भारत में डचों का आगमन एवं उनकी असफलता के कारण

भारत में डचों का आगमन तथा पुर्तगाली और अंग्रेजों से संघर्ष एवं उनकी असफलता के कारण

17वीं शताब्दी के आरम्भ तक भारत साथ व्यापार करने की तीव्र इच्छा यूरोपीय राष्ट्रों में जाग्रत हो चुकी थी। सभी देश भारत से व्यापारिक संबंध कायम कर अपना आर्थिक एवं राजनीतिक हित साधना चाहते थे। इसी उद्देश्य को लेकर सर्वप्रथम पुर्तगाली आए थे। उनकी सफलता से प्रभावित होकर क्रमशः डच, अँगरेज और फ्रांसीसी भी भारत आए। इन शक्तियों में 17-18वीं शताब्दी के दौरान आपसी प्रतिस्पर्धा का तीव्र दौड चला, जिसमें एक-एक कर पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसी पीछे छूटते गए और अंग्रेज यहाँ के मालिक बन बैठे।

भारत में डच शक्ति की स्थापना

पुर्तगालियों की ही तरह डच भी भारत के साथ व्यापार करने का लोभ लेकर भारत आए। इस दिशा में पहला प्रयास 1552 ई0 में हुआ जब एमस्टरडम के व्यापारियों ने भारत के साथ व्यापार करने के लिए एक व्यापारिक कंपनी की स्थापना की। 1595 ई0 में पहला डच जहाजी बेड़ा कोरनीलियन हाउटमैन के नेतृत्व में हॉलैंड से भारत के लिए चला। यह बेड़ा उत्तमाशा अंतरीप पारकर मलय द्वीपसमूह पहुँचा तथा वहाँ से काफी सामान लेकर 1597 ई0 में हॉलैंड वापस लौटा। इस सफल समुद्रयात्रा ने डचों को काफी प्रोत्साहित किया तथा पूर्व के साथ व्यापार करने की उनकी इच्छा तीव्र होती चली गई। एक इतिहासकार के शब्दों में, “डच व्यापारी वर्ग की अवरुद्ध चेष्टा इस तरह से फूट पड़ी जैसे कोई बाँध काट दिया गया हो।’ इसके पश्चात नई-नई व्यापारिक कंपनियाँ कायम की जाने लगीं। 20 मार्च, 1602 को राजकीय घोषणा के आधार पर “न्यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी ऑफ दी नेदरलैंड्स” (ईस्ट इंडिया कंपनी) की स्थापना की गई। डच स्टेट्स जनरल ने इस कंपनी को सनद के द्वारा “युद्ध चलाने, संधि करने, प्रदेशों पर अधिकार रखने तथा किलेबंदी करने का अधिकार प्रदान किया और इस प्रकार उसने यूनाइटेड कंपनी को युद्ध एवं विजय का एक प्रबल अस्र बना दिया।”

प्रारंभ में डचों का भी प्रमुख उद्देश्य भारत के साथ व्यापार करना ही था। इस उद्देश्य से इन लोगों ने कोरोमंडल तट, गुजरात और बंगाल में कई व्यापारिक फैक्टरियाँ कायम की। बिहार और उड़ीसा में भी उनकी कोठियाँ बन गईं। इनमें प्रमुख थीं- पुलीकट, सूरत, चिनसुरा, कासिम बाजार, पटना, बालासोर, बारानगर, नेगपट्टम और कोचीन। इन कोठियों की स्थापना ने उनकी व्यापारिक स्थिति सुदृढ़ कर दी। इतिहासकार सरकार और दत्त के अनुसार, “अब वे वास्तव में भारतवर्ष और पूर्व में अपने समुद्र के पार उपनिवेशों के बीच पक्के माल और पैदावार के वाहक बन गए थे।” मसालों के व्यापार पर उनका एकाधिकार कायम हो चुका था।

