हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित प्रमुख स्थल

हड़प्पा सभ्यता से सम्बन्धित प्रमुख स्थल

आम धारणा यह है कि सिंधुघाटी की सभ्यता में सिर्फ नगर ही थे, परंतु ऐसा सोचना भ्रामक होगा। सिंधु-सभ्यता से संबद्ध सैकड़ों स्थलों में कुछ नगर, बड़े ग्राम एवं कस्बे थे। कस्बें या ग्रामों की संख्या निश्चित रूप से नगरों से अधिक थी। कुछ नगर बंदरगाह के रूप में भी विकसित हुए। इस सभ्यता के समस्त क्षेत्र पर नियंत्रण रखने के लिए संभवतः एक से अधिक राजधानियाँ या प्रशासनिक केंद्र भी थे। यहाँ संक्षेप में इस सभ्यता से संबद्ध स्थलों का परिचय प्राप्त करना आवश्यक है।

हड़प्पा

यह स्थान मुलतान (पाकिस्तान) जिले में रावी नदी के किनारे है। सबसे पहले इसी स्थल की खुदाई से सिंधुघाटी की सभ्यता प्रकाश में आई। यहाँ की खुदाई से नगर-निर्माण-योजना तथा सभ्यता के अन्य पहलुओं के विषय में जानकारी मिलती है। यहाँ अत्रागार पाए गए हैं। हड़प्पा करीब 5 किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत था। हड़प्पा से गढ़ी और निचले नगर की योजना प्रकाश में आई है। गढ़ी के निर्माण में मिट्टी और कच्ची ईंटों का व्यवहार हुआ है। इसका मुख्य प्रवेशद्वार उत्तर की ओर था। गढ़ी के निकट कारीगरों की बस्ती और भट्ठियाँ मिली हैं।

मोहनजोदड़ो

इसे ‘मृतकों का टीला’ भी कहा जाता है। यह स्थान भी पाकिस्तान के लरकाना (सिंध) जिले में स्थित है। यह सिंधु नदी के पूर्वी किनारे पर बसा हुआ था। यह हड़प्पा से 483 किलोमीटर की दूरी पर स्थित था तथा सिंधु नदी द्वारा हड़प्पा से जुड़ा हुआ था। यह नगर करीब ढाई किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ था। यहाँ की जनसंख्या लगभग 35,000 थी। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि इस नगर की जनसंख्या एक लाख के लगभग थी। यहाँ का सबसे प्रमुख भवन विशाल स्नानागार है। यहाँ भी गढ़ी और पक्की ईंटों से बना एक बुर्ज मिला है। यहाँ से अन्नागार और अन्य भवनों के अवशेष भी पाए गए हैं।

चन्हुदाड़ो

यह मोहनजोदड़ो से दक्षिण-पूर्व में करीब 130 किलोमीटर की दूरी पर सिंधु नदी के किनारे स्थित है। यह स्थल भी सिंध (पाकिस्तान) में है। यहाँ से पकाई गई ईंटों के भवन एवं मनके बनाने का कारखाना प्रकाश में आया है। सिंधु संस्कृति के अतिरिक्त चन्हुदाड़ों से झूकर और झांगर संस्कृति के पुरावशेष भी मिले हैं यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तन और अन्य उपकरण हड़प्पा-मोहनजोदड़ो के सदृश है।

लोथल

लोथल हड़प्पा-संस्कृति का एक प्रमुख स्थल माना जाता है। यह गुजरात में खंभात की खाड़ी के समीप स्थित है। इस स्थल की खुदाई श्री एस० आर० राव ने करवाई है। इस स्थल की खुदाई से अनेक भवनों एवं दुकानों के भग्नावशेष प्रकाश में आए हैं। यहाँ । एक गोदीबाड़ा का भी प्रमाण मिलता है। जान

कालीबंगा

यह स्थान राजस्थान के गंगानगर जिले में स्थित है। यह प्राचीन शहर सरस्वती नदी (घग्गर) के किनारे बसा हुआ था। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि हड़प्पा और मोहनजोदाड़ों की ही तरह कालीबंगा भी ‘सैंधव साम्राज्य’ की तीसरी राजधानी थी। यहाँ लकड़ी से बनी नालियों के अवशेष मिल हैं, जो अन्यत्र नहीं पाए जाते।

वणवाली

यह हरियाणा राज्य के हिसार जिले में स्थित है। 1973-74 में यहाँ उत्खनन करवाए गए, जिनसे किलेबंदी तथा हड़प्पा-संस्कृति के नागरिक स्वरूप का प्रमाण मिलता है। यहाँ से मिट्टी के बर्तनों के अतिरिक्त ताम्र उपकरण, वाणाग्र, मनके, मृणमूर्तियाँ, बाट-बटखरे और लिपियुक्त मुहर मिली है।

उपर्युक्त वर्णित प्रमुख नगरों के अतिरिक्त हड़प्पा संस्कृति के अन्य स्थल भी बलूचिस्तान (सुत्कगेनडोर, डाबरकोट), सिंध (कोटदीजी), पंजाब (रोपड़, बाड़ा, संघोल), हरियाणा (राखीगढ़ी, मीत्ताथल), उत्तर प्रदेश (आलमगीरपुर, बड़गाँव, अम्बखेड़ी), गुजरात (रंगपुर, रोजदि, सुरकोटड़ा, मालवण) से प्रकाश में आए हैं।

सुत्कगेनडोर

यह स्थल कराची से लगभग 480 किलोमीटर पश्चिम तथा बलूच-मकरान समुद्र तट से 56 किलोमीटर उत्तर में दाश्त नदी के पूर्वी किनारे पर बसा हुआ था। यहाँ से एक बंदरगाह, दुर्ग और नगर योजना के प्रमाण मिले हैं। जार्ज डेल्स ने यहाँ सिंधु सभ्यता के तीन चरण पाए। उनका अनुमान था कि यह स्थान एक बंदरगाह के रूप में सिंधु सभ्यता और बेबीलोन के बीच सामुद्रिक व्यापार में प्रमुख भूमिका निभाता था।

डाबरकोट

यह स्थल सिंधु नदी से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर लोरालाई के दक्षिण झोब घाटी में अवस्थित है। यह कांधार जानेवाले व्यापारिक मार्ग पर पड़ता है। इसलिए इसका प्राचीन काल में भी महत्व था। आरंभिक सर्वेक्षण के दौरान इस स्थल से सिंधु संस्कृति के अतिरिक्त इसके पूर्व और बाद की संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं। इस स्थल के उत्खनन से हड़प्पा संस्कृति के उद्गम पर भी प्रकाश पड़ता है।

कोटदीजी

यह स्थल सिंध में खैरपुर से दक्षिण और मोहनजोदड़ो से करीब 40 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। यहाँ से ‘कोटदीजी संस्कृति’ के अतिरिक्त हड़प्पा संस्कृति के भी प्रमाण मिले हैं। मकान की नींव पत्थर की बनी हुई थी और दीवारें कच्ची ईंटों की। यहाँ से बड़ी संख्या में वाणाग्र मिले हैं जो अन्य स्थलों से नहीं मिलते।

रोपड़

रोपड़ आधुनिक भारत के पंजाब में शिवालिक पहाड़ी की उपत्यका में है। यह स्थल सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यहाँ से हड़प्पा संस्कृति के दो चरण मिले हैं। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के समान मिट्टी के बर्तन, कांचली मिट्टी एवं अन्य प्रकार के आभूषण, ताम्र कुल्हाड़ी एवं एक मुहर यहाँ से मिली है। भवनों के निर्माण में कच्ची ईंटों का व्यवहार देखने को मिलता है।

बाड़ा

यह स्थल भी रोपड़ के निकट ही है। यहाँ के अवशेष ह्रासोन्मुख हड़प्पा संस्कृति के परिचायक हैं। मिट्टी के कुछ बर्तन कोटदीजी और कालीबंगा के हड़प्पा-पूर्व संस्कृति से मिलते है।

संघोल

यह स्थान चंडीगढ़ से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ के निम्न स्तरों से सिंधु सभ्यता के अवशेष मिले हैं। ये अवशेष सिंधु सभ्यता के अंतिम चरण के हैं। मकान की दीवारें कुटी हुई मिट्टी और कच्ची ईंटों की बनी थीं। यहाँ बाड़ा और रापड़ की हड़प्पा संस्कृति से मिलते-जुलते तत्व पाए गए हैं।

राखीगढ़ी

यह स्थान जींद के निकट है। यहाँ से हड़प्पापूर्व और हड़प्पाकालीन पुरावशेष मिले हैं। यहाँ से एक लिपिबद्ध मुहर भी मिली है।

मीत्ताथल

यह स्थल भिवानी के निकट है। यहाँ से हड़प्पा संस्कृति के दो चरण के  प्रमाण मिलते हैं- विकासशील और पतनोन्मुख। प्रथम चरण में सुनियोजित नगर विन्यास, गढ़ी और निचले नगर की योजना दिखाई देती है। दूसरे चरण में निर्माण के लिए पुराने और खंडित ईंटों का व्यवहार हुआ। सिंधु सभ्यता के विशिष्ट बर्तन, ताम्र उपकरण, आभूषण, खिलौने इत्यादि भी यहाँ से मिले है।

आलमगीरपुर

आलमगीरपुर गंगा-यमुना दोआब में पहला स्थल था यहाँ से हड़प्पाकालीन अवशेष प्रकाश में आए थे। यह स्थान मेरठ के निकट हिण्डन नदी (यमुना की सहायक नदी) के तट के निकट है। यहाँ से सिंधु प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। प्राप्त सामग्री पतनोन्मुख हड़प्पा सभ्यता का संकेत देती है।

बड़गाँव और अम्बखेड़ी

विगत वर्षों में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिला में बड़गाँव और अम्बखेड़ी से भी सैंधव सभ्यता के अवशेष मिले हैं। बड़गाँव यमुना की सहायक नदी मस्करा के तट पर अवस्थित है। यहाँ से मिट्टी के बर्तन, काँचली मिट्टी की चूड़ी तथा ताँबे का एक छल्ला मिले हैं जो सिंधु सभ्यता के बर्तनों के सदृश हैं।

रंगपुर

आधुनिक गुजरात में भी अनेक हड़प्पाकालीन स्थल उत्खननों से प्रकाश में आए हैं। लोथल के अतिरिक्त रंगपुर एक प्रमुख स्थल था। रंगपुर लोथल से लगभग 50 किलोमीटर उत्तर-पूर्व और अहमदाबाद के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह भादर नदी के किनारे बसा हुआ था। रंगपुर के उत्खननों से हड़प्पा संस्कृति के हास के विषय में जानकारी मिलती है। एस० आर० राव के अनुसार रंगपुर में सिंधु सभ्यता का उदय लोथल के बाद हुआ। इसकी स्थापना संभवतः लोथल से आए बाढ़ पीड़ित लोगों द्वारा हुई। रंगपुर से विकसित एवं पतनोन्मुखी हड़प्पा सभ्यता के साक्ष्य मिलते हैं। यहाँ से विशिष्ट प्रकार के इमारत, नालियाँ, कच्ची ईंटों के सुरक्षा दुर्ग, मिट्टी के बर्तन, आभूषण इत्यादि मिले हैं, परंतु मातृदेवी की मूर्तियाँ और मुहर नहीं मिले हैं।

रोजदि

यह स्थल भादर नदी के किनारे राजकोट से दक्षिण में स्थित है। सुरक्षा के उद्देश्य से यहाँ के मकानों को पत्थर की दीवारों से घेर दिया गया था। सिंधु सभ्यता में इस प्रकार की घेराबंदी अन्यत्र नहीं मिलती। यहाँ से मिट्टी के बर्तन, आभूषण इत्यादि मिले हैं। यहाँ से भीषण अग्निकांड के प्रमाण भी मिले हैं।

सुरकोटड़ा

यह स्थान कच्छ जिला में स्थित है। यहाँ से गढ़ी और आवासीय मकान मिले हैं। भवन-निर्माण में कच्ची ईंटों के व्यवहार के प्रमाण मिले हैं। सिंधु सभ्यता के सदृश मिट्टी के बर्तन, अस्थि-कलश तथा बड़ी चट्टान से ढंकी एक कब्र यहाँ से मिली है। यहाँ भी अग्निकांड का प्रमाण मिला है।

मालवण

मालवण काठियावाड़ के सूरत जिला में है। यह स्थान ताप्ती नदी के मुहाने पर है। यह भी सिंधु सभ्यता का एक बंदरगाह था। यहाँ से सिंचाई के लिए एक नहर, कच्ची ईंटों का चबूतरा, मिट्टी के बर्तन इत्यादि पाए गए हैं।

हड़प्पा संस्कृति से संबंधित स्थलों के आधार पर इस संस्कृति का विस्तार निश्चित किया जा सकता है। प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर यह माना जाता है कि जम्मू (मांडा) इस सभ्यता की उत्तरी; आलमगीरपुर, बड़गाँव और अम्बखेड़ी (उ० प्र०) पूर्वी, दैमाबाद (महाराष्ट्र) दक्षिणी तथा सुत्कगेनडोर (बलूचिस्तान) पश्चिमी सीमा थी। उत्तर-पश्चिम में इस सभ्यता का प्रसार रहमान ढेड़ी (गोमलघाटी) तक था।

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