स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक वर्षों में भारत तथा सं० रा० अमेरिका संबंध

भारत तथा अमेरिका के संबंध

भारत तथा अमेरिका के संबंध

डॉ० बलजीत सिंह  लिखते हैं, “भारत-अमरीकी सम्बन्धों के प्रारम्भिक वर्ष एक ऐसे नवविवाहित जोड़े की तरह थे जो शादी होते ही, यहाँ तक कि मधुमास की छोटी-सी विलासिता के बिना ही, एक दूसरे के दृष्टिकोणों, इच्छाओं-अनिच्छाओं तथा पसन्दों को समझने के गम्भीर कार्य को लेकर बैठ गए हैं। अनेक गलतफहमियों का पैदा हो जाना तथा परिणामस्वरूप कटु तर्कों का आदान-प्रदान स्वाभाविक ही था।” 1940 के दशक में दोनों ही राज्य एक दूसरे के सान्निध्य में अचानक ही आ गए। फिर एक दूसरे के चरित्र तथा इच्छाओं को दस वर्ष तक परखने में गुजारने के बाद पारस्परिक लाभदायक सम्बन्धों को बनाने के गम्भीर कार्य में जुट गए। सुरजीत मान सिंह के शब्दों में, “भारत तथा अमरीका के बीच सम्बन्ध कभी नियोजित नहीं थे तथा न ही इनके बारे में कोई भविष्यवाणी की जा सकती थी। इन दोनों के बीच विकास की कोई सामान्य रेखा दृष्टिगोचर नहीं होती।”

नेहरू युग भारत की विदेश नीति के निर्माण का उषाकाल था। नेहरू स्वयं अपने विदेश मंत्री थे तथा स्वतन्त्रता के बाद वे तत्काल ही विदेश नीति के निर्माण में तथा दूसरे देशों विशेषतया महा-शक्तियों के साथ सम्बन्ध कायम करने में जुट गए।

  1. 1947 से लेकर 1952 के मध्य सम्बन्ध

    दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद भारत के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति की सम्भावनाएँ अधिक हो गईं। फरवरी, 1944 में श्री आसफ अली को अमरीका में भारत का राजदूत बना कर भेजा गया तथा इससे अमरीका तथा भारत के सम्बन्धों का दौर शुरू हुआ। तथापि भारत-अमरीकी सम्बन्ध 1949 तक कोई विशेष प्रगति नहीं कर सका। अमरीका यूरोप के मामलों में तथा साम्यवाद के नियन्त्रण में बुरी तरह से उलझा रहा। अब तक शीत युद्ध शुरू हो चुका था तथा अमरीका का ध्यान अब शीत युद्ध में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने तथा विश्व राजनीति में महाशक्ति के रूप में स्थिति को बनाए रखने की ओर लगा रहा। वह अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अपनी नई भूमिका के अनुरूप अपने आप को ढालने लगा, इसलिए उसने भारत के साथ सम्बन्धों में कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई। भारत भी स्वतंत्रता के बाद अपने घरेलू मामलों में उलझ गया। यद्यपि नेहरू ने अमरीका के साथ सम्बन्धों के महत्त्व को समझ लिया था परन्तु फिर भी 2 अक्तूबर, 1949 से पहले वहाँ नहीं जा सके। वे अमरीका के साथ भारत के सम्बन्धों के महत्त्व को समझते थे इसलिए अमरीका के साथ मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगात्मक सम्बन्ध स्थापित कर सकने के लिए काफी आशावान थे। सन् 1946 में अन्तरिम सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में भी नेहरू ने भारत तथा अमरीका के बीच गहरे मैत्रीपूरण तथा सहयोगात्मक सम्बन्ध स्थापित हों। तथापि भारत के प्रति अमरीका की उदासीनता, अमरीका की शीत युद्ध की नीति तथा अमरीका के कुछ अन्य निर्णय सभी उनकी नजर में सन्देहास्पद तथा भय उत्पादक थे। भारत की प्रारम्भिक विदेश नीति निर्णयों, जो एशिया में भारत की मुख्य भूमिका के सम्बन्ध में थे, तथा शीत युद्ध में तटस्थ रहने के निर्णयों का अमरीका के विदेश नीति निर्माताओं तथा राजनेताओं ने कड़ा विरोध किया। अमरीकी भारत की संधियों तथा शीत युद्ध से अलग रहने की नीति के प्रति आशंकित थे। तथा इसे साम्यवाद के नियन्त्रित करने के लिए की गई अपनी सुरक्षा संधियों की नीति के रास्ते में बहुत बड़ी रुकावट मानते थे। विदेश नीति में स्वतंत्रता की भारत की इच्छा, साम्यवादी रूस की बढ़ती शक्ति को नियन्त्रित करने के लिए सन्धि द्वारा लोकतान्त्रिक देशों को सुदृढ़ करने की अमरीका की इच्छा के बिल्कुल विरुद्ध थी।

