अकबर शासनकाल में भू-राजस्व

मुगलकालीन भू-व्यवस्था में अकबर का योगदान

भूराजस्व व्यवस्था में सुधार के लिए अकबर द्वारा अपनायी गयी विभिन्न प्रणाली

अकबर के राज्यकाल में अनुभव के आधार पर भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार किये जाते रहे। 1582 ई० में भू-राजस्व के लिये खालसा भूमि को चार भागों में विभाजित किया गया तथा प्रत्येक भाग के लिये राजस्व अधिकारी की नियुक्ति की गई। अकबर के राज्यकाल में 1588 ई० में भूमि की पैमाइश के लिए ‘गज-ए-सिकंदरी’ के स्थान पर ‘गज-ए-इलाजी’ का प्रयोग आरम्भ किया गया। इन दोनों में 39.41 का अन्तर था। एक बीघा 3600 वर्ग गज का स्वीकार किया गया तथा बीघा का बीसवाँ भाग बिसवा कहलाता था। यद्यपि शाहजहाँ के राज्यकाल में भूमि की पैमाइश की इकाई को पुनः परिवर्तित करने का प्रयास किया गया परन्तु वह अस्थाई सिद्ध हुआ तथा मुगल काल के अन्त तक साधारणतया ‘बीघा-ए-इलाही’ प्रचलित रहा। इसके अतिरिक्त 1593 ई0 में सूबे के राजस्व प्रशासन के लिये प्रत्येक सूबे में एक दीवान नियुक्त किया गया जो सूबेदार से स्वतन्त्र था तथा उसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध वजीर अथवा केन्द्रीय दीवान से होता था।

आइने-दहसाला या टोडरमल बन्दोबस्त

आइने-दहसाला की पद्धति अकबर द्वारा अपने शासन के चौबीसवें वर्ष में अपनाई गई। माँग का निर्धारण नकद राशि के रूप में किया गया, वार्षिक आधार पर गणना की आवश्यकता नहीं रही और उसके परिणामस्वरूप होने वाले विलंब और अनिश्चितता की स्थितियाँ भी समाप्त हो गई। इरफान हबीब के मतानुसार “इस नई पद्धति का सार यह है कि खेती की श्रेणियों तथा कीमतों के स्तरों के बारे में प्रत्येक परगना की दस वर्षों की स्थिति (हल-ए-दह-साला) का पता लगाने के बाद उन्होंने वार्षिक राजस्व के रूप में उसका दसवाँ भाग निर्धारित किया।” ऐसा प्रतीत होता है कि जो कुछ किया गया वह यह था कि प्रत्येक वर्ष एक स्थान के संबंध में भूतलक्षी प्रभाव से फसलों की दरें निकाली गई तथा साथ ही कीमतों की एक समांतर सूची तैयार की गई ताकि प्रत्येक पिछले वर्श के संबंध में नकद-राजस्व की दरें निर्धारित की जा सके।” नील, पान, हल्दी तथा पोस्त जैसी नकदी फसलों के संबंध में अपवाद रहा। उनकी दरें कुछ अच्छे वर्षों की फसल के आधार पर तय की गई।

आइन के अनुसार शासन के इकत्तीसवें वर्ष तक भूमि की नपाई करने की मानक इकाई ‘इस्कंद्री गज’ थी (अर्थात 41 इस्कांद्रियों के व्यास तथा एक इस्कंद्री की क्रिज्या के योग के बराबर की लंबाई-लोदी काल के एक कांसे के सिक्के का नाप इस्कंद्री था)। हुमायूँ ने आदेश दिया था कि इस लंबाई को 42 इस्कांद्रियों (32 अंकों) के बराबर कर दिया जाए। अपने शासन के इकत्तीसवें वर्ष में जब अकबर ने यह देखा कि अलग-अलग माप के होने से प्रजा को बहुत असुविधा हो रही है और बेईमानी को बढ़ावा मिल रहा है तो उसने उसे समाप्त कर दिया। उसने इकतालीस अंकों के माध्यम ‘गज’ का प्रचलन आरंभ किया (इलाही गज)। “तनाब” (माप यंत्र) की अपेक्षा जो कि मूंज की रस्सी का बना होता था, उसने नई “जरीब’ का प्रचलन किया जो बाँस की बनी होती थी और लाहे की चूड़ियों से जुड़ी होती थी। एक “बीघा’ को बीस ‘बिस्वा’ में उपविभाजित किया जाता था। प्रत्येक बिस्वा को फिर बीस बिस्वानसों में बाँटा जाता था। नौ बिस्वानसो तक कोई राजस्व नहीं लिया जाता था किन्तु दस विस्वानसों की गणना एक बिस्वा के रूप में की जाती थी।

