गुप्तोत्तर कालीन समाज

गुप्तोत्तर कालीन समाज 

गुप्तोत्तर कालीन समाज की प्रमुख विशेषताएं

इस युग का सर्वाधिक विस्मकारी परिवर्तन जातियों का प्रगुणन था, जिसने ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूतों और शूद्रों-सभी को प्रभावित किया। भूमि से प्रगाढ़ रूप से संबंधित होने के आधार पर निर्मित एक बंद आर्थिक इकाई ने जिस सामंतीय क्षेत्रीयता को पोषित किया और विजयों और ब्राह्मणों को भूमिदान के माध्यम से कबायली लोगों को ब्राह्मणीय व्यवस्था में जिस प्रकार समाविष्ट किया जा रहा था, उनके परिप्रेक्ष्य में नवीन सामाजिक परिवर्तनों को भलीभाँति-समझा जा सकता है।

परंपरागत वर्ण-व्यवस्था का, जिसके अनुसार समाज मोटे रूप से चार वर्गों में विभक्त था, अभिलेखों तथा साहित्यिक ग्रंथों में भी उल्लेख किया गया है।

समाज में ब्राह्मणों का सर्वश्रेष्ठ स्थान था- केवल धार्मिक ग्रंथों से ही नहीं वरन विदेशी यात्रियों के वृत्तांत से भी इस बात की पुष्टि होती है। यूनत्सांग ने लिखा है कि अनेक वर्ण और जातियों में ब्राह्मण सबसे अधिक पवित्र हैं और उन्हें सबसे अधिक सम्मान मिलता है। यही विचार अरब यात्री अलमसूदी और अलबीरूमी ने प्रकट किए है। ब्राह्मणों का मुख्य कार्य इस युग में भी अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन (यज्ञ करना और यज्ञ करवाना) और दान लेना था। वे शास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट आचार का पालन करते थे, वेद-वेदांग तथा अन्य शास्त्रों में पारंगत होते थे। उन्हें श्रोत्रिय, आचार्य तथा उपाध्याय कहा जाता था। ऐसे ब्राह्मण दान के पात्र समझे जाते थे। अनेक ब्राह्मण पुरोहित कर्म करते थे।

धर्मशास्त्रों में वैश्यों के लिए कृषि, पशुपालन और व्यापार-जैसे-व्यवसाय निर्दिष्ट किए गए हैं और पाराशर ने ‘कुसीद वृत्ति’ (सूद पर रुपए उधार देना) वैश्य का व्यवसाय बताया है। बौद्ध, जैन और वैष्णव धर्म में प्रतिपादित अहिंसा-सिद्धांत के प्रभाव से वैश्यों ने सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए कृषि कर्म तथा पालन छोड़ दिया था और व्यापार को अपनी आजीविका का साधन बना लिया था। भविष्यत इस युग में वैश्य वर्ग वैष्णव धर्म तथा जैन धर्म का अनुयायी था। पुराणों में अनेक धनी वैश्यों की कथाएँ हैं जिन्होंने प्रभूत धनराशि दान देकर धुण्य लाभ उठाया। जिस प्रकार प्राचीन काल में वैश्यों ने बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया उसी प्रकार पूर्व मध्यकाल में वैष्णव और जैन धर्म में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। राजस्थान, कर्नाटक तथा गुजरात में जैन धर्म के प्रसारण में वैश्यों की समृद्धि प्रमुख कारण है।

