भारत-पाक संबंधों में कश्मीर विवाद का प्रभाव

कश्मीर की समस्या की उत्पत्ति एवं भारत-पाक सम्बन्धों पर इसका प्रभाव

भारत-पाक सम्बन्धों के इतिहास का कश्मीर पर विवाद

भारत तथा पाकिस्तान के बीच कश्मीर एक मुख्य समस्या तथा झगड़े की जड़ रहा है। विभाजन से कई झगड़े तथा समस्याएं पैदा हुईं। कश्मीर के झगड़े को छोड़कर बाकी सारे झगड़े धीरे-धीरे परस्पर बातचीत द्वारा हल कर लिये गये। एक विश्व बैंक की सहायता से तथा दूसरा मध्यस्थता से हल कर लिया गया तथापि कश्मीर की समस्या ज्यों की त्यों खड़ी है।, बहुत से व्यक्तियों, राज्यों तथा संगठनों के कई थका देने वाले तथा सहनशील प्रयलों के बावजूद ऐसा कोई हल नहीं ढूँढ़ा जा सका, जो भारत तथा पाकिस्तान दोनों को स्वीकार्य हो।

सैद्धांतिक रूप में 1947 से लेकर कश्मीर समस्या भारत तथा पाक के सम्बन्धों में बाधक बनी हुई है। यह समस्या संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में अभी भी विचाराधीन है परन्तु इसके द्वारा इसके हल के कोई आसार नजर नहीं आते। कश्मीर समस्या सुरक्षा परिषद के कैलेण्डर में बहुत पीछे छूट चुकी है। सन् 1965 में इसके कारण दोनों में युद्ध भी हुआ। सन् 1966 की ताशकन्द बैठक तथा 1972 ई० की शिमला वार्ता भी कश्मीर के सम्बन्ध में दोनों देशों द्वारा अपनाई गई स्थितियों के बीच अन्तर को दूर नहीं कर सकी। भारत छठे दशक के मध्य से ही यह बात कह रहा है कि कश्मीर भारतीय संघ का एक अटूट अंग है तथा यह भारत में पूर्ण तथा अन्तिम रूप से शामिल हो चुका है। भारत के लिए कश्मीर की समस्या, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) की मुक्ति की समस्या है। पाकिस्तान अब भी यही कहता है कि कश्मीर के भविष्य का फैसला कश्मीर के लोगों की इच्छानुसार होना अब भी बाकी है। इसलिए कश्मीर के मामले पर भारत तथा पाकिस्तान के बीच तीव्र मतभेद हैं तथा आज भी कश्मीर इन दो दक्षिणी-एशियाई राष्ट्रों के द्विपक्षीय सम्बन्धों का निर्धारक बना हुआ है।

सन् 1947 से लेकर अब तक के भारत-पाक सम्बन्धों की समीक्षा तभी पूर्ण हो सकती है, जब हम दोनों देशों के बीच कश्मीर के संघर्ष के इतिहास के स्वरूप की समीक्षा करें।

  1. कश्मीर समस्या का जन्म-

    जम्मू तथा कश्मीर भारत संघ का एक राज्य है जिसका क्षेत्रफल 86,023 वर्ग किलोमीटर है तथा इसमें कश्मीर की घाटी, जम्मू तथा लद्दाख का क्षेत्र, पहाड़ी जिले तथा कबायली क्षेत्र शामिल हैं जैसे बलतिस्तान, गिलगित, हुंजा तथा नगर। राज्य की वर्तमान वास्तविक स्थिति के अन्तर्गत जम्मू, घाटी तथा लद्दाख भारत में है। कबायली क्षेत्र पाकिस्तान में है तथा भौगोलिक स्थिति के कारण यह भारत की सुरक्षा के साथ विशेषरूप से जुड़ा है।

