भारत में सुधार आन्दोलन में जाति प्रथा और अछूतोद्धार (हरिजन) आन्दोलन

सुधार आन्दोलन में जाति प्रथा और अछूतोद्धार आन्दोलन

दलित एवं पिछड़ी जाति के सम्बन्ध में सुधार आन्दोलन

जाति प्रथा भरतीय समाज का दूसरा बड़ा रोग था जिसके विरूद्ध सुधारकों ने संघर्ष छेड़ा । जाति प्रथा ने समाज में कई दोषों को जन्म दिया था। इसकी वजह से सारा समाज अनेक इकाइयों में विभक्त हो गया था । विभिन्न जातियों, विशेषकर ऊंची और नीची, जातियों में काफी भेदभाव और वैमनस्य था और सामाजिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई थी । आर्थिक एवं सामाजिक विकास के प्रायः सभी साधन और सुअवसर ऊंची जातियों के हाथ में थे अतः कालांतर में नीची जातियों का बहुतसंख्यक भाग दरिद्र, अशिक्षित और हर दृष्टि से पिछड़ा रह गया । इसका अर्थ था पूरे राष्ट्र का पिछड़ापन और संपूर्ण राष्ट्र की कमजोरी।

जाति प्रथा और छुआछूत की नींव प्राचीन काल में ही पड़ चुकी थी और तभी से इन्हें दूर करने के असफल प्रयत्न भी होते रहे थे । जाति प्रथा और अस्पृश्यता को दूर करने की दिशा में प्राचीन काल में महात्मा बुद्ध और महावीर, तदुपरांत स्वामी रामानंद, कबीर, नानक, तुकाराम, एकनाथ और नामदेव आदि ने प्रयास किया था पर उन्हें यथोचित सफलता नहीं मिली।

आधुनिक काल में अंग्रेजी शासन के दौरान कुछ ऐसी शक्तियाँ उत्पन्न हुई जिन्होंने जातीय एवं अन्य सामाजिक भेद-भाव की भावना पर सशक्त प्रहार किया। ये शक्तियाँ बाह्य एवं आंतरिक दोनों थीं । अंग्रेजों के भारत में आगमन के साथ-साथ आधुनिक उद्योगों में आर्थिक लाभ के सुअवसर ने विशेषकर ऊंची जातियों को किसी भी उद्योग (जहाँ मुनाफा हो) को शुरू करने के लिए बाध्य किया । अब वाणिज्य और व्यापार वैश्यो का ही धंधा नहीं रह गया था। पैसे के लिए अब ब्राहमण भी चमड़े या जूते का व्यापार कर सकता था।

अंग्रेजी प्रशासनिक व्यवस्था के साथ भारत में कानून का शासन और कानून के सम्मुख समानता के सिद्धांत का प्रवेश हुआ । इससे सामाजिक समानता को बल मिला, जातिवाद और असमानता की भावना को धक्का लगा । नए न्यायालयों की स्थापना ने जातीय पंचायतों के कार्य को खत्म कर दिया। दूसरी ओर अंग्रेजी सरकार की नीति से सरकारी नौकरियों और सेन के द्वार सभी जातियों के लिए खुल गए ।

आधुनिक लोकतांत्रिक विचार, बुद्धिवाद तथा मानवतावाद से प्रभावित भारतीयों ने धार्मिक अंधविश्वास के साथ ही सामाजिक असमानता, जातिप्रथा और छुआछूत के विरूद्ध आवाज उठाई।

यही वजह है कि जब राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ हुआ तो स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जातीय भेदभाव की समाप्ति और व्यापक सामाजिक समता अनिवार्य शर्त बन गए। इस प्रकार शुरू से ही राष्ट्रीय आंदोलन और उसके अभिन्न अंग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सभी जातिगत विशेषाधिकारों और छुआछूत का विरोध किया तथा सभी भारतीयों के लिए समान नागरिक अधिकार, जाति-धर्म-लिंग के भेदभाव के बिना सभी को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए समान अधिकार एवं स्वतंत्रता की मांग की।

