जागीरदारी प्रथा समाप्ति के विभिन्न कारण

जागीरदारी प्रथा की समाप्ति के कारण

जागीरदार यदि अपने पद के साथ-साथ फौजदार भी नहीं होता तो वस्तुतः उसकी शक्ति और प्राधिकार भू-राजस्व निर्धारण और संग्रह तक ही सीमित थे। सैद्धांतिक रूप से जागीर का दावा प्राधिकृत भू-राजस्व और करों (माल-ए-वाजिबी-ओ-हुकूक-ए-दीवानी) तक ही परिसीमित था और शाही विनियमों के अनुसार निर्धारित प्राधिकृत करों से अधिक वह कुछ नहीं माँग सकता था। उसे न्यायिक अधिकार नहीं मिले हुए थे। ये अधिकार तो बादशाह द्वारा नियुक्त काजी के पास होते थे। एक छोटे जागीरदार के पास पुलिस के अधिकार भी नहीं होते थे। वे अधिकार फौजदार के पास होते थे। सल्तनतकालीन इक्तादार के विपरीत मुगलकालीन जागीरदार मोटे तौर पर अपनी जागीर के प्रशासनिक दायित्वों से वंचित था। फिर भी इरफान हबीब के अनुसार व्यवहार में जागीरदार के अधिकार इतने अधिक परिसीमित नहीं होते थे। विशेष रूप से यह बात बड़े जागीरदार पर लागू होती थी, जिसे फौजदारी या पुलिस की शक्तियाँ भी मिली होती थीं।

जागीरदारों की शक्ति इस तथ्य से भी अधिक बढ़ गई थी कि उनकी जागीरों में भूमि का क्षेत्र बहुत अधिक होता था। एक आकलन के अनुसार सन् 1646 में केवल 68 राजाओं और उच्चतम अभिजात वर्ग के लोगों के पास साम्राज्य की कुल “जमा” का 36.6% था तथा अन्य 587 उच्चतर अधिकारियों के पास लगभग 25 प्रतिशत था, जबकि शेष 7,555 मनसबदारों के पास कुल राजस्व का चौथा हिस्सा था या तीसरा हिस्सा ही था। जिन अधिकारियों को नकद वेतन मिलता था, उनकी बात छोड़ भी दें तो ऊपर बताये गये अनुपातों से यह तो सिद्ध हो जाएगा कि अधिकतर जागीरें कुछ ही हाथों में संकेन्द्रित थीं। बड़े जागीरदारों को जहाँ कहीं जागीरें मिलती थीं, वहाँ वे राजस्व उगाहने के लिए स्थायी प्रशासनिक तंत्र (सरकार) रखते थे। उनके पास बड़ी सैनिक शक्ति भी होती थी। इसलिए यदि उनके खिलाफ किसी तरह की शिकायत शाही दरबार में पहुंचती भी थी तो उनके पद और प्राधिकार के बल पर वह बेअसर साबित हो जाती थी।

जागीरदारी संकट

जागीरदारी प्रथा की ताकत इस तथ्य में निहित है कि इसकी स्थापना एक शक्तिशाली भू-स्वामी अभिजात वर्ग पर शाही नियंत्रण के एक साधन के रूप में की गई थी, ताकि इसके माध्यम से जागीरें बाँट कर एक दक्ष शाही सेवा व्यवस्था बनाई जा सके। बहरहाल जागीरदारी प्रथा की अपनी कुछ अंतर्निहित विसंगतियाँ थीं। इस प्रथा में निहित कमजोरियों का विश्लेषण करते समय इस बात की ओर संकेत किया जा सकता है कि यह प्रथा तभी सुचारु रूप से काम करेगी जब या तो वितरण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध होगी या जागीरदारी मनसबदारों की संख्या पर उचित नियंत्रण रखा जा सकेगा। दूसरे शब्दों में, यदि जागीरों का आवंटन अंधाधुंध किया गया तो वह स्थिति जल्दी ही आ जाएगी, जब बांटने को पर्याप्त भूमि बचेगी ही नहीं। जागीरों की कमी से भूमि की अनुमानित आय में मुद्रा-स्फीति का प्रवेश होगा, जिससे वस्तुतः आय की वसूली होगी ही नहीं। “हासिल” (वास्तविक आय) और “जमा” (अनुमानित आय) के इसी अंतर ने जागीरदारी प्रथा को आगे चलने नहीं दिया। जागीरदारी संकट का एक संभावित कारण यह भी था कि खालिसा भूमि को जागीरों में बदला जाता रहा। ऐसा करने से न केवल पादशाह ही कंगाल हो गया अपितु इसने जागीरदारों-मनसबदारों को भी राज्य के अधिकारों को हड़पने के लिए उत्प्रेरित किया। जागीरदारी प्रथा की कमजोरियों के अन्य कारण थे-भ्रष्टाचार, इजारा, जागीरदारों पर केन्द्र के प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण का अभाव आदि-आदि।

