जागीरदार प्रथा का विकास तथा कर्तव्य

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जागीरदार प्रथा का विकास तथा कर्तव्य

जागीरदार वे मनसबदार थे जिन्हें उनका वेतन नकद नहीं मिलता था, किन्तु इसके लिए उन्हें कुछ राजस्व-क्षेत्र दिए जाते थे, जिन्हें “जागीर” कहते थे। अपनी जागीरों से वे राजस्व इकट्ठा कर उसका अपने लिए विनियोजन कर लेते थे। जागीरों से उन्हें लगभग उतनी अनुमानित आय हो जाती थी, जो जागीरदार के रूप में उनके नियत वेतन के बराबर होती थी। अनुमानित आय को तकनीकी अर्थ में “जमा” या “जमादामी” कहते थे। इसमें भू-राजस्व एवं “हासिल-सैर” और “पेशकश’ जैसे अन्य कराधान शीर्षों से होने वाली आय सम्मिलित होती थी। मुगलों के अधीन शाही इलाके भू-राजस्व प्रशासन की दृष्टि से मोटे तौर पर तीन लगभग असमान कोटियों में विभाजित थे,जो “खालिसा’ “जागीर” और “इनाम” कहलाते थे। खालिसा से सरकारी मुलाजिम राजस्व इकट्ठा कर उसे शाही खजाने में जमा करवा देते थे। जिन दी गई जमीनों के साथ किसी प्रकार का प्रशासनिक दायित्व नहीं जुड़ा होता था, उन्हें “इनाम’ कहते थे। इनमें “मदद-ए-माश” कहलाने वाली वे जमीनें भी सम्मिलित थीं जो या तो धर्मपरायण विद्वान और सम्मानीय व्यक्तियों को दी जाती थीं या उन लोगों को जिनके पास आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं होता था। अनुदान प्राप्त व्यक्तियों को इन अनुदानों में मिले भू-खंडों से आजीवन भू-राजस्व संग्रह करने का अधिकार होता था।

मुगलों के अधीन जागीरदारी प्रथा एक विशिष्ट संस्था के रूप में विकसित हुई जिसके व्यापक नियम-विनिमय थे। इस संस्था की नींव अकबर ने डाली, किन्तु शाहजहाँ ने इस सामान्य संगठन को एक जटिल संस्था के रूप में विकसित किया। धीरे-धीरे यह संस्था मुगल प्रशासनिक व्यवस्था का एक अत्यंत विशिष्ट अभिलक्षण बन गयी। आरंभ में इस व्यवस्था को लागू करने का उद्देश्य यह था कि शाही सेवा में दक्ष और अनुशासित व्यक्तियों को लाया जाये। साथ-साथ यह भी उद्देश्य था कि इससे सरकार पर भू-राजस्व प्रशासन का जो भारी बोझ था, वह हलका हो जायेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में कानून और व्यवस्था लागू करने में भी मदद मिलेगी। किन्तु सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक तो इस व्यवस्था ने मुगल साम्राज्य के प्रशासनिक और आर्थिक स्थायित्व को अस्थिर करना शुरू कर दिया। इसलिए यह आवश्यक है कि हम इस व्यवस्था के वास्तविक स्वरूप को पहचाने और इसकी कार्य-शैली की विस्तार से जाँच करें।

जागीरदारी व्यवस्था का सारतत्व यह है कि व्यवस्था भू-राजस्व आवंटन के द्वारा वेतन-भुगतान का एक तरीका था। जागीरदारों को अपना निजी खर्च चलाने और पादशाह की सेवा के लिये रखी फौजी टुकड़ियों के रख-रखाव पर खर्चा करने का अधिकार था। वेतन-भुगतान के एक प्रकार के रूप में जागीर मिलने का आशय था कि उसका दावा केवल “महाल” से प्राप्त राजस्व तक ही सीमित था। नियतन आदेश यह बात साफ तौर पर लिखी जाती थी। जागीरदार को नियत-भूमि पर स्थायी अधिकार प्राप्त नहीं थे। फिर भी यह देखा गया है कि मुगल शासन में कुछ जागीरें वंशानुगत आधार पर भी प्राप्त थीं।