अगस्त, 1947 को अब ब्रिटिश सरकार का प्रभुत्व समाप्त हुआ तो कश्मीर स्वतन्त्र राज्य बन गया तथा विभाजन की शर्त के अनुसार यह स्वयं इस पर निर्भर करता था कि वह पाकिस्तान या भारत किसी एक में शामिल हो जाए या फिर एक स्वतन्त्र राज्य बना रहे। कश्मीर के महाराजा श्री हरि सिंह ने यह निर्णय लिया कि कश्मीर को स्वतन्त्र ही रहने देंगे। इसलिए उन्होंने यह निर्णय किया कि भारत या पाकिस्तान दोनों द्वारा पेश किए गए राज्य में शामिल होने के उपकरणों को स्वीकार नहीं करेंगे। विभाजन के तीन दिन पहले (12 अगस्त 1947) महाराजा ने भारत तथा पाकिस्तान के साथ एक यथास्थिति समझौता किया ताकि आर्थिक तथा संचार सेवाओं के मामले में यथापूर्वस्थिति (Stand Quo) को बनाया रखा जा सके। पाकिस्तान ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया परन्तु भारत ने ऐसा नहीं किया तथा महाराजा को बातचीत के लिए आमन्त्रित किया।

  1. कश्मीर पर पाकिस्तान के समर्थन से कबायली आक्रमण-

    तथा स्थिति (Stand still) समझौते को पाकिस्तान द्वारा मान्यता देना केवल दिखावा मात्र था क्योंकि एक ही महीने के अन्दर ही इसने कश्मीर के लोगों की आर्थिक गतिविधियाँ बन्द करके, तथा अपनी ओर से खाद्य पदार्थों, ईंधन आदि की पूर्ति न करके तंग करना शुरू कर दिया। आर्थिक रूप से बहिष्कार का निर्णय करने से ऐसा लगता था कि पाकिस्तान कश्मीर को अपने में मिलाने के लिए ही ऐसा कर रहा था। किन्तु महाराजा ने पाकिस्तान में मिलने की ऐसी कोई इच्छा नहीं दिखाई तथा उसकी इसी हिचकिचाहट के कारण पाकिस्तान अपनी इच्छा की पूर्ति करने के लिए सैनिक दबाव डालने के लिए उत्सुक दिखाई देने लगा। पाकिस्तान के लिए ऐसा सोचना कल्पना से परे था कि कश्मीर एक मुस्लिम देश का हिस्सा न बने। परिणामस्वरूप इसने कश्मीर पर कबायली आक्रमण करवा दिया। अक्तूबर 1947 में सशस्त्र कबायलियों ने कश्मीर पर आक्रमण करना शुरू कर दिया। 15 अक्तूबर, 1947 को लगभग 5000 आक्रमणकारियों ने कश्मीर के अन्दर ओवन के किले (Fort Owen) को घेरना शुरू कर लिया। इन छापामारों को पाकिस्तान स्पष्ट रूप से समर्थन दे रहा था तथा वास्तव में ये कबायली कपड़ों में पाकिस्तान सैनिक ही थे। कश्मीर पर आक्रमणकारियों का अधिकार हो जाने का खतरा पैदा हो गया। कश्मीर के महाराजा ने भारत को सहायता के लिए प्रार्थना की परन्तु भारत ने तब तक सहायता न देने का निर्णय किया जब तक कश्मीर को भारत में शामिल करने का निर्णय नहीं हो जाता।

  2. कश्मीर का भारत में विलय-

    23 अक्तूबर को महाराज हरि सिंह ने यह निर्णय लिया कि कश्मीर भारत में शामिल हो जाएगा। 26 अक्तूबर, 1947 को उसने भारत राज्य में शामिल उपकरण पर हस्ताक्षर किए तथा कश्मीर को भारत का हिस्सा बना दिया। कश्मीर की विधिवत् रुप से चुनी गई सरकार, जिसका मुखिया राजा था, जिसके साथ पाकिस्तान भी यथा स्थिति समझौता राजा पहले ही कर चुका था, के इस कार्य से कश्मीर भारत का एक भाग बन गया। तत्काल ही भारत ने अपनी सेनाएँ कश्मीर भेज दीं तथा भारत की सेनाएं आक्रमणकारियों के विरुद्ध युद्ध में जुड गई। प्रभावशाली तथा कुशल सैनिक संचालन के कारण ही भारत श्रीनगर को बचाने तथा आक्रमणकारियों को उरी की तरफ भगाने में सफल हो गया।

