मुगलकालीन भू-राजस्व व्यवस्था

मुगलकालीन भू-राजस्व व्यवस्था

भू-राजस्व प्रणाली

भू-राजस्व आय का आधार स्रोत था। इसलिए उसकी मात्रा, उसके आकलन एवं उसकी वसूली की ओर अधिक ध्यान दिया गया। यह स्वीकृत तथ्य है कि अकबर के प्रशासन ने काफी विशाल क्षेत्र में भू-राजस्व प्रणाली के मानकीकरण में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर ली थी। इस क्षेत्र में शामिल थे उत्तरी भारत का निचला भाग, नमक क्षेत्रों से लेकर सोन नदी तक का प्रदेश और आठ सूबे। राजस्व के आकलन के लिए जिस मानक पद्धति को अपनाया जाता था उसे ‘जाब्ता’ कहते थे। इसके अनुसार प्रत्येक फसल के अंतर्गत क्षेत्र का मूल्य निर्धारित किया जाता था और उसके आधार पर मानक दरों को लागू करके राजस्व की वसूली की जाती थी। आइने-दह-साला (आइन के उन्नीस वर्ष) नामक शीर्षकों के अंतर्गत तालिकाओं में छठे से लेकर चौबीसवें शासकीय वर्ष तक प्रतिवर्ष निर्धारित दर का ब्यौरा दिया गया है। दस्तूरों का ब्यौरा प्रातवार एकल दरों या युग्म दरों (निम्नतम एवं उच्चतम) में दिया गया है। छठे से नवें शासकीय वर्ष तक लगभग आठों प्रांतों में फसलों की एकल दर प्रचलित थी। दसवें वर्ष से परिवर्तन कैसे हुआ।

अबुल फजल ने इस बात का विस्तृत ब्यौरा दिया है कि आइने-अकबरी में आठ प्रांतों में क्या-क्या नकद दरें थीं (दस्तूर अमल) इस विवरण से पता चलता है कि एक प्रांत में फसलों की दरें समान रूप से निर्धारित नहीं की गई थीं। प्रांत सर्किलों में बँटा होता था। एक सर्किल में कई “परगना’ होते थे। प्रत्येक सर्किल के लिए एक अलग अनुसूची होती थी जिसमें प्रत्येक फसल की अलग-अलग नकद-दरें दर्शाई जाती थीं। सामान्यतः “दस्तूर सर्किल’ में सरकार का सीमा क्षेत्र शामिल नहीं होता था। कुछ मामलों में सर्किल और किसी एक सरकार की सीमाएँ समान भी होती थीं। किन्तु कुछ ही ऐसे सर्किल होते थे जिनमें एक से अधिक सरकार के परगना शामिल हों। सर्किल विभिन्न आकार के होते थे, कुछ सर्किल दो या तीन सरकार को मिलाकर बनते थे और कुछ सर्किलों में केवल एक परगना होता था। दरों का निर्धारण संभवतः फसलों की संशोधित दरों तथा कीमतों के नए आँकड़ों के आधार पर बहुत ही सावधानीपूर्वक हिसाब लगाकर किया जाता होगा।

कृषि उपज का कौन-सा भाग विनियोजित किया गया? शेरशाह “राई” के आधार पर राजस्व दरों का हिसाब लगाया था। अबुल फजल का जी फार्मूला था, उससे ऐसा अनुमान है कि अकबर के दस्तूरों का उद्देश्य भी प्रति बीघा उपज का एक तिहाई भाग वसूल करना था तथा इस प्रकार माल के रूप में निर्धारित दरों का हिसाब नकद राशि के रूप में कुछ नकदी फसलों  को छोड़कर ग्रामीण स्थानों में प्रचलित कीमतों के आधार पर लगाया जाता था। अबुल फजल ने इस बात का कोई सीधा उल्लेख नहीं किया है, न ही इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध है कि जब दस्तूर की प्रथा आरंभ हुई तक विभिन्न दस्तूर सर्किलों में सरकारी तौर पर फसलों की कितनी उपज निर्धारित की गई तथा उनकी क्या कीमतें चल रही थीं। अतः जिन अनुमानों को सामान्य रूप में स्वीकार किया जा चुका है, उनकी प्रत्यक्ष जाँच करना सम्भव नहीं है।

तथापि, दस्तरों के जो आँकड़े प्राप्त हुए हैं, उनसे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि कुछ स्थानों के संबंध में अधिकांश खाद्य तथा अन्य सामान्य फसलों (गेहूँ सहित) के बारे में जितना भू-राजस्व आकलितं किया गया था, वह उपज के लगभग आधे भाग के बराबर था। उच्च श्रेणी की फसलों (गन्ना, नील आदि) के संबंध में ऐसा निश्चित रूप से कहना कठिन है कि सभी दस्तूर उपज के लगभग आधे भाग तक बैठते थे। कुछ भी सही, वे फसल की उपज के अनुमानों के अनुसार निर्धारित नहीं किए जाते थे। इन फसलों के दस्तूरों की तुलना यदि आधुनिक आँकड़ों से की जाए तो उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। ऐसा प्रतीत होता है कि किसान को प्रोत्साहन के रूप में कुछ रियासत दी जाती थी। किन्तु कुछ फसलों पर दी जाने वाली इन रियायतों का कोई खास असर पड़ता हो, यह संभव नहीं है। सामान्यतः भू-राजस्व कुल कृषि उपज का लगभग आधे भाग तक ही निर्धारित किया जाता था।

