यूरोपियों के भारत आगमन के कारण

यूरोपियों के भारत आगमन

यूरोपियों के भारत आगमन को प्रभावित करने वाले तत्व

भारत का विदेशों से काफी प्राचीन काल से ही व्यापारिक और राजनीतिक सम्बन्ध रहा है। यह सम्बन्ध मुख्यतः भारत के उत्तर पश्चिम सीमा से स्थल मार्ग द्वारा और दक्षिण के समुद्री मार्ग द्वारा कायम किया गया। मुगलों ने सीमा पर के स्थल मार्ग की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की थी, परन्तु सामुद्रिक मार्ग की सुरक्षा की तरफ वे यथेष्ट ध्यान नहीं दे सके। वस्तुतः, मुगल द्वारा सामुद्रिक मार्ग की उपेक्षा ने यूरोपीय जातियों के भारत आने और यहाँ अपने पैर जमाने की प्रेरणा दी। भारत के साथ सीधा व्यापारिक सम्बन्ध इसलिए भी आवश्यक हो गया क्योंकि अरब व्यापारी भारतीय और यूरोप व्यापारियों के बीच मध्यस्थता कर सारा मुनाफा स्वयं ले लेते थे। फलतः यूरोप व्यापारियों ने भारत के साथ सीधा व्यापारिक सम्बन्ध कायम करने के लिए नवीन मार्गों की खोज प्रारम्भ कर दी। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण घटना थी 17 मई 1498 को वास्कोडिगामा नामक पुर्तगाली नाविक का उत्तमाशा अंतर होते हुए कालीकट पहुँचना। वस्तुतः मध्यकालीन यूरोप में सामंतवाद के पतन के साथ ही ‘आधुनिक युग’ का उदय हुआ। इस युग में पूँजीवाद और वाणिज्यवाद का विकास हुआ। इसके चलते नये देश की खोज की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी, साहसी यापारी और नाविक सुदूर और अज्ञात देश की खोज में निकल पड़े। इसी क्रम में इटली के नाविक कोलम्बस ने स्पेन की सहायता से 1492 ई० में अमेरिका की खोज की तथा वास्कोडिगामा पुर्तगाली सरकार की सहायता से भारत के प्रसिद्ध बन्दरगाह कालीकट पहुँचा। कालीकट के राजा ने इस साहसी नाविक की सहायता कर उसे अनेक व्यापारिक सुविधाएँ प्रदान की। सबसे बड़ी बात यह भी कि पुर्तगाली पहली यूरोपीय जाति थी जिसे भारत के समुद्र तट पर बसने एवं व्यापार करने की सुविधा मिली थी। 10वीं शताब्दी तक सिर्फ पुर्तगाली ही भारत से अपना व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित कर सके थे, परन्तु कालान्तर में जब धर्म सुधार आन्दोलन ने पोप की सत्ता कमजोर कर दी तो भारत के साथ होने वाले व्यापारिक लाभ को देखकर यूरोप की अन्य शक्तियाँ भी भारतीय व्यापार में दिचस्पी लेने लगी। अपने-अपने देशों की सरकार के सहयोग और संरक्षण के आधार पर डचों, फ्रांसीसियों, अंगरेजों इत्यादि ने व्यापारिक कंपनियाँ स्थापित की तथा भारत से व्यापारिक संबंध स्थापित किए। परिणामस्वरूप, 17-18वीं शताब्दी में पुर्तगालियों के अतिरिक्त डच, फ्रांसीसी और अंगरेजों के पाँव भी भारत में व्यापारी के रूप में जम गए। भारत के विभिन्न भागों में इन्होंने अपनी कोठियाँ एवं बस्तियाँ स्थापित की। भारतीय राजनीति की दुर्बलता का लाभ उठाकर इन लोगों ने व्यापार के अतिरिक्त राजनीति में भी हस्तक्षेप किया। परिणामस्वरूप, इनमें आपसी प्रतिस्पर्धा भी आरंभ हुई जिसमें अंततः अँगरेज सफल हुए और भारत पर उनका राजनीतिक प्रभाव स्थापित हो गया।

यूरोपीयों के भारत आगमन के कारण

भारत में यूरोपीय जातियों का आगमन 15वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुआ। ये विदेशी जातियाँ कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भारत आई। निस्संदेह व्यापारिक हितों की सुरक्षा एक प्रधान कारण था, परन्तु इसके साथ ही अन्य उद्देश्य भी थे। इन उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की पूर्ति के लिए ही यूरोपियनों ने भारत से अपना संपर्क बढ़ाया। ये कारण निम्नलिखित हैं-

