मार्च 1998 से वर्तमान काल में भारत पाकिस्तान सम्बन्धों की प्रकृति एवं इतिहास

भारत पाकिस्तान सम्बन्धों की प्रकृति एवं इतिहास

भारत पाकिस्तान सम्बन्धों की प्रकृति 

मार्च 1998 में बी० जे० पी० के नेतृत्व में बनी गठबन्धन सरकार की स्थापना के बाद से लेकर अब तक, यानी लगभग तीन वर्षों के समय में, भारत-पाक सम्बन्धों में कई प्रकार के उतार-चढ़ाव आये । परमाणु परीक्षण, बस कूटनीति, लाहौर घोषणा, कारगिल युद्ध, कारगिल युद्ध में पाकिस्तान की असफलता, पाकिस्तान में सैनिक सत्तावादी शासन की स्थापना, भारत में राष्ट्रीय लोकतन्त्रीय गठबन्धन की नई सांझी सरकार की स्थापना, अमरीकी राष्ट्रपित बिल क्लिंटन की भारत यात्रा से उत्पन्न स्थिति आदि प्रमुख घटनाओं ने भारत पाकिस्तान सम्बन्धों का निर्धारण किया और दुर्भाग्यवश यह निर्धारण नकारात्मक दिशा की ओर ही हुआ तथा आज 21वीं शताब्दी में भी यह वातावरण नकारात्मक ही बना हुआ है।

मार्च 1998 में सत्ता में आने के बाद बी० जे० पी० के नेतृत्व वाली सांझा सरकार ने भारत की विदेश नीति को गुटनिरपेक्षता, पंचशील, अच्छा पड़ोसीपन, लाभकारी द्विपक्षीयवाद, विकास के लिये क्षेत्रीय सहयोग, भारत की सुरक्षा के लिये अधिक सतत् प्रयास तथा परमाणु विकल्प अपनाने के सिद्धान्तों पर आधारित किया। पाकिस्तान के साथ ही अच्छे सम्बन्धों की कामना की गई।

नई सरकार ने भारतीय परमाणु नीति में परिवर्तन करने का निर्णय लिया गया 11 और 13 मई 1998 को पाँच (3+2) परमाणु परीक्षण (पोखरां II) करके भारत को परमाणु शस्त्र धारक देश घोषित कर दिया। इस नई नीति के पक्ष में जो तर्क दिये गये उनमें से एक था चीन-पाकिस्तान की परमाणु क्षेत्र में गुटबन्दी तथा पाकिस्तान का छिपे रूप में परमाणु शस्त्र बनाना।

भारत द्वारा परमाणु परीक्षण किये जाने के विरुद्ध पाकिस्तान में तेज प्रतिक्रिया हुई तथा 29 मई, 1998 को इसने भी छः परमाणु परीक्षण करने के बाद अपने आप को परमाणु शस्त्र धारक देश घोषित कर दिया। अपने परमाणु परीक्षणों तथा परमाणु शस्त्रों को पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध शक्ति संग्रहण के रूप में पेश किया तथा प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ ने यह घोषणा की कि पाकिस्तान के शस्त्र और मिसाइलें भारत से सभी शहरों को पार करने में सक्षम थीं। पाकिस्तान का छिपा हुआ परमाणु शस्त्र कार्यक्रम अब खुला हो गया तथा इसने अब खुले रूप में अपने कार्यक्रम को भारत का मुकाबला करने के लिये आवश्यक प्रोग्राम के रूप में उचित ठहराना आरम्भ कर दिया।

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ऐसे वातावरण में भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध अत्यंत तनावपूर्ण और खराब हो गये। ‘परमाणु धमकी’ ने वातावरण को गम्भीर बना दिया।