जागीरों की इस कोटि में “वतन जागीर” और “अलतमगा जागीर” सम्मिलित थीं। वतन-जागीर कुछ राजाओं और जमींदारों को मिली हुई थी। इन जागीरों में “वतन” (वह भूमि जो मूल रूप से उनके शासन में थी) एवं अन्य प्रकार के राजस्व नियतन आते थे और ये दोनों प्रकृति से वंशानुगत होते थे। राजाओं के पुश्तैनी इलाकों को वतन-जागीर की कोटि में लाने का एक लाभ यह हुआ कि इससे वे इलाके भी उन्हीं शाही नियमों-विनियमों से नियंत्रित होने लगे, जिनसे जागीर-भूमि नियंत्रित होती थी। जहाँगीर द्वारा प्रवर्तित “अलतमगा जागीर’ पुश्तैनी जागीर की दूसरी कोटि में आती है। पर जागीर का यह प्रकार बहुप्रचलित नहीं था। पादशाह की जिन परिवारों पर कृपादृष्टि हो जाती, केवल उन्हीं को ये जागीरें मिलती थीं।

जागीरदार प्रथा का कर्तव्य

चूँकि जागीरदार एक मनसबदार होता था, इसलिए उसे नियत मात्रा में फौजी टुकड़ियाँ रखनी पड़ती थीं। वह चौधरियों, कानूनगों, देशमुखों, देशपांडों और कृषकों से (माल-ए-वजीब) नियत मात्रा में राजस्व और “हुकूक-ए-दीवानी’ (राजकोषीय माँगे) वसूलता था। किन्तु उसकी कृषकों और सरकार के मध्य बिचौलिए की स्थित नहीं थीं, क्योंकि जागीर से जो आय होती थी उसका विनियोजन उसी के लिए होता था। वह यदाकदा राजमार्गों पर यात्रियों की सुविधा के लिए सरायें बनवाता था। कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण स्थानों पर आवासीय बस्तियाँ बसाता था और यहाँ तक कि लूटपाट और डाकों से लोगों को बचाने के लिए चौकियाँ भी स्थापित करता था। इस तरह जागीरदारी प्रथा सैनिक और नागरिक (राजस्व) प्रशासन से और यहाँ तक कि कुछ मामलों में ग्रामीण क्षेत्रों में कानून और व्यवस्था से पूरी तरह जुड़ गई।

जागीरदारी प्रथा का विकास

अकबर द्वारा प्रवर्तित जागीरदारी प्रथा भावी मुगल पादशाहों के काल में अधिक जटिल हो गई। अकबर के शासनकाल के अंतिम कुछ वर्षों में कम से कम तीन प्रांतों में तो खालिसा से प्राप्त आय कुल जमा की चौथाई थी। जहाँगीर के समय में पूरे साम्राज्य में यह अनुपात गिर कर न्यूनतम 1/20 पर पहुँच गया। शाहजहाँ ने इसे बढ़ा कर 1/7 तक पहुँचाया। शेष सारी भूमि जागीरों के रूप में बंटी हुई थी। जागीरों में यह समस्या थी कि उनके निर्धारित राजस्व (जमा) और उनसे प्राप्त वास्तविक राजस्व-संग्रह (हासिल) में अंतर होता था। यह समस्या इतनी अधिक नाजुक हो गई कि अपनी गद्दीनशीरी के तुरंत बाद ही शाहजहाँ को इस पर सरकारी तौर पर ध्यान देना पड़ा। उसने 1/3 या कहीं-कहीं 1/4 तथा माहवारी (month scale) के नियम लागू किए। इनका उद्देश्य राजस्व संबंधी आवश्यकता और उपलब्धि के बीच पाए जाने वाले अंतर को पाटने के लिए मनसबदारों को मिलने वाले अनुलाभों और उनके दायित्वों में कमी लाना था।

