भारत-पाक विभाजन के मुख्य कारण

भारत-पाक विभाजन के प्रमुख कारण

भारत-पाक विभाजन

भारत का विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का वह बिन्दु है जो कांग्रेस के महान् प्रयास के पश्चात् भी नहीं ढाला जा सका। गाँधी जी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि चाहे भारत को आग लग जाये लेकिन इसका विभाजन नहीं होगा। एक अन्यत्र स्थल पर उन्होंने कहा था कि भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा। इसी प्रकार कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेता जवाहर आल नेहरू, सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद एवं मौलाना आजाद भारत के विभाजन के लिए तत्पर नहीं थे। जहाँ तक कि माउंटबेटन तत्कालीन गवर्नर-जनरल भी कांग्रेस के नेताओं से सहमत थे। वे भारत विभाजन के विचारसे खुश नहीं थे। इस सम्बन्ध में उनकी एक प्रतिक्रिया प्रकाश में आयी है। कहा जाता है कि श्री जिन्ना को टी0 बी0 हो गयी थी। बम्बई के एक चिकित्सा विशेषज्ञ ने परीक्षा के पश्चात् बतलाया था कि जिन्ना दो साल से अधिक नहीं बच सकते। इस घटना को गोपनीय रखा गया। माउन्ट बेटन की प्रतिक्रिया इस सम्बन्ध में बहुत वर्ष पश्चात् यह थी कि वे अगर इस समाचार को जानते तो विभाजन के प्रश्न को दो वर्ष और खींच ले जाते।

इस सब प्रयासों एवं इच्छाओं के बावजूद भी आभरत का विभाजन हुआ। इसके निम्नलिखित कारण हैं-

  1. मुस्लिम लीग और कांग्रेस के मध्य समझौते का एकमात्र आधार

    कैबिनेट योजना के अन्तर्गत यह स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम लीग पाकिस्तान से कम किसी भी बात पर कांग्रेस के साथ समझौता नहीं करेगी। लार्ड माउंटबेटन चाहते थे कि सत्ता के शीघ्र हस्तान्तरण के लिए इन दोनों दलों में समझौता हो जाये। लार्ड माउन्टबेटन ने जिन्ना और गाँधी को समझाने का प्रयत्न किया लेकिन वे अपनी शर्तों पर अटल रहे। इसके पश्चात् उन्होंने जवाहर लाल और सरदार पटेल से इस सम्बन्ध में बातें की। उन्हें साम्प्रदायिकता के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई विस्फोटक स्थिति से परिचित किया। समझौते को सम्पन्न करने के लिए ही विभाजन स्वीकार किया गया। 3 जून, 1947 को ब्रिटिश सरकार ने यह घोषणा की कि पाकिस्तान प्रश्न पर कांग्रेस से और लीग में समझौता हो गया है। इसी दिन माउंटबेटन ने कहा कि भारतीय जनता के लिए अखण्ड भारत ही उपयुक्त होता लेकिन दोनों लों में पाकिस्तान से कम किसी बात पर समझौता नहीं होसका था।

  2. फूट डालो राज्य करो नीति

    यह एक प्राचीन साम्राज्यवादी नीति है जिसका अंग्रेजों ने भारत वर्ष में सफल प्रयोग किया था। प्रारम्भ में अंग्रेजों ने हिन्दुओं के प्रति कृपालुता दिखलायी कांग्रेस की स्थापना तथा इसकी बढ़ती हुई मांगों से घबराकर इन्होंने मुसलमानों को प्रोत्साहित करना प्रारम्भ कर दिया। लार्ड मिण्टो ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को भड़काकर कांग्रेस के समक्ष एक दीवार खड़ी करने का प्रयत्न किया। इसलिए उन्हें पाकिस्तान का जनक भी कहा जाता है। इस नीति के अन्तर्गत हिन्दू और मुसलमानों के मध्य तनाव पैदा कर दिया गया। 1909, 1919 और 1935 के अधिनियमों में एक ऐसी व्यवस्था की गयी जिसका अन्ततः परिणाम पाकिस्तान का निर्माण था।

  3. भारत को दुर्बल बनाने की नीति

    1929 ई० के अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की मांग की। यह एक ऐसी मांग थी जो ब्रिटिश हितों के पूर्णतः प्रतिकूल थी। भारतीयों की आवाज को विभक्त करने के लिए उन्होंने मुसलमानों को समझाया कि वे हिन्दू बहुमत में अंग्रेजों की अपेक्षा अधिक शोषण और दासता का अनुभव करेंगे। इसलिए उन्हें हिन्दुओं से अलग रहना चाहिए। द्वितीय महायुद्ध के दौरान ही यह स्पष्ट हो गया कि भारत अंग्रेजों को छोड़ना होगा। अंगरेजों को ऐसा अनुभव हुआ कि स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत न तो मित्र ही रहेगा और न अधिराज्य ही। इसलिए अखण्ड भारत भविष्य में ब्रिटेन के हितों के लिए हानिकारक होता। ब्रिटिश हितों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है कि इसे विभाजित कर दिया जाये। परिणामस्वरूप भारत का विभाजन कर दिया गया।

  4. द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् ब्रिटेन का दुर्बल हो जाना

