गुप्तकालीन शिक्षा और साहित्य

गुप्त काल में शिक्षा और साहित्य

गुप्त काल में शिक्षा एवं साहित्य

साहित्यः पुराणों का जो रूप अब प्राप्त होता है उसकी रचना इसी काल में हुई। पुराणों में ऐतिहासिक परंपराओं का वर्णन है जिनका विषय सृष्टि आरम्भ से है और जिनमें प्रत्येक राजवंश की विस्तृत वंशावलियाँ दी गई हैं। ब्राह्मणों के हाथ में आ जाने पर उनकी पुनर्रचना पांडित्यपूर्ण संस्कृत में की गई । उनमें विभिन्न हिन्दू मतों, आचार तथा प्रथाओं के ज्ञान को सम्मिलित किया गया जिसमें ये हिन्दुओं के प्रामाणिक धर्मग्रंथ बन गए। हिन्दू धर्म के साहित्य को लोकप्रिय बनाने और उसमें नवीनता लाने की दृष्टि से ब्राह्मण धर्मशास्त्रों का संशोधन और परिवर्तन गुप्त काल में हुआ। अनेक स्मृतियों और सूत्रों पर भाष्य लिखे गए, अनेक पुराणों तथा रामायण व महाभारत को अंतिम रूप दिया गया। नारद, कात्यायन, पाराशर, बृहस्पति स्मृतियों की रचना हुई।

गुप्त काल श्रेष्ठ कवियों का काल था। कुछ कवियों की कोई भी कृति प्राप्त नहीं है परन्तु अभिलेखीय प्रमाण मिले हैं। हरिषेण, वत्सभट्टी तथा वासुल महत्वपूर्ण हैं। हरिषेण महादडनायक ध्रुवभूति का पुत्र था। समुद्रगुप्त के समय पर यह संधिविग्रहिक कुमारामात्य तथा महादंडनायक था। प्रयाग स्तभलेख पर अंकित समुद्रगुप्त की दिग्विजयों की प्रशस्ति उसकी शैली का एकमात्र उदाहरण है। वह प्रतिभासंपन्न कवि था और उसकी सरल आलंकारिक शैली उसकी काव्यकुशलता का प्रमाण है। उसके छंद कालिदास की शैली की याद दिलाते हैं। पूरा लेख गद्य-पद्य मिश्रित शैली में है।

वासुल ने मदसौर प्रशस्ति की रचना यशोधर्मन के काल में की। मंदसौर स्तंभ लेख में, श्लोक हैं जो श्रेष्ठ काव्य के उदाहरण हैं। रोचक, सरल व हृदयग्राही शैली में इस प्रशस्ति की रचना की गई है।

संस्कृत के सबसे उल्लेखनीय रचनाकार कालिदास हैं जो कवि और नाटककार दोनों दृष्टियों से अद्वितीय हैं। कालिदास के काव्यग्रंथ हैं, ऋतुसंहार, मेघदूत, कुमारसंभव, तथा रघुवंश। गुप्तकालीन नाटक मुख्यतः प्रेमप्रधान एवं सुखांत होते थे। इस समय के नाटकों की उल्लेखनीय बात यह है कि उच्च सामाजिक स्तर के पात्र संस्कृत बोलते हैं जबकि निम्न सामाजिक स्तर के पात्र तथा स्त्रियाँ प्राकृत भाषा का प्रयोग करती हैं। इस समय की अलंकृत दरबारी भाषा को समाज के अन्य वर्गों के लोग नहीं समझ सकते थे, अतः दरबारी, उच्च वर्ग और कुलीन वर्ग ही साहित्य का आनंद उठा सकते थे।

साहित्य और नाटय दोनों की दृष्टि से चरम उपलब्धि अभिज्ञानशाकुन्तलम् है। इसकी विषयवस्तु राजा दुष्यंत और शंकुतला का मिलन है। इसकी कथा महाभारत से ली गई है परन्तु प्रणय दृश्यों में मौलिकता है। कालिदास ने मानव भावनाओं का अद्वितीय चित्रण किया है। कालिदास का एक अन्य नाटक विक्रमोर्वशीयम् है जिसमें उर्वशी-पुरूरवा की कथा को मर्त्य राजा विक्रम और अप्सरा उर्वशी के प्रणय आख्यान का रूप दे दिया गया है। कालक्रम के आधार पर कालिदास का प्रथम नाटक कालविकाग्निमित्र माना जाता है। यह शुंग इतिहास पर आधारित है।

