आर्यों का धार्मिक जीवन एवं आस्था

आर्यों का धार्मिक जीवन एवं आस्था

उत्तर वैदिक काल में आर्यों का धार्मिक जीवन एवं आस्था

उत्तर-वैदिककाल में आर्यों के धार्मिक जीवन एवं आस्थाओं में भी महान परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। इस समय की धार्मिक आस्थाएँ भी तत्कालीन भौतिक जीवन से प्रभावित थीं। वैदिक काल का सीधा-सादा धार्मिक जीवन अब आडंबरपूर्ण, रूढ़िवादी और कर्मकांडप्रधान बन गया। धार्मिक जीवन पर पुरोहितों का वर्चस्व स्थापित हो गया। एक अर्थ में वे ही धर्म के मालिक बन बैठे। उत्तर-वैदिककाल के अंतिम चरण में पुरोहितों की प्रभुता एवं कर्मकांडों की निस्सारता के विरोध में उपनिषदों ने आवाज उठाई।

ऋग्वेद में जिन प्रमुख देवताओं (इंद्र, वरुण, अग्नि, मित्र, इत्यादि) को प्रधान माना जाता था, उनका स्थान अब गौण पड़ गया। उनकी जगह नए देवताओं यथा- शिव या रुद्र, विष्णु या नारायण, प्रजापति या ब्रह्म ने ले लिया। देवताओं की संख्या में भी वृद्धि हुई और उनमें से अनेक दिग्पाल, गंधर्व, यक्ष आदि के रूप में (देवताओं के सहायक) सामने आए। पितृसत्तात्मक तत्वों के सबल होने से उषा एवं अदिति जैसी देवियों का महत्व भी कम हो गया। उनकी जगह अब विभिन्न यक्षिणियों एवं अप्सराओं का आविर्भाव हुआ। देवताओं में सबसे प्रमुख स्थान प्रजापति को दिया गया। उसे विश्व का सृष्टिकर्ता माना गया। प्रजापति द्वारा वराह रूप में पृथ्वीधारण करने तथा कूर्म बनने की कल्पना प्रचलित हुई जिसने आगे अवतारवाद को बढ़ावा दिया। रुद्र (पशुओं का देवता) शिव या पशुपति कहलाने लगा। विष्णु पालनकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इस प्रकार, उत्तर-वैदिककाल में त्रिमूर्ति की भावना का विकास हुआ। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही प्रमुख देवता बन गए। सामाजिक वर्गीकरण के साथ-साथ कुछ देवताओं का संबंध वर्णविशेष से स्थापित हो गया। उदाहरणस्वरूप पूषन, जो पहले मवेशियों का देवता था, अब मुख्यतया शूद्रों का ही देवता बन सका। प्रो0 रामशरण शर्मा के अनुसार, उत्तर-वैदिककाल में मूर्तिपूजा की प्रथा भी आरंभ हो चुकी थी, परन्तु मूर्तिपूजा के निश्चित पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। साहित्यिक स्रोतों में भी मूर्तिपूजा का स्पष्ट उल्लेख इस समय नहीं मिलता। यहाँ इस बात का उल्लेख किया जा सकता है कि यद्यपि मूर्तिपूजा के पुरातात्विक साक्ष्य नहीं मिलते हैं तथापि अतरंजीखेड़ा से प्राप्त कुछ वृत्ताकार अग्निकुंड और कौशांबी से मिला यज्ञ वेदी इन कर्मकांडों की पुष्टि करते हैं।

