प्राचीन भारत में राजनीतिक दर्शन: नामकरण की समस्या

प्राचीन भारत में राजदर्शन

प्राचीन भारत में राजनीतिक दर्शन: नामकरण की समस्या

(POLITICAL PHILOSOPHY IN ANCIENT INDIA: PROBLEM OF NOMENCLATURE)

हमारे अध्ययन के विषय को प्राचीन भारत में कई नामों से पुकारा गया है। प्राचीन किया गया है।

भारत में इसे राजधर्म, दण्डनीति, नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र आदि नामों से सम्बोधित महाभारत के ‘शान्तिपर्व’ में इसे ‘राजधर्म’ कहा गया है। प्राचीन भारत में राजतन्त्र ही सबसे अधिक प्रचलित था, अतः राज्य और शासन के अध्ययन को राजा का धर्म कहा गया। राजधर्म में राजा के सभी कर्त्तव्य और शासन सम्बन्धी बातें सम्मिलित की गयीं। सब विद्याएँ राजधर्म में ही आ जाती थीं।

कतिपय विचारकों के अनुसार यह शासन का विज्ञान व कला दोनों थी। दण्ड नीति को प्राचीन भारत में प्रशासन का शास्त्र’ समझा गया जिसका सम्बन्ध शासन के कार्यों अथवा शासन तन्त्र से रहा। कौटिल्य के मतानुसार, मनु, वृहस्पति और शुक्राचार्य द्वारा मान्य चार विद्याओं में से दण्ड-नीति एक है। भारतीय विचारक बहुत पहले से ही सम्प्रभुता राज्य का आधार मानने लगे थे। उनके मतानुसार बल प्रयोग या दण्ड के बिना कोई राज्य कायम नहीं रखा जा सकता। दण्ड की महत्ता के सम्बन्ध में मनु का कहना था कि जब सभी लोग सो रहे होते हैं तो दण्ड उनकी रक्षा करता है। उसी के भय से लोग न्याय का मार्ग अपनाते हैं। डॉ० जायसवाल ने दण्ड-नीति को सरकार के सिद्धान्त (Principles of Government) कहा है। राज्य में दण्ड के इस अत्यधिक महत्व के परिणामस्वरूप ही शासकों के कार्यों तथा समाज के कल्याण का वर्णन करने वाले शस्त्र को दण्ड-नीति के नाम से जाना गया। उशनस् तथा प्रजातीय द्वारा शासन-तन्त्र पर लिखित ग्रंथ भी दण्ड-नीति के नाम से प्रसिद्ध है।

आगे चलकर इस विषय के लिए ‘अर्थशास्त्र’ शब्द का भी प्रयोग किया जाने लगा। डॉ० जायसवाल ने अर्थशास्त्र को जनपद सम्बन्धी शास्त्र (Code of Commonwealth) कहा है। वैसे वर्तमान समय में अर्थशास्त्र शब्द का प्रयोग प्रायः सम्पत्तिशास्त्र (Economics) के लिए किया जाता है, जिसका अध्ययन-विषय धन व अर्थ की प्रात्ति के साधन तथा मनुष्य के हित में प्रयोग है। इसके विपरीत राजशास्त्र का अध्ययन विषय राज्य व शासन है अतएव दोनों में बड़ा अन्तर है, किन्तु कौटिल्य का कथन है कि ‘अर्थ’ शब्द से जैसे मनुष्य के व्यवसाय व धन्धे दिग्दर्शित होते हैं वैसे ही जिस भूमि पर रहकर वे व्यवसाय चलाते हैं वह भूमि भी सम्बोधित हो सकती है, इसलिए भूमि को प्राप्त करने व उसका पालन करने का जो साधन है, उसे भी अर्थशास्त्र कहना उचित है। चूंकि राज्य शासन के विषय पर प्राचीन भारत में लिखा गया सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र के नाम से पुकारा गया, अतः अर्थशास्त्र को नीतिशास्त्र अथवा दण्ड-नीति के ही अर्थ में लिया जाने लगा। शुक्र-नीति में भी कहा गया है कि अर्थशास्त्र का क्षेत्र केवल धन या सम्पत्ति प्राप्त करने के उपायों का विवेचन करना नहीं, वरन् शासन शास्त्र के सिद्धान्तों को प्रस्थापित करना है। अमरकोष में अर्थशास्त्र तथा दण्ड नीति को समानार्थक शब्द माना गया है। अर्थशास्त्र के प्रथम अध्याय के अवलोकन से भी यह प्रतीत होता है कि कौटिल्य उसे ‘दण्ड-नीति’ नाम ही देना चाहता था।