डच-पुर्तगाली प्रतिस्पर्धा-

डचों को अपने प्रसार में पुर्तगालियों के साथ कड़ा संघर्ष करना पड़ा। इसका मुख्य कारण यह था कि पूर्वी व्यापार पर पुर्तगालियों का एकछत्र आधिपत्य कायम था और जब तक डच पुर्तगाली शक्ति पर नियंत्रण नहीं करते उनका व्यापारिक और राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता। डचों के सौभाग्य से पुर्तगाली अपने दुष्कर्मों से काफी बदनाम हो चुके थे। इसका लाभ डचों ने उठाया। उन्होंने स्थानीय शासकों और जनता का भावनाओं का लाभ उठाकर पुर्तगालियों को उनके अधिकृत क्षेत्रों से हटाना प्रारंभ कर दिया। 1605 ई० में डचों ने पुर्तगालियों से अम्बोयना ले लिया और धीरे-धीरे गरम मसालों के द्वीप से उन्हें निकाल बाहर किया। आगे चलकर डचों ने जिब्राल्टर की खाड़ी में स्पेनिश बेड़े को नष्ट कर पुर्तगालियों को काफी क्षति पहुँचाई। 1619 ई० में जकार्ता पर अधिकार कर डचों ने बटाविया नामक नगर बसाया जो डचों की राजनीतिक और व्यापारिक गतिविधयों का केन्द्र बन गया। डच इतने से ही संतुष्ट नहीं हुए। उन लोगों ने गोवा पर जो पुर्तगाली शक्ति का केन्द्र था, 1639 ई० में आक्रमण किया, 1641 ई० में मलक्का पर विजय प्राप्त की और 1658ई० में लंका पर भी अधिकार कायम कर लिया। इस प्रकार, 1664 ई० तक मालाबार तट स्थित पुर्तगाली अपने अधिकांश प्रारंभिक उपनिवेशों से हाथ धो बैठे। डच-पुर्तगाली संघर्ष में पुर्तगाली असफल रहे और डचों की प्रतिष्ठा और शक्ति का अत्यधिक विस्तार हुआ।

डचों का अंग्रेजों से संघर्ष-

डचों की व्यापारिक और सामरिक प्रगति ने उन्हें अंग्रेजों के साथ भी संघर्ष में उलझा दिया। दोनों ही भारत में अपनी प्रभुत्ता स्थापित करने का स्वप्न देख रहे थे। अतः, उनमें टकराहट आवश्यक हो गया। प्रारंभ में डचों और अंग्रेजों के संबंध मधुर और मंत्रीपूर्ण थे। हॉलैंड और इंग्लैंड दोनों ही प्रोटेस्टेण्ट धर्म को मानने वाले थे तथा दोनों ने समानरूप से स्पेन और पुर्तगाल का विरोध किया जहाँ कैथोलिक मत का प्रधानता थी। इसी बीच स्पेन और इंग्लैंड के नए संबंधी ने (1694 ई० की संधि) डचों और अंग्रेजों के मध्य दीवार खड़ी कर दी। भारत में दोनों ही व्यापारिक लाभ के लिए एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन बैठे। अंग्रेजों ने शीघ्र ही यह अनुमान लगा लिया कि उनके वास्तविक प्रतिद्वंद्वी डच ही हैं डच भी पूर्व में अंग्रेजों की उपस्थिति से सशंकित हो उठे थे। अतः, शीघ्र ही दोनों में संघर्ष आरंभ हो गया।

