तु यह लागू न की जा सकी क्योंकि भारत के अधिकांश लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया। अमरीका खाद्यान्नों की आपूर्ति में की गई कमी को समाप्त करने को राजी तो हो गया, परन्तु केवल उस समय ही जब भारत की सरकार ने भारत के रुपये का अवमूल्यन कर दिया।

श्रीमती इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद तुरंत अमेरिका की यात्रा की तथा संबंध सुधारने की दिशा में प्रयास शुरू किया परंतु उनको बहुत सफलता नहीं मिली। इंदिरा गाँधी के शासनकाल में भारत तथा अमेरिका के संबंधों की रूपरेखा निम्नवत् रही है-

  1. इन्दिरा बनाम निक्सन

    अमरीकी प्रशासन के निक्सन युग (1964-74) में भारत तथा अमरीका के सम्बन्ध अत्यधिक तनावपूर्ण तथा अमैत्रीपूर्ण हो गए। जैसा कि टी० एन० कौल ( N. Kaul) कहते हैं, “निक्सन के अमरीका ने सारी अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को एक अलग मोड़ देने के लिए नई प्रकार की रणनीति विकसित की। इसने अमरीकी शक्ति की सीमाओं को माना तथा एशिया में अमरीका द्वारा प्रतिबद्धता को कम करने के अपने दृढ़ निश्चय को मान लिया।” बी० आर० नैयर का मत है, “इस सम्बन्ध में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अमरीका की प्रथमकर्ता की स्थिति को बनाए रखने की प्रमुख प्रेरणाएं थीं- सोवियत रूस की विस्तृत हो रही भूमिका को सीमित करना; वियतनाम से अमरीकी सैनिकों को हटाने की प्रक्रिया का आरम्भ करना; तथा अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे कर्ता के रूप में चीन से पुनर्मेल करने की ओर कदम बढ़ाना।” चीन के साथ पुनर्मेल का निक्सन के विचार का मुख्य तत्त्व था-चीन की बढ़ती परमाणु योग्यता। इस प्रकार इस समय के दौरान भारत के प्रति अमरीका की विदेश नीति शिथिल हो गई। इसे भारत तथा सोवियत संघ की बढ़ती मित्रता तथा एशिया की सुरक्षा और हिन्द महासागर क्षेत्र से सम्बन्धित अमरीकी दृष्टिकोण को स्वीकार करने तथा उसे महत्त्व देने की भारत की अस्वीकृति अच्छी नहीं लगी।

  2. बंगलादेश युद्ध तथा भारतअमरीकी सम्बन्ध

    भारत-अमरीकी सम्बन्धों का निम्नतर स्तर 1971 में आया जब भारत ने पहले रूस के साथ शांति तथा मित्रता की सन्धि की तथा फिर बंगलादेश के साथ युद्ध में संलिप्त हो गया। अमरीकियों ने रूस तथा भारत की इस सन्धि का कड़ा विरोध किया तथा इसे भारत की विदेश नीति का रूस की तरफ विश्वासात्मक झुकाव माना। कुछ अमरीकी लेखकों ने तो यहां तक कह दिया कि इससे भारत की गुट-निरपेक्षता समाप्त हो जाती है। दूसरी ओर भारत ने इस आलोचना का कड़ा उत्तर दिया तथा कहा कि भारत पूर्वारूप में गुट-निरपेक्ष देश था। 1971 ई० में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अमरीका पाकिस्तान समर्थक बना । इसने पाकिस्तान के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप के लिए भारत की कड़ी आलोचना की। निक्सन प्रशासन ने तो भारत पर दबाव डालने के लिये “Gun Boat Diplomacy” का प्रयोग करने का प्रयत्न किया जब इसने बंगाल की खाड़ी में क्षेत्र को अपने सातवें बेड़े को तैनात कर दिया। इसने भारत को आर्थिक सहायता तथा सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति बन्द करवा दी। भारत द्वारा बंगलादेश की मुक्ति वाहिनी की सहायता और अमरीका द्वारा भारत की बंगलादेश नीति की आलोचना तथा विरोध ने मिलकर दोनों देशों के सम्बन्धों को निम्नतर स्तर पर ला खड़ा किया। तथापि इस युद्ध में पाकिस्तान की हार तथा बंगलादेश की मुक्ति ने दक्षिण एशिया में सामरिक वातावरण को ही बदल दिया तथा इसके परिणामस्वरूप भारत इस क्षेत्र की मुख्य शक्ति के रूप में उभर कर सामने आ गया। इससे अमरीका की नीति को एक झटका लगा जो भारत तथा पाकिस्तान को समान स्तर पर रखने पर आधारित थी। भारत तथा अमरीका के सम्बन्ध कटु हो गए तथा कई महीने तक रहे 1971 के युद्ध के बाद भारत ने उत्तरी वियतनाम के साथ अपने कूटनीतिक सम्बन्धों को उच्चस्तरीय बनाने का निर्णय लिया। 1972 ई० में जैक एण्ड्रसन के आलेखों के प्रकाशन से निक्सन के प्रशासन का भारत विरोधी पक्ष खुलकर सामने आया। इसके अतिरिक्त वाशिंगटन-पीकिंग-पिंडी के साथ बढ़ते सम्बन्धों को भारत सन्देहास्पद समझता था। ये सभी तत्त्व भारत-अमरीकी सम्बन्धों में मुख्य रुकावट तत्त्व बने रहे।

