महात्मा गाँधी का “असहयोग आन्दोलन”

असहयोग आन्दोलन का प्रारम्भ एवं सरकार द्वारा इसका दमन

महात्मा गाँधी ने कांग्रेस का सहयोग तथा समर्थन प्राप्त करने के उपरान्त एक देशव्यापी आन्दोलन का कार्य निश्चित किया। महात्मा गाँधी ने अली बन्धुओं के साथ-साथ समस्त देश का दौरा किया और जनता को आन्दोलन में भाग लेने के लिये प्रोत्साहित किया। आन्दोलन आरम्भ होने से पूर्व महात्मा गाँधी ने अगस्त 1920 ई. को वाइसराय के साथ किये गये अपमानों पर पश्चाताप करना चाहिये और भारतीय नेताओं से परामर्श करने के उपरान्त ऐसे मार्ग को निकालने का प्रयत्न करना चाहिये जिससे जनता को सन्तुष्टि प्राप्त हो असयोग कार्यक्रम निश्चित था। उसी के अनुसार कार्यक्रम किया जाना तय हुआ, क्योंकि सरकार ने महात्मा गाँधी की अपील की ओर ध्यान नहीं दिया। असहयोग का कार्यक्रम कलकत्ते के कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में स्वीकृत किये हुये प्रस्ताव के अनुसार था जो बाद में नागपुर में स्वीकृत हो गया आन्दोलन का कार्यक्रम अग्रलिखित था –

  • सरकारी उपाधियों तथा अवैतानिक पदों को त्यागना और स्थानीय संस्थाओं के मनोनीत सदस्यों को अपने-अपने पदों को रिक्त करना।
  • सरकारी दरबारों तथा उत्सवों में सम्मिलित न होना, और न सरकार द्वारा या सरकार के सम्मान में आयोजित सरकारी या गैर-सरकारी उत्सवों में सम्मिलित होना।
  • सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त या सरकार के अधीन स्कूलों और कालिजों का वहिष्कार और इनके स्थान पर राष्ट्रीय स्कूल और कालिजों की स्थापना की जाए।
  • सरकारी अदालतों का वहिष्कार और उनके स्थान पर पंचायतों की स्थापना की जाए।
  • सैनिक, क्लर्क और श्रमिक लोग विदेशों में नौकरी न करें।
  • सुधारों तथा स्थापित होने वाली व्यवस्थापिका सभाओं का बहिष्कार
  • विदेशी माल का बहिष्कार और स्वदेशी प्रचार।

असहयोग आन्दोलन का आरम्भ

उक्त पंक्तियों में इसका उल्लेख किया जा चुका कि महात्मा गाँधी ने समस्त भारत का दौरा किया जिससे अहसयोग आन्दोलन के कार्यक्रम से जनता पूर्णतया परिचित हो गई। महात्मा गाँधी ने अहिंसा के सिद्धान्त पर विशेष महत्व दिया।

  1. असहयोग आन्दोलन के आरम्भ में सर्वप्रथम उन्होंने ही गवर्नर जनरल को अपना पदक वापिस कर दिया।
  2. आन्दोलन के प्रारम्भ होते ही बहुत से विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों से अपने नाम कटवा लिए और वे राष्ट्रीय संस्थाओं में भर्ती हुए।
  3. सैकड़ों व्यक्तिों ने अपनी उपाधियाँ वापिस की।
  4. हजारो वकीलों ने वकालत करना छोड़ दिया। इसमें बंगाल के चिरंजन दास, यू.पी. के पंडित मोती लाल तथा उनके सुपुत्र पंण्डित जवाहर लाल नेहरू, पंजाब के लाला लाजपतराय, गुजरात में बल्लभ भाई पटेल तथा विट्ठल भाई पटेल, पूना में नरसिंह चिन्तामणि केलकर प्रान्त में डॉ. मूंजे और अभयंकर, बिहार में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और मद्रास में राजगोपालचार्य सत्यमूर्ति और टी. प्रकाशन के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। आन्दोलन में मुस्लिम नेताओं ने सक्रिय भाग लिया जिनमें अलीबन्द (मौलाना मुहम्मद अली तथा शौकत अली), डॉ. अन्सारी, मौलाना अब्दुल कलाम आदि प्रमुख थे। निम्न प्रमुख राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना हुई। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, मुजरात विद्यापीठ, बंगाल का राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, तिलक महाविद्यापीठ।
  5. विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया गया और लोगों ने स्वदेशी को अपनाया। हजारों की संख्या में लोगों ने चरखा कातना आरम्भ किया।
  6. मादक पदार्थों के विरुद्ध भी आन्दोलन हुआ, जिससे सरकार को बहुत अधिक आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। के बहिष्कार के समय कांग्रेस के स्वयं सेवकों पर सरकार की ओर से बड़े अत्याचार किए गये।