राजस्व-संग्रह और सैनिक दायित्वों के बारे में सरकारी विनियमों का उल्लंघन करने के लिए जागीरदार भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये। कभी-कभी बिना परिश्रम के ही राजस्व-संग्रह करने के लिए जागीरदार अपनी जागीरों को सबसे ऊंची बोली लगाने वाले ठेके (इजारे) पर दे देते थे। यह तरीका किसानों के लिए दमनकारी सिद्ध हुआ। सरकार अपने गुप्तचर विभाग के माध्यम से जागीरों के बारे में सूचना एकत्र करती थी। जागीरदारों के खिलाफ दमन संबंधी शिकायतें पादशाह, सूबेदार या दीवान को दी जा सकती थीं। पर सामान्यतः जागीरदारों के कारिंदे किसानों को जोर-जबरदस्ती से शिकायतें पहुँचाने से रोक लेते थे। बहरहाल, केन्द्रीय सरकार किसी भी जागीरदार को अनियमितताओं के लिए दंडित कर सकती थी। ये अनियमितताएं प्रायः जागीरों के अवैध हस्तान्तरण, पुनर्ग्रहण अथवा सरकारी हाकिमों को हटाने या बदलने से संबंधित होती थी। सरकार का कहना है कि इन अनियमितताओं के लिए जो दंड जागीरदारों को दिये जाते थे वे बहुत ही साधारण होते थे, अर्थात् उन्हें वस्तुतः दंड कहा ही नहीं जा सकता। इस प्रकार व्यवहार में किसानों को जमींदारों के दमन से बचाने वाला कोई नहीं था।

“जमा” और “हासिल” के बीच जो विसंगति थी, वह जमींदारी प्रथा की एक बड़ी कमजोरी थी। इस मामले में जागीरदारों, जमींदारों और किसानों के बीच जो रिश्ते थे, उन पर भी यहाँ बल दिया जाना चाहिए। जागीर से राजस्व की वसूली में जागीरदार को जमींदार के सहयोग की अपेक्षा होती थी, वह तो उसे मिलता ही नहीं था, उल्टे जमींदार अनेक समस्याएं उत्पन्न कर देता था। जमींदार का सदा यह प्रयत्न रहता था कि वह इकट्ठे हुए राजस्व में से अपने लिए निर्धारित हिस्से से अधिक हिस्सा अपने पास रख ले। इस तरह उसका जो लाभ होता था, वह जागीरदारों की हानि होती थी। कभी-कभी तो जमींदार भुगतान करने में आनाकानी करता था तब जागीरदार को बल-प्रयोग करना पड़ता था। कुछ जमींदारों के पास अपनी सैनिक टुकड़ियाँ होती थीं, इसलिए ऐसे अवसरों पर कुछ झगड़ा फसाद भी हो जाता था। जिन क्षेत्रों में जमींदार ही जागीरदार होता था, वहाँ ऐसे झगड़े नहीं होते थे, किंतु बेचारे किसान तो उस जागीरदार-जमींदार की दया पर ही जीते थे।

जागीर के हस्तांतरण की प्रथा ने अनेक कठिनाइयाँ पैदा की। नोमन अहमद सिद्दीकी के अनुसार जागीरों के हस्तांतरण के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि पादशाह यह नहीं चाहता था कि अपनी जागीर में जागीरदार की जड़ें गहरी हो जाएं। केवल वेतन जागीरों को छोड़कर अन्य सभी जागीरों के मामले में यह एक लगभग स्थायी सिद्धांत बन गया था कि कोई जागीर किसी एक ही व्यक्ति के पास चार वर्षों से अधिक न रह सके। हो सकता है कि जागीरों के निरंतर हस्तान्तरणों ने पादशाहों की इस रूप से मदद की हो कि जागीरदार स्थानीय शक्तिशाली शासक न बन सकें, और वे पादशाह की इच्छा पर ही पूरी तरह आश्रित रहें। पर जागीरदारों के लिए बार-बार के स्थानान्तरण असुविधाजनक थे। मान लें, जागीरदार का स्थानान्तरण वर्ष के मध्य में हुआ, तो उसे अनेक कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती थीं। इन कठिनाइयों को देखते हुए जागीरदार अपने ठहराव-काल में ही अधिक-से-अधिक धन-संग्रह कर लेना चाहते थे, क्योंकि उन्हें इस बात का भरोसा नहीं रहता था कि कब उनका स्थानान्तरण कर दिया जाएगा।