आर्थिक हितों की सुरक्षा-

यूरोपीय जातियों के भारत-आगमन का प्रमुख उद्देश्य अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा करना था। भारत से सीधा व्यापारिक संबंध कायम कर यूरोपीय जातियाँ अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करना चाहती थीं। प्राचीन काल में भी यूरोपीय देशों का भारत के साथ व्यापारिक संबंध था। इस संबंध से उन्हें बहुत अधिक लाभ होते थे। बाद में जब अरबों ने इस व्यापार पर अधिकार कर लिया तो उनको आर्थिक क्षति होने लगी। फलतः, वे भारत से सीधा व्यापारिक संबंध स्थापित कर अपनी स्थिति सुदृढ़ करना चाहते थे। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर यूरोपियनों ने प्रारंभ में भारतीय शासकों के सामने नतमस्तक होकर, वफादारी की कसम खाकर अपने-अपने लिए व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त की तथा अपनी-अपनी कोठियाँ स्थापित की। ऐसा कर वे अपने व्यापार को अधिक-से-अधिक बढ़ाना चाहती थीं। इस प्रयास में विभिन्न यूरोपीय जातियों में स्पर्धा भी होती थी।

राजनीतिक उद्देश्य-

आर्थिक हितों की सुरक्षा की आड़ में विदेशी जातियाँ अपने राजनीतिक हितों की सुरक्षा में भी लगी हुई थीं। 17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से ही भारत की राजनीतिक स्थिति के असंतुलित होने के लक्षण स्पष्ट होने लगे थे। मुगल साम्राज्य धीरे-धीरे पतन की तरफ अग्रसर हो रहा था। इसका लाभ उठाकर एक तरफ तो स्थानीय तत्व एवं शक्तियाँ अपने-आपको मजबूत करने में लगी हुई थीं तो दूसरी तरफ यूरोपीय जातियाँ भी इस मौके का लाभ उठाना चाहती थी। 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण तक भारत में पुर्तगाली, डच, अँगरेज और फ्रांसीसी व्यापारिक कंपनियाँ स्थापित हो चुकी थीं। इनके समक्ष भारतीय राजनीति का खोखलापन स्पष्ट हो चुका था। अतः, ये कंपनियाँ व्यापार की आड़ में राजनीति में प्रवेश कर अपने-अपने हितों की सुरक्षा एवं सर्वोच्चता प्राप्त करने का प्रयास करने लगी। इस दिशा में पहले पुर्तगालियों ने आरंभ किया, परन्तु पुर्तगाली भारत में राजनीतिक सर्वोच्चता प्राप्त करने के प्रयास में अनेक कारणों से पिछड़ गए। यही स्थिति डचों की भी रही, लेकिन अँगरेजों और फ्रांसीसियों ने अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु भारतीय राजनीति में खुला हिस्सा लेना प्रारम्भ कर दिया। फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले ने दक्षिण की राजनीति में गहरी दिलचस्पी लेना प्रारम्भ कर दिया। दूसरी तरफ अँगरेज बंगाल पर अपनी निगाहें जमाए हुए थे। आपसी स्वार्थों की टकराहट ने अंगरेजों और फ्रांसीसियों में सर्वोच्चता के संघर्ष को भी जन्म दिया। इस संघर्ष में अँगरेजों को ही विजयश्री हासिल हुई और वे समूचे भारत के मालिक बन बैठे।

धार्मिक उद्देश्य-

व्यापरिक एवं राजनीतिक उद्देश्यों के अतिरिक्त यूरोपीय जातियाँ असभ्य देशों को सभ्य बनाने की आड़ में भी भारत में अपनी शक्ति कायम करना चाहती थीं। यूरोपीय जातियों की धारणा थी कि असभ्यों का सभ्य बनाना उनका उत्तरदायित्व है। इसके लिए ईसाई धर्म का प्रचार आवश्यक था। अरबों की तरह यूरोपीय जातियाँ भी अपने धर्म का प्रचार करना अपना पवित्र कर्तव्य मानती थीं, लेकिन जहाँ अरबों ने धर्म-प्रचार के लिए सैनिक अभियानों का सहारा लिया वहाँ यूरोपीय जातियों ने उदारवादी दृष्टिकोण अपनाया। ऐसा कर वे भारतीयों के मध्य अपने लिए स्थान बनाना चाहती थीं। अँगरेजों और फ्रांसीसियों ने धार्मिक मामलों में उदारवादी दृष्टिकोण का सहारा लिया। धर्म-प्रचार का काम ईसाई मिशनरियों को सौंप दिया गया। इसके विपरीत पुर्तगालियों ने धर्मप्रचार के लिए कठोर एवं दमनात्मक कार्रवाई की, जो अंततः उनके पतन का एक प्रमुख कारण सिद्ध हुई।

इस प्रकार, भारत में यूरोपियनों का आगमन आकस्मिक एवं निरुद्देश्य नहीं था। वे निश्चित आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक उद्देश्य लेकर भारत आए थे। यूरोप की राजनीति ने भी उनके प्रयासों में सहायता पहुंचाई।

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