इस काल की स्मृतियों तथा निबंधों में भी सेवावृत्ति के अतिरिक्त शूद्र के लिए अन्य अनेक व्यवसाय निर्धारित किए गए हैं जिनसे उनकी आर्थिक स्थिति में निश्चित सुधार हुआ। अति, देवल तथा पोराशर ने शूद्र के लिए सेवा के अतिरिक्त कृषि, पशुपालन, वाणिज्य तथा शिल्प उपयुक्त व्यवसाय बताए हैं। उशना ने व्यापार और शिल्प, शूद्र की आजीविका के साधन बताए हैं। बृहस्पति की परिभाषा के अनुसार सुवर्णकार, लोहार, चर्मकार, (चमार), तंतुवाय (जुलाहा) के कार्य शिल्पों के अंतर्गत जाते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण और पदम पुराण के अनुसार कुंभकार, बढ़ई, संगतराश (पत्थर का काम करने वाले), लौहाकार इात्यादि से संबद्ध शिल्प शूद्रों के लिए निर्दिष्ट किए गए हैं। तत्कालीन स्मृतियों तथा निबंधों में कुल मिलाकर सभी उद्योग और व्यवसाय शूद्रों की आजीविका के साधन बताए गए हैं। व्यास, पाराशर और वेजयंती में एक कृषक वर्ग का उल्लेख है जिन्हें ‘कुटुंबी’ कहा गया है। इन्हें शूद्रों के अंतर्गत रखा गया है। एक और वर्ग ‘कीनाश’ का उल्लेख आता है। प्राचीन ग्रंथों में कीनाश वैश्य हैं किन्तु 8वीं शताब्दी के नारद स्मृति के टीकाकार असहाय ने ‘कीनाशों’ को शूद्र बतलाया है। इन किसानों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है: (1) स्वतंत्र किसान (संभवतः कुटुंबी इसी श्रेणी के थे) जो भूमि के स्वामी थे और राज्य को अनेक प्रकार के कर देते थे, (2) वे किसान जो बटाई पर खेती करते थे। इन्हें ‘व्यधसीरिन’ या ‘सीरिन’ कहा गया है। इन्हें उपज का 1/3 या 1/4 भाग मिलता था। किसान मजदूरों को उपज का 1/10 से 1/4 भाग तक मिलता था। अधिकतर शूद्र कृषक इसी श्रेणी के थे।

शूद्रों के बँधुआ होने के संकेत एक धार्मिक विचारधारा में मिलते हैं, जो पूर्व मध्यकाल में अत्यंत प्रभावशाली हो गई थी। यद्यपि उन्हें सरोवर, कूप, आहार-गृह, आदि बनवाने की अनुमति प्राप्त थी और वे पुण्य कमा सकते थे, किन्तु इस तथ्य के बावजूद मेधातिथि ने उन्हें चौथे ‘आश्रम’ के फल अर्थात मोक्ष अधिकार से इस आधार पर वंचित कर लिया कि वे केवल ‘गृहस्थ’ के रूप में ही काम कर सकते थे और द्विजों की सेवा करके तथा संतानोत्पत्ति द्वारा ही पुण्य कमा सकते थे। ग्यारहवीं शताब्दी में अलबीरूनी ने शूद्रों के प्रति ही नहीं अपितु वैश्यों के प्रति भी ऐसे दृष्टिकोण का उल्लेख किया है, हालाँकि उसने ऐसे अन्य लोगों का भी उल्लेख किया है जो उपरोक्त विचारधारा से सहमत नहीं थे।

कायस्थ :

एक जाति के रूप में कायस्थों का आविर्भाव एक महत्वपूर्ण सामाजिक घटना है। कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य स्मृति में है। इसमें कहा गया है कि राजा को चाहिए कि शोषित प्रजा की, विशेषकर कायस्थों से रक्षा करें : भक्ष्यमाणा प्रजाः रक्ष्या कायस्थे च विशेषतः। अधिक संभावना यही है कि गणक और लेखक के रूप में कायस्थ भूमि व राजस्व- संबंधी दस्तावेज तथा हिसाब किताब रखते थे और पद अंतर्जातीय विवाह से उत्पन्न संतान की जाति माता पर आधारित होगी, पिता पर नहीं। इस नियम की पुष्टि पूर्वमध्यकालीन अभिलेखों से भी होती है। अलबीरूनी ने भी लिखा है कि बच्चे की जाति माता की होती है, पिता की नहीं।

विवाह-संबंधी निषेध के साथ-साथ भोजन-संबंधी निषेध के नियम भी कट्टर हो गए। मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन इत्यादि ब्राह्मणों के लिए वर्जित थे। ह्यूनत्सांग ने खान-पान संबंध में ब्राह्मणों की कट्टरता का उल्लेख किया है। इस युग में धीरे-धीरे भोजन-संबंधी नियम इतने कठोर हो गए कि ब्राह्मण, ब्राह्मण के हाथ का बना हुआ भोजन नहीं खा सकता था।