  2. कश्मीर समस्या एवं भारतअमरीकी सम्बन्ध

    सन् 1948 में कश्मीर की समस्या ने भारत-अमरीका सम्बन्धों में सर्वप्रथम तनाव पैदा किया। संयुक्त राष्ट्र संघ में माऊंटबैटन तथा ब्रिटिश तथा अमरीकी, प्रतिनिधियों के प्रभाव के कारण ही भारत ने कश्मीर समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में पेश करने का निर्णय किया था। तथापि संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर पर बहस के दौरान अमरीकी तथा पश्चिमी विचार पाकिस्तान के ही पक्ष में रहे। वास्तव में इस समय तक अमरीका ने यह सोचना शुरू कर दिया कि शायद पाकिस्तान की सुरक्षा संधियों को स्वीकार कर लेगा। ऐसा इसलिए सोचा गया क्योंकि नेहरू की यात्रा के तुरन्त बाद ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की अमरीका यात्रा को अत्यधिक महत्त्व दिया गया था। कश्मीर पर भारत के दृष्टिकोण को समझने में अमरीका की कमी ने दोनों देशों के बीच एक बड़ी खाई पैदा कर दी।

  3. चीन की मान्यता का प्रश्न तथा भारतअमरीका सम्बन्ध

    1949 ई० में जब चीन माओ के नेतृत्व में एक साम्यवादी देश के रूप में उभर कर सामने आया तो भारत ने चीन के लिये अपने सम्बन्धों के महत्त्व को समझते हुए दिसम्बर, 1949 में इसको पूर्ण मान्यता देने का निश्चय किया। भारत के इस निर्णय पर अमरीका ने अप्रसन्नता तथा कड़ा विरोध प्रकट किया क्योंकि वह समझता था कि ऐसा निर्णय साम्यवाद के नियन्त्रण की अमरीका की नीति के विरुद्ध था। अमरीका ने यह महसूस किया कि भारत का यह निर्णय अमरीका के विरुद्ध रूस की सहायता करेगा तथा इस प्रकार विश्व के विभिन्न भागों में साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव को और अधिक बल देगा। इसलिए चीन भारत-अमरीकी सम्बन्धों को परेशान करने वाला तथा रुकावट डालने वाला तत्त्व बन गया। एन० डी० पामर का मत है, “1950 के दशक के मध्य में भारत तथा अमरीका, साम्यवादी चीन के प्रति अपने-अपने व्यवहार में एक दूसरे से कोसों दूर थे। भारत साम्यवादी चीन के साथ समझौता करना चाहता था तथा राष्ट्रों के अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में उसने चीन के शासन की पूर्ण मान्यता का समर्थन किया। इसके विपरीत अमरीका साम्यवादी चीन को मान्यता न देने का समर्थक था । राष्ट्रवादी चीन का मुख्य समर्थक था जिसे भारत ने बिलकुल मान्यता नहीं दी थी। भारतीय नेता, अमरीका की चीन नीति की खुली आलोचना करते थे क्योंकि वे महसूस करते थे कि अमरीका एशिया की वास्तविकताओं का सामना करने से इन्कार कर रहा था।”