व्यवस्थापिका सभाओं का बहिष्कार

कांग्रेस के नव सुधार योजना के अनुसार बनने वाली व्यवस्थापिका सभाओं का भी बहिष्कार करने का निश्चय किया था, यद्यपि सी०आर० दास के नेतृत्व में इसका विरोध किया गया था। उन्होंने जनता से यह प्रार्थना की थी कि वह उसका उम्मीदवार न बने और जो व्यक्ति निर्वाचित होने के लिए खड़े हों उनको मत नहीं दिये जायें। अधिकांशतः जनता ने ऐसा ही किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि बहुत से स्थानों पर तो मतदान पेटियाँ खाली ही पड़ी रहीं, किन्तु इसमें भाग न लेने से उपाधि प्राप्त व्यक्ति और साहूकार वकील आदि इन सभाओं के सदस्य निर्वाचित हुए जिनका अंग्रेजी सरकार को सहयोग तथा समर्थन प्राप्त था। इस प्रकार ये संस्थायें कांग्रेस से अथवा जनता के सम्पर्क तथा प्रभाव से दूर हो गयी।

कन्नोट के ड्यूक भारत आने वाले थे

व्यवस्थापिका सभाओं के उद्घाटन के लिये फरवरी 1921 ई. में कन्नोट के ड्यूक भारत आने वाले थे। महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन के कारण भारत में शान्त वातावरण नहीं था। सरकार ने शान्त वातावरण की स्थापना के उद्देश्य से भरसक प्रयत्न किया, किन्तु वह ऐसा करने में सफल न हो सकी। उसकी इच्छा यह थी कि ड्यूक के आगमन के समय किसी प्रकार का हल्ला गुल्ला न हो। कांग्रेस ने निश्चय किया कि ड्यूक के आवागमन का बहिष्कार किया जाये। उसके आगमन का स्वागत, जहाँ भी वे गये उन सभी स्थानों में हड़तालों द्वारा किया गया। इसके उपरान्त सरकार ने घोर दमन चक्र चलाया। राजद्रोही सभा कानून कार्यान्वित किया गया तथा उन भारतीयों को पकड़ना आरम्भ किया जिनका आन्दोलन से सम्पर्क था। बहुत से व्यक्तियों को जेल-यात्रा करनी पड़ी। अप्रैल 1921 में लार्ड चैम्सफोर्ड के स्थान लार्ड रीडिंग भारत के वायसराय नियुक्त किए। पण्डित मदन मोहन मालवीय के प्रयत्न से गांधी जी ने वायसराय से भेंट की जिसका परिणाम यह हुआ कि अली बन्धुओं ने यह आश्वासन दिया कि उस समय तक हिंसा का प्रचार नहीं किया जिस समय तक उनक सम्बन्ध आन्दोलन से रहेगा।