बाद में हिन्दू राजनीति से सम्बन्धित ग्रन्थों को नीतिशास्त्र का नाम भी प्रदान किया जाने लगा। नीतिशास्त्र में नीति शब्द की ‘नी’ धातु का अर्थ ‘ले जाना’ होता है। इसे मार्गदर्शन के अर्थ में भी प्रयुक्त किया जा सकता है। जो शास्त्र भलाई-बुराई में भेद करे तथा उचित व अनुचित कार्यों का उल्लेख करे उसे ‘नीतिशास्त्र’ कहा जाता है। यह मार्गदर्शन मानव-जीवन के किसी भी क्षेत्र में किया जा सकता है। राजनीतिक क्षेत्र में किये गये मार्गदर्शन के लिए भी नीतिशास्त्र शब्द का प्रयोग कर दिया जाता था। कामन्दक तथा ने राज्य एवं शासन के सम्बन्ध में जो रचनाएँ की उनको नीतिशास्त्र का नाम दिया गजया । कामन्दक ने अपने नीतिसार में राज-कार्यों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण बातों को संक्षिप्त रूप प्रदान किया। बाद के समय में कामन्दक का नीतिशास्त्र इतना लोकप्रिय हो चुका था कि शुक्र-नीतिसार के रचयिता ने इसमें से अनेक उद्धरणों को बिना लेखक का नामोल्लेख किये ही स्वतन्त्रतापूर्वक ग्रहण किया। अग्नि पुराण के जिन कुछ अध्यायों में राम ने लक्ष्मण के साथ नीति के सम्बन्ध में जो वार्ता की है वह और कुछ नहीं वरन् कामन्दक के नीतिसार से ही कहीं से लिये गये कथन हैं। राज्यशास्त्र को नीतिशास्त्र इसलिए कहा गया था क्योंकि दोनों के लक्ष्य में कोई भिन्नता नहीं थी। दोनों ही समाज के सर्वांगीण उन्नति करके उसे आनन्दमय बनाने के लिए प्रयत्नशील थे। दोनों द्वारा धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्रदान करने का प्रयास किया जाता था। ऐसी स्थिति में राज्य से सम्बन्धित शास्त्र को नीतिशास्त्र कहना अनुपयुक्त नहीं माना गया।

कामन्दक के समय में जो ‘नीति’ शब्द राज्य की नीति के सम्बन्ध में प्रयुक्त किया जाता था वही अब सामान्य आचरण के लिए प्रयुक्त किया जाने लगा। राजनीति (Polity) तो इसका एक भाग मात्र थी। ऐसी स्थिति में राज्य से सम्बन्ध रखने वाले नियमों या तथ्यों को आचरण के अन्य पहलुओं से पृथक् दर्शाने के लिए यह ‘नीति’ शब्द के साथ ‘राज’ विशेषण का प्रयोग किया जाना आवश्यक बन गया।

डॉ० भण्डारकर के शब्दों में “ऐसा लगता है कि जब नीति शब्द का प्रयोग सामान्य आचरण के नियमों के लिए किया जाने लगा तो यह आवश्यक हो गया कि उनको (सामान्य आचरण के नियमों को) राजा के व्यवहार के नियमों से अलग करने के लिए राजनीति शब्द का प्रयोग किया जाये।”

इसके बाद से राजनीति शब्द का प्रयोग प्रचलित हुआ तथा इसी के अन्तर्गत शासन एवं राज्य व्यवस्था से सम्बन्धित रचनाएँ की जाने लगी।

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