  4. कोरिया का संकट तथा भारतअमरीकी सम्बन्ध

    सन् 1950 में एक बार फिर भारत-अमरीका के दृष्टिकोण में कोरिया को लेकर मतभेद उभर कर सामने आए। पहले पहल तो भारत ने उत्तरी कोरिया को आक्रमक बताने में अमरीका का साथ दिया। तथापि बाद में जब अमरीका ने साम्यवादी चीन का विरोध करने के लिए कोरिया की समस्या को ढाल बनाने का प्रयास किया, जैसा कि कोरिया में38वें अक्षांश को पार करने के अमरीकी निर्णय से पता चला है, तो भारत ने अमरीकी निर्णय का विरोध किया तथा साथ-साथ ही अमरीका के “शान्ति के लिए इकट्ठा होने के प्रस्ताव” का विरोध करने से भी नहीं हिचकिचाया।

  5. भारतसोवियत मैत्री तथा भारतअमरीका सम्बन्ध

    स्टालिन के बाद के काल में रूस के साथ भारत के मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का प्रारम्भ भी अमरीका को अच्छा नहीं लगा। सन् 1955 में नेहरू की रूस यात्रा तथा उसके बाद रूसी नेता खुश्चेव तथा बुलगानिन की भारत यात्रा तथा रूसी-भारतीय भाई-भाई के नारे ने एक बार फिर अमरीका को नाराज कर दिया। 1954 ई० के बाद कश्मीर के मामले पर पाकिस्तान को अमरीका का खुला समर्थन स्पष्ट हो गया। इसके विपरीत सोविययत संघ ने कश्मीर के विषय पर भारत का समर्थन करना शुरू कर दिया। इससे भारत-रूस मैत्री के अवसर अधिक उज्ज्वल हो गए तथा भारत-अमरीकी सम्बन्धों में सुधार के अवसर कम हो गए। इसके अतिरिक्त अमरीका का कुछ उपनिवेशीय मामलों पर भारत का समर्थन करने से इन्कार तथा हिन्द-चीनी में तथा मध्यपूर्व में अमरीका की भूमिका का विरोध करने भारत का निर्णय भी अमरीका तथा भारत के सम्बन्धों में रुकावट बन गया। इस प्रकार 1956 ई० तक अमरीकी नेता, विशेषतया मि० डल्स ( Dulles) ने भारत को रूस समर्थक देश मानना शुरू कर दिया।