समस्त भूमि को खालिसा भूमि एवं निर्दिष्ट भूमि को दो व्यापक एवं आधारभूत श्रेणियों में विभाजित किया जाता था। निर्दिष्ट भूमि को “तुयूल”, “जागीर” या “इक्ता” के नाम से भी पुकारा जाता था। दोनों श्रेणियों की भूमि में यह अंतर था कि खालिसा भूमि का राजस्व प्रशासन तो सीधे सरकारी विभागों के अधीन था, पर निर्दिष्ट भूमि का प्रशासन शहंशाह द्वारा विभिन्न श्रेणियों के अपने अधिकारियों तथा प्रजा को सौंप दिया गया था। मोरलैंड का कहना है कि इस प्रणाली की मुख्य विशेषता यह थी कि “आवर्ती राजस्व की कुछ मदें आवर्ती व्यय की विशेष मदों की पूर्ति करने के लिए निर्दित कर दी जाती थीं, इन विशेष मदों में हर मामले में तो नहीं किन्तु सामान्यतः साम्राज्य की सेवा पर होने वाला व्यय तथा वेतन की मर्दे शामिल थीं।”

ज़ब्ती प्रणाली की विशेषता-

अकबर के शासनकाल में भू-राजस्व की वसूली के लिये उपरोक्त जब्ती प्रणाली का प्रचलन हुआ जो भूमि सर्वेक्षण, भू-राजस्व निर्धारण के लिये दस्तूरुल अमल तथा जब्ती खसरे की तैयारी पर आधारित थी। साम्राज्य के अधिकतर भू-क्षेत्रों में यही प्रणाली प्रचलित थी। इस प्रणाली से अनेक लाभ थे। प्रथम, भूमि की पुनः पैमाइश की जाती थी। इस प्रणाली से अनेक लाभ थे। प्रथम, भूमि की पुनः पैमाइश की जा सकती थी। दूसरे, दस्तूरुल अमल के द्वारा कर्मचारियों की मनमानी पर नियन्त्रण लगाया जा सका। तीसरे, दस्तूरुल अमल के कारण वार्षिक भू-राजस्व की प्राप्ति में उतार-चढ़ाव की सम्भावना का काफी सीमा तक अन्त हो गया। परन्तु इस प्रणाली में कुछ दोष भी थे। उन क्षेत्रों में जहाँ भूमि समान श्रेणी की नहीं थी वहाँ इसे सरलतापूर्वक नहीं लागू किया जा सका। दूसरे, उत्पादन में सदैव अनिश्चितता बनी रहती थी। सूखा अथवा फसल के नष्ट होने पर किसान को कष्ट सहन करना पड़ता था। साथ ही यह प्रणाली अपेक्षाकृत महँगी भी थी। भूमि की पैमाइश में लगे हुये कर्मचारियों के खर्चे के लिये एक दाम प्रति बीघा कर के रूप में लिया जाता था जिसे ‘जाबिताना’ कहा जाता था।

बटाई प्रणाली-

भू-राजस्व निर्धारण की दूसरी प्रमुख प्रणाली बटाई अथवा गल्लाबख्शी कहलाती थी। ‘आइन-ए-अकबरी’ में तीन प्रकार की बटाई का उल्लेख मिलता है – खेत बटाई, लाक बटाई एवं रास बटाई। खेत बटाई में फसल के तैयार होते ही खेत में खड़ी फसल का विभाजन कर लिया जाता था।लाक बटाई में फसल को काटने के पश्चात रालिहान में लाया जाता था तथा अनाज निकाले बिना ही राज्य एवं किसान के बीच उसका बँटवारा कर लिया जाता था। रास बटाई के अन्तर्गत खलिहान में फसल के आने पर राज्य तथा किसान के बीच अनाज का बँटवारा कर लिया जाता था। उपज के विभाजन की व्यवस्था में पर्याप्त सजगता, निरन्तर निरीक्षण और कुछ अतिरिक्त खर्च की आवश्यकता होती थी जिसे राज्य तथा कृषक दोनों को समान रूप से वहन करना पड़ता था। इसके अतिरिक्त स्थानीय अधिकारियों के प्रयासों के बाद भी उपज के कुछ भाग के अपहरण की सम्भावना उस समय तक बनी रहती थी जब तक कि वास्तविक विभाजन न हो जाये। यही कारण था कि बटाई, प्रणाली के लिये अधिकारी अनिच्छुक रहते थे तथा इसके लिये पहल सदैव कृषकों की ओर से होती रही होगी। परन्तु राजस्व निर्धारण अधिकारी का यह कर्तव्य होता था कि वह उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर ले। अतः इस प्रणाली को अधिक प्रोत्साहन नहीं दिया जाता था। जहाँ जब्ती प्रणाली को कार्यान्वित करने में कठिनाई होती थी वहीं इसे लागू किया जाता था।