इस प्रणाली में कृषि विकास के लिए दो सकारात्मक प्रोत्साहनों की व्यवस्था थी, (1) आकलन की भिन्न दरें अधिक कीमत वाली फसलों के पक्ष में थीं, (2) परती भूमि पर निम्न दरें निर्धारित की जाती थीं और जैसे-जैसे उपज बढ़ती जाती थी उसके अनुसार कर की दर में वृद्धि की जाती थी। पहली रियायत से वाणिज्यिक फसलों की खेती को प्रोत्साहन मिलता था और दूसरी रियायत से खेती के विस्तार में सहायता मिलती थी। इन दोनों रियायतों से “अधिशेष” भाग उत्पादक के पास रह जाता था।

भू-राजस्व प्रणाली बराबर इस तरह की बनी रही, जिससे ऐसे लोगों से भी वसूली की जा सके जो देने की स्थिति में नहीं थे। निर्धारण की समान दर से छोटी जोत वाले किसान पर भारी दबाव पड़ता था। गरीब किसान मोटे अनाज की ही कृषि में लगा रहता था और लाभकारी वाणिज्यिक फसलें उगाने का काम धनी किसान करते थे। ऐसी स्थिति में मुद्रा के रूप में राजस्व की वसूली से गरीब किसान और भी गरीब होता गया। किन्तु फिर भी यह कहना सही नहीं होगा कि मुगल शासन “किसानों के जीवन-रक्त को चूसने वाला मात्र दुःस्वप्न” था।

“दस्तूर” का अर्थ था किसान से किया गया कर का दावा। आइने-अकबरी में उल्लिखित “जमा” और “नकदी” का अर्थ था राजस्व की वसूली। “जागीर” देने की प्रणाली में यह व्यवस्था थी कि प्रदेश की “जमा” (बाद में जमादामी के रूप में वर्णित) जागीरदार को दी जाने वाली तलब या वेतन की राशि के बराबर हो। अबुल फजल के शब्दों का यह तात्पर्य है कि “जमा” वेतन के बराबर होती थी। “जमा” निवल आय होती थी अर्थात कुल वसूली में से वसूल करने के व्यय को तथा दूसरों को मिलने वाले भत्तों को घटाकर जो राशि बचती थी उसे “जमा” कहते थे और यह वह राशि होती थी जिसको प्रशासन की दृष्टि में जागीरदार संबंधित प्रदेश से प्राप्त कर सकता था।

कम-से-कम “जब्ती” प्रांतों में किसान को अपनी उपज का लगभग आधा भाग देना पड़ता था। इन प्रांतों में ऐसा नियम था कि कृषि वाले क्षेत्र और दस्तूर को गुणा करने पर वह राशि आनी चाहिए जो कुल वसूली के बराबर हो किन्तु वसूली की राशि का निर्धारित मात्रा के बराबर होना आवश्यक था। कुल भू-रजस्व वसूली का निर्धारण करने में स्वीकृत भुगतानों, कमीशनों, छूटों तथा रियायतों का भी हिसाब लगाया जाता था और इन्हीं के आधार पर कुल तथा निवल वसूली का हिसाब लगाया जाता था।

भू-राजस्व के महत्वपूर्ण दावेदार थे जमींदार तथा स्थानीय एवं ग्राम अधिकारी। सत्रहवीं शताब्दी में उत्तरी भारत में अधिकृत भू-राजस्व में जमींदार का भाग नाममात्र के लिए दस प्रतिशत निर्धारित किया गया था। स्थानीय अधिकारियों का भाग संभवतः सात प्रतिशत था। ऐसा प्रतीत होता है कि जमा का प्रभार केवल खेती की मात्रा के अनुसार ही अलग-अलग नहीं होता था अपितु अन्य कारणों से भी वह कम या अधिक होता था, जैसे कीमत-स्तर, कुल राजस्व वसूली में जमींदार का भाग और अंत में प्रशासनिक नियंत्रण। उपज की में भू-राजस्व की माँग सभी क्षेत्रों में एकसमान नहीं होती थी।

