क्या गुप्त युग ‘स्वर्ण युग’ था?

क्या गुप्त युग ‘स्वर्ण युग’ था?

क्या गुप्त युग ‘स्वर्ण युग’ था?

सांस्कृतिक उपलब्धियों के आधार पर अनेक विद्वानों ने गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग, हिन्दू-पुनर्जागरण का काल एवं राष्ट्रीयता के पुनरुत्थान का युग माना है। ऐसी धारणा बहुत दिनों तक चलती रही। राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित इतिहासकारों ने गुप्तयुग को स्वर्णिम युग के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया, जब गुप्त राजाओं ने भारत में पुनः राजनीतिक एकता स्थापित की, विदेशियों को पराजित किया, प्रशासनिक व्यवस्था कायम की, धर्म, कला और साहित्य तथा ज्ञान-विज्ञान को प्रोत्साहन दिया। आधुनिक काल में मार्क्सवादी विचारधारावाले तथा अन्य निष्पष इतिहासकार इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि गुप्तयुग वास्तव में ‘स्वर्णयुग’ था गुप्तयुग अगर स्वर्णयुग था, तो सिर्फ उत्तरी भारत के उच्च वर्गवालों के लिए। साधारण जनता तो अभावों और कठिनाइयों से त्रस्त थी। यह ‘हिन्दू-पुनर्जागरण‘ का युग भी नहीं था। प्रो० डी० एन० झा ने लिखा है, “जिस हिन्दू-पुनर्जागरण का बहुत प्रचार किया जाता है, वह वस्तुतः कोई पुनर्जागरण नहीं था, बल्कि वह बहुत अंशों में हिंदुत्व का द्योतक था।” यह भी सही नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि प्राचीन भारतीय स्वयं को हिन्दू कहते ही नहीं थे। हिन्दू शब्द का व्यवहार अरबों ने गुप्तयुग के पश्चात भारतीयों के लिए किया। गुप्तयुग की मूर्तिकला पर बौद्धधर्म का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। ज्ञान-विज्ञान भी विदेशी प्रभाव से मुक्त नहीं था। वराहमिहीर के रोमक एवं पोलिश सिद्धांतों पर सिकंदरिया के ज्योतिर्विद पाल का प्रभाव देखने को मिलता है। साहित्यिक रचनाओं और ब्राह्मणधर्म का विकास भी प्राचीन परम्पराओं से ही विकसित हुआ।

गुप्तों शासकों ने ‘राष्ट्रीयता’ की भी पुनर्स्थापना नहीं की। प्रो० डी० डी० कोसांबी के अनुसार, “गुप्तों ने राष्ट्रीयता की पुनरुत्पत्ति नहीं की वरन राष्ट्रीयता ने गुप्तों की पुनरुत्पत्ति की।” गुप्तों ने सही अर्थों में ‘राजनीतिक एकता’ भी स्थापित नहीं की। इसके विपरीत, यह युग सामंती मान्यताओं की स्थापना, दास-प्रथा, बंधुआ मजदूरों के विकास, बेगारी की प्रथा, अस्पृश्यता, बाल-विवाह, सती-प्रथा, सामाजिक तनाव एवं विषमताओं के लिए भी विख्यात है। सामंती व्यवस्था के दुष्परिणाम सर्वत्र दिखाई पड़ते हैं। यद्यपि सामंती प्रभाव के कारण राजकीय कला का विकास हुआ, तथापि लोक-कला विकसित नहीं हो सकी। यह आर्थिक समृद्धि का नहीं, बल्कि आर्थिक विपन्नता का युग था। नगर उजड़कर गाँव बन गए, उद्योग-धंधे एवं व्यापार चौपट हो गए, सिक्कों का प्रचलन कम हो गया, जो स्वर्णमुद्राएँ चलीं भी, उनमें सोने की मात्रा घटती गई। शिल्पियों की गतिशीलता समाप्त हो गई। किसानों और मजदूरों की तरह उन्हें भी गाँव, भूमि और भूमिपति से बाँध दिया गया। फलतः, गुप्त समाज स्पष्टतः उच्च सुविधाभोगी और निम्न सुविधाविहीन वर्गों में विभक्त हो गया। इनमें से पहले के लिए अगर गुप्तयुग स्वर्णयुग था, तो दूसरे के लिए निश्चय ही दरिद्रता का। अतः, एक इतिहासकार ने ठीक ही लिखा है, “स्वर्णयुग की अवधारणा यथार्थ पर आधृत नहीं प्रतीत होती-कम-से-कम जनसाधारण के लिए तो नहीं है। ……तथाकथित ‘राजनीतिक एकता’, ‘हिन्दू-पुनर्जागरण’, कालिदास, भारवि, वसुबंधु, देवगढ़, भितरगाँव, अजंता-बाघ जैसी उपलब्धियों के पीछे वे पिसते लोग हैं, जिनके गीत गाने वाले के लिए कोई ‘हरिषेण न था।

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