देशी रियासतों का एकीकरण, विलय एवं पुनर्गठन

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देशी रियासत का एकीकरण, विलय एवं पुनर्गठन

देशी रियासतों का एकीकरण

द्वितीय विश्व युद्ध में भारत ने अति तीव्र राजनीतिक गतिविधियाँ देखीं। राष्ट्रीय कांग्रेस ने असहयोग की नीति अपनाई। ब्रिटिश सरकार ने इस गतिरोध को समाप्त करने के लिए अनेक प्रयत्न किये। क्रिप्स के सुझाव 1942 में, वेवल योजना 1945 में और मंत्रिमंडल मिशन योजना 1946 में और अन्त में 20 फरवरी, 1947 को प्रधान मंत्री एटली की घोषणा इस श्रृंखला की कड़ियां थीं। इन सभी प्रस्तावों में भारतीय रियासतों के भविष्य पर विचार किया गया। क्रिप्स की योजना में रियासतों की सर्वश्रेष्ठता किसी और को दे देने का कोई विचार नहीं था। रियासतों ने पूर्ण प्रभुसत्ता पूर्ण संघ जो कि देश में एकतीसरी शक्ति के रूप में कार्य कर सके- बनाने की भिन्न-भिन्न योजनाओं के बारे मेंम विचार किया। नरेन्द्र मंडल के चांसलर, भोपाल के नवाब ने यह आशा व्यक्त की कि अंग्रेज भारत में रियासतों को अनाथ बालक के रूप में नहीं छोड़ जायेंगे और इसे भी एक साम्प्रदायिक प्रश्न के रूप में हल करने का प्रयत्न करेंगे। परंतु 20 फरवरी की एटली की घोषणा और 3 जून की माउंटबैटन योजना ने यह स्पष्ट कर दिया कि सर्वश्रेष्ठता समाप्त हो जायेगी और रियासतों को अधिकार होगा कि वे पाकिस्तान अथवा भारत किसी में सम्मिलित हो सकते हैं। लार्ड माउन्टबैटन ने किसी एक रियासत अथवा अनेक रियासतों के संघ को एक तीसरी इकाई के रूप में मान्यता देने से इन्कार कर दिया।

देशी रियासतों का विलय

राष्ट्रीय अस्थायी सरकार में सरदार पटेल रियासती विबाग के कार्यवाहक थे। उन्होंने भारतीय रियासतों की देशभक्ति को ललकारा और उनसे अनुरोध किया कि वे भारतीय संघ में अपनी रक्षा, विदेशी मामले और संचार अवस्था को भारत अधीनस्थ बनाकर, सम्मिलित हो जायें। 15 अगस्त, 1947 तक 136 क्षत्राधिकारी रियासतें भारत में सम्मिलित हो गई थीं। कश्मीर ने विलय पत्रों पर 26 अक्टूबर, 1947 को जूनागढ़ और हैदराबाद ने 1948 में हस्ताक्षर कर दिये।

बहुत सी छोटी-छोटी रियासतें जो एक अलग इकाई के रूप में आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में नहीं रह सकती थीं, संलग्न प्रान्तों में विलय कर दी गई। जैसे उड़ीसा और छत्तीसगढ़ की 39 रियासतें उड़ीसा अथवा मध्य प्रान्त में विलय कर दी गईं और गुजरात की रियासतें बम्बई प्रान्त में। इन रियासतों के विलय का एक अन्य रूप ऐसी इकाइयों के रूप में भी गठन करना था जो केन्द्र द्वारा प्रशासित की जाएं। इस श्रेणी में हिमाचल प्रदेश, विन्ध्य प्रदेश, त्रिपुरा, मणिपुर, भोपाल, विलासपुर और कच्छ की रियासतें थीं। एक अन्य प्रकार का विलय, राष्ट्र संघों का गठ्इत करना था। इस प्रकार काठियावाड़ की संयुक्त रियासतें, मध्य प्रदेश की संयुक्त रियासतें, विन्ध्य प्रदेश और मध्य भारत के संघ, पटियाला और पूर्वी पंजाब रियासती संघ राजस्थान, ट्रावनकोर और कोचीन की संयुक्त रियासतें अस्तित्व में आयीं।

देशी रियासत का पुनर्गठन

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में राष्ट्रीय कांग्रेस की एक मांग भाषायी सीमाओं पर आधारित प्रान्तों का पुनर्गठन था। स्वतन्त्र भारत में इसने एक उग्र रूप धारण कर लिया। तेलुगु भाषा-भाषी आंध्र प्रदेश केलिए आन्दोलन करते हुए श्रीरामलू की मृत्यु के कारण 1953 में यह प्रान्त अस्तित्व में आ गया। 1954 में सरकार ने एक आयोग का गठन किया जो इस प्रश्न की निष्पक्ष रूप से जांच करे। फजल अली इसके अध्यक्षर और पंडित हृदय नाथ कुंजरू और सरदार के एम० पन्निकर इसके सदस्य थे।

इस आयोग ने सितम्बर 1955 में अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी और सुझाव दिया कि 16 राज्य और तीन केन्द्र-प्रशासित प्रदेश बनने चाहिए। इसके फलस्वरूप ट्रावनकोर, कोचीन मैसूर, कुर्ग, सौराष्ट्र, कच्छ, मध्य प्रदेश भोपाल, विन्ध्य प्रदेश, अजमेर, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और पप्सू भिन्न-भिन्न इकाइयों के रूप में नहीं रहे और A.B.C. श्रेणी के राज्यों की व्यवस्था में समाप्त कर दी गयी।

1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम, भारतीय संसद ने पारित कर दिया और उसके अनुसार 14 राज्य और 6 केन्द्र-प्रशासित प्रदेश बनाये गये। 1961 में बम्बई को गुजरात और महाराष्ट्र में बांट दिया गया। 1962 में नागालैंड को पूर्ण राज्य का पद दिया गया। 1966 में पंजाब में से हरियाणा अलग कर दिया गया। आज भारत में 25 राज्य और 7 केद्र-प्रशासित प्रदेश हैं।

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