शूद्रक रचित मृच्छकटिकम् अपवाद है क्योंकि यह अन्य नाटकों के समान नहीं है। विषयवस्तु की दृष्टि से राजकीय जीवन और महाकाव्यों के प्रसंगों की उपेक्षा करके यह परम्परा को तोड़ता है। उसका नायक है दरिद्र ब्राह्मण सार्थवाह जारुदत्त और मायिका वसंतसेना नामक गणिका है। इसमें विभिन्न पात्रों द्वारा बोली गई प्रादेशिक भिन्नताएँ हैं जो यथार्थ जीवन पर आधारित प्रतीत होती हैं। नाटक में भाव और कर्म का संतुलन और करुणा एवं हास्य का सामंजस्य है। इसमें राजा, ब्राह्मण, जुआरी, व्यापारी, वेश्या, चोर, धूर्त,दास आदि सभी सामाजिक वर्गों का वर्णन है। भाषा और भाव की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-ही-साथ यह नाटक ऐतिहासिक दृष्टि से भी उपयोगी है।

विशाखदत्त ने दो नाटकों की रचना की-मुश्वराक्षस और देवीचन्द्रगुप्तम। मुश्वराक्षस एक ऐतिहासिक नाटक है जिसमें घटनाएँ वास्तविकता व सजीवता के साथ चित्रित हैं इसमें चाणक्य की योजनाओं का वर्णन है। वेशीचन्द्रगुप्तम् नाटक के केवल कुछ अंश प्राप्त हुए हैं। इस ऐतिहासिक नाटक में चन्द्रगुप्त के द्वारा शंकराज एवं राम गुप्त के वध तथा ध्रुवदेवी के साथ उसके विवाह का वर्णन है। कन्नौज का हर्ष (606-645) स्वयं भी उच्च कोटि का नाटककार था। हर्ष का एक संस्कृत नाटक नागानन्द है जिसमें उसने स्वयं आत्मबलिदानी बौद्ध नायक की भूमिका निभाई थी। यह पार्वती को समर्पित है। इसमें न तो उसे और न बौद्ध-जैन-आजीवक तथा साधुओं में धार्मिक अंतर्विरोध प्रतीत हुआ। हर्ष ने अन्य नाटक भी लिखे।

गद्य लेखकों में वाणभट्ट प्रसिद्ध है। वह हर्ष का राजकवि था। हर्षचरित संस्कृत गद्य का सर्वोत्तम उदाहरण माना गया है। बाण ने गद्य में कथाएँ भी लिखीं। बाणभट्ट की कादम्बरी के कुछ पद इतने लम्बे हैं कि वे कई पंक्तियों तक चलते हैं। वह अत्यंत कुशल गद्य लेखक था।

संस्कृत के प्रसिद्ध अचरकोण की रचना कोषकार अमरसिंह ने की। वह संभवतः चंद्र गुप्त द्वितीय की राजसभा के नौ रत्नों में से था। चंद्रगोणी नामक वंशाली बौद्ध भिक्षु ने चंद्र व्याकरण नामक ग्रंथ लिखा, जो बहुत लोकप्रिय हुआ और महायाम बौद्धों द्वारा अपनाया गया।

वात्स्यायन का काणसूत्र इस विषय का प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसमें काव्य जीवन के समस्त पक्षों, जैसे सामाजिक, वैयक्तिक, शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, भोग, आदि का वैज्ञानिक ढंग से विवेचन किया है। परन्तु ग्रंथ में अश्लीलता नहीं है और एक निष्कपट सरलता है। उसमें कुछ समय के लिए ग्राम जाने वाले नागरिक को सलाह दी गई है कि वह सुसंस्कृत बातचीत, शिष्टतापूर्ण व्यवहार, संगीत, गीत, नृत्य और मदिरापान आदि के लिए ग्रामीण बंधुओं की सभाएँ करे। कामसूत्र में सुखी-संपन्न नागरिक के दैनिक जीवन का वर्णन है। उसे कलात्मक विषयों में रूचि होनी चाहिए। ऐसा जीवन वे ही नागरिक बिता सकते थे जिनके पास अवकाश व आवश्यक भौतिक सुविधाएँ हों। ऐसा परिवेश प्रस्तुत किया जाए जो कविता और चित्रकला की प्रेरणा के अनुकूल हो और कलाप्रेमी युवा नागरिक को इन दोनों कलाओं में दक्ष होना चाहिए। कवि सम्मेलनों का आयोजन होता था। संगीत, वीणा वादन आदि में दक्षता आवश्यक बताई गई है। युवा नागरिक को प्रणयकला की शिक्षा देने के लिए कामसूत्र और इसी प्रकार के अन्य ग्रंथ लिखे गए।