शाही-कर-दावे का कुछ भाग ‘सुयूरगल‘ के रूप में व्यक्तियों को अंतरित कर दिया गया। अबुल फजल का कहना है कि शहंशाह द्वारा नकदी के रूप में जो अनुदान दिए जाते थे उन्हें “वजीफा” कहा जाता था और भूमि के रूप में दिए जाने वाले अनुदान “मदद-ए-माश” कहे जाते थे। अन्य इतिहासकारों ने इस शब्द का बहुत कम प्रयोग किया है। कुछ भी सही, भूमि संबंधी अनुदान “सुयूरगल” अनुदानों के अंतर्गत आते थे। मूल अनुदानों के फरमानों तथा अन्य दस्तावेजों में सदा ही उस विशिष्ट क्षेत्र की व्यवस्था की जाती थी जो आकलन में शामिल न की गई भूमि में से सौंपी जाती थी (खारिजे जमा)। किसी भी परगना में “सुयूरगल’ की राशि “जमा” की राशि से अधिक नहीं थी। “सुयूरगल” के रूप में प्राप्त राजस्व की राशि बहुत थोड़ी होती थी।

मुगल भारत में जमींदार सामाजिक दृष्टि से विजातीय होते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके अधिकारों एवं दायित्वों में एक स्थान से दूसरे स्थान में बहुत अंतर होता था। प्रत्यक्ष रूप से प्रशासित क्षेत्रों में वे मुगल भू-राजस्व तंत्र के मुख्य आधार थे। अन्य क्षेत्रों में उनकी स्थिति लगभग कर अदाकर्ताओं जैसी होती थी और वे मुख्य रूप से अपने लिए किसानों से भूमिकर वसूल करते थे। अटठारहवीं शताब्दी के स्रोतों में ऐसे विवरण हैं जिनसे पता चलता है कि जब कभी जमींदार राजस्व वसूली में सहायता देने के अपने दायित्व से विमुख होता था तब भू-राजस्व में उसका दावा केवल दस प्रतिशत रह जाता था।

जैसा कि बर्नियर तथा अन्य समकालीन प्रेक्षकों का मत है, यह संभव है कि मुगलकाल के कृषि समाज का निर्धन वर्ग सबसे अधिक कष्टों में रहा। फिर भी संभवतः इस प्रणाली से ग्रामीण समाज के ऐसे वर्गों को लाभ पहुँचा जिनका इस लूट में हिस्सा था। उत्पादक से जो कुछ भी वसूल किया जाता था, वह सभी देहाती इलाकों से ही नहीं आता था। वसूल किए गए राजस्व की राशि कृषि उपज के तिहाई से लेकर आधे भाग तक तो होती थी किन्तु जितनी निवल राशि ली जाती थी, वह चौथाई या तिहाई से अधिक नहीं होती थी। बीच की राशि, जमींदारों, सूदखोरों, मुखिया लोगों तथा भूमि संबंधी उच्च अधिकारों वाली कृषि जातियों के हाथों में रहती थी। नकदी के रूप में राजस्व की वसूली से आदान-प्रदान हेतु उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रेरणा मिलती थी।

ग्रामीण समाज में दो श्रेणियाँ थीं। एक श्रेणी “खुत’ या प्रधानों की और दूसरी श्रेणी थी दासोचित “बालाहारों’ की। राजस्व अर्थात खालिसा, जागीर, जमींदारी या रैयती वसूल करने की वैकल्पिक तथा समान कार्य करने वाली संस्थाएँ थीं। ग्राम-वासियों के लिए राजस्व वसूलकर्ता के रूप में राज्य कोई मायने नहीं रखता था। रैयत की ओर से भू-राजस्व के लिए जो व्यक्ति नियुक्त किया जाता था, उस पर इसका प्रभाव दूसरा ही पड़ता था। कृषि अधिशेष की वसूली तथा उसके वितरण क लिए सब प्रकार से सक्षम मशीनरी की व्यवस्था के लिए मुगलों ने जो प्रयास किए तथा जो सामंजस्य स्थापित किए, उनसे संपत्ति के अधिकारों के विकास के लिए प्रोत्साहन मिला तथा उनसे बाजार का भी विकास हुआ। राजस्व फार्मिग में धन लगाने से कई साहूकार अनुपस्थित भू-स्वामियों के रूप में उभरे।

यद्यपि शाही प्राधिकारी की माँगें असीमित थीं, किन्तु उसके अतर्गत भारत के एकीकरण से ऐसी सुव्यवस्थित सरकार की स्थापना हुई तथा सुरक्षा की भावना का इतना अधिक संचार हुआ कि उससे व्यापार, उद्योगों एवं नकदी फसलों के उत्पादन के लिए प्रोत्साहन मिला। नीति निर्माताओं को इस बात का स्पष्ट ज्ञान था कि क्या करना है। अधिकारियों के रुखों में विरोधाभास के बावजूद व्यापारी तो फला-फूला किन्तु किसान की स्थिति केवल निर्वाह के स्तर पर आ गई। व्यापार और व्यापारियों के प्रति जो नीति थी, उससे एक अजीब विरोधाभास का पता चलता है। राज्य-शक्ति और शासक वर्ग में कोई भेद नहीं है तथा राज्य की समृद्धि में ही देश के व्यापार एवं उसकी कृषि की समृद्धि निहित है।

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