  3. भारत तथा पाकिस्तान के बीच में कश्मीर पर झगड़ा-

    भारत में शामिल होने सम्बन्धी दस्तावेज स्वीकार करते हुए भारत ने स्वेच्छा से यह माना कि, “जब भी कश्मीर में कानून व्यवस्था ठीक हो जाएगी तथा उसकी धरती से सभी आक्रमणकारी खदेड़ दिए जाएंगे तब भारत में मिलने का प्रश्न लोगों की स्वीकृति के लिए पेश किया जाये।” पाकिस्तान ने भारत में कश्मीर के विलय की बात को स्वीकार नहीं किया तथा इसे ”कायर शासकों द्वारा भारत सरकार की सहायता से कश्मीर के लोगों को धोखा कहा।” 27 अक्तूबर, 1947 को, पाकिस्तान के गवर्नर जनरल एम० ए० जिन्हा ने पाकिस्तानी सेनाओं को कश्मीर में दाखिल हो जाने के लिए कहा। लेकिन बाद में जब पाकिस्तानी सेना के सेनापति ने यह पत्र दिया कि इस प्रकार का सीधा हमला करने से पाकिस्तान सेना में काम कर रहे ब्रिटिश अफसर चले जाएंगे, तो यह आदेश वापस ले लिया गया। परन्तु पाकिस्तान ने आक्रमणकारियों को गुप्त सहायता देना जारी रखा। अपने गवर्नर जनरल माऊंटबैटन की सहायता से भारत की सरकार ने पाकिस्तान द्वारा आक्रमणकारियों को दी जाने वाली सहायता को समाप्त करने के लिए बातचीत शुरू की। पहले तो पाकिस्तान ने कश्मीर के युद्ध में अपनी भूमिका से इन्कार कर दिया तथा फिर कश्मीर के भारत में शामिल होने को चुनौती दी।

  4. सुरक्षा परिषद में कश्मीर समस्या-

    पहली जनवरी, 1948 को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुच्छेद 35 के अन्तर्गत, भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के सामने कश्मीर के प्रश्न को प्रस्तुत किया तथा प्रार्थना की कि वह पाकिस्तान की सरकार को निम्न बातें कहे-

  1. कि वह जम्मू तथा कश्मीर राज्य में पाकिस्तान की सरकार के कर्मचारियों, सैनिक तथा असैनिक द्वारा आक्रमणकारियों को किसी भी प्रकार की दी जाने वाली सहायता बन्द करे,
  2. पाकिस्तान के नागरिकों को जम्मू तथा कश्मीर की लड़ाई में भाग लेने से रोके।
  3. तथा यह यकीनी बनाया जाए कि आक्रमणकारियों को,
  • पाकिस्तान की भूमि को कश्मीर के विरुद्ध प्रयुक्त करने न दिया जाए तथा उन्हें वहाँ रहने न दिया जाए।
  • सैनिक तथा दूसरी वस्तुओं की आपूर्ति न कि जाए।
  • किसी भी प्रकार की और सहायता न दी जाए जिससे वर्तमान युद्ध लम्बा पड़ जाए।

