शीत युद्ध का अंत

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अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शीत युद्ध का अंत

अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शीत युद्ध का अंत

1917 से 79 ई. तक के काल को छोड़कर 1945 से 1990 ई. तक सारे समय में सारे विश्व को टकरावों तथा झगड़ों में उलझाकर शीत युद्ध समाप्त हो गया। अमरीका तथा (भू.पूर्व) सोवियत संघ 1985 ई. से ही एक परिपक्व तथा अनवरत तनाव शैथिल्य में शामिल हो गए थे। दोनों ने सन् 1987 में INF सन्धि पर तथा 1990 ई. में START सन्धि पर हस्ताक्षर किए। दोनों ने आपसी सम्बन्धों तथा सहयोग को बढ़ाने की दिशा में कार्य करना आरम्भ कर दिया। इसके द्वारा दोनों ही अपने सम्बन्धों को समन्वित कर पाए तथा दोनों ही शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा सहयोग के युग में पर्दापण कर पाए। (भू.पू.) सोवियत संघ में परैसट्राइका तथा ग्लासनॉस्ट तथा पूर्वी यूरोप के देशों पर उनके प्रभाव ने पोलैंड, चैकोस्लोवाकिया, रूमानिया, बुल्गारिया तथा पूर्वी जर्मनी की राजनीतिक व्यवस्थाओं में बहुत परिवर्तन कर दिया। इन परिवर्तनों ने इस राष्ट्रों को पश्चिमी यूरोपीय देशों के बहुत समीप कर दिया; सभी यूरोपीय देशों के बीच सहयोग से एक नये युग की शुरूआत हुई। पश्चिमी जर्मनी तथा पूर्वी जर्मनी एक जर्मनी में इकट्ठे हो गए तथा बर्लिन की दीवार जो यूरोप में शीत युद्ध का प्रतीक तथा जीता जागता उदाहरण थी, अब टूट गई। क्षेत्रीय झगड़ों में महाशक्तियों का हस्तक्षेप कम हो गया। सोवियत संघ अफगानिस्तान से बाहर हो गया। अमरीका अफगानिस्तान के प्रति अपने दृष्टिकोण में अधिक वस्तुगत हो गया। सोवियत संघ तथा इसके समाजवादी गुट का विघटन हो गया। कई स्थानीय युद्ध अब समाप्त हो गए। किसी भी देश ने श्रीलंका की गड़बड़ी से अब कोई फायदा नहीं उठाना चाहा। अमरीका ने भारत तथा पाकिस्तान के बीच कश्मीर की समस्या के प्रति अधिक सकारात्मक तथा परिपक्व स्थिति अपना ली। शीत युद्ध, गठबन्धन राजनीति, शस्त्र-दौड़, परमाणु निवारण, आतंक का संतुलन तथा आक्रामक-शक्ति राजनीति के बारे में विचारधारा का स्थान अब तनाव शैथिल्य, शान्ति, सुरक्षा, विकास, झगड़े वाले मुद्दों को सुलझाने के शान्तिपूर्ण ढंगों, वातावरण की सुरक्षा, निशस्त्रीकरण तथा शस्त्र-नियन्त्रण के लिए बढ़ते सहयोग तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों ने ले लिया। इस प्रकार शीत युद्ध समाप्त हो गया तथा अब इसका स्थान शान्ति, समृद्धि तथा विकास के प्रयास ने ले लिया। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में गोर्बाच्योब संवृत्ति (Phenomenon)- परैसट्राइका तथा ग्लासनॉस्ट ने शीतयुद्ध के युग को समाप्त करने में मुख्य भूमिका निभाई।

सोवियत संघ का विघटन

(Disintegration of the Soviet Union)

विश्व व्यवस्था में 1917 ई. में जो महान् परिवर्तन सोवियत संघ के प्रथम समाजवादी देश के रूप में उदय होने से आया था वह 1991 ई. के अन्तिम महीनों में एक बार फिर महान् परिवर्तन के रूप में विश्व व्यवस्था पर छा गया। सोवियत संघ जो कि 1945 से 1991 ई. तक विश्व राजनीति में एक महाशक्ति के रूप में भूमिका निभाता रहा आन्तरिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समस्याओं के कारण अपने को एक राज्य के रूप में संगठित न रख सका। अगस्त 1991 में गोर्बाच्योव का शासन अपने आप को कट्टरवादी साम्यवादियों की क्रान्ति से तो बचा पाया परन्तु नवम्बर-दिसम्बर, 1991 में अपने आपको सुरक्षित न रख सका। तीन बाल्टिक राज्य Estonia, Latvia and Lithuania तो पहले ही स्वतन्त्र राज्य बन चुके थे। शेष राज्य भी अपनी-अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा करने लगे। केन्द्रीय नेतृत्व सोवियत संघ की एकता तथा अखण्डता की रक्षा न कर पाया तथा संघीय इकाइयों ने अपनी–अपनी स्वतन्त्रता को प्राप्त कर लिया। रूस, बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में सोवियत संघ का उत्तराधिकारी राज्य बना तथा नौ भूतपूर्व रूसी गणराज्यों ने स्वतन्त्रता के पश्चात् अपने आप को एक राष्ट्रमण्डल घोषित कर दिया। यह राष्ट्रमण्डल एक ढीली व्यवस्था ही थी। इसकी न तो कोई साझी सरकार है और न ही इसके सदस्यों में एकता थी। रूस तथा यूक्रेन में जल सेना के विभाजन, समुद्री बेड़े के विभाजन तथा परमाणु शस्त्रों पर स्वामित्व के प्रश्न पर उग्र मतभेद उभर पड़े। सोवियत संघ का पूर्ण विघटन हो गया। रूस अपने आप में एक कमजोर राज्य बन गया। इसके पास परमाणु शस्त्र तो थे परन्तु इसकी आर्थिक व्यवस्था अत्यन्त कमजोर थी। यह पश्चिमी देशों पर निर्भर बना हुआ था।

सोवियत संघ के विघटन, पूर्वी यूरोप के उदारीकरण तथा वार्सा समझौते की समाप्ति के साथ ही शीत युद्ध भी पूर्णतया समाप्त हो गया।

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