जागीरदारी प्रथा की कार्य-प्रणाली में जो परेशानियाँ आई, उनके कारण थे-युद्ध, साम्राज्य का विस्तार, मनसबदारों की संख्या में वृद्धि, अकाल इत्यादि। औरंगजेब के शासनकाल में जागीरें साम्राज्य का एक बड़ा हिस्सा बनी रहीं। किन्तु तब जागीरदारी प्रथा के स्वरूप में काफी परिवर्तन आया। उसके शासकाल के उत्तरार्द्ध में न खत्म होने वाली दक्खिनी लड़ाइयों के परिणामस्वरूप “दक्खिनी” मनसबदारों (अर्थात दक्खिनी राजशाही से आए और मराठा अधिकारियों) की संख्या इतनी बढ़ गई कि उनके वेतन चुकाने के लिए उपलब्ध जागीरों की संख्या कम पड़ गई। जागीरों के अभाव और उपलब्ध जागीरों की आय में कमी की वजह से मनसबदार दुखी थे और इसीलिए उनमें असंतोष की भावना बढ़ी।

उपलब्ध प्रमाणों से ज्ञात होता है कि सबसे पहले सन् 1691 में मुगल पादशाह को इस समस्या का सामना करना पड़ा कि नित्यप्रति बढ़ती मनसबदारों की संख्या को देखते हुए सभी को जागीरें कहाँ से दी जाएँ, क्योंकि तब उपलब्ध जागीरों की संख्या बहुत ही कम थी। जागीरदारी प्रथा में आया यह संकट औरंगजेब के शासनकाल के शेष वर्षों में भी कम नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि जब बहादुरशाह गद्दी पर बैठा तो वह अनेक अभिजात वर्ग के व्यक्तियों और अमीरों को जागीरें नहीं दे सका। इसके बावजूद उसने भी अंधाधुंध जागीरों बाँटकर और पदोन्नतियाँ। देकर जागीरदारी प्रथा के संकट को और अधिक बढ़ाया। जागीरें से प्राप्त वास्तविक आय पादशाह के उपयोग में आने वाली सैनिक टुकड़ियों के रख-रखाव पर होने वाले आवश्यक खर्च के लिए पर्याप्त नहीं थी। इसलिए राज्य के प्रति अपने सैनिक दायित्व के निर्वाह की ओर से मनसबदार लापरवाह हो गए। चूँकि जागीरों से होने वाली आय अनिश्चित थी, इसलिए शाही जानवरों के दाना-पानी की व्यवस्था पर होने वाले खर्च का भुगतान करना भी मनसबदारों के लिए कठिन हो गया। इसलिए मुनीम खाँ ने पशुओं के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सरकार के पास लौटा ली और तदनुसार ही जागीरदारों के अनुलाभों में आनुपातिक कमी कर दी। किन्तु इस रद्दोबदल ने पहले से ही खाली शाही खजानों के भार को और भी बढ़ा दिया।

जहाँदारशाह के शासनकाल में जुल्फिकार खाँ नामक शक्तिशाली वजीर ने जागीरों की दावेदारी संबंधी मामलों की जाँच और सत्यापन के नियामें का कड़ाई से पालन करने का प्रयत्न किया और इनके लिए रोजनामचे बनवाए। किन्तु घूसखोरी की वजह से इनका उल्लंघन होता रहा। राजस्व-संग्रह के काम को ठेके पर देने की प्रथा (इजारा) नियंत्रण से बाहर हो गई, जिसका परिणाम यह हुआ कि किसानों का दमन बढ़ गया।

