जून 1991 से अब तक के मध्य भारत-नेपाल संबंध

भारत-नेपाल सम्बन्ध (जून 1991 से अब तक)

भारत-नेपाल सम्बन्ध

(Indo-Nepal relations Since June 1991)

जून 1991 के बाद भारत तथा नेपाल के मध्य उच्च स्तरीय सम्पर्क बनाये गये तथा दोनों देशों के सम्बन्धों में मैत्रीपूर्ण तथा सहयोगात्मक विकास किये जाने के प्रयास किये गये। यह प्रक्रिया आज भी सक्रियता से चल रही है।

  1. प्रधानमंत्री कोइराला की भारत यात्रा-

    दिसम्बर 1991 में नेपाल के प्रधानमंत्री जी० पी० कोइराला भारत आए। इस यात्रा में व्यापार तथा पारगमन (Trade and Transit) संधि की समस्या का समाधान कर लिया गया तथा दोनों देशों के बीच कई अन्य समझौते भी हुए। श्री कोइराला ने यह घोषणा की कि नेपाल अपनी सुरक्षा के मामले में चीन पर अब और निर्भर नहीं रहेगा। इस यात्रा के दौरान भारत तथा नेपाल के बीच एकदम से नये तथा परिपक्व सम्बन्धों की स्थापना होती दिखाई दी।

बहुत से विवादास्पद मुद्दों जैसे कि जल संसाधन विकास, व्यापार तथा पारगमन की अलग दो संधियों तथा उग्रवाद को दबाने के लिए सहयोग के लिए कई समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये। राष्ट्रपति भवन में श्री नरसिंहाराव तथा श्री कोइराला की उपस्थिति में सम्बन्धित विभागों के सचिवों द्वारा पाँच समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये।

व्यापार, पारगमन, तथा भारत-नेपाल सीमा पर अनधिकृत व्यापार को नियंत्रित करने के लिए सहयोग के क्षेत्र में तीन समझौते किये गये। व्यापार के क्षेत्र में जो समझौता किया गया, उसने करों के सम्बन्ध में और भारतीय बाजारों को नेपाल के माल की पहुंच के सम्बन्ध में काफी रियायतें दीं। यह आशा की गई थी कि विशिष्ट रूप में सहायक पहुँच व्यवस्था की स्थापना से स्वीकृत संयुक्त उद्योगों द्वारा उत्पादित माल के व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।

  1. पारगमन समझौता—

    यह समझौता भारत के मार्ग से नेपाल को अन्य देशों के साथ व्यापार करने की सुविधा देने से सम्बन्धित था। व्यापार समझौता भारत की ओर से नेपाल को कुछ वस्तुओं की आपूर्ति की मात्रा को तथा नेपाल द्वारा कुछ तैयार वस्तुओं को भारत में निर्यात करने की सुविधा को सामने रख कर किया गया था। इससे पहले, श्री कोइराला के सम्मान में दिये गये भोज के समय प्रधानमंत्री श्री नरसिंहा राव ने अपने भाषण में व्यापार क्षेत्र का हवाला देते हुए कहा था कि दोनों देशों के बीच व्यापार केवल अपनी बाजार व्यवस्था की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मौसमी या स्थानीय अतिरेक (Surplus) के विपमन का मामला ही नहीं है। “यह एक गम्भीर तथा सुसंगत आर्थिक कार्यवाही है जो, यदि खुली सीमा तथा साझी उपभोक्ता प्रवृत्तियों के वातावरण में लागू हो, तो परस्पर लाभप्रद आर्थिक अन्तक्रिया का आधार बन सकती है।”

चौथा समझौता कृषि के क्षेत्र से सम्बन्धित था। इससे यह आशा की गई थी कि इससे गांवों में रोजगार देने तथा सभी गांवों में विकास करने के लिए महत्वपूर्ण कार्य करना सम्भव हो सकेगा। कृषि के इस समझौते ने कृषि पर आधारित उद्योग तथा मिट्टी का परीक्षण करने की सुविधाओं के अतिरिक्त इलायची तथा अदरक की खेती करने पर विशिष्ट बल दिया।