कश्मीर के प्रश्न पर पहले कुछ वाद-विवाद में भारत ने कश्मीर के भारत में शामिल होने के औचित्य को सिद्ध किया परन्तु यह बात स्वीकार की कि अन्तिम हल के लिए पाकिस्तान को चाहिए कि वह सारे आक्रमणकारियों को वहाँ से निकाले। भारत ने यह स्वीकार किया कि पाकिस्तान के निकल जाने पर, वह कश्मीर में अपनी सेनाओं की संख्या कम से कम कर देगा जितना सारे राज्य की सुरक्षा तथा प्रशासन के लिए पर्याप्त होगी तथा परिस्थितियों के सामान्य हो जाने के बाद यह वहाँ की लोकप्रिय सरकार तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधियों की देखरेख में मत संग्रह करवाएगा ताकि कश्मीर के विलय का प्रश्न हल किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के प्रतिनिधि मि० जफरउल्ला खान ने यह तर्क दिया कि कश्मीर का झगड़ा केवल उपमहाद्वीप के हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच की गहरी कलह का दर्दनाक पहलू था तथा जिसे केवल मात्र दोनों ही समुदायों के शान्तिपूर्ण पृथक्करण द्वारा तथा कश्मीर पाकिस्तान को देकर हल किया जा सकता था। उसका कहना था कि भारत ने कश्मीर को धोखे से अपने में शामिल किया है। उसने कश्मीर समस्या को भारत तथा पाकिस्तान का झगड़ा कहा और कबायली आक्रमण में पाकिस्तान का हाथ होने से इन्कार किया।

सुरक्षा परिषद् के वाद-विवाद में भारत के दृष्टिकोण को अधिक समर्थन नहीं मिला। भारत के विचार में केन्द्रीय समस्या कश्मीर समस्या कश्मीर के आक्रमण में पाकिस्तान की संलिप्तता थी। इसके विपरीत सुरक्षा परिषद् ने कश्मीर के लोगों में आत्मनिर्णय के अधिकार पर बल दिया तथा इस प्रकार कश्मीर के भारत में शामिल होने पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया, जिससे पाकिस्तान को इस विषय में अधिकार प्रदान कर दिया। अपनी ओर से भारत ने कश्मीर के लोगों से किया वायदा निभाना स्वीकार किया परन्तु केवल तभी जब पाकिस्तान कश्मीर में से अपनी सेना, कबायली आक्रमणकारियों तथा दूसरे पाकिस्तानियों को हटा लेगा।

  1. कश्मीर पर भारत तथा पाकिस्तान की द्विपक्षीय बातचीत-

    1953 ई० की गर्मियों में भारत तथा पाक ने कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए द्विपक्षीय बातचीत शुरू की। जून 1953 को क्वीन कॉरोनेशन के समय जो पहली द्विपक्षीय बातचीत शुरू हुई, वह जुलाई में कराची तथा अगस्त में दिल्ली में भी जारी रही। बातचीत सद्भावना के वातावरण में शुरू हुई परन्तु शीघ्र ही कुछ एक नकारात्मक बातों के उभरने के कारण ही इसमें कटुता आ गई 19 अगस्त, 1953 को शेख अब्दुल्ला को पदच्युत कर दिया गया तथा उसे राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए भारत की सरकार द्वारा भारत में ही नजरबन्द कर दिया गया। फरवरी 1954 ई० में कश्मीर की संवैधानिक सभा ने राज्य के भारत में विलय की एकमत होकर पुष्टि कर दी। इन दोनों परिवर्तनों ने वातावरण को बोझिल तथा सन्देहास्पद बना दिया। बातचीत को अधिक क्षति तब पहुँची जब 1954 में अमरीका द्वारा पाकिस्तान को भारी मात्रा में सैनिक साजो-सामान देने तथा पाकिस्तान द्वारा अमरीका की दक्षिण पूर्वी एशिया के लिए बनाई गई सैनिक सन्धि में शामिल होने की घोषणा की गई। पाकिस्तानी गवर्नर जनरल गुलाम मुहम्मद द्वारा किए गए प्रयत्नों तथा भारत द्वारा सद्भावना का उत्तर सद्भावना में देने के बावजूद कश्मीर समस्या के इस दिशा में कोई प्रगति नहीं की जा सकी। अमरीका द्वारा प्रायोजित सैनिक गुट में शामिल होने के पाकिस्तान के निर्णय को भारत ने अपने ऊपर दबाव डालने का उपकरण माना । परिणामस्वरूप कश्मीर पर भारत की स्थिति को तथा कश्मीर के भारत में विलय की अलंघनीयता कहा जाने लगा। सन् 1956 में पाकिस्तान में सरकार बदलने से तथा प्रधानमन्त्री चौधरी मुहम्मद अली द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर समस्या फिर भड़काने के प्रयल, स्पष्टतया पाकिस्तान के नए गुट मित्रों की सहायता से, पुनः शुरू करने के निर्णय ने द्विपक्षीय बातचीत के युग को समाप्त कर दिया। भारत ने कश्मीर में अब मत संग्रह की माँग को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि कश्मीर की संवैधानिक सभा ने कश्मीर के भारत में विलय की पुष्टि कर दी थी तथा कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 111 में कहा गया है, “जम्मू तथा कश्मीर का राज्य भारतीय संघ का अटूट अंग है तथा रहेगा।” इससे पाकिस्तान का रवैया और भी कठोर हो गया। परिणामस्वरूप भारत तथा पाकिस्तान कश्मीर के प्रश्न पर सुरक्षा परिषद् में एक बार फिर तू-तू, मैं-मैं पर उतर आए।