धार्मिक क्षेत्र में जो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन आया, वह था पुरोहितों का प्रभाव और कर्मकाण्डों की जटिलता में वृद्धि। समाज के अनुत्पादी वर्गो-ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों ने बिना श्रम किए ही उत्पादन में हिस्सा बँटाने और समाज पर अपनी धाक एवं श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए आपस में समझौता कर लिया। ब्राह्मण अपनी धार्मिक श्रेष्ठाता और शक्तियों के प्रभाव को बनाए रखने के लिए नए हथकंडों का सहारा लेने लगे। इसके बदले उन्हें धन एवं प्रतिष्ठा मिली। क्षत्रिय ब्राह्मणों के संरक्षक बन गए। ब्राह्मणों ने भी धन प्राप्त करने एवं राजा की शक्ति को स्थापित और सुदृढ़ करने के लिए यज्ञों का आयोजन आवश्यक बना दिया। फलस्वरूप, इस युग में तप और भक्ति की जगह यज्ञ एवं बलि पर ज्यादा बल दिया जाने लगा। यद्यपि देवताओं की पूजा अब भी उसी उद्देश्य से की जाती थी, जिस उद्देश्य से ऋग्वैदिक काल में, तथापि अब पूजा की विधि बदल गई। यद्यपि देवताओं की स्तुति में अब भी मंत्रोचरण होते थे, तथापि अब मंत्रों की शक्ति से अधिक यज्ञ और बलि की शक्ति पर महत्व दिया गया। यज्ञों के संपादन के लिए अब पुरोहितों का सहयोग आवश्यक बन गया। चाहे यज्ञ छोटे हों या बड़े पुरोहितों की सहायता के बिना इसे नहीं किया जा सकता था। ये यज्ञ बलि प्रधान और खर्चीले थे। इन यज्ञों को संपादित करवाने के निमित्त पुरोहितों को बहुत अधिक दान-दक्षिणा प्राप्त होता था। उदाहरणस्वरूप, राजसूय यज्ञ (अभिषेक) करवाने वाले प्रधान पुरोहित को 2,40,000 गाएँ दान में दी जाती थीं। इसके साथ-साथ उन्हें सोना, वस्त्र एवं सामान (संभवतः जमीन भी) भी दान में दिए जाते थे। इस दान के बल पर पुरोहित समाज के सुविधाभोगी और संपन्न वर्ग में आ गए। साहित्यिक ग्रंथों में इस समय जिन प्रमुख यज्ञों का उल्लेख मिलता है, वे हैं वाजपेथ, राजसूय और अश्वमेघ । ये सारे यज्ञ राजाओं (क्षत्रियों) के लिए ही सुरक्षित रखे गए। यद्यपि इन यज्ञों का उद्देश्य राजा की शक्ति और उसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि करना था, तथापि साथ-साथ उद्देश्य कृषि-उत्पादन को भी बढ़ाना था। अतः, ब्राह्मणों और क्षत्रियों दोनों ने कर्मकांडों को बढ़ावा दिया। क्षत्रियों द्वारा कर्मकांडों को बढ़ावा देने का एक अन्य कारण यह था कि “इनके माध्यम से वे आर्य सभ्यता की सीमा पर रहने वाले अनार्य प्रमुखों के बीच अपना प्रभुत्व बढ़ा पाते थे।” इसकी पुष्टि अथर्ववेद तथा पंचविंशब्राह्मण से होती है जहाँ मगध के व्रात्य मुखिया को वैदिक समाज में प्रवेश देने के लिए कर्मकांड का आयोजन किया गया है। ये यज्ञ बहुत अधिक खर्चीले थे तथा लंबे समय तक चलते रहते थे। यज्ञों के साथ-साथ विभिन्न संस्कारों के पालन पर भी बल दिया गया। ये संस्कार गर्भाधान से मृत्युपर्यन्त होते रहते थे। इन सभी ने पुरोहितों (ब्राह्मणों) का प्रभाव समाज पर स्थापित कर दिया। उनकी संख्या और श्रेणियों में भी वृद्धि हुई। अब उनमें से कुछ होतृ, उद्गाता, अर्ध्वयु के नाम से विख्यात हुए। वे राजा के प्रमुख सलाहकार भी बन गए।