  3. आठवें दशक में भारतअमरीकी सम्बन्ध

    तथापि 1972 ई० के अन्तिम महीनों में भारत तथा अमरीका के सम्बन्धों में एक सुधार आ गया। इसका आरम्भ तब हुआ जब अमरीका ने सहायता संघ की इस इच्छा को स्वीकार कर लिया कि भारत-ऋण को पुनः निर्धारित किया जाए। भारत ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसके साथ-साथ हैनरी किसिंगर का यह कहना कि अमरीका भारत को दक्षिण एशिया की बड़ी शक्ति मानता है तथा डेनियल पी० मोनिहन के भारत में अमरीका का राजदूत बनकर आने से 1971 ई० से चले आ रहे तनावपूर्ण सम्बन्धों में एक सुखद वातावरण पैदा हो गया। दिसम्बर 1973 में पी० एल 480 कोष की जमा हुई राशि का 2/3 भाग मुयाफ कर देने के अमरीकी निर्णय ने भारत-अमरीकी सम्बन्धों में सुधार के अवसरों को बढ़ावा दिया। तथापि इस नई प्रवृत्ति में वियतनाम पर भारत तथा अमरीका के बीच तू-तू, मैं-मैं, डियागो गार्शिया के मुददे, सी०आई०ए० (CIA) के क्रियाकलाप तथा मार्च 1973 को पाकिस्तान को अमरीकी शास्त्रों की पुनः आपूर्ति से बाधा पड़ी। 18 मई, 1974 को भारत ने अपना पहला शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट किया तथा वह इस प्रकार परमाणु क्लब में शामिल हो गया। भारत के शांतिपूर्ण परमाणु नीति के प्रति संदिग्ध हो उठा। इसने महसूस किया कि भारत का शांतिपूर्ण विस्फोट दूसरे देशों (पाकिस्तान आदि) को भी परमाणु देश बनने को उत्साहित करेगा तथा इस प्रकार एशिया में शस्त्र-दौड़ तेज हो जाएगी। तथापि भारत ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु तकनीक को विकसित करने के अपने अधिकार के औचित्य के सम्बन्ध में दृढ़ तर्क प्रस्तुत किये।

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अक्तूबर 1974 में अमरीका के विदेश मन्त्री डॉ० हैनरी किसिंगर भारत आए तथा उन्होंने अमरीका और भारत की विदेश नीतियों, पूर्वाग्रहों तथा निर्णयों के बीच की दरार को पाटने का प्रयत्न किया। 28 अक्तूबर, 1974 को आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी, शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक सहयोग पर संयुक्त भारत-अमरीका आयोग की स्थापना के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इसेक द्वारा भारत तथा अमरीका ने इन क्षेत्रों में परस्पर सहयोग को बढ़ावा देने का निर्णय लिया गया। अमरीका तथा रूस के बीच दीता के प्रादुर्भाव, 1973 में वियतनाम युद्ध की समाप्ति, हैनरी किसिंगर तथा राष्ट्रपति फोर्ड (Ford) के उत्साह प्रदान करने वाले कथन तथा अमरीका द्वारा भारत को पुनः आर्थिक सहायता देना आदि ने भारत तथा अमरीका के बीच अच्छे सम्बन्धों के विकास के अवसरों को सुदृढ़ कर दिया।

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