  2. कश्मीर के विषय में मध्यस्थता का प्रस्ताव तथा इसकी अस्वीकृति-

    सुरक्षा परिषद् में चार शक्तियों द्वारा एक प्रस्ताव Four Power Resoluton (आस्ट्रेलिया, क्यूबा, इंग्लैण्ड तथा संयुक्त राज्य अमेरिका) पेश किया गया। इस पर सोवियत संघ द्वारा वीटो हो जाने के बाद एक नया संशोधित प्रस्ताव पेश किया गया तथा इसके द्वारा स्वीडन के प्रधान गुनार जारिंग ने कहा कि वह भारत तथा पाकिस्तान की सरकारों के साथ, संयुक्त राष्ट्र के पहले प्रस्तावों के सन्दर्भ में हुए सभी समझौतों पर जो वे कश्मीर समस्या को हल करने के लिए ठीक समझें, पर बातचीत करें। 29 अप्रैल, 1957 को अपनी रिपोर्ट में गुनार जारिंग ने कहा कि यदि मत संग्रह करवाया जाता है तो गम्भीर समस्याएं पैदा हो जाएंगी। ऐसा लगता था कि यह यथापूर्वक स्थिति के ही पक्ष में था। परन्तु उसने यह सुझाव दिया कि मध्यस्थता के द्वारा यह निश्चय किया जाना चाहिए कि क्या दोनों ही देशों से सुरक्षा परिषद् के प्रस्तावों की प्रथम शर्तों को पूरा कर दिया है, जिसमें युद्ध विराम तथा मत संग्रह के बारे में किए जाने वाले प्राथमिक उपायों का विशेषरूप से उल्लेख था। भारत ने मध्यस्था के इस सुझाव को अस्वीकार कर दिया तथा इस प्रकार जारिंग मिसन समाप्त हो गया।

  3. दूसरा ग्राहम मिशन-

    पाकिस्तान के दबाव अधीन सितम्बर 1957 में पश्चिमी शक्तियों ने सुरक्षा परिषद् से यह प्रार्थना की कि वह फ्रैंक पी० ग्राहम को पुनः अपना प्रतिनिधि नियुक्त करे जो कश्मीर समस्या पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को लागू करवाने के लिए उचित कदम उठाने के लिए दोनों देशों को सिफारिश करें। भारत तथा पाकिस्तान की सरकारों के साथ बातचीत कर लेने के बाद ग्राहम ने मार्च 1959 में अपनी रिपोर्ट पेश की। उसने कश्मीर की सीमा पर संयुक्त राष्ट्र संघ की सेनाओं को ठहराने तथा भारत तथा पाकिस्तान को प्रधानमन्त्री के स्तर की बैठक करने का सुझाव दिया। पाकिस्तान ने इस सुझाव को स्वीकार कर लिया परन्तु भारत ने अस्वीकार कर दिया। संयुक्त राष्ट्र ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की तथा फिर 1962 ई० तक कश्मीर की समस्या को सुरक्षा परिषद् में नहीं उठाया गया।