प्रिंस आफ वेल्स का बहिष्कार

यह वार्ता के होने पर भी आन्दोलन पूर्ववत् चलता रहा। 1921 ई. में गाँधी जी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। इस समय मौलाना मुहम्मद अली के नेतृत्व में खिलाफत सम्मेलन की ओर से मुसलमानों से निवेदन किया गया कि वे सरकारी सेवाओं में प्रवेश न करें। उन्हें रांची में एक दो वर्ष के कारावास की सजा मिली। कांग्रेस की ओर से वेल्स के राजकुमार का बहिष्कार करने का भी निश्चय किया गया जिसका आगमन 1921-22 के शीत-काल में होन वाला था। वे 17 नवम्बर 1921 को आए। समस्त देश व उस तिथि को हड़ताल हुई। जिस समय वे बम्बई बन्दरगाह पर उतरे तो वहाँ एक भारी दंगा हो गया। गाँधी जी ने उनकी बड़ी निन्दा की। जहाँ वे गये वहाँ उनका हड़ताल से स्वागत किया गया। दिन प्रतिदिन स्थिति की गम्भीरता बढ़ती गई। युवराज जहाँ-जहाँ गये जीवन हीन नगरों ने उनका स्वागत किया और विदेशियों को उस दिन विवश होकर व्रत करना पड़ता क्योंकि होटलों के नौकर भी हड़ताल पर थे। पंडित मदन मोहन मालवीय तथा मुहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस और सरकार के मध्य समझौता कराने के लिये घोर प्रयत्न किया वायसराय भी इस समय समझौता करना चाहते थे और ऐसा कहा जाता है कि वे शान्त वातावरण की स्थापना के लिये ऊँची कीमत तक देने को तत्पर थे। महात्मा गाँधी उस समय तक कोई समझौता करने को तत्पर नहीं हुए जिस समय तक अली बन्धुओं को मुक्त नहीं कर दिया जाए।

सरकार की ओर से दमन

अब सरकार ने दमन-चक्र जोरों से चलाया। 1921 के अन्त तक राजनीतिक बन्दियों की संख्या 50,000 के भी ऊपर हो गई। मान्य कांग्रेसी नेताओं को सरकार ने बन्दीगृह में डाल दिया। सार्वजनिक संस्थाओं को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। इस प्रकार एक ओर तो आन्दोलन तीव्रगति से चल रहा था और दूसरी ओर सरकार दमन चक्र 1 दिसम्बर 1921 ई. में कांग्रेस का अधिवेशन अहमदाबाद में हुआ। इस अधिवेशन में महात्मा गाँधी ने हिंसक कार्यों की निन्दा की। इस बात पर फिर कांग्रेस ने असहयोग नीति का समर्थन किया। कांग्रेस ने गाँधी जी को आन्दोलन का अधिनायक नियुक्त किया और उसमें सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रारम्भ करने का निश्चय किया गया। उसमें जनता से कांग्रेस के स्वयं सेवक दल में सम्मिलित होने की प्रार्थना की गई। कांग्रेस का आन्दोलन तीव्रगति से चलता रहा।

भारतीय नेताओं का सम्मेलन

अहमदाबाद के कांग्रेस सम्मेलन ने स्पष्ट कर दिया कि जब महात्मा गाँधी के नेतृत्व में बहुत बड़े आन्दोलन का प्रादुर्भाव होने वाला है। भारतीय नेताओं के हृदय में यह भावना बलवती हुई कि कांग्रेस और सरकार से समझौता कराया जाय। अतः भारतीय नेताओं का एक सम्मलेन बम्बई नगर में हुआ जिसमें कांग्रेस की ओर से महात्मा गाँधी सम्मिलित हुए। पाठकों को स्मरण होगा कि इस समय कांग्रेस के सब महान् नेता कारागार की सजायें भोग रहे थे इस सम्मेलन का उद्देश्य कांग्रेस और सरकार में समझौता कराना था। इस सम्मेलन में पर्याप्त वाद-विवाद के उपरान्त यह निश्चय हुआ कि (i) जिस समय तक समझौता वार्ता चलती रही उस समय तक अहमदाबाद कांग्रेस सम्मेलन द्वारा निश्चित किया हुआ आन्दोलन स्थगति रखा जाए, (ii) असहयोग करने वाले व्यक्ति को तथा दूसरे व्यक्तियों को जेल से मुक्ति प्रदान की जावे, (ii) सरकार को कठोर दमन नीति की भी निन्दा की गई, (iv) सरकार से एक गोलमेज सम्मेलन की मांग की गई जिसके द्वारा खिलाफत, पंजाब हत्याकांड और स्वराज्य के प्रश्न का निर्णय करने का प्रयत्न किया जाए।

