नेहरू का अन्तर्राष्ट्रीयतावाद, युद्ध, शान्ति और तटस्थता पर विचार

नेहरू और अन्तर्राष्ट्रीयतावाद

जवाहरलाल नेहरू और अन्तर्राष्ट्रीयतावाद

(Nehru and Internationalism)

नेहरू का राष्ट्रवाद जब संकीर्ण और अनुदार नहीं था तो इसका स्वाभाविक अर्थ है कि नेहरू अन्तर्राष्ट्रीयतावाद के पोषक थे। उन्होंने अपने देश को, काँग्रेस को और सम्पूर्ण मानव समाज को एक व्यापक अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रदान किया। उन्होंने काँग्रेस को महसूस कराया कि स्वतन्त्रता के लिए भारतीय संघर्ष वास्तव में एक वैश्विक संघर्ष का भाग था, तथा अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं को ध्यान में रखते हुए इसे सफल बनाया जा सकता था। वस्तुतः “विश्व शान्ति और विश्व सम्प्रदाय के विचार में नेहरू का बड़ा विश्वास था। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य-पत्र के प्रति जितनी आस्था दिखाई उतनी शायद ही किसी और ने दिखाई हो ।” अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में नेहरू जी की धारणा थी कि “हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जबकि विदेशी मामलें जैसा शब्द ही अप्रासंगिक है। हम एक-दूसरे पर अधिकाधिक अवलम्बित होते जा रहे हैं। जगत् में हम इस देश और उस देश जैसे संकीर्ण दृष्टिकोण के स्थान पर विश्व के दृष्टिकोण को अपना रहे हैं। संकीर्ण राष्ट्रीयता भी राजनीतिक कट्टरता का एक रूप है। उनका विश्वास था कि युद्ध अवश्यम्भावी नहीं है और न शान्ति ही अव्यावहारिक है। इसलिए उन्होंने गुटों से अलग रहने की नीति को अपनाया।” पर गुटों से अलग रहने की नीति से नेहरू का आशय यह नहीं था कि “पृथक्कतावाद’ के मार्ग पर चला जाय। संसार में शान्ति की स्थापना के लिए नेहरू भारत को अपनी शक्ति भर विश्व के मामलों में सहायक बनाना चाहते थे। अन्तर्राष्ट्रीयता के प्रोत्साहन के लिए वे प्रत्येक सम्भव उपाय करने को तत्पर थे।

नेहरू का हृदय सर्वोदय की भावना से परिपूर्ण था। वे कहा करते थे-हम सबके मित्र हैं और हमारा कोई शत्रु नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीयता में उनकी आस्था से सभी छोटे-बड़े देश अवगत थे। जून, 1955 में मास्को विश्वविद्यालय ने उनका अभिनन्दन करते हुए कहा था कि नेहरू ने सदैव छोटे और बड़े राष्ट्रों के मूल अधिकारों की मान्यता के लिए अन्तर्राष्ट्रीय नियमों और सिद्धान्तों की रक्षा की है और वे एशिया तथा विश्व में तनाव को कम करने के लिए सच्चे दिल से प्रयत्नशील रहे। नेहरू को अन्तर्राष्ट्रीयता की प्रेरणा विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और महात्मा गाँधी जैसे महान् व्यक्तियों से प्राप्त हुई थी। गाँधी की भाषा में बोलते हुए नेहरू ने कहा था-“मेरी राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीयता पर आधारित है और आधुनिक विश्व, विज्ञान, व्यापार और यातायात के साधनों के कारण अन्तर्राष्ट्रीयता की नींव पर खड़ा है। कोई भी राष्ट्र विश्व से विमुख नहीं रह सकता ।” पर, नेहरू की यह भी स्पष्ट मान्यता थी कि अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना सिर्फ एक स्वतन्त्र देश में ही पनप सकती है, और उसकी वजह यह है कि किसी भी गुलाम देश का सारा दिमाग और सारी ताकत आजादी पाने की कोशिश में लगी रहती है।