  6. 1950 के दशक के अन्तिम वर्षों में भारतअमरीकी सम्बन्ध

    1950 ई० में नेहरू ने अमरीका का एक दूसरा दौरा किया तथा भारत- अमरीका मित्रता तथा सम्बन्धों को सुदृढ़ बनाने का प्रयल किया। तथापि इस यात्रा से, अतिरिक्त भारत को खाद्य सहायता देने के, कोई और विशेष लाभ नहीं हुआ। 1956 ई० में भारत ने स्वेज संकट समस्या पर अमरीका के परिवक्व निर्णय की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा इससे दोनों के सम्बन्धों में कुछ सुधार हुआ। तथापि हंगरी में रूस के हस्तक्षेप की आलोचना करने से भारत का इन्कार तथा मध्य पूर्व में लेबनान में अमरीका संलिप्तता का भारत द्वारा विरोध, इन सबका बुरा प्रभाव पड़ा तथा भारत-अमरीकी सम्बन्ध आशा के अनुसार गरिमा उत्पन्न न कर सके। 1959 ई० में अमरीका के राष्ट्रपति आइजनहावर ने भारत की यात्रा की। इस यात्रा से दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार की एक नई आशा का संचार हुआ। इस समय तक भारत अपनी उत्तरी सीमाओं पर चीन के बढ़ते खतरों से सचेत हो चुका था तथा उसे अमरीका से मित्रता करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी थी। परिणामस्वरूप भारत कई क्षेत्रों में अमरीका के साथ सम्बन्धों को बढ़ाने में अधिक रुचि लेने लगा था। सन् 1960 में अमरीका में राष्ट्रपति के चुनावों में मि० जे०एफ० कैनेडी विजयी हुए। मि० जे० एफ० कैनेडी भारत-अमरीका मैत्री के जाने-माने समर्थक थे तथा सीनेटर के रूप में उन्होंने भारत के साथ गहरी मैत्री का समर्थन किया था। नवम्बर 1959 में अपने प्रसिद्ध रिवरसाइड कैलिफोर्निया भाषण में उन्होंने भारत तथा चीन के बीच एशिया के राजनीतिक तथा आर्थिक नेतृत्व के संघर्ष के बारे में अपने विचार प्रस्तुत किए तथा एशिया के सम्मान के लिए किस का जीवन-यापन का रास्ता दूसरे से श्रेष्ठ है, सिद्ध करने का अवसर माना । “हम चाहते हैं कि भारत इस संघर्ष में लाल चीन से जीत जाए। स्वतन्त्र तथा सम्पन्न भारत स्वतन्त्र तथा सम्पन्न एशिया का नेता बने।” ऐसा कहकर उन्होंने भारत के प्रति अपनी सहानुभूति में कोई सन्देह नहीं रहने दिया। इस प्रकार जब जनवरी 1961 में मि० कैनेडी अमरीका के राष्ट्रपति बने तो दोनों देशों के बीच सम्बन्धों में सुदृढ़ता आने की आशाएँ सुदृढ़ हो गई।

  7. भारत पर चीन का आक्रमण एवं भारतअमरीकी सम्बन्ध

    कैनेडी के प्रशासन के दौरान 1962 ई० में, जब भारत चीन के आक्रमण का शिकार हुआ और परिणामस्वरूप उसे अमरीका की सैनिक तथा आर्थिक सहायता की आवश्यकता नहीं तो भारत को अमरीका के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ। अमरीका इस संकट के समय भारत की सहायता के लिए तत्परता से आगे आया तथा अमरीका ने तुरन्त ही छोटे शस्त्र भारत भेजने आरम्भ कर दिए तथा भारत के आकाश की सुरक्षा के लिए उसे अमरीकी हवाई सेना की सुरक्षा का आश्वासन भी दिया। अमरीका की इस सहायता की भारतीयों ने बहुत प्रशंसा की तथा वे अमरीका तथा श्री कैनेडी के आभारी हो गये। तथापि इस अवसर पर भी भारत ने गुट-निरपेक्षता को छोड़ने से इन्कार कर दिया। नेहरू ने यह घोषणा की कि भारत सभी देशों से सहायता स्वीकार करेगा तथा उसकी प्रशंसा भी करेगा परन्तु कभी भी अपनी गुट-निरपेक्षता के साथ समझौता नहीं करेगा। इसलिए अमरीका ने भारत को केवल सीमित सहायता देने का निर्णय किया। क्यूबा के मिसाइल संकट में शामिल होना तथा रूस के साथ नए प्रकार के दीतां में शामिल होने की अमरीका की नई इच्छा ने 1962 के बाद के काल में भारत-अमरीकी सम्बन्धों की गति में थोड़ा अवरोध पैदा कर दिया। तथापि इसके बावजूद 1962-63 का समय भारत-अमरीका के सम्बन्धों का अच्छा समय था। चीन के आक्रमण के समय तथा बाद में भारत को अमरीका की नैतिक तथा आर्थिक सहायता ने एक ऐसा वातावरण पैदा कर दिया जिससे दोनों देशों के बीच सम्बन्धों के सुधरने के उज्ज्वल अवसर स्पष्ट हो गए। तथापि इस आदर्श वातावरण में भी भारत-अमरीकी सम्बन्ध कुछ नकारात्मक घटनाओं के कारण सुधर न सके। अमरीका दबावों के अन्तर्गत ही ही भारत को पाकिस्तान के साथ कश्मीर समस्या पर बातचीत करनी पड़ी। मई 1963 में अमरीका ने भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में बोकारो में इस्पात प्लांट लगाने के लिए सहायता देने से इन्कार कर दिया। नवम्बर 1963 में कैनेडी की हत्या तथा उपरिलिखित दो घटनाओं के कारण, भारत तथा अमरीका के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना के अवसर फिर कम हो गए।