जागीरदारी संकट पर सतीश चन्द्र ने विस्तार से विचार किया है। अपने अध्ययन में उन्होंने इस प्रथा की अनेक कमजोरियों पर प्रकाश डाला है और उन समस्याओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है, जो इनको सामना जागीरदारों को करना पड़ता था। सतीश चन्द्र के अनुसार मुगल काल में जागीरदारी प्रथा का संकट मुख्यतः मध्यकालीन भारत में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक संबंधों से जुड़ा हुआ था- विशेषतया भू-कृषि संबंधों से और इन संबंधों की आधारशिला पर खड़े प्रशासनिक ढाँचे से। मुगल शासक वर्ग के सामने प्रमुख समस्या थी – राजस्व प्राप्ति में निरंतर होती कमी की। मुगल शासन राजस्व संग्रह के लिए जमींदारों और प्रभावशाली भू-स्वामियों पर आश्रित था, और ये लोग सरकार को इस काम में पर्याप्त सहयोग नहीं देते थे। सवारों कीसंख्या में कमी हो जाने के कारण मुगल फौजदारों की योग्यता और इच्छा शक्ति भी कमजोर हो गई और वे अपने हिस्से की मालगुजारी वसूल करने के लिए जमींदारों को पर्याप्त सहायता प्रदान नहीं कर सकते थे। चूंकि मनसबदार अपनी जागीरों से देय आय की राशि वसूल करने में असमर्थ हो गए, इसलिए उनके सैनिक सामर्थ्य में ह्रास की मात्रा बढ़ गई। सतीश चन्द्र तत्कालीन सामाजिक ढांचे का गहराई से परीक्षण कर इस नतीजे पर पहुंचे कि उस समय कृषि संबंध जागीरदारों, जमींदारों और खुदकाश्त करने वाले भू-स्वामियों या प्रभावशाली कृषक वर्ग के तिपाये पर टिके थे। इस बात के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं कि उस समय के प्रभावशाली या विशेषाधिकार प्राप्त किसान सामान्यतः भूमिहीन किसानों को या कम भूमि वाले किसानों को भू-स्वामित्व की अनुमति प्रदान करने के प्रति अनिच्छुक थे। भू-स्वामित्व न मिलने के कारण कृषि-कर्म का विस्तार नहीं हो सका और विस्तार न होने के कारण कृषि उपज में वृद्धि सीमित ही रही। इसका परिणाम यह हुआ कि जागीरों की आय घट गई और इस प्रकार जागीरदारी संकट शुरू हुआ।

जागीरदारी संकट के जनक दो कारकों का उल्लेख ऊपर हुआ है, उनके अलावा संकट को बढ़ाने वाले कुछ अन्य कारकों पर भी सतीश चन्द्र ने विचार किया है। ये कारक हैं-शासक वर्ग के आकार में वृद्धि, मनसबदारों की आडंबरपूर्ण जीवन शैली, जागीरों का हस्तांतरण और नये मनसबदारों को जागीरों के आवंटन में विलंब। जागीरी विनिमयों के क्रियान्वयन से भी समस्याएं उत्पन्न हुईं। यदि जागीरदार घोड़ों की निर्धारित संख्या वाला रिसाला नहीं दे पाता था, तो उसकी जागीर का पुनर्ग्रहण कर उसे “पै बाकी” के अंतर्गत दिखा दिया जाता था, अर्थात् उस जागीर वाली भूमि को नये मनसबदारों में आवंटित करने के लिए सुरक्षित रख लिया जाता था। दकन में जमींदारों और भू-स्वामियों से अपने हिस्से का राजस्व उगाहने में निरंतर बढ़ने वाली कठिनाइयों की वजह से अनेक मनसबदार उपर्युक्त शर्तों को पूरा नहीं कर सके। परिणाम यह हुआ कि अधिक-से-अधिक भूमि “पै बाकी” होती गई और लंबे समय तक उनका पुनः आवंटन भी नहीं हुआ। सतीश चन्द्र के अनुसार जागीरदारी प्रथा में संकट की वृद्धि का केन्द्र बिन्दु वस्तुतः “पै बाकी” भूमि की कमी में निहित नहीं था, अपितु इस प्रथा की कार्य-विधि में बढ़ती कमियों ने ही संकट को बढ़ाया। कमियाँ ये थीं कि न तो उस समय कानून और व्यवस्था लागू हो पा रही थी और न साम्राज्य के अनेक हिस्सों से केन्द्र के हिस्से के भू-राजस्व की उगाही हो पा रही थी। इन सब बातों का आगे चल कर शेष साम्राज्य पर असर तो होना ही था।

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