कनकूत प्रणाली-

भू-राजस्व निर्धारण की विभिन्न प्रणालियों में कनकूत अथवा दानाबन्दी प्रणाली भी प्रमुख थी। इस प्रणाली के अन्तर्गत पहले उपज वाली भूमि की पैमाइश की जाती थी और फिर उसके अनुसार भूमि की उपज का अनुमान लगाया जाता थ। साधारणतः इस प्रणाली के अन्तर्गत भूमि की पैदावार को आँकने लिये पैमाइश किये हुए खड़ी फसलों वाले भू-क्षेत्र तथा उस क्षेत्र की प्रति बीघा या बिसवा उपज को आधार बनाया जाता था। यदि कोई कृषक इस प्रकार निर्धारित किए हुए भू-राजस्व में किसी प्रकार की अनुचित वृद्धि की शिकायत करना था तो पैदावार की बनागी तौलकर जाँच करने के बाद पूरी उपज का निर्धारण किया जाता था। अमीन अपनी ओर से एक बिसवा की खड़ी फसल चुनता था तथा किसान अपनी ओर से एक बिसवा की फसल चुनता था। इस प्रकार दोनों बिसवों की फसलों को काट कर अनाज निकाल लिया जाता था तथा इस अनाज को तौलकर फसली भूमि की माप के अनुसार कुल उपज को जोड़ लिया जाता था। इस प्रकार जोड़कर निकाली हुई कुल उपज के आधार पर निर्धारित भू-राजस्व में कमी अथवा वृद्धि की जा सकती थी। कनकूत प्रणाली में भू-राजस्व निर्धारण न्यूनाधिक उपज पर होता था और फसल की क्षति को राज्य एवं कृषक दोनों समान रूप से सहन करते थे। परन्तु इस प्रणाली में भू-राजस्व निर्धारण अनुमानित अथवा सम्भावित उपज पर होता था।

नस्क प्रणाली-

इस प्रणाली के अन्तर्गत न तो भूमि की मैमाइश होती थी और न तो फसलों का सामयिक विवरण ही तैयार किया जाता था। डॉ० आर० पी० त्रिपाठी के अनुसार “इसमें न तो भूमि की पैमाइश की जाती थी और न तो फसलों का वर्गीकरण किया जाता था; यह शासन तथा कृषक अथवा भू-स्वामी के मध्य मोटे अनुमान पर आधारित शुद्ध एवं सरल समझौता था।” यह प्रणाली बंगाल, कठियावाड़, गुजरात एवं काश्मीर में प्रचलित थी।

भू-राजस्व की वसूली-

राज्य की ओर से प्रत्येक कृषक को पट्टा दिया जाता था जिसमें उसका नाम, उसकी भूमि का क्षेत्र, बोई गई फसल का विवरण, भू-राजस्व का अंकन इत्यादि का उल्लेख होता था। इसके बदले कृषक राज्य को कबूलियत प्रदान करता था जो एक प्रकार से स्वीकृति पत्र था। पट्टा तथा कबूलियत राज्य तथा कृषक के बीच एक प्रकार का समझौता था। इससे यह भी प्रतीत होताा है कि भू-राजस्व सीधे कृषक से वसूल किया जाता था। परन्तु प्रो0 इरफान हबीब का मत है कि प्रत्येक कृषक से भू-राजस्व वसूल करना कठिन था। अतः साम्राज्य के कुछ भागों में भू-राजस्व कृषक से व्यक्तिगत रूप में न लेकर सामूहिक रूप से गाँव से वसूल किया जाता था। जमींदार तथा जागीरदार से गाँव का सम्पूर्ण भू-राजस्व एक साथ वसूल कर लिया जाता था जो अपने क्षेत्रों में अपने कर्मचारियों द्वारा कृषकों से वसूल कर लिया करते थे। यद्यपि उन्हें निर्देश था कि वे नियमानुसार निर्धारित भू-राजस्व से अधिक न वसूल करें परन्तु यह सम्भव नहीं दिखाई देता कि जागीरदार एवं जमींदार कृषकों से निश्चित भू-राजस्व ही वसूल करते रहे होंगे।

