शिमला समझौता एवं उसकी की मुख्य धाराएँ

शिमला समझौता

दिसम्बर 1971 के युद्ध के बाद भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों में जो तनाव तथा घुटन का वातावरण छा गया था, उसको समाप्त करने के विचार से लोगों देशों से जून 1971 को शिमला में बैठक करना स्वीकार किया। 28 जून, 1972 को प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी तथा राष्ट्रपति भुट्टो के बीच ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन सद्भावना तथा समझौते की भावना में शिमला में शुरू हुआ।

शिमला शिखर सम्मेलन मेल-मिलाप की भावना से शुरू हुआ और इसी कारण पाकिस्तानी युद्धबंदियों की देश-प्रत्यावर्तन के मामले पर प्रारम्भिक मतभेदों, जम्मू कश्मीर सैक्टर से सेनाओं की वापसी तथा बंगलादेश की मान्यता की समस्या तथा कश्मीर समस्या के बावजूद इसे सफलतापूर्वक निपटाया गया तथा तथा इन्हें शिमला समझौते पर हस्ताक्षर करने में रुकावट नहीं बनने दिया गया। दोनों देशों के सरकारी प्रतिनिधियों की बातचीत तथा प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी तथा राष्ट्रपति भुट्टो के बीच अन्तिम बातचीत द्वारा 3 जुलाई, 1972 को यह ऐतिहासिक शिमला समझौता (Shimla Agreement) सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

शिमला समझौते की धाराएँ

(Provisions of Shimla Agreement)

“भारत तथा पाकिस्तान की सरकारें दृढ़ प्रतिज्ञ हैं कि अब तक जिन झगड़ों के कारण दोनों देशों के सम्बन्धों में कटुता पैदा होती रही, उन्हें समाप्त कर दिया जाए तथा मैत्रीपूर्ण तथा सद्भावपूर्ण सम्बन्धों तथा उपमहाद्वीप में स्थायी शांति की स्थापना के लिए कार्य आरम्भ किया जाए ताकि दोनों देश अब से अपने संसाधनों तथा शक्तियों को अपने लोगों को कल्याण के लिए प्रयुक्त कर सकें।”

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारत की सरकार तथा पाकिस्तान की सरकार ने निम्नलिखित बातें स्वीकार की-