पांचवां समझौता नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री के बड़े भाई स्वर्गीय श्री विश्वेश्वर परसाद कोइराला की याद में भारत-नेपाल बिश्वेश्वर प्रसाद कोइराला फाउंडेशन की स्थापना से सम्बन्धित था। भारत तथा नेपाल के विदेश सचिवों श्री जे0 एन0 दीक्षित (Mr. J.N. Dixit) तथा मि0 ए0 विक्रम शाह ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये। इस फाउंडेशन ने शिक्षा, कृषि, जन स्वास्थ्य, विज्ञान तथा तकनीक तथा विकासात्मक अध्ययन के आदान-प्रदान में सहायता देनी थी। श्री नरसिम्हाराव द्वारा फाउंडेशन के ट्रस्ट फंड की स्थापना के लिए भारत की ओर से 2 करोड़ रुपये की राशि के योगदान की पहले ही घोषणा कर दी गई थी।

  1. अक्टूबर 1992 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की नेपाल यात्रा-

    अक्टूबर 1992 में प्रधानमंत्री श्री नरसिंम्हाराव ने नेपाल की तीन दिवसीय यात्रा की तथा द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाने, उदारशर्तों पर नेपाल का भारत को निर्यात बढ़ाने तथा परस्पर हितों के लिए विशाल जल संसाधन शक्ति को शीघ्रता से प्रयोग में लाने के उपायों की एक श्रृंखला का प्रतिपादन किया। इस यात्रा से दोनों देशों में विद्यमान सद्भावना में और वृद्धि हुई। इसने भारत तथा नेपाल के बीच चीन द्वारा दरार पैदा किये जाने के विरुद्ध भारत के दृढ़ निश्चय को प्रदर्शित किया।

यात्रा के अन्त में जारी संयुक्त विज्ञप्ति में भारत तथा नेपाल के व्यापार को बढ़ाने के लिए एक नये आर्थिक उपक्रम का वर्णन था। भारत में नेपाल के निर्यात को सुविधाजनक बनाने के लिए कई मुद्दों को सुलझाया गया इसमें नेपाली निजी व्यापारिक वाहनों को नेपाल की सीमा से लेकर कलकत्ता हल्दिया (Calcutta Haldia) तक जाने और फिर वापस आने जाने की सुविधा भी शामिल थी। अब नेपाल सुगमता से स्वतन्त्र रूप से परिवर्तनीय मुद्रा देकर भारत से अपनी आवश्यकता की वस्तुएं आयात कर सकता था। यह सुविधा विद्यमान भारतीय रुपये में भुगतान की व्यवस्था के अतिरिक्त थी। भारतीय निर्यातकों को भी सुगमता से परिवर्तनीय मुद्रा में ऐसे निर्यात के लिए भारत द्वारा उपलब्ध सभी निर्यात-लाभ लेने का अधिकार था। ऋण सीमा के सम्बन्ध में संयुक्त विज्ञप्ति में यह कहा गया कि भारत सरकार ने भारतीय मुद्रा में यह रकम 35 करोड़ से बढ़ाकर 50 करोड़ कर दी थी। इसमें कहा गया कि समझौते की कार्य अवधि भी एक वर्ष से बढ़ा कर तीन वर्ष कर दी जानी थी। इस ऋण पर ब्याज 7 प्रतिशत वार्षिक की विशिष्ट छूट पर लिया जाना था।

जल संसाधन सहयोग के सम्बन्ध में इस विज्ञप्ति में कहा गया कि करनाली, पंकेश्वर, सप्तकोसी, बुही गंडकी, कमला तथा भागमती योजनाओं पर योजना रिपोर्ट तैयार करने तथा जांच-पड़ताल करने के लिए एक विशिष्ट समयावधि दोनों देशों ने स्वीकार की।

नेपाल के प्रधानमंत्री श्री जी० पी० कोइराला ने भारतीय प्रधानमंत्री की इस यात्रा का अत्यन्त लाभदायक तथा पूर्णतया सन्तोषजनक कहा। प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव, महाराजा बीरेन्द्र तथा नेपाल की सरकार को यह विश्वास दिलाने में सफल रहे कि भारत प्रभुसत्ता सम्पन्न समानता तथा परस्पर हितों के सिद्धान्त के आधार पर नेपाल के साथ सभी क्षेत्रों में पहले से अधिक सहयोगात्मक सम्बन्धों का समर्थक था। जब एक पत्रकार ने प्रधानमंत्री के इस विचार कि उपमहाद्वीप में प्रायः भारत को बड़ा भाई माना जाता है, पर टिप्पणी करने को कहा तो प्रधानमंत्री ने उत्तर दिया कि उन्होंने इस विचार को गलत सिद्ध करने के लिए जो भी मानवीय रूप से सम्भव हो सकता था, करने का प्रयत्न किया था। “ऐसा कोई भी साधन नहीं है जिसमें मैं अपना आकार परिवर्तन कर सकूँ । कृपया समझने का प्रयत्न करें।’ वास्तव में नेपाल भी अब समझने लगा कि बहुत बड़ा तथा विशालकाय होने के बावजूद भारत ने दक्षिण एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने की नीति नहीं अपनाई थी।