सम्मेलन का असफल होना

कांग्रेस की कार्यकारिणी ने इस प्रस्तावों को स्वीकार किया, किन्तु भारत सरकार ने इनको स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार यह ध्यान रहे कि कांग्रेस सरकार के सहयोग करना चाहती थी, किन्तु सरकार की हठधर्मी के कारण सफलता प्राप्त नहीं हुई और बाध्य होकर महात्मा गाँधी को असहयोग आन्दोलन की शरण लेनी पड़ी।

असहयोग आन्दोलन की समाप्ति

महात्मा गाँधी ने फरवरी 1922 ई. को भारतीय नेताओं के बम्बई सम्मेलन के असफल होने पर भारत वायसराय को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने सरकार की नीति की विशेष निन्दा करते हुए कटु अलोचना की और सरकार को यह चेतावनी दी कि यदि सरकार अपने रूख तथा नीति में परिवर्तन नहीं करती है तो यह सात दिन के अन्दर बारदौली में सत्याग्रह आरम्भ कर देंगे। बारदौली सूरत जिले में एक छोटा सा ताल्लुका है, वहाँ की जनता ने महात्मा गाँधी की समस्त बातों को स्वीकार कर लिया था, इसी कारण उन्होंने वहाँ आन्दोलन करने का निश्चय किया था। सात दिन समाप्त भी नहीं होने पाये थे कि गोरखपुर जिले के चौरी चौरा नामक स्थान पर एक दुर्घटना हो गई। यहाँ की जनता ने वहाँ के थाने में आग लगा दी और थानेदार तथा 21 सिपाहियों का वध कर दिया। जब महात्मा गाँधी को वह समाचार विदित हुआ तो उनके दुःख का ठिकाना न रहा। वे इंसको सहन नहीं कर सके। इससे पूर्व भी मालावार में तथा बम्बई में कुछ दंगे हो चुके हैं। महात्मा गाँधी को यह अनुभव हुआ कि आन्दोलन अहिंसात्मक रूप खो रहा है और जनता में हिंसात्मक प्रवृत्ति प्रबल हो रही है। महात्मा गाँधी ने आन्दोलन स्थगित करने का निश्चय किया उन्होंने बारदौली में कांग्रेस कार्यकारिणी बैठक का आयोजन किया। जिसका सम्मेलन 21 फरवरी को हुआ। महात्मा गाँधी के आन्दोलन स्थगित करने वाले प्रस्ताव पर बहुत वाद-विवाद हुआ और अन्त में उनका प्रस्ताव स्वीकार हुआ। महात्मा गाँधी ने रचनात्मक कार्यक्रम पर विशेष बल दिया। इस प्रकार आन्दोलन स्थगित किया गया।

जिस समय महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन को स्थगित किया उस समय उनके अतिरिक्त भारतीय कांग्रेस तथा खिलाफत दल के नेता बन्दीगृह की यातना भोग रहे थे। महात्मा गाँधी ने आन्दोलन के साथ-साथ सरकारी कानूनों की अवज्ञा तथा कर बन्दी को भी स्थगित किया और देश के सामने रचनात्मक कार्यक्रम रखा। 13 मार्च को गाँधी जी बन्दी किय गये, यद्यपि उनको बन्दी करने का निश्चय फरवरी के अन्तिम सप्ताह ही में कर लिया गया था। गाँधी जी को राजद्रोह के अपराध में सेशन को सुपुर्द कर दिया गया। इस न्यायालय ने उनको छः वर्ष का कारगार मिलया। उनको यर्वदा जेल में बन्दी कर दिया गया। इस समय गाँधी जी ने इच्छा प्रकट की कि सारे कार्यकर्ता यह दिखला दें कि सरकार की आशंकाये निर्मूल हैं, न हड़तालें, न शोरगुल के साथ प्रदर्शन किये जाये न जुलूस निकाले जायें। देश ने उनकी इच्छा का पालन किया।

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