दर्शन के क्षेत्र में भी गुप्त युग में सभी धर्मों के आचार्य ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। षडदर्शन- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व एवं उत्तर मीमांसा (वेदांत)- की महत्वपूर्ण कृतियों की रचना इसी काल की बताई जाती है।

गुप्त युग में बौद्ध दर्शन पर भी ग्रंथों की रचना हुई। बौद्ध धर्म के अधिकांश दार्शनिक और विचारक इस युग में हुए। असंग ने योगाचार भूमिशास्त्र, प्रकरण आर्यवाचा, महायानसूत्रालंकार, वज्रघेटिका टीका, महायान सम्परिग्रह और महायानभिधर्म संगीत शास्त्र ग्रंथ आदि लिखे। वह महायान धर्म का प्रकांड विद्वान था। वसुबंधु ने हीनयान और महायान दर्शन पर अनेक ग्रंथ लिखे। अभिधर्मकोष में बौद्ध धर्म के मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन है। वसुबंधु ने मीमांसा, सांख्य, योग, वैशेषिक दार्शनिक पद्धतियों का खंडन किया और बौद्ध दर्शन को विकसित किया। दिड् भाग एक अन्य महान बौद्ध दार्शनिक था। उसने न्याय दर्शन और बौद्ध तर्कशास्त्र पर ग्रंथ लिखे।

हीनयान धर्म के दार्शनिक ग्रंथ भी लिखे गए। बुद्धधोष ने त्रिपिटकों पर अनेक भाष्य लिखे। बिसुद्विभग्य उसका प्रसिद्ध ग्रंथ है।

जैन दार्शनिक ग्रंथों की रचना भी इस काल में हुई। आचार्य सिद्धसेन ने न्याय दर्शन पर ग्रंथ लिखे। न्यायावतार सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है।

चौथी शताब्दी से सातवीं शताब्दी के बीच विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ और उनका संकलन वैज्ञानिक व तकनीकी ग्रंथों में हुआ। इस काल के प्रमुख गणितज्ञ ज्योतिष विद्या में भी निपुण थे, अतः इन दोनों शाखाओं का समुचित विकास हुआ। इनमें आर्यभट्ट प्रथम, वराहमिहिर, भास्कर प्रथम तथा ब्रह्मगुप्त विशेष महत्व रखते हैं।

आर्यभट्ट का गणित के क्षेत्र में विशेष स्थान केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने सबसे पहले गणित-ज्योतिष की समस्याओं को उठाया बल्कि इसलिए भी है कि उनके द्वारा बताए गए बुनियादी गणित सिद्धांतों का आने वाली शताब्दियों के गणितज्ञों ने भी अनुकरण किया। यह उन्हीं के प्रयत्नों का परिणाम था कि ज्योतिष को गणित से अलग शास्त्र माना गया। उनका विश्वास था कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है तथा इसकी छाया चन्द्रमा पर पड़ने के कारण ग्रहण पड़ता है। बाद के ज्योतिषियों ने उनके क्रांतिकारी विचारों की आलोचना की क्योंकि इस संबंध में परम्पराओं और धर्म के विरुद्ध वह नहीं जाना चाहते थे। परन्तु इस काल के ज्योतिर्विदों में आर्यभट्ट के विचार सबसे अधिक वैज्ञानिक थे। आर्यभट्टीय इस काल का एकमात्र ग्रंथ है जिस पर रचनाकार का नाम दिया गया है।

आर्यभट्ट के सिद्धांतों को भास्कर प्रथम (600ई0) ने उनपर टीकाएँ और स्वतंत्र ग्रंथ लिखकर विशेष ख्याति प्रदान की। वह ब्रह्मगुप्त का समकालीन थे और स्वयं भी प्रसिद्ध खगोलशास्त्री थे। उन्होंने तीन ग्रंथ लिखे-महाभास्कर्य, लघुभास्कर्य और भाष्य।

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