  4. भारत-पाक प्रयत्न-

    1958 ई० में फील्ड मार्शल अयूब खान तानाशाह बन गया तथा बाद में पाकिस्तान का राष्ट्रपति । वह सन् 1960 ई० में नेहरू से दो बार मिले तथा उसने कश्मीर समस्या पर बातचीत की। 1960 ई० में भारत तथा पाकिस्तान के मध्य नहरी पानी सन्धि से सम्बन्धित सन्धि होने से इस बात की आशा हो गई कि कश्मीर समस्या को हल करने के लिए भी दोनों ही देश कुछ न कुछ प्रयत्न अवश्य करेंगे तथापि सितम्बर 1961 के बाद के समय में इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई।

  5. कश्मीर के विषय में सुरक्षा परिषद् की कार्यवाही के लिए पाकिस्तान के नवीन प्रयत्न-

    जनवरी 1962 में पाकिस्तान ने एक बार फिर सुरक्षा परिषद् से प्रार्थना की कि कश्मीर में एक गम्भीर परिस्थिति उत्पन्न हो रही है, इसलिए वह कश्मीर का मामला अपने हाथों में ले। सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान की इस प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि तब भारत ने आने वाले चुनावों को दृष्टि में रखते हुए इसे स्थगित करने की प्रार्थना की। भारत में चुनावों के बाद पाकिस्तान ने दुबारा प्रार्थना पेश कर दी, जिसके आधार पर सुरक्षा परिषद् ने एक बार फिर कश्मीर समस्या को हाथ में लिया।

  6. चीन का भारत पर आक्रमण तथा भारत-पाक सम्बन्धों पर इसका प्रभाव-

    1962 ई० में चीन तथा भारत में सीमा युद्ध ने भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों को और भी तनावपूर्ण कर दिया। पाक द्वारा चीन का खुला समर्थन, चीन तथा पाकिस्तान में आपसी सम्बन्ध तथा अमरीका और भारत के बीच आपसी सद्भाव-समझबूझ के पैदा हो जाने के कारण जिसमें अमरीका द्वारा अस्त्र-शस्त्र दिया जाना भी शामिल था, ने भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों को और भी अधिक जटिल तथा संकटपूर्ण बना दिया तथापि अमरीका तथा ब्रिटेन ने दक्षिण एशिया की इस परिवर्तित स्थिति को, जोकि हिमालय की सीमा पर चीन के लोकतांत्रिक भारत पर आक्रमण के कारण पैदा हुई थी, कश्मीर की समस्या पर भारत तथा पाकिस्तान के बीच के झगड़े में कुछ समय के लिए टाल देने के लिए प्रयुक्त करने का निर्णय किया। वह अपने प्रतिनिधियों, डनकन सैंडी तथा एकराल हैरीमैन द्वारा, नवम्बर 1962 में भारत तथा पाकिस्तान के बीच कश्मीर की समस्या पर द्विस्तरीय बातचीत करने का समझौता करवा सकने में सफल हो गए।

  7. कश्मीर पर भारत-पाक बातचीत की विफलता-

    27 दिसम्बर, 1962 को रावलपिंडी में भारत तथा पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू हुई। परन्तु इस बैठक में सद्-विश्वास का प्रश्न, पहली समस्या बनकर उठ खड़ा हुआ जब पाकिस्तानी सरकार ने यह घोषणा कर दी कि इसने चीन के साथ सिंक्यांग तथा पाकिस्तान की सीमाओं की सन्धि के संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। भारत सरकार ने इसकी जोरदार आलोचना की तथा चीन तथा पाकिस्तान के बीच 2 मार्च, 1962 के हुए समझौते को अवैध कहकर अस्वीकार कर दिया। भारत ने इसे अपने पर दबाव डालने वाला तथा कश्मीर के प्रश्न पर चीन का अपने पक्ष में समर्थन प्राप्त करने के लिए पाकिस्तान का प्रयत्न किया। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने इस समझौते का समर्थन किया तथा कश्मीर के सम्बन्धों में भारत की स्थिति को चुनौती दी। इन परिस्थितियों में पाकिस्तान तथा भारत के बीच बातचीत के छः दौर सिवाय भारत-पाक के बीच मदभेद बढ़ाने के और कोई विशेष परिणाम न दिखा सके। परन्तु साथ-साथ कश्मीर की समस्या के सभी सम्भावित पहलू और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आ गए।