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  1. नेपाल में साम्यवादी सरकार का गठन तथा भारत-नेपाल सम्बन्ध-

    1994 में भारत-नेपाल सम्बन्धों में नेपाल की आंतरिक राजनीति में कुछ परिवर्तनों के कारण, कुछ तनाव पैदा हो गये जब नेपाल के कुछ नेताओं तथा नेपाल के राजा ने यह विचार प्रकट किया कि भारतीय कूटनीतिज्ञ तथा कुछ अन्य लोग नेपाल की राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे थे। नेपाल के साम्यवादियों, विशेषकर इसके नेता श्री मनमोहन अधिकारी ने अपने एक भाषण में यह कहा कि भारतीय श्री कोइराला का ही समर्थन कर रहे थे। नेपाली कांग्रेस एक भारत पक्षीय दल है तथा भारतीय इसी पक्ष को सत्तारूढ़ करने का प्रयास कर रहे थे।

जब नवम्बर 1994 के चुनावों के बाद नेपाल में साम्यवादी सरकार का गठन हुआ तथा श्री मनमोहन अधिकारी प्रधानमंत्री बने तो यह शंका पैदा हो गई कि नेपाल के भारत के सम्बन्धों में कमी आयेगी तथा नेपाल भारत की अपेक्षा चीन, बंगलादेश तथा पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों के विकास को प्राथमिकता देगा। परन्तु सरकार निर्माण के पश्चात् प्रधानमंत्री श्री अधिकारी ने नेपाल भू-सामरिक तथा आर्थिक आवश्यकताओं एवं विशेषताओं को देखते हुए अपनी चुनावी मनोस्थिति से ऊपर उठकर भारत साथ सम्बन्धों को, विकसित करने की आवश्यकता को स्वीकार किया। इस सोच-परिवर्तन के पीछे भारतीय नेताओं द्वारा दिया गया भारत-नेपाल सम्बन्धों की द्विपक्षीय महत्ता का तर्क, प्रभावी बना। नेपाल की साम्यवादी पार्टी की केन्द्रीय और स्थायी समिति की सदस्य श्रीमती सहाना प्रहान ने यह घोषणा की कि नेपाल भारत के साथ सम्बन्धों को विकसित करने के लिए दृढ़ निश्चयी तथा दोनों देशों के लोगों की यात्रा व्यवस्था पहले के समान विद्यमान रहेगी। “हम भारत के साथ अच्छे सम्बन्धों को तोड़ नहीं सकते क्योंकि इनकी जड़ें काफी गहरी हैं।”

  1. महाकाली सन्धि 1996-

    भारत-नेपाल सम्बन्धों में एक बहुत उत्तम स्तर तब आया जब दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने 6 फरवरी, 1996 के दिन महाकाली सन्धि पर हस्ताक्षर किये। इस सन्धि द्वारा 2000 मैगावाट की समर्थ वाले पंचेश्वर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजैक्ट का 8 वर्षों में निर्माण करने तथा सराहा और तनकपुर जल भण्डारों का विकास करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। पंचेश्वर प्राजेक्ट को भारत तथा नेपाल ने संयुक्त तथा एक समान रूप में 20,000 करोड़ रुपये खर्च करके बनाना था। इसके द्वारा नेपाल को मानसून के दौरान 1000 क्यूसिक पानी तथा कम प्रवाह वाले महीनों में 300 क्यूसिक पानी तनकपुर भण्डार से मिलना था तथा इसके साथ लगातार 70 मिलियन किलोवाट बिजली निशुल्क मिलनी थी। दोनों देशों ने महाकाली नदी आयोग की स्थापना का भी निर्णय किया तथा इस आयोग ने इस समझौते को पूर्ण करने की प्रक्रिया के सम्बन्ध में निरीक्षण, तालमेल तथा समीक्षा कार्य करने थे। उत्पन्न होने वाली समस्याओं के समाधान भी इसने सुझाने थे। इसके साथ नेपाल में कोहालपर-महाकाली क्षेत्र के अन्दर 22 पुलों का भी निर्माण करने का समझौता भी किया गया।