भारत ने अपनी नई परमाणु नीति और कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए उचित तथा आवश्यक माना परन्तु पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों के वातावरण में उत्पन्न तनावों को कुछ कम करने का प्रयास भी किया तथा कहा कि भारत कभी भी पहले परमाणु शस्त्रों का प्रयोग नहीं करेगा (No first use of the weapons)। इसने पाकिस्तान द्वारा कश्मीर के मुद्दे को दक्षिण एशिया की सुरक्षा से जोड़ने के प्रयास को निरस्त किया तथा भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय मुद्दों, विवादों तथा सम्बन्धों में किसी तीसरे देश की भूमिका की सम्भावना को पूर्णरूप से नकार दिया। पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्तालाप की आवश्यकता की बात को भारत ने फिर दोहराया।

ऐसी बातचीत के लिये पहला अवसर उस समय पैदा हुआ जब जुलाई 1998 को कोलम्बो सार्क शिखर सम्मेलन में भारत तथा पाकिस्तान के प्रधानमन्त्रियों ने बैठक की। परन्तु परिणाम शून्य ही रहा। पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री श्री नवाज शरीफ ने इसे शून्य बैठक (Zero meeting) कहा तथा कश्मीर को भड़काने के लिये तैयार चिंगारी कहकर कश्मीर मुद्दे के अन्तर्राष्ट्रीयकरण का प्रयास किया। यहाँ तक कि पाकिस्तान ने भारत के साथ परमाणु युद्ध छिड़ने की सम्भावना की बात भी कर दी। पाकिस्तान ने सार्क मंच को कश्मीर मुद्दे को उठाने के लिये प्रयोग करना चाहा। परन्तु भारत ने ऐसे प्रयास को सार्क के सम्मेलन में सफल न होने दिया। ऐसे वातावरण में भारत-पाक सम्बन्ध तनावपूर्ण ही बने रहे।

इस समय यह आशा की गई कि दोनों देशों के प्रधामन्त्री नाम शिखर सम्मेलन (NAM Summit) (सितम्बर 1998) के समय फिर मुलाकात करेंगे परन्तु ऐसा हो न सका क्योंकि आंतरिक खराब परिस्थितियों के कारण पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री नाम सम्मलेन (NAM Summit) में शामिल ही नहीं हो सके।

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श्री वाजपेयी तथा श्री नवाज शरीफ की मुलाकात का एक अवसर तब बना जब सितम्बर 1998 में दोनों नेता संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में भारत लेने के लिये न्यूयार्क गये। जबकि श्री नवाज शरीफ ने अपने भाषण में कश्मीर के मुद्दे को उठाया और यह कहा कि दक्षिण एशिया में शक्ति सन्तुलन को पोखरां विस्फोटों द्वारा असंतुलित करने का दोषी भारत था, वहाँ श्री वाजपेयी ने प्रत्यक्ष रूप में पाकिस्तान की आलोचना न करके परिपक्वता का परिचय दिया। उन्होंने केवल अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद तथा पार-सीमा आतंकवाद की बुराई से शक्तिशाली तथा व्यवस्थित रूप से निपटने का आह्वान किया। बाद में दोनों नेताओं के बीच में एक बैठक हुई तथा यह सहमति बनाई गई कि द्विपक्षीय वार्तालाप को दोबारा आरम्भ किया जाये तथा यह वार्तालाप 216 के फार्मूले कश्मीर तथा शांति एवं सुरक्षा तथा क्षेत्र में सुरक्षा के मुद्दे को दो प्रमुख मुद्दे मानकर छ: अन्य मुद्दों पर वार्तालाप के आधार पर हो ।

इसके बाद भारत तथा पाकिस्तान में वार्तालाप के दो दौर हुए तथा क्रिकेट कूटनीति को भी आरम्भ किया गया। लेकिन इस प्रक्रिया से कोई निश्चित तथा ठोस परिणाम प्राप्त न किया जा सका। परन्तु । जनवरी, 1999 को भारत तथा पाकिस्तान ने 1991 के “परमाणु संस्थानों तथा सुविधाओं पर आक्रमण की मनाही के समझौते” के अन्तर्गत अपने-अपने परमाणु संस्थानों तथा सुविधाओं की सूची को एक दूसरे को सौंप दिया।

बस कूटनीति तथा एक पहल

(Bus Diplomacy and the Break-through)

भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों को सुधारने की दिशा में एक नई पहल बस कूटनीति के द्वारा आरम्भ हुई, जब 19 फरवरी, 1999 को भारत के प्रधानमन्त्री श्री वाजपेयी ने वाघा बार्डर के सड़क मार्ग से पाकिस्तान की यात्रा की तथा प्रधानमन्त्री श्री नवाज शरीफ से मुलाकात की। श्री वाजपेयी के साथ सरकारी नेताओं/अधिकारियों के साथ 22 प्रसिद्ध व्यक्तियों का समूह भी पाकिस्तान गया। उत्तर पोखरां-चगाई काल में दोनों देशों ने इस दृढ़ कदम के द्वारा आपसी सम्बन्धों को एक अच्छी तथा उच्च सकारात्मक तथा प्रगतिशील दिशा और स्वस्थता देने का प्रयास किया। एक अच्छे वातावरण में वार्तालापों तथा बैठकों के बाद दोनों देशों ने तीन महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों-लाहौर घोषणा, संयुक्त वक्तव्य तथा आपसी समझ के यादपत्र हस्ताक्षर किये तथा द्विपक्षीय सम्बन्धों को एक अच्छा आरम्भ और आधार देने का प्रयास किया। दोनों देशों के नेताओं ने आपसी सम्बन्धों, शांति तथा सुरक्षा के मुद्दे, परमाणु विषय से सम्बन्धित मुद्दों पर बातचीत की तथा यह सहमति बनाई कि क्षेत्र में शस्त्र-दौड़ न चलाई जाये तथा परमाणु तथा परम्परागत विश्वास निर्माण पगों को उठाया जाये ताकि परमाणु क्षेत्र में संयम तथा स्थायित्व पैदा किया जा सके।

भारत तथा पाकिस्तान के द्वारा जिन तीन दस्तावेजों पर प्रधानमन्त्री श्री वाजपेयी की लाहौर यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किये गये उनकी समीक्षा करने पर यह बात स्पष्ट दिखाई दी (विशेषकर लाहौर घोषणा में) कि दोनों देशों ने जम्मू तथा कश्मीर सहित आपसी सभी समस्याओं का समाधान करने के लिये प्रयासों को दृढ़ तथा तेज करने तथा एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के निर्णय लिये। दोनों ने यह माना कि परमाणु शस्त्रों के दुर्घटना वश तथा अनधिकृत प्रयोग पर रोक लगाने के लिये तत्काल पग उठाए जायेंगे तथा उन धारणाओं और सिद्धान्तों पर विचार किया जायेगा जिनका उद्देश्य होगा विरोध को रोकना तथा परमाणु और परम्परागत क्षेत्रों में विश्वास उत्पन्न करने वाले विस्तृत उपायों को अपनाना। दोनों देशों ने शिमला समझौते के प्रावधानों तथा भावना को लागू करने के निश्चय को, पूर्ण सार्वभौमिक परमाणु निःशस्त्रीकरण तथा परमाणु अप्रसार के उद्देश्यों की ओर प्रतिबद्धता को, तथा सार्क के उद्देश्यों तथा लक्ष्यों के प्रति वचनबद्धता को दोहराया। दोनों पक्षों द्वारा सभी रूपों में आतंकवाद की आलोचना की गई तथा इस बुराई की समाप्ति के लिये संघर्ष करने के निश्चय को प्रकट किया गया।

प्रधानमन्त्री श्री वाजपेयी की पाकिस्तान यात्रा के बाद जो संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया उसमें सभी तथ्यों को लिखा गया तथा यह कहा गया कि समय-समय पर दोनों देशों के विदेश मन्त्री बैठक किया करेंगे तथा आपसी रुचि के सभी मुद्दों, परमाणु मुद्दे सहित, पर चर्चा करेंगे, दोनों देश विश्व व्यापार संगठन (WTO) से सम्बन्धित मुद्दों पर परामर्श करेंगे, वीज़ा तथा यात्रा व्यवस्थाओं को उदार बनाने पर विचार विमर्श किया जायेगा, सूचना तकनालोजी, विशेषकर Y2K समस्या पर नियंत्रण पाने के लिये सहयोग के क्षेत्रों का निर्धारण करने के लिये सहयोग किया जायेगा तथा मन्त्री स्तर पर एक दो सदस्यीय समिति को नियुक्त किया जायेगा ताकि हिरासत में लिये गये नागरिकों तथा गुमशुदा युद्धबंदियों से सम्बन्धित मानववादी मुद्दों का परीक्षण किया जा सके।