जहाँ तक भुगतान की पद्धति का सम्बन्ध है ‘आमिल’ को यह आदेश था कि यदि कृषक नकद नहीं देना चाहता हो तो अनाज क रूप में भुगतान स्वीकार कर लिया जाय। परन्तु कृषकों को भू-राजस्व की मांग की प्रत्येक बकाया किस्त के नकदी भुगतान के लिये प्रोत्साहित किया जाता था और सामान्यतः उन्हें नकद भुगतान करना पड़ता था। औरंगजेब के शासन के अंतिम चरण और उसके बाद के प्रमाणों से इस अनुमान की पर्याप्त पुष्टि हो जाती है कि साम्राज्य के अधिकतर भाग में नकद भुगतान करने की सामान्य प्रथा प्रचलित थी। जहाँ कनकूत तथा बटाई प्रणाली प्रचलित थी वहाँ भी अनाज के रूप में निश्चित किये हुए राज्य के अंश को नकदी में बदल दिया जाता था। डॉ० नोमान अहमद सिद्दीकी का कथन है कि “उपलब्ध प्रमाणों से संकेत मिलता है कि आमतौर पर नकद भुगतान का प्रचलन था। तथापि, किसी विशेष क्षेत्र में प्रचलित स्थानीय रीतियों तथा प्रथाओं और कृषि की परिस्थितियों को न्यायसंगत मानकर नकद भुगतान प्रथा को छोड़ा भी जा सकता था। ऐसे मामलों में वस्तु के रूप में भुगतान की सम्भावना को नियम विरुद्ध नहीं कहा जा सकता।”

कृषकों के लिये सुविधायें-

प्रशासन की ओर विशेष परिस्थितियों में कृषकों को सहायता भी प्रदान की जाती थी। अकाल पड़ने पर भू-राजस्व में छूट प्रदान की जाती थी तथा कृषकों को तक्रावी अथवा ऋण भी प्रदान किया जाता था जिस पर कोई ब्याज नहीं लिया जाता था। यह धनराशि सरल किस्तों में वसूल की जाती थी। शाहजहाँ के शासनकाल में 1630 ई० के दुर्भिक्ष में बादशाह ने अहमदाबाद में भारी पैमाने पर भू-राजस्व माफ कर दिया था तथा लोगों को राहत पहुँचाने के उद्देश्य से लंगरखाने तथा दानगृह स्थापित कर दिये थे। 1641 ई0 में जब अति वर्षा के फलस्वरूप कश्मीर में फसल खराब हो गई तथा अनाज का अभाव हो गया तो बादशाह ने लोगों में एक लाख रुपया वितरित किये जाने तथा उनके भोजन के लिए लंगरखाने की स्थापना का आदेश दिया था। औरंगजेब का समकालीन ईश्वरदास नागर फुतूहात आलमगीरी में लिखता है कि 1688-89 ई0 में सूबा हैदराबाद में सूखे के कारण बादशाह ने एक वर्ष के लिए जजिया तथा अन्य सभी करों की वसूली बन्द करने का ओदश दिया था। इसी प्रकार 1704 ई० में अकाल एवं युद्ध से उत्पन्न संकट कारण पूरे दशक में जजिया माफ कर दिया गया था। सेना को यह निर्देश था कि फसल को किसी प्रकार क्षति न पहुँचाई जाये और यदि फसल को क्षति पहुँचती है तो उसके लिये कृषक को उचित मुआवजा दिया जाये। इससे यह स्पष्ट है कि मुगल बादशाहों को जनता के दुःख-दर्द की चिन्ता अवश्य रहती थी तथा जैसे ही दयनीय परिस्थिति की ओर उनका ध्यान आकर्षिक होता था वे उसके निदान के लिये भरसक प्रयास किया करते थे। राजस्व विभाग के कर्मचारियों को आदेश दिया गया था कि वे उनके हितों की रक्षा करें तथा उन्हें खेती के लिये प्रोत्साहित करें। सिंचाई के लिये नहरों, कुओं तथा बाँधों की व्यवस्था की गई थी। शासन की ओर से इन सुविधाओं के द्वारा कृषकों को खेती के लिये प्रोत्साहित किया जाता था, क्योंकि इससे कृषक तथा राज्य दोनों को ही लाभ था। राज्य सदैव ही इसके लिये प्रयत्नशील था कि अधिक से अधिक भूमि को कृषि के अन्तर्गत लाया जाये। कृषक द्वारा बंजर भूमि को खेती के योग्य बनाने पर राज्य की ओर से भू-राजस्व में विशेष छूट प्रदान की जाती थी।

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