उत्तर-वैदिक युग में जहाँ एक तरफ यज्ञ, बलि एवं कर्मकाण्डों की प्रधानता बढ़ती जा रही थी, वहीं एक नई दार्शनिक विचारधारा का भी उदय हुआ, जिसने यज्ञों और बलियों को निरर्थक बताकर तप एवं ज्ञान का मार्ग सुझाया। इस विचारधारा ने ब्राह्मणों के कर्मकांड पर गहरा आघात कर छठी शताब्दी ई०पू० के धर्मसुधार-आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। आरण्यकों में यज्ञ-बलि की अपेक्षा तप के महत्व को बताया गया। इसके अनुसार शरीर को तपस्या द्वारा कष्ट देकर ही परमब्रह्म या मोक्ष की प्राप्ति हो सकती थी। तपमार्ग के ठीक विपरीत उपनिषदों न ज्ञानमार्ग का रास्ता दिखाया। “उपनिषदीय विचारकों ने यज्ञ आदि अनुष्ठानों को ऐसी कमजोर नौका बताया है, जिसके द्वारा यह भवसागर पार नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस उद्देश्य के लिए इन्सान को जीवन के चक्र से मोक्ष दिलाने के लिए ज्ञानमार्ग का प्रतिणदन किया। उपनिषदों ने अद्वैतवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया। आत्मज्ञान द्वारा ही परमब्रह्म या मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। षडदर्शन का बीजारोपण भी इसी काल में हुआ। इन नए विचारों ने धार्मिक क्षेत्र में क्रांति ला दी।

अगर हम ऋग्वैदिक काल और उत्तर-वैदिक काल का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है कि आर्यों की प्रारम्भिक सभ्यता में जिन मूल तत्वों की स्थापना हुई थी, उत्तर-वैदिक काल में उनमें परिवर्तन, संवर्धन एवं संशोधन हुए।ये नए तत्व प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के आधारभूत तत्व बन गए।

सिंधुघाटी की सभ्यता और आर्यों की सभ्यता (वैदिक सभ्यता) प्राचीन भारत की दो प्रमुख सभ्यताएँ है। दोनों ही सभ्यताएँ कुछ सौ वर्षों के अन्तराल में विकसित हुई। दोनों सभ्यताओं में कुछ समानताएँ देखी जा सकती हैं, परन्तु इन समानताओं के बावजूद दोनों सभ्यताओं के स्वरूप में मूलभूत अंतर था।

ऋग्वैदिक काल और उत्तर-वैदिक काल की सभ्यताओं में समानता

यद्यपि सिंधुघाटी की सभ्यता और आर्यों की सभ्यता का स्वरूप एक-दूसरे से भिन्न था, फिर भी भारत की दोनों प्राचीन सभ्यताओं में कुछ समानताएँ भी देखी जा सकती हैं। दोनों ही सभ्यताओं के निवासी पशुपालन और कृषि से परिचित थे, परन्तु सिक्के के प्रयोग से दोनों ही अपरिचित थे। इसी प्रकार दोनों ही सभ्यताओं के दौरान मन्दिरों के अस्तित्व का प्रमाण नहीं मिलता। प्रकृति की विभिन्न शक्तियों की पूजा सिंधुवासी और आर्य दोनों ही करते थे। कुछ समानता वस्त्राभूषण में भी देखी जा सकती है। कपास की उपज दोनों सभ्यताओं में होती थी। खान-पान के क्षेत्र में भी कुछ समानता दोनों सभ्यताओं में देखी जा सकती है।

दोनों सभ्यताओं में अन्तर

सिंधुघाटी और आर्यों की सभ्यता में वर्णित उपर्युक्त समानताएँ सतही हैं; दोनों ही सभ्यताओं का मूल स्वरूप एक-दूसरे से भिन्न था। दोनों सभ्यताओं मुख्यतः निम्नलिखित विभेद थे-