अस्पृश्यताः

अस्पृश्यता जातियों की संख्या तथा अस्पृश्यता की भावना में वृद्धि हुई। चांडालों को तो बहुत पहले से अस्पृश्य माना जाता था किन्तु इस काल की स्मृतियों में सात अन्य जातियों का उल्लेख है- रजक (धोबी), चर्मकार (चमार), नट, वरुड़ (चटाई, टोकरी आदि बनाने वाले), कैवर्त, धीवर, भेद (आदिवासी जाति) तथा भिल्ल। व्यासंस्मृति में कोली, पुष्कर और वराट के नाम अंत्यजों की श्रेणी में दिए गए हैं। बृहद्धर्म और स्कन्द पुराण में जिन अंत्यज जातियों का उल्लेख किया गया है उनकी संख्या अठारह थी।

इस काल में अस्पृश्यता की भावना बहुत अधिक बढ़ गई थी। पहले तो केवल चांडाल ही अस्पृश्य माने जाते थे किन्तु इस काल में रजक, चर्मकार आदि उपरोक्त जातियाँ भी अस्पृश्य मानी जाने लगीं। स्पर्श-दोष निवारण के लिए शुद्धि-क्रियाएँ करनी पड़ती थीं। उदाहरणार्थ, अत्रि के अनुसार यदि चर्मकार, नट, व्याध इत्यादि जातियाँ द्विजाति के किसी अंग को स्पर्श करें तो वह अंग धो डालना चाहिए और पवित्र संस्कृत जल से आचमन करना चाहिए। सांप्रदायिक द्वेष के कारण भी कुछ व्यक्तियों को अस्पृश्य समझा जाता था। ब्रह्मपुराण के अनुसार बौद्ध, पाशुपत, जैन, लोकायन और कापालिकों को स्पर्श करने से व्यक्ति को सवस्र स्नान करके शुद्ध होना पड़ता था।

सती प्रथा-

सती-प्रथा के कुछ उदाहरण पूर्व काल में भी मिलते हैं किन्तु 9वीं शताब्दी से सती प्रथा अत्यधिक प्रचलित हो गई। इस प्रथा के बढ़ने के कई कारण थे, जैसे वैराग्य तथा कठोर संयम संबंधी विचारधारा का समाज पर-विशेषतः ब्राह्मण वर्ग पर-बढ़ता हुआ प्रभाव, पुनर्विवाह का निषेध, विधवाओं के संपत्ति विषयक अधिकार को विलंब से तथा हिचकिचाहट के साथ मान्यता देना आदि। विधवाओं के इस संपत्तिगत अधिकार पर कई तरह के प्रतिबंधों ने विधवाओं की दशा को शोचनीय बना दिया और पति के साथ सती होने में ही उसे जीवन के इन कष्टों से मुक्ति दिखाई दी। अंगिरा, हारीत आदि पूर्वमध्यकालीन स्मृतियों तथा अपरार्क, विज्ञानेश्वर आदि निबंधकारों ने सती प्रथा की प्रशंसा की।

दासप्रथा :

पूर्व मध्यकाल में दास प्रथा में वृद्धि हुई। केवल राजा, सामंत और गृहस्थ के यहाँ ही नहीं वरन बौद्ध मठों, वैष्णव, शैव और शाक्त मंदिरों में भी दास रहते थे। इस युग में दास प्रथा के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए धर्म शास्त्रों के अतिरिक्त जैन ग्रंथों, शिलालेखों तथा विदेशी मंत्रियों के वृत्तांतों से भी जानकारी प्राप्त होती है। विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में नारद द्वारा कथित 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया हैं इनमें से 7-8 प्रकार के दासों के अस्तित्व की पुष्टि अर्थशास्त्र के अतिरिक्त अन्य ग्रंथों तथा शिलालेखों से होती है। इनमें से गृहज या उदर दास सर्व साधारण थे। लेखपद्धति के एक लेख में 504 विषलप्रिय (चहमान राजा विषल देव के नाम से प्रचलित एक सिक्का) में एक दासी की खरीद के संबंध में क्रयपत्र है जिसमें यह बताया गया है कि इस क्रय की घोषणा सारे नगर में की गई। जैन ग्रंथ समराइच्छकहा तथा प्रबंचचिन्तामणि में दास व्यापार की अनेक कथाएँ हैं जिनसे पता चलता है कि दास-व्यापर नियमित रूप से चल रहा था।

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