  8. ताशकन्द घोषणा के बाद भारत-पाक सम्बन्ध : भारत पाकिस्तान युद्ध, 1971-

    ताशकन्द घोषणा के बाद, कश्मीर तथा दूसरी समस्याओं पर भारत तथा पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय बातचीत की सम्भावनाएँ पैदा हो गईं। 15 अगस्त 1968 को श्रीमती गाँधी ने पाकिस्तान को एक अनाक्रमण सन्धि का प्रस्ताव प्रस्तुत किया तथा 1 जनवरी, 1969 को इस समझौते के पूरक के रूप में प्रस्ताव पेश किया कि पाकिस्तान के साथ सभी झगड़ों की जाँच पड़ताल करने के लिए एक संयुक्त मशीनरी की स्थापना की जाए। किन्तु इससे पूर्व कि इन प्रस्तावों को लागू किया जा सके, सातवें दशक के अन्त तक आठवें दशक के शुरू में कुछ ऐसी घटनाएँ घट गईं जिससे भारत तथा पाकिस्तान के लिए इस दिशा में कोई काम करना कठिन हो गया। पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) में संकट पैदा हो जाने तथा परिणामस्वरूप बंगलादेश की मुक्ति के मुद्दे ने स्थिति को और भी बिगाड़ दिया। दिसम्बर 1971 में दोनों ही देश एक अन्य युद्ध युद्ध में संलिप्त हो गए। इस युद्ध में कश्मीर की समस्या नहीं उभरी। पाकिस्तान की प्रेस तथा नेताओं ने इसे समाचार-पत्रों में जीवित रखा ताकि जनता का समर्थन प्राप्त किया जा सके तथा उनकी तर्क शक्ति को बढ़ाया जा सके परन्तु वास्तविक व्यवहार में संयुक्त राष्ट्र में इस समस्या को उठाने का कोई गम्भीर प्रयल नहीं किया गया। बंगलादेश के संकट ने पाकिस्तान के शासकों को कश्मीर के साथ-साथ इस समस्या से ही उलझाए रखा तथा 1971 के युद्ध में उनकी हार ने उन्हें पूर्णतया हतोत्साहित कर दिया ।

  9. 1972 का शिमला समझौता तथा कश्मीर समस्या-

    1972 के शिमली सम्मेलन में प्रधानमन्त्री भुट्टो ने कश्मीर का प्रश्न उठाया तो था परन्तु नितान्त सतही तौर पर । शिमला समझौते की धारा IX में एक उप-धारा भी शामिल थी तथा इसमें कहा गया-”जम्मू तथा कश्मीर में, 17 दिसम्बर, 1971 के युद्ध विराम के परिणामस्वरूप नियन्त्रण रेखा का दोनों ही देश सम्मान करेंगे और इसमें किसी भी ओर की पूर्व मान्य स्थिति का ध्यान नहीं रखा जाएगा। कोई भी देश इसे एक तरफा रूप में नहीं बदल सकेगा चाहे उनमें कितने ही परस्पर मतभेद तथा कानूनी व्याख्याएँ हों। दोनों ही देशों ने यह मत भी स्वीकार किया कि वे एक-दूसरे को कोई धमकी देंगे तथा न ही इस सीमा रेखा का उल्लंघन करने के लिए शक्ति का प्रयोग करेंगे।”

शिमला समझौते के बाद 17 दिसम्बर, 1971 वाली नियन्त्रण रेखा नई युद्ध विराम रेखा बन गई। भारत की स्थिति ताशकन्द समझौते के बाद की उसकी स्थिति से अधिक अच्छी बनी। इसका अत्यधिक सामरिक महत्त्व वाले कुछ स्थानों पर नियन्त्रण था इस समय से दोनों ही देशों के बीच यही नियन्त्रण रेखा, भारत तथा पाकिस्तान की वास्तविक नियन्त्रण रेखा है।

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