इस दिशा में विशेषकर छुआछूत समाप्त करने और दलित एवं अछूत वर्ग के उद्धार के लिए गांधी ने भी भरसक प्रयत्न किया । उन्होंने अछूतों (शूद्र आदि) को हरिजन अर्थात भगवान का आदमी कहा। उन्होंने उनकी भलाई के लिए हरिजन नामक एक साप्ताहिक पत्र निकाला और ‘हरिजन सेवक संघ‘ की स्थापना का। गाँधी दलितों एवं अछूतों के उद्धार के कार्य में आजीवन लगे रहे । यहाँ इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है कि अपनी सारी निकनीयती के बावजूद गाँधी की सामाजिक सुधार से संबंधित नीति की कुछ मौलिक कमजोरियाँ थीं । मसलन् गाँधी सामाजिक भेदभाव, छुआछूत आदि के विरूद्ध तो थे, पर वे वर्णव्यवस्था के समर्थक थे। यह एक बड़ा अंतर्विरोध था। 20वीं शताब्दी में वर्ण का अर्थ जाति से भिन्न नहीं हो सकता था। जाति प्रथा के प्रश्न पर उनके विचार अस्पष्ट और अनुदार थे। इसी प्रकार गाँधी सामाजिक एकता के पक्ष में तो थे, मगर संपत्ति के समान वितरण के पक्ष में नहीं थे वे ‘ट्रस्टीशिप (न्यासिता) के पक्षधर थे। गाँधी के सामाजिक चिंतन में ऐसे कितने ही मौलिक अंतर्विरोध थे और उसमें व्यावहारिकता का अभाव था । इसके मुख्य कारण थे : उनके सामाजिक चिंतन पर धर्म का अतिशय-प्रभाव, उसमें प्रगतिशीलता का अभाव और सामाजिक प्रश्नों के प्रति भावना प्रधान आदर्शवादी दृष्टिकोण

सामाजिक जागृति और शिक्षा के प्रसार से नीची जातियों में जागृति आई उन्हें मौलिक मानव अधिकारों का ज्ञान हुआ और वे स्वयं अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आने लगा। इस प्रकार उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों के सदियों से चले आ रहे शोषण के विरूद्ध एक शक्तिशाली आंदोलन जोर पकड़ने लगा । ऐसे आंदोलन के नेताओं में डा0 बी0 आर0 अम्बेडकर का नाम उल्लेखनीय है । उनका जन्म एक निम्नवर्गीय परिवार में हुआ था और उन्होंने जाति प्रथा के दोषों को ठीक समझा था । अतः वे आजीवन जाति प्रथा के खिलाफ, विशेषकर ऊंची जातियों की नीची जातियों पर मनमानी के विरूद्ध लड़ते रहे। अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए उन्होंने ‘ऑल इण्डिया डिप्रेस्ड क्लास फैडरेशन’ (अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ) की स्थापना की। दलितों एवं अछूतों के उद्धार के लिए इन जातियों के अन्य नेताओं ने भी ‘ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास एसोसिएशन’ की स्थापना की । दक्षिण भारत में जातीय कट्टरता और चरम सीमा पर था। 1920 के बाद वहाँ गैर-ब्राह्मण जातियों ने एक ‘सेल्फ-रेसपेक्ट मूवमेंट’ (आत्मसम्मान आंदोलन) चलाया और अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश की मंदिर में प्रवेश और ऐसे ही अन्य निषेधों के खिलाफ उन्होंने अनेक सत्याग्रह किए ।

इस सबके बावजूद जातीय कट्टरता एवं अस्पृश्यता का अंत आसान नहीं था। जब तक देश में विदेशी साम्राज्यवादी शासन था तब तक इसका अंत हो भी नहीं सकता था । इस समस्या को खत्म करने के लिए विदेशी सरकार ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती थी, जिससे समाज का रूढ़िवादी वर्ग, जो संपन्न और अंग्रेजों का समर्थक था, नाराज हो जाए । दूसरे, सामाजिक उत्थान का संबंध राजनीतिक और आर्थिक राजनीतिक उत्थान से अविच्छिन्न रूप में जुड़ा हुआ था। लेकिन भारतीयों का आर्थिक और राजनीतिक उत्थान अंग्रेजी शासन के स्वामित्व के लिए छूआछूत अपनी खतरनाक था । अतः इन सभी मुद्दों पर अंग्रज बड़े सतर्क और लगभग चुप थे। 1947 में भारत विदेशी शासन से मुक्त हो गया । समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों ने भारतीय मुक्ति-संग्राम को प्रेरणा दी थी। अतः स्वतंत्रता मिलने पर भारत सरकार का पहला काम था इन आदर्शों को जीवन के हर क्षेत्र में अभिव्यक्ति प्रदान करना । इसलिए नए संविधान के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को एक-दूसरे के साथ समानता का अधिकार दिया गया और छुआछूत, तथा जाति प्रथा को दंडनीय अपराध माना गया। इतना ही नहीं, अछूतों, अल्प-संख्यकों और पिछड़ी जातियों की भलाई के लिए विशेष व्यवस्था की गई । उन्हें नौकरियों में उच्च पद दिए गए और केंद्र तथा राज्यों की सरकारों में उनके लिए प्रतिनिधितव सुरक्षित किया गया। भविष्य में भी इनकी भलाई हो, इसके लिए गणतंत्र के राष्ट्रपति को विशेष अधिकार दिए गए ।

फिर भी जाति प्रथा अभी भी पूर्णरूप से समाप्त नहीं हो पाई है। आज भी यह देश के सामने एक बड़ी समस्या है। आरक्षण-संबंधी विवाद के कारण जातीय भेद-भाव हाल के वर्षों में और भी संकीर्ण और कठोर होता जा रहा है।

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