  1. काल-संबंधी विभेद-

    दोनों सभ्यताएँ भिन्न-भिन्न काल में विकसित हुई। सिन्धु-सभ्यता करीब 2500 ई०पू० से 1700 ई०पू० के मध्य तक विकसित हुई। यद्यपि 1700 के पश्चात भी कुछ स्थानों पर यह सभ्यता पतनोन्मुख रूप में चलती रही, तथापि इसके प्रमुख केन्द्र नष्ट हो चुके थे। सिन्धु-सभ्यता के पतन के लगभग 200 वर्षों के पश्चात ही आर्यों की सभ्यता स्थापित हुई। इस सभ्यता का काल लगभग 1500 ई० पू०से 600 ई० पू० माना जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सिन्धु-सभ्यता की तरह आर्यों की सभ्यता 600 ई०पू० के पश्चात नष्ट या विलुप्त नहीं हो गई, बल्कि परिवर्द्धित और संशोधित रूप में चलती ही रही। हमारी आधुनिक सभ्यता भी आर्यों की प्राचीन सभ्यता से बहुत अधिक सीमा तक प्रभावित है। सिन्धुघाटी की सभ्यता स्पष्टतया आर्यों की सभ्यता से पुरानी थी। सिन्धुघाटी की सभ्यता के पतन के पश्चात ही आर्यों की सभ्यता स्थापित एवं विकसित हुई।

  2. दोनों सभ्यताओं के संस्थापकों में अन्तर-

    सिन्धुघाटी की सभ्यता की स्थापना में विभिन्न प्रजापतियों का योगदान रहा है। इसके विकास में मुख्यतः प्रागस्रलायद् भूमध्यसागरीय, मंगोलियन और अल्पाइन प्रजातियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इन विभिन्न प्रजातियों के सम्मिश्रण ने ही सिन्धु-सभ्यता का स्वरूप सँवारा, परन्तु वैदिक सभ्यता आर्यों के द्वारा स्थापित की गई थी। इस सभ्यता के विकास में किसी अन्य प्रजाति का योगदान नहीं था।

  3. दोनों सभ्यताओं का भिन्न स्वरूप-

    दोनों सभ्यताओं का स्वरूप भी एक-दूसरे से भिन्न था। सिन्धुघाटी की सभ्यता का स्वरूप जहाँ नागरिक था, वहीं वैदिक सभ्यता ग्रामीण स्वरूप की थी। हड़प्पा-संस्कृति के दौरान नगरों एवं नागरिक जीवन की स्थापना हो चुकी थी, परन्तु आर्यों की सभ्यता ग्रामों पर ही आधृत थी। इस युग में नगरों के विकास का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। जहाँ सिन्धुघाटी के निवासी ईंटों से बनाए गए मकानों में रहते थे, वहीं आर्य लकड़ी फूस-बाँस या कच्ची मिट्टी के गृहों में निवास करते थे।

  4. आर्थिक भिन्नता-

    दोनों ही सभ्यताओं के निवासियों के आर्थिक जीवन की आधार-रेखा भी एक-दूसरे से भिन्न थी। यद्यपि सिन्धु-सभ्यता और आर्यों की सभ्यता के दौरान पशुपालन और कृषि-कर्म समान रूप से होते थे, तथापि उद्योग-धंधों, व्यापार-वाणिज्य और विशेषकर विदेशी व्यपार का जैसा विकास सिंधुघाटी की सभ्यता में हुआ, वैसा आर्यों की सभ्यता के दौरान नहीं। आर्य तो प्रारम्भ में कृषि से अधिक महत्व पशुचारण को ही देते थे। आरम्भिक काल में पशुपालन ही उनके आर्थिक जीवन का मुख्य आधार था। बाद में यद्यपि कृषि, उद्योग-धंधों और सीमित तौर पर व्यापार-वाणिज्य की भी प्रगति हुई, तथापि इस संदर्भ में आर्य सिन्धुवासियों से बहुत पीछे थे। स्पष्टतः जहाँ सिन्धुघाटी की अर्थव्यवस्था का स्वरूप नागरिक था, वहीं आर्यों की सभ्यता का आर्थिक स्वरूप ग्रामीण था।