इस संघर्ष की शुरूआत मसालों के द्वीप से ही हुई। अंग्रेजों को मसाले के द्वीपों से दूर रखने के उद्देश्य से डच गवर्नर रेयंट ने वण्डा के सरदारों को, जो अंग्रेजों से व्यापार करते थे, दंडित किया और अम्बोयना से अंग्रेजों को जबरदस्ती खदेड़ दिया। 1618 ई० में एक अन्य डच गवर्नर जनरल जॉन कोयन ने अंग्रेजों के विरुद्ध सफलतापूर्वक जल एवं स्थल से युद्ध किए। परिणामस्वरूप बाध्य होकर 1619ई० में अंग्रेजों को डचों के साथ संधि करनी पड़ी। इस संधि को कार्यान्वित करवाने का जिम्मा ‘ज्वाइंट कौंसिल ऑफ डिफेंस इन दी इस्ट’ को सौंपा गया; परन्तु यह कौंसिल डचों और अंग्रेजों के बीच की कटुता समाप्त नहीं कर सकी। कुछ ही वर्षों के अंदर लंटोर और नुलोरन से अंग्रेजों को निर्दयतापूर्वक निकाल बाहर किया गया। अंग्रेजों और डचों की पारस्परिक घृणा अम्बोयना हत्याकांड (1623 ई०) के चलते चरम सीमा पर पहुंच गई। अम्बोयना के डच गवर्नर वेंसपेल्ट ने अठारह अंग्रेजों और नौ जापानी सिपाहियों तथा एक पुर्तगाली को अंग्रेज एजेंट टावरसन के साथ एक झूठा अभियोग लगाकर गिरफ्तार कर लिया। इन पर डच किले पर आक्रमण करने का अभियोग लगाया गया था। अभियुक्तों पर अत्याचार कर उनसे अपराध कबूल करवाया गया और टावरसन, नौ अंग्रेजों और जापानियों को मृत्युदंड दिया गया। इस घटना की तीखी प्रतिक्रिया हुई। अब अंग्रेजों ने ‘मसालों के द्वीप‘ से भारत की तरफ अपना ध्यान देना शुरू किया। यहाँ भी दोनों में संघर्ष चलते रहे। 1759 ई० तक डच अंग्रेजों से प्रतिस्पर्धा करते रहे परन्तु उनकी शक्ति अब भारत में काफी कमजोर हो चुकी थी। शीघ्र ही अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को परास्त कर यहाँ अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर ली।

डचों की असफलता के कारण

पुर्तगालियों के ही समान भारत के व्यापार और राजनीति पर एकाधिपत्य कायम करने का डचों का प्रयास असफल सिद्ध हुआ। डचों की असफलता के अनेक कारण थे।

डच व्यापारिक कंपनी पर सरकार का सीधा नियंत्रण-

डच व्यापारिक कंपनी एक राष्ट्रीय संस्था थी, उसका सीधा संबंध हॉलैंड की सरकार के साथ था। हॉलैंड की सरकार यूरोपीय राजनीति में बुरी तरह उलझी हुई थी। उसे अनवरत इंगलैंड, फ्रांस आदि देशों से युद्ध में संलग्न रहना पड़ता था। फलस्वरूप, उन सरकार कंपनी के आर्थिक हितों का सुरक्षा नहीं कर पाई और न ही जरूरत पड़ने पर उसे वांछित मदद पहुँचा सकी। फलस्वरूप, डचों की शक्ति कमजोर पड़ती चली गई।

भ्रष्ट एवं अयोग्य पदाधिकारी और कर्मचारी-

डच व्यापारिक कंपनी के पदाधिकारी और कर्मचारी अयोग्य और भ्रष्ट थे। उनमें दूरदर्शिता एवं देशभक्ति की भावना का अभाव था। वे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ-साधना में ही लिप्त रहते थे। परिणामस्वरूप, वे अपने प्रबल प्रतिद्वंद्वियों का मुकाबला नहीं कर सके।

अंग्रेजों से संघर्ष-

डच शक्ति के पतन का सबसे प्रमुख कारण था उनका अंग्रेजों के साथ संघर्ष होना। अंग्रेज डचों की अपेक्षा अधिक व्यवहारकुशल, कूटनीतिज्ञ एवं साधनसंपन्न थे। उन्होंने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दी जिसमें डचों का सारा ध्यान पूर्वी द्वीपसमूहों की तरफ उलझा रहा और अंग्रेजों ने धीरे-धीरे समूचे भारत पर अपना आधिपत्य कायम कर लिया।

इस प्रकार, पुर्तगाली और डच दोनों ही भारत में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में पीछे छूट चुके थे। अब फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच मैदान खाली था। दोनों ही इस ताक में थे कि अपने प्रतिद्वंद्वी को मैदान से हटाकर विजयश्री हासिल कर सकें।

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