समझ के यादपत्र की विशेषताएँ (Memorandum of Understanding)

इस यात्रा के दौरान भारत तथा पाकिस्तान के विदेश सचिवों द्वारा जिस समझ के यादपत्र (Memorandum of Understanding) पर हस्ताक्षर किये, उसकी मुख्य विशेषताएँ थीं-

  1. सुरक्षा धारणाओं तथा परमाणु सिद्धान्तों पर दोनों पक्षों द्वारा द्विपक्षीय विचार विमर्श किया जायेगा ताकि परमाणु तथा परम्परागत क्षेत्रों में विश्वास-निर्माण के लिये उपायों को विकसित किया जाये तथा विरोध से दूर रहा जाये।
  2. दोनों पक्ष मिसाइल उड्डयन परीक्षणों की पूर्व सूचना एक दूसरे को देंगे।
  3. अपने-अपने नियंत्रण अधीन परमाणु शस्त्रों के दुर्घटनावश या गैर-अधिकृत प्रयोग के खतरे को कम करने के लिये अपने-अपने राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाएंगे।
  4. बहुपक्षीय मंच पर हो रहे वार्तालाप के सन्दर्भ में दोनों देश, सुरक्षा, निःशस्त्रीकरण तथा परमाणु अप्रसार के मुद्दों पर द्विपक्षीय विचार विमर्श करेंगे।

इस तीनों दस्तावेजों तथा श्री वाजपेयी की यात्रा के दौरान प्रदर्शित व्यवहार ने यह आशा बन्धाई कि आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों में एक विशाल तथा सकारात्मक प्रगति होगी तथा दोनों देशों के लोग आपसी विश्वास तथा सहयोग के एक नये युग का आरम्भ होते देखेंगे। परन्तु ऐसा हुआ नहीं अथवा ऐसा हो नहीं सका क्योंकि पाकिस्तान ने लाहौर सद्भावना की पीठ में छुरा घोंपने की प्रक्रिया पहले ही आरम्भ कर कार्यवाही में शामिल थे। उसने घुसपैठियों को मुजाहिदीन (Freedom Fighters) बतलाया और यह भी कहा कि नियंत्रण रेखा न तो निश्चित थी और न ही जमीन पर निर्धारित थी। इसका अस्तित्व केवल कागज पर ही था। इस प्रकार पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा के अस्तित्व को ही स्वीकार करने से इन्कार कर दिया तथा ऐसा करते समय वह भूल गया कि शिमला समझौते (1972) के समय नियंत्रण रेखा का निर्धारण भी हुआ था तथा इसे मान्यता भी दी गई थी। वास्तव में पाकिस्तान की कारगिल अतिक्रमण की खेल योजना निम्नलिखित थी-

  1. कारगिल में युद्ध की स्थिति पैदा करके कश्मीर के मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना तथा नियंत्रण रेखा को चुनौती देना।
  2. दूसरे देशों को इस झगड़े में शामिल करना तथा भारत पर दबाव बनाना।
  3. लाहौर घोषणा को आड़ के रूप में प्रयोग करके अपने आपको एक शांतिप्रिय देश के रूप में प्रस्तुत करना तथा भारत को कश्मीर मुद्दे पर अड़ियल रवैया अपनाने का दोषी करार देना।
  4. भारत के साथ-मुद्दे पर द्विपक्षीय बातचीत की पेशकश करके अपने आप को शांति प्रिय तथा कूटनीतिक प्रयासों में विश्वास रखने वाले देश के रूप में पेश करना।