  5. पाषाण एवं धातुओं के उपयोग में अन्तर-

    सिन्धुघाटी की सभ्यता धातु-प्रस्तरयुगीन सभ्यता थी। अतः, इस अवधि के दौरान धातुओं के साथ-साथ पत्थरों का भी व्यवहार उपकरणों के लिए किया जाता था, परन्तु वैदिक आर्य पत्थरों का व्यवहार उपकरणों के रूप में नहीं करते थे। सिन्धुवासी मुख्यतः काँसा का व्यवहार करते थे। इसलिए सिन्धुघाटी की सभ्यता कांस्ययुगीन सभ्यता भी कही जाती हैं काँसे के अतिरिक्त वे सोना, चाँदी और ताँबा से भी परिचित थे, परन्तु लोहे का ज्ञान उन्हें नहीं था। वैदिक आर्य इन धातुओं के अतिरिक्त लोहे के ज्ञान से भी परिचित थे (उत्तर-वैदिक युग से) लोहे का प्रयोग इस समय बड़े पैमाने पर युद्ध के अत्रों एवं घरेलू उपकरणों में होता था। जीवन में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया।

  6. युद्ध के प्रति दृष्टिकोण में अन्तर-

    सिन्धु-सभ्यतावासी और आर्यों का युद्ध के प्रति दृष्टिकोण एक-दूसरे से भिन्न था। सिन्धुवासी शांतिप्रिय और युद्ध से अलग रहने वाले थे। इसीलिए उत्खननों के दौरान सैंघव-स्थलों से युद्ध के अस्त्र-शस्त्र नहीं के बराबर मिले हैं, जबकि अन्य घरेलू उपकरणों की भरमार है। आर्यों का जीवन-दर्शन दूसरा था। युद्ध उनके लिए आवश्यक था। वे बराबर युद्धों में संलग्न रहते थे। ऋग्वेद में आर्यों के प्रमुख देवता इंद्र के युद्ध-कौशल की प्रशंसा की गई है। उसने अनेक किलों और नगरों को नष्ट किया। आर्यों को आपसी युद्धों के अतिरिक्त अनार्यों से भी युद्ध करना पड़ा। दस राजाओं के युद्ध और भरत-युद्ध के वर्णन से युद्ध की विभीषिका का अंदाज लगाया जा सकता है। वैदिक साहित्य में कंवच, शिरस्राण आदि का उल्लेख मिलता है। इस काल में (उत्तर-वैदिककाल) कुरु-पांचाल-क्षेत्र से लोहे के बने युद्ध के हथियार पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हुए हैं।

  7. रथ एवं घोड़े के व्यवहार में विभेद-

    युद्ध में आर्यों को मुख्यतः रथ और घोड़ों का सहारा लेना पड़ता था। इसी की मदद से वे अपने विरोधियों और प्रतिद्वंद्वियों पर आसानी और तेजी से विजय प्राप्त कर सके। सिन्धुनिवासी रथ और घोड़े के व्यवहार से अपरिचित थे (घोड़े के ज्ञान के संदिग्ध प्रमाण कुछ सिन्धुस्थलों से मिले हैं) सिन्धुवासी घोड़े द्वारा खींचे जाने वाले रथों की अपेक्षा बैलगाड़ियों से परिचित थे, जो उनके आवागमन एवं सामान ढोने का एक मुख्य माध्यम था।

  8. लिपि के व्यवहार में अन्तर-

    सिन्धु-सभ्यता और आर्यों की सभ्यता में एक महत्वपूर्ण विभेद यह था कि सिन्धुवासी लेखन-कला (लिपि) से परिचित थे। उत्खननों के दौरान मुहरों पर उत्कीर्ण अनेक लेख मिले हैं, जिन्हें अभी तक संतोषपूर्ण ढंग से पढ़ा नहीं जा सका है। इस लिपि में करीब 400 चिन्ह हैं। लिपि सामान्यतः दाएँ से बाएँ की तरफ लिखी जाती थी। इसके विपरीत यद्यपि आर्य-सभ्यता के दौरान अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई (वैदिक साहित्य), तथापि आर्य इस समय तक लेखन-कला से परिचित नहीं थे। आर्य मौखिक शिक्षा देते थे। उनके ग्रंथ बहुत बाद में लिखे गए।