चूंकि इजारादारी (revenue farming) किसानों और राज्य-दोनों के लिए विनाशकारी थी, इसलिए फर्रुखासियर ने इसे बंद करा दिया। किन्तु वह एक अत्यंत कमजोर शासक था और सैयद भाइयों के हाथों की कठपुतली बन गया। इसलिए यह सुधार ठीक तरह से लागू नहीं किया जा सकता। इस दौरान मुगल दरबार षडयंत्रों का अखाड़ा बन गया। नोमन अहमद सिद्दीकी (Noman Ahmad Siddiqui) ने ठीक ही कहा है कि इस तरह की परिस्थितियों में मनसबों और जागीरों का बँटवारा राजनीतिक हित-लाभ को ध्यान में रखकर अधिक किया जाता था न कि प्रशासनिक क्रिया-विध को ध्यान में रखकर, या कि प्राप्तकर्ता की सराहनीय सेवाओं को ध्यान में रखकर। सिद्दीकी आगे बताते हैं कि भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद इतना अधिक फैल गया कि जागीरें और मनसबें कभी किसी को प्रसन्न करने के लिए दी जाने लगी तो कभी संघर्षरत दलों के बीच शक्ति संतुलन के लिए। इन कारणों से जागीरदारी प्रथा में विघटन की जो शुरुआत औरंजगजेब के शासन के अंतिम वर्षों में हुई, उसने फर्रुखसियर के शासनकाल में गति पकड़ी और अधिक स्पष्ट हो गई।

जागीरदारी संकट-काल के दौरान सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ कि खालिसा भूमि जागीरों के रूप में बाँटी जाने लगी। इसका कारण यह था कि तब अमीर वर्ग बहुत ताकतवर हो गया और बहुत जोर-शोर से जागीरों की माँग करने लगा। मनसबदारों के दावों की भरपाई करने के लिए पादशाह ने खालिसा भूमि को महाल के रूप में देने का रास्ता अपनाया। परिणाम यह हुआ कि थोड़े ही समय में सारी खालिसा भूमि जागीरदारों के हाथों में चली गई। इस प्रकार जो वर्ग कभी राज्य की सेवा और सहायता के लिए बनाया गया था, वही अब राज्य के लिए भारी और अलाभप्रद बोझ बन गया तथा आगे चल कर राज्य के अधिकार को हड़प गया। इस प्रकार जागीरदारी प्रथा की अंतर्निहित विसंगतियाँ अब पूरी तरह उजागर हो गई।

जागीरदारी प्रथा को सर्वनाश से बचाने का अंतिम प्रयत्न निजाम-उल-मुल्क ने किया, जब उसने अक्टूबर 1721 में वजीर का पद संभाला। उसने इस प्रथा में कुछ सुधार करने चाहे। उसके प्रस्ताव थे कि प्राचीन अमीर वर्ग के ओहदे बढ़ाए जाएं, जिनको मनसबें उनकी व्यक्तिगत योग्यता के अनुसार नहीं मिली थीं, उनकी संख्या कम की जाए, पिछले शासन में खालिसा के रूप में उद्दिष्ट सभी महाल भूमि का पुनर्ग्रहण किया जाए, जिन जागीरों से राजस्व-संग्रह बल-प्रयोग की धमकी देकर ही किया जा रहा हो, उन्हें शक्तिशाली अमीरों को सौंप दिया जाए तथा जिन जागीरों से राजस्व-संग्रह में अधिक कठिनाई न हो रही हो, उन्हें छोटे या कमजोर मनसबदारों को दे दिया जाए।

इन सुचिंतित सुधार-प्रस्तावों ने कुछ क्षेत्रों में आशाएं जगाई और यह माना जाने लगा कि जो प्रशासनिक स्थायित्व औरंगजेब की मृत्यु के बाद डांवाडोल होने लगा था, उसमें फिर से दृढ़ता आ जाएगी। किंतु जल्दी ही इन आशाओं पर तुषारापात हो गया। निजाम-उल-मुल्क मुगल दरबार में व्याप्त राजनीतिक षड्यंत्रों से ऊब गया और उसने दिसंबर 1723 में दिल्ली से विदा ली और दक्षिण भारत में जाकर एक अर्ध-स्वायत्त राज्य की स्थापना की। इस प्रकार जागीरदारी प्रथा को बचाने का यह अंतिम प्रयत्न भी असफल हुआ।

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