11 जून, 1999 को भारत सरकार ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ तथा उसके जनरल स्टाफ प्रमुख लै० जनरल मोहम्मद अज़ीर की बातचीत (जो मई 26 तथा 29, 1999 को टेलीफोन पर हुई थी) का ब्यौरा प्रकाशित करके यह स्पष्ट सिद्ध कर दिया कि कारगिल में घुसपैठ तथा अतिक्रमण में प्रत्यक्ष रूप में पाकिस्तानी सेना शामिल थी तथा इसका उद्देश्य भारतीय कारगिल क्षेत्र की उच्च चोटियों पर कब्जा करके नियंत्रण रेखा को पाकिस्तान के पक्ष में परिवर्तित कर देना था।

12 जून, 1999 को पाकिस्तान के विदेश मन्त्री श्री सरताज अजीज, चीन का दौरा करने के बाद, भारत पहुँचे और भारत के विदेश मन्त्री श्री जसवंत सिंह से वार्तालाप किया। परन्तु, इससे कोई भी प्रगति न हो सकी जैसा कि आशा थी। भारत तथा पाकिस्तान ने अपनी-अपनी नीतियों को स्पष्ट घोषित किया तथा कारगिल युद्ध पहले की तरह चलता रहा।

भारत ने एक ओर तो अपनी सेना को आदेश दिये कि वह अपना क्षेत्र अतिक्रमण करने वालों से खाली करवा कर नियंत्रण रेखा के स्वरूप को पहले की तरह बहाल करे, तो दूसरी ओर विशेष कूटनीति प्रयास आरम्भ किये ताकि पाकिस्तानी चाल, धोखे तथा अतिक्रमण को सब के सामने लाया जा सके। विदेश मन्त्री श्री जसवंत सिंह ने चीन समेत कई देशों का दौरा किया तथा भारतीय नीति तथा कार्यवाही के बारे में उन्हें सूचना दी तथा पाकिस्तानी अवैध कार्यवाही के सम्बन्ध में तथ्यों की जानकारी दी। अमरीका, रूस, जर्मनी, जापान, इंग्लैण्ड, जी-7 के अन्य देशों, यूरोपीय संघ के अनेक देशों अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के सभी प्रमुख कर्ताओ ने यह माना कि पाकिस्तान को नियंत्रण रेखा का सम्मान करना चाहिए तथा उसकी ओर से हो रही घुसपैठ तथा अतिक्रमण को रोका जाना चाहिए। भारतीय प्रधानमन्त्री ने भी 20 जून, 1999 को स्पष्ट रूप से घोषणा की कि जब तक अतिक्रमण करने वालों को भारतीय क्षेत्र से खदेड़ नहीं दिया जाता तब तक पाकिस्तान के साथ कोई बातचीत नही की जायेगी। भारतीय सेना द्वारा चलाया जा रहा विजय अभियान (Operation Vijay) अपने लक्ष्य की ओर निरंतर प्रगति करता-करता अब तक काफी अच्छी स्थिति में पहुँच चुका था तथा कारगिल, बटालिक तथा द्रास के बहुत से क्षेत्रों पर फिर से भारतीय नियंत्रण स्थापित हो गया। 9 जुलाई, 1999 को, भारतीय सैनिक कार्यवाही के बढ़ते दबाव तथा अमरीका द्वारा पाकिस्तान पर डाले गये कूटनीतिक दबाव के कारण पाकिस्तान के सत्ताधारियों ने घुसपैठियों को वापस बुलाने का निर्णय लिया। 11 जुलाई, 1999 के दिन भारत तथा पाकिस्तान के सैनिक कार्यवाहियों के निदेशक जनरलों (Director Generals Military Operations-DGMOS) के मध्य, अटारी सीमा पर बैठक हुई तथा सैनिक कार्यवाही को बन्द करने तथा पाकिस्तान द्वारा घुसपैठियों को निश्चित समय सीमा में वापस बुलाने के निर्णय पर सहमति हुई। शीघ्र ही इन निर्णय को व्यावहारिक रूप भी दे दिया जाने लगा परन्तु कागरिल-द्रास-बटालिक क्षेत्रों में छिटपुट गोलाबारी होती ही रही।

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