  9. धर्म-संबंधी अंतर-

    सिंधु-सभ्यता और आर्यों की सभ्यता में धार्मिक विभेद भी पाए जाते हैं। यद्यपि आर्यों के देवतागण मानवोचित गुणों से परिपूर्ण थे, तथापि आर्य मूर्तिपूजक नहीं थे। सिन्धुवासी मूर्तियों की पूजा करते थे। सिन्धुवासियों के बीच देवी को देवता से अधिक महत्व प्राप्त था। वहाँ की प्रमुख अधिष्ठात्री देवी मातृदेवी थीं। अन्य देवताओं में शिव की पूजा, लिंग और योनि की पूजा नाग की पूजा प्रमुख थी। इसके विपरीत आर्यों के प्रारम्भिक देवताओं में इन्द्र, वरुण, अग्नि, मिस्र, इत्यादि प्रमुख थे। देवियों में ऊषा एवं अदिति प्रधान थीं। बाद में शिव (रुद्र), विष्णु और प्रजापति प्रधान देवता बन गए। आर्य लिंगपूजा को घृणा की दृष्टि से देखते थे। आर्यों की पूजा-पद्धति भी सिन्धुवासियों से भिन्न थी। वे मंत्रों, यज्ञों और बलियों के द्वारा देवता को प्रसन्न करने का प्रयास करते थे।

  10. अन्य प्रमुख अंतर-

    इन विभेदों के अतिरिक्त दोनों सभ्यताओं में अन्य विभिन्नताएँ भी देखी जा सकती हैं। उदाहरण के लिए, सिन्धुनिवासी भवन-निर्माण कला, मूर्तिकला, मिट्टी के बरतन, खिलौने, मनके, ताम्रपत्र आदि बनाने की कला में बहुत अधिक प्रवीण थे, परन्तु आर्यों की कला उतनी विकसित नहीं थी। कला के क्षेत्र में सिन्धुवासियों से बहुत पीछे थे। सिन्धु-सभ्यता में कूबड़दार साँढ़ और बैल का अधिक महत्व था, परन्तु आर्य गाय को विशेष महत्व देते थे। सिन्धु-सभ्यतावासी घर के अन्दर होने वाले आमोद-प्रमोदों में विशेष दिलचस्पी लेते थे, परन्तु आर्य शिकार और घुड़दौड़ के प्रिय थे। सिन्धुवासी मुख्यतः गेहूँ और जौ का व्यवहार करते थे, परन्तु आर्य चावल और दूध का विशेष व्यवहार करते थे। आर्य सोमरस भी पीते थे, जिसका ज्ञान संभवतः सिन्धुवासियों को नहीं था। सिन्धुवासी पेड़-पौधों की भी पूजा करते थे, परन्तु आर्य ऐसा नहीं करते थे। सिन्धुवासी अपने मृतकों के संस्कार के लिए विभिन्न पद्धतियाँ अपनाते थे, परन्तु वैदिक आर्य अपने मृतकों का दाह-संस्कार ही करते थे।

इस प्रकार, सिन्धुघाटी की सभ्यता और वैदिक सभ्यता में कुछ ऊपरी समानताओं के बावजूद महत्वपूर्ण विभेद दिखाई पड़ते हैं। दोनों सभ्यताओं का मूल स्वरूप एक-दूसरे से भिन्न था। जहाँ सिंधुघाटी की सभ्यता नागरी सभ्यता (urban civilization) थी, वहीं वैदिक सभ्यता ग्रामीण सभ्यता यही दोनों सभ्यताओं में प्रमुख अंतर है।

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