इस सन्धि द्वारा महाकाली नदी क्षेत्र का समुचित एवं एकीकृत विकास करने का महत्वपूर्ण निर्णय किया गया। महाकाली नदी पर बाँध के निर्माण से 6400 मेगावाट पन बिजली पैदा होनी थी जिसे दोनों देशों ने बराबर रूप से उपयोग करना था। इस सन्धि द्वारा भारत-नेपाल मित्रता, सहयोग तथा विकास के लिए किये जा रहे प्रयासों को काफी शक्ति प्राप्त हुई। भारतीय संसद तथा नेपाली संसद् दोनों ने ही इसे 21 सितम्बर, 1996 तक 2/3 बहुमतों से स्वीकृत करके इस सन्धि को पूर्ण कानूनी आधार प्रदान कर दिया।

  1. गुजरात सिद्धांत और भारत-नेपाल सम्बन्ध–

    भारत ने गुजराल सिद्धान्त (Gujral Doctrine) के अधीन नेपाल के साथ सम्बन्धों को अधिक मित्रतापूर्ण एवं सहयोगी सम्बन्ध बनाने की प्रक्रिया अपनाई तथा जब जून 1997 में प्रधानमंत्री श्री आई0 के0 गुजराल ने नेपाल की यात्रा की तो इसे प्रक्रिया और बल प्राप्त हुआ। दोनों देशों ने महाकाली नदी सन्धि के स्वीकृत कागजात एक-दूसरे को सौंपे, आपसी ऊर्जा व्यापार को बढ़ाने के लिए एक समझौता किया, तथा नागरिक उड्डयन के सम्बन्ध में एक याद पत्र (MOU) पर हस्ताक्षर किये गये। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने नेपाल में भारतीय सहायता से चल रहे प्रॉजेक्टों की प्रगति की समीक्षा की। यह निर्णय भी किया कि आपसी सुरक्षा सम्बन्धी हितों पर विचार करने के लिए दोनों देशों में गृह सचिवों की स्तर पर बातचीत नियमित रूप से की जायेगी। इस प्रकार की व्यवस्था बनाना आवश्यक हो गया था क्योंकि पाकिस्तान तथा कश्मीरी उग्रवादियों की गतिविधियाँ, नेपाल के क्षेत्र में बढ़ रही थीं। उसका एक उद्देश्य निजी क्षेत्र में ऊर्जा समझौता किया गया। भारतीय सहायता से चलाये जा रहे नेपाल के प्रॉजैक्टों में निजी क्षेत्र को जोड़ना था। नागरिक उड्डयन यादपत्र पर हस्ताक्षर करने का उद्देश्य था कि दोनों देशों के मध्य हवाई सेवाओं की साप्ताहिक क्षमता को 4000 से 6000 यात्रियों तक बढ़ाना और इसके लिए निजी क्षेत्र द्वारा धन लगाने को प्रोत्साहित करना। नेपाल को भारत से दो और केंद्रों बेंगलूर तथा लखनऊ से हवाई सेवा चलाने के अनुमति दी गई।

  2. नेपाली प्रधानमंत्री की भारत यात्रा तथा भारत-नेपाल सम्बन्ध-

    अगस्त 2000 में नेपाली प्रधानमंत्री श्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने भारत की यात्रा की तथा प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी तथा अन्य भारतीय नेताओं से विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। भारत नेपाल सीमा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, पार-सीमा आतंकवाद पर वार्तालाप हुआ तथा पार सीमा आतंकवाद की समाप्ति के लिए उपायों पर गहन विचार किया गया। यह निर्णय लिया गया कि दोनों देशों की कानून लागू करने वाली एजेंसियों में सहयोग और तालमेल विकसित किया जायेगा। दोनों देशों की सीमा के सम्बन्ध में स्थापित 1980 के आयोग को यह निर्देश दिया गया कि सन् 2000 तक सीमा सम्बन्धी कार्य पूर्ण हो जाना चाहिए। भारत-नेपाल सीमा (1700 क0 म0 का निर्धारण 1920 में किया गया था परन्तु कुछेक क्षेत्रों के सम्बन्ध में पूर्ण रेखांकन अभी किया जाना था) कालापानी त्रिकोण (भारत-नेपाल-चीन सीमा बिन्दु) तथा बिहार के चम्पारण जिले के साथ लगते सुरक्षा क्षेत्र के सम्बन्ध में विशेष तौर पर सीमा रेखांकन के कार्य पर विशेष ध्यान दिया जाना था।

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