सल्तनत काल में स्थापित प्रमुख सैन्य विभाग

सल्तनत काल का सैन्य विभाग

सैन्य विभाग (दीवान-ए-अर्ज)

इस विभाग का अध्यक्ष आरिज-ए-मुमालिक कहलाता था। भारत में आरिज के विभाग की स्थापना सबसे पहले बल्बन ने की थी। आरिख के प्रमुख कार्य सेना की भरती, उसे अस्त्र-शस्त्र से लैस करना तथा वेतन वितरण के कार्य थे। इन सभी के लिए यही उत्तरदायी होता था। वर्ष में एक बार सेना के निरीक्षण के लिए सुल्तान के समक्ष उपस्थित की जाती थी। परंतु साधारणतया इस नियम का विधिवत् पालन नहीं किया जाता था। आवश्यकता होने पर ही सरदार और सूबेदार अपनी सेनाओं को लेकर सुल्तान की सेवा में उपस्थित होते थे।

सेना का कोई स्थायी सेनापति न था। सुल्तान ही सेना का मुख्य सेनापति होता था तथा उसका सहायक नायब-उल-मलिक या मलिक नायब होता था। समय-समय पर सुल्तान विभिन्न आक्रमणों के लिए विभिन्न सेनापति स्वयं नियुक्त करता था। उदाहरण के लिए अलाउद्दीन के काल में मलिक काफूर को दक्षिण युद्ध में सेनापति नियुक्त किया गया था। सेनापति की नियुक्ति केवल विशिष्ट समय तक ही रहती थी। अमीर-ए-आखूर का शाही सेना में एक विशेष स्थान था। उदाहरण के लिए कुत्बुद्दीन ऐबक मुइजुद्दीन गोरी का अमीर-ए-आखूर था। सुल्तान रजिया ने मलिक जमालुद्दीन याकूत को अमीर-ए-आखूर के पद पर नियुक्त किया था। ये लोग बड़े योग्य और बहादुर होते थे। सल्तनत के सैनिक-संगठन में इनका विशेष स्थान था।

सैनिक-संगठन में क़िले को बहुत महत्व दिया जाता था। मंगोल-आक्रमण से रक्षा प्राप्त करने के लिए सीमाओं पर क़िलों का निर्माण अत्यधिक आवश्यक था। क़िले अधिकतर उन क्षेत्रों में बनाए जाते थे जहाँ प्रकृति के स्थिर लाभ प्राप्त हो सकते हों। क़िलों के चारों तरफ़ घुड़सवार शीघ्र उनके पास पहुँच न सकें। बल्बन पहला शासक था जिसने क़िले बनाने पर ध्यान दिया। मंगोल आक्रमण से सुरक्षा पाने के लिए बल्बन लाहौर गया और वहाँ के क़िले को सुदृढ़ बनाने का आदेश दिया। उसने सीमा पर क़िलों की एक क़तार बनाई, उदाहरणार्थ मुनाम भटिंडा, लाहौर तथा दिवालपुर में। यहाँ शेरखाँ को नियुक्त किया। प्रत्येक क़िले में स्थायी सेना रखी। अलाउद्दीन खलजी ने भी सीरी के क़िले को सुदृढ़ किया। दिल्ली तथा उत्तर-पश्चिम के क़िलों की मरम्मत करवाई और इनमें स्थायी सेना रखी गई।

क़िलों को सुरक्षा-पंक्ति का एक मुख्य भाग समझा जाता था और उनकी सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक प्रबंध किए जाते थे। प्रत्येक क़िलों में उसका सेनापति होता था। इसे कोतवाल कहते थे। जिसके पास किले की चाभी रहते थे। इस प्रकार कोतवाल ही क़िले का सर्वोच्च अधिकारी था और उसका स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण था। कोतवाल के अतिरिक्त क़िलों के मुफ़ारिद होते थे। इनके कार्यों की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई है, पर संभवतया ये अभियंता थे जो क़िलों के हथियारों की देखभाल करते थे। किले खाद्य और चारा से पूरी तरह भरे होते थे। सुल्तानों के पास नदी में चलने वाली नावों का एक बेड़ा था जिसको बहर कहते थे। इसका अध्यक्ष अमीर-ए-बहर कहलाता था। इसके अतिरिक्त सेना में बहुत-से गुप्तचर भी थे जिन्हें तलेया या यउकी कहा जाता था और जिन्हें शत्रुओं की गतिविधियों पर ध्यान रखने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता था।

इस काल में बहुत-से हथियार प्रयोग में लाए जाते थे। प्रत्येक घुड़सवार के पास दो तलवारें, एक भाला और धनुष-बाण होता था। रक्षा के लिए कवच और शस्त्रास्त्र का प्रयोग करते थे। घोड़ों और हाथियों की रक्षा के लिए उन्हें सोने के बख्तर पहनाते थे। पैदल सैनिकों के पास भी तीर-कमान, भाला, बरछा, तलवार, कटार आदि हथियार होते थे।

सल्तनत-काल में बारूद, गोले या तोपखाने का निर्माण नहीं किया गया था। तेरहवीं शताब्दी में कुशकंजिर शब्द का प्रसंग मिलता है और ऐसा मालूम पड़ता है कि वह तोप का बिगड़ा हुआ रूप था। इसके अतिरिक्त मग़रिब, मंजनिक तथा अरादा का वर्णन मिलता है। इनका प्रयोग भारी पत्थर फेंकने में या धातु के गोले फेंकने में किया जाता था जिससे विरोधी दल के मीनार इत्यादि नष्ट किए जाते थे। चर्ख (अर्थात् शिक्षा प्रक्षेपास्त्र) और फलाखून (गुलेल) का भी प्रयोग किया जाता था। गरगज एक चलायमान मंच था जिस पर खड़े होकर घेरा डालने वाले अधिकतम ऊंचाई पर पहुँचकर शत्रु पर आक्रमण कर सकते थे। सबत एक सुरक्षित गाड़ी थी जो प्रक्षेपक से रक्षा करती थी। घेरा डालनरे वाले सैनिक पाशेब बनाते थे जो ढलवा टीले जैसा होता था और किले की ऊंची दीवार की ओर जाता था। प्रायः इसका प्रयोग इंजन को चढ़ाने और क़िलों को तोड़ने में किया जाता था।

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