    भारत वर्ष की स्वतंत्रता को द्वितीय महायुद्ध का परिणाम कहा जा सकता है। द्वितीय महायुद्ध ब्रिटेन के लिए महान् आर्थिक आघात लेकर आया था। युद्ध की समाप्ति के बाद स्पष्ट हो गया था कि ब्रिटेन अपने उपनिवेशों को आधीन नहीं बनाये रख सकेगा। विश्व के अन्य राज्यों ने भी ब्रिटेन पर इस सम्बन्ध में दबाव डालने प्रारम्भ कर दिये थे। इन बदली हुई परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार भारतीय राष्ट्रीय नेताओं को समझाने की शक्ति नहीं रखती थी। इस समय ब्रिटेन में भारतीय स्वतंत्रता समर्थक एटली की मजदूर दल सरकार थी इसका उद्देश्य अखंड आभरत को ही स्वतंत्रता देना था। लेकिन यह जिन्ना ही पाकिस्तान की मांग न रखने के लिए ही न मनवा सकी।

  5. अंग्रेज पदाधिकारियों के षड्यंत्र

    अंग्रेज पदाधिकारियों की सहानुभूति पाकिस्तान के साथ थी। इन पदाधिकारियों ने लीग सदस्यों के साथ मिलकर गैर-कानूनी तरीकों से गोला बारूद मुसलमानों को देना प्रारम्भ कर दिया था। परिस्थिति बड़ी खराब हो रही थी। गृह युद्ध होने की सम्भावना थी। नेहरू ने कहा था कि इस सिर दर्द से छुटकारा पाने के लिए हमने सिर कटाना ही मंजूर कर दिया। सरदार पटेल ने भी स्पष्ट किया था कि अंग्रेजों ने परिस्थिति इतनी खराब कर दी थी कि आवश्यक था कि भारत का बंटवारा कर दिया जाये तथा शेष भारत को संगठित किया जाये। 25 नवम्बर, 1948 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में सरदार पटेल ने कहा था कि अगर हम बंटवारे के लिए तैयार नहीं होते तो एक पाकिस्तान नहीं बल्कि कई पाकिस्तान बनते। प्रत्येक दफ्तर में पाकिस्तान की एक इकाई होती। हमने इस शर्त पर पाकिस्तान माना कि पंजाब और बंगाल का बंटावरा कर दिया जाये। जिन्ना लंगड़ा और दीमक लगा पाकिस्तान नहीं चाहता था लेकिन उसे स्वीकार करना पड़ा।

  6. कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति

    कांग्रेस ने अपनी राष्ट्रवाद चरित्र के आदर्श को बनाये रखने के लिए मुस्लिम लीग की सही और गलत समस्त नीतियों का समर्थन किया था। सन् 1918 के लखनऊ पैक्ट में कांग्रेस ने लीग की बहुत सी मांगें मान ली थी। सी0 आर0 फार्मूले में पाकिस्तान की मांग को बहुत हद तक स्वीकार किया गया। इस नीति ने मुस्लिम लीग को प्रोत्साहन मिला और वह पाकिस्तान की मांग पर दृढ़ हो गयी।

  7. अन्तरिम सरकार की असफलता

    अन्तरिम सरकार में लीग के सदस्य केवल अडंगा डालने की नीति में हीसम्मिलित हुए थे। इनका उद्देश्य सरकार चलाना नहीं बल्कि गत्यावरोध पैदा करके यह बताना था कि कांग्रेस मुसलमानों का हित नहीं चाहती। सरदार पटेल और पं० नेहरू को लीग की कार्यवाही देखकर बड़ा दुःख हुआ। लीग के सदस्य लियाकत अली खाँ वित्त-मंत्री थे इन्होंने कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत किसी भी योजना को सफल नहीं होने दिया। इससे खिन्न होकर सरदार पटेल ने कहा था, “यदि शरीर का एक भाग खराब हो जाय तो उसका शीघ्र हटाना ठीक है, ताकि सारे शरीर में जहर न फैल सके। मैं मुस्लिम लीग से छुटकारा पाने के लिए भारत का कुछ भाग इसे देने के लिए तैयार हूँ।”

  8. लार्ड माउन्टबेटन का प्रभाव

    लार्ड माउन्टबेटन, भारत के अन्तिम व स्वतन्त्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल, भारत प्रेमी व्यक्ति थे। इसके अकाट्य एवं युक्ति संगत तर्कों से जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल अत्यधिक प्रभावित हुए। लार्ड माउन्टबेटन ने उन सभी समस्याओं की ओर इन नेताओं का ध्यान आकर्षित किया जो मुस्लिम लीग के रहते भारत में पैदा हो सकती थी। उन्होंने इन्हें बताया कि एक शक्तिशाली भारत लीग के रहते कभी नहीं बन सकता।

  9. परिस्थितियों का दबाव-

    मुस्लिम लीग की सीधी कार्यवाही से कलकत्ता के अन्दर हजारों की संख्या में हिन्दू मारे गये। इसके पश्चात् भी कई स्थानों पर दंगे हुए और काफी नर-संहार हुआ। ऐसी परिस्थितियों में सरदार पटेल ने कहा था, ‘निर्दोषों के कत्ले-आम से स्वीकृति अच्छी है।’ नेहरू ने कहा था कि आजादी इन हालातों में मिल जाती तो बारत दुर्बल रहता। भारत में सदैव आन्तरिक संघर्ष की स्थिति बनी रहती। जब दूसरे हमारे साथ रहना ही नहीं चाहते तो हम क्यों और कैसे उन्हें अपने साथ रख सकते थे। नेहरू ने कहा “हालात की मजबूरी थी और यह महसूस किया गया कि जिस मार्ग का हम अनुसरण कर रहे हैं, उसके द्वारा गतिरोध को कम नहीं किया जा सकता। अतः हमें देश का बंटवारा करना पड़ा।’

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