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नेहरू युग में भारत-अमरीकी सम्बन्धों का मूल्यांकन

1947 ई० से लेकर 1964 ई० तक भारत तथा अमरीका के सम्बन्धों के उपरिलिखित विवरण से तनावों का स्पष्ट वर्णन मिलता है। इसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि नेहरू युग में दोनों देशों के बीच सहयोग नाम की कोई चीज नहीं थी। 1950 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में भारत तथा अमरीका के बीच आर्थिक सम्बन्ध महत्त्वपूर्ण ढंग से विकसित हुए। नेहरू युग में अमरीका ने भारत को बहुमूल्य आर्थिक एवं खाद्यान्न सहायता प्रदान की। अमरीका के राजदूत चैस्टर बाउल्स ने अमरीका तथा भारत के बीच आर्थिक सम्बन्धों के विकास को अच्छी दिशा दी तथा उन्हीं के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप ही अमरीका ने भारत को आर्थिक एवं खाद्यान्न सहायता प्रदान करना शुरू किया। 1953 ई० में अमरीका की सहायता तथा समर्थन से भारत सहायता क्लब की स्थापना की गई। इस क्लब के अन्य सदस्यों के साथ अमरीका ने भी भारत की आर्थिक योजनाओं को सफल बनाने के लिए आर्थिक सहायता देना शुरू किया। इस प्रकार भारत अमरीका आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाला एक मुख्य देश बन गया।

मई 1960 में, भारत तथा अमरीका के बीच पी० एल० 480 (P.L.480) समझौता हुआ जिसके अन्तर्गत अमरीका ने रुपये के बदले तथा कम कीमत पर भारत को अनाज देना स्वीकार किया। इसके अतिरिक्त यह भी स्वीकार किया गया कि पी० एल० 480 (P.L.480) कोष को भारतीय रिजर्व बैंक में जमा करवाया जायेगा। भारत ने अमरीका से न केवल अनाज ही प्राप्त करना शुरू किया बल्कि भारतीय कृषि के विशेषज्ञों को प्रशिक्षण देने तथा भारत में कृषि अनुसंधान संस्थान की स्थापना के लिए अमरीका से बहुमूल्य सहायता प्राप्त करना शुरू कर दिया। इस समय के दौरान अमरीका ने कुछ बहुमुखी योजनाओं तथा स्वास्थ्य योजनाओं को पूरा करने के लिए भी सहायता एवं सहयोग प्रदान किये। दिसम्बर, 1963 को भारत तथा अमरिका ने एक समझौता किया जिसके द्वारा अमरीका ने भारत को तारापुर परमाणु संयंत्र की स्थापना के लिए 8 लाख डालर देना स्वीकार किया। 30 वर्षीय संधि के द्वारा इसने यह भी स्वीकार किया कि भारत को पुष्ट यूरेनियम भी दिया जायेगा, जिसका प्रयोग तारापुर प्लांट में परमाणु ईंधन के रूप में होगा। इससे परमाणु तकनीक के क्षेत्र में भारत-अमेरिकी सहयोग के एक नए युग का सूत्रपात हुआ।

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