  1. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के सिद्धान्तों तथा उद्देश्यों को दोनों देशों के सम्बन्धों का आधार बनाया जायेगा।
  2. दोनों देश इस बात के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं कि वे अपने मतभेद पारस्परिक बातचीत द्वारा शान्तिपूर्वक सुलझाएंगे या दोनों के बीच परस्पर स्वीकृत किसी भी अन्य शान्तिपूर्ण साधन द्वारा सुलझायेंगे। दोनों देशों के बीच यदि किसी समस्या का अन्तिम समाधान अभी बाकी है तो दोनों में से कोई भी देश एकतरफा ही स्थिति को नहीं बदलेगा तथा दोनों ही देश किसी भी ऐसे संगठन, संस्था अथवा मुहिम को दबाएंगे जो उनके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध के मार्ग में अवरोध बनाने का प्रयत्न करेगा।
  3. समझौते की आधारभूत धारणाएँ अच्छा पड़ोसीपन तथा दोनों के बीच स्थायी शान्ति के प्रति प्रतिबद्धता, दोनों देश शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, एक दूसरे की भू-क्षेत्रीय अखंडता के प्रति सम्मान, समानता, प्रभुसत्ता, आन्तरिक सम्बन्धों में अहस्तक्षेप तथा परस्पर लाभ के आधार पर कार्य करने के लिए प्रतिबद्धता।
  4. 20 वर्षों से दोनों देशों के सम्बन्धों में कटुता पैदा करने वाली मूल समस्याएँ तथा मामले शांतिपूर्ण साधनों द्वारा सुलझाए जाएंगे।
  5. दोनों ही देश एक-दूसरे की राष्ट्रीय एकता, भू-क्षेत्रीय अखंडता, राजनीतिक स्वतन्त्रता तथा प्रभुसत्तात्मक समानता का सदैव सम्मान करेंगे।
  6. संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुसार दोनों देश एक दूसरे की भू-क्षेत्रीय अखंडता तथा राजनीतिक स्थिति के विरुद्ध किसी प्रकार की शक्ति प्रयोग की धमकी तथा वास्तविक-शक्ति प्रयोग से नहीं करेंगे।
  7. देशों की सरकारें एक-दूसरे के प्रति शत्रुतापूर्ण प्रचार को रोकने का यथा-सम्भव प्रयास दोनों ही देश ऐसी किसी भी सूचना को देने को प्रोत्साहन देंगे जो उनके बीच के मैत्रीपूर्ण को बढ़ावा देगी।
  8. बार-बार दोनों देशों के बीच के सम्बन्धों को सामान्य बनाने तथा क्रमिक रूप से आगे बढ़ाने के लिए यह तय हुआ कि-
  • संचार, डाक तथा तार, सामुद्रिक, सीमान्त चौकियों समेत भूमि तथा एक दूसरे के देश के ऊपर से उड़ानों के साथ वायु सम्बन्ध फिर से शुरू करने के लिये पग उठाए जायेंगे।
  • दूसरे देश के नागरिकों के लिए यात्रा सुविधाएँ देने के लिए उचित पग उठाये जाएंगे।
  • आर्थिक तथा अन्य सहमति के क्षेत्रों में जहाँ तक सम्भव होगा, व्यापार तथा सहयोग की स्थापना की जाएगी।
  • वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान किया जाएगा। इस संदर्भ में दोनों देशों के प्रतिनिधि समय-समय पर आवश्यक मुद्दों पर बातचीत करने के लिए मिलते रहेंगे।
  1. स्थायी शांति की स्थापना के लिए दोनों सरकारों ने यह तय किया कि वे-
  • भारतीय तथा पाकिस्तानी सेनाएं अन्तर्राष्ट्रीय सीमा तक वापस बुला ली जाएंगी।
  • जम्मू तथा कश्मीर में, 17 दिसम्बर, 1971 के युद्ध विराम के बाद बनी सीमा नियन्त्रण रेखा का दोनों ही देश अपनी-अपनी मान्य स्थितियों का विचार किए बिना आदर करेंगे। दोनों में से कोई भी देश इसे परस्पर मतभेदों तथा कानूनी व्याख्याओं के बावजूद एकतरफा परिवर्तित करने की नहीं सोचेगा। दोनों ही देश यह बात स्वीकार करते हैं कि वे इस रेखा के उल्लंघन हेतु न तो शक्ति प्रयोग की धमकी ही देंगे तथा न ही शक्ति प्रयोग करेंगे।
  • सेनाओं की वापसी इस समझौते के लागू होने के तुरन्त बाद ही शुरू होगी तथा इस कार्य को 30 दिन के अन्दर-अन्दर पूर्ण कर लिया जायेगा।

इस समझौते को दोनों ही देश अपनी-अपनी संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार पुष्टि करेंगे तथा यह उस दिन से लागू माना जाएगा जिस दिन से पुष्टि के दस्तावेजों का आदान-प्रदान होगा।

“दोनों ही सरकारें इस बात पर सहमत है कि दोनों देशों के अध्यक्ष सुविधा अनुसार भविष्य में मिलेंगे तथा तब तक उनके प्रतिनिधि, युद्धबंदियों की वापसी, नागरिकों की स्वदेश वापसी, जम्मू तथा कश्मीर का अन्तिम हल तथा कूटनीतिक सम्बन्धों को पुनः स्थापित करना जैसे प्रश्नों समेत सम्बन्धों के सामान्यीकरण तथा स्थायी शांति की स्थापना के लिए प्रबन्ध करने के लिए मिलेंग, उपाय खोजेंगे तथा इस पर बातचीत करेंगे।”

इन धाराओं के साथ जिस सद्भावना तथा मेल-मिलाप की भावना से शिमला समझौता हुआ उस हिसाब के इसे अत्यन्त महत्त्व का ऐतिहासिक दस्तावेज कहा गया। यह शीत युद्ध तथा युद्धों की समाप्ति के लिए तथा भारत-पाक सम्बन्धों में द्विपक्षवाद, सद्भावना, सहयोग तथा मित्रता के नये युग में भारत-पाक सम्बन्धों के प्रवेश की ओर सामायिक तथा स्वस्थ प्रयल था। यह तनावपूर्ण सम्बन्धों की समाप्ति की दिशा में निर्भीक तथा मैत्रीपूर्ण और सहयोगात्मक सम्बन्धों की स्थापना की ओर साहसिक प्रयल था। इसे भारत-पाक दीतां का चार्टर भी कहा गया है।

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