नेहरू महान् अन्तर्राष्ट्रीयतावादी थे। न केवल राजनीतिक क्षेत्र में वरन् आर्थिक क्षेत्र में भी उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीयतावादी आदर्श का समर्थन किया। उनका कहना था कि “शायद जिस चीज को भली-भाँति नहीं समझा जाता वह उद्योगवाद का अन्तर्राष्ट्रीय स्वभाव है। उसने राष्ट्रीय सीमाओं को ध्वस्त कर दिया है और हर राष्ट्र को, वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, दूसरे देशों पर आश्रित बना दिया है। राष्ट्रवाद की भावना आज भी लगभग उतनी ही प्रबल है जितनी कि पहले थी, और उसके पवित्र नाम पर युद्ध लड़े गये हैं तथा दसियों लाख लोगों की हत्या की गई है, किन्तु वह एक मिथ्या विश्वास है जिसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। विश्व का अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो चुका है, उत्पादन अन्तर्राष्ट्रीय है, बाजार अन्तर्राष्ट्रीय है तथा परिवहन अन्तर्राष्ट्रीय है। केवल मनुष्य के विचारों पर उन मदमातों का शासन है जिनका आज कोई अर्थ नहीं रह गया है, कोई राष्ट्र वास्तव में स्वाधीन नहीं है, सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं।”

नेहरू का अन्तर्राष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण कोरा आदर्शवादी नहीं था। उन्होंने उसे व्यवहार में लागू करना चाहा। ज्यों-ज्यों उनकी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति बढ़ती गई, वे अन्तर्राष्ट्रीय विचारों को मूर्त रूप देते गये। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में राज्यों के आचरण का एक नया मौलिक सिद्धान्त दिया जो ‘पंचशील’ के नाम से विख्यात है। इसमें

निम्नलिखित पाँच सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये-

  1. एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और सर्वोत्तम सत्ता के लिए पारस्परिक संबंध
  2. अनाक्रमण,
  3. एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप,
  4. समानता और पारस्परिक लाभ, एवं
  5. शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व तथा आर्थिक सहयोग ।

विश्व के लगभग सभी राज्यों ने (अपवाद स्वरूप कुछ राष्ट्रों को छोड़कर) पंचशील के सिद्धान्तों में आस्था प्रकट की। पंचशील द्वारा नेहरू ने स्पष्ट कर दिया कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में वे नैतिक मार्ग का अनुसरण करने में विश्वास करते हैं। इस सिद्धान्त द्वारा उन्होंने मेकियावलीय राजनीति और शक्ति राजनीति में अपनी अनास्था प्रकट की और राष्ट्रों के मस्तिष्क में यह बात बैठाने की कोशिश की कि यदि अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र से इम बल प्रयोग को पूरी तरह बहिष्कृत नहीं कर सकते तो उसे न्यूनतम अवश्य ही कर सकते हैं। पंचशील के सिद्धान्त के मूल में धारणा यह रही कि राष्ट्र एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयल करें और एक दूसरे के अधिकारों तथा दावों का शान्तिपूर्वक और सच्चाई के साथ मूल्यांकन करें। किन्तु “नेहरू किसी भी रूप में शक्ति के सामने झुकने को तैयार नहीं थे। फिर भी नेहरू के कुछ आलोचकों का कहना था कि कश्मीर, गोआ, पाकिस्तान तथा तिब्बत के सम्बन्ध में नेहरू का नैतिक और मानवतावादी अन्तर्राष्ट्रीयवाद विकृत होकर तुष्टिकरण की नीति में परिवर्तित हो गया।’ कतिपय राजनीतिक क्षेत्रों में भारत पर पाकिस्तान और चीन के आक्रमण के आधार पर पंचशील सिद्धान्त की व्यावहारिकता को चुनौती दी गई है। लेकिन हम इस सिद्धान्त को गलत या अनुचित नहीं ठहरा सकते। सत्य बोलना अच्छा है पर यदि हम सत्य के सिद्धान्त पर आचारण न करें। तो इसमें सिद्धान्त का क्या दोष ? क्या हम इस तथ्य से इन्कार कर सकते हैं कि आज के आणविक युग में शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जिससे मानव सभ्यता की रक्षा हो सकती है। पंचशील कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसके उल्लेख मात्र से कलह, संघर्ष और अन्तर्राष्ट्रीय तनाव दूर हो जाएँगे। परन्तु यदि पंचशील के सिद्धान्तों पर ईमानदारी से अमल किया जाए तो अन्तर्राष्ट्रीय तनावों में निश्चित रूप में कमी होगी और संघर्ष के कारणों का उन्मूलन भी किया जा सकेगा।

युद्ध, शान्ति और तटस्थता (असंलग्नता) पर नेहरू के विचार

नेहरू ने युद्ध का तिरस्कार करते हुए विश्व-शान्ति को मानव-कल्याण का एकमात्र मार्ग बताया अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में उन्होंने अपने विचारों और कार्यकलापों से विश्व-शान्ति के प्रसार की दिशा में बड़ा प्रभावशाली और सराहनीय कार्य किया। इतिहास में नेहरू की गहरी रुचि थी। उन्होंने उन कारणों की खोज की जो युद्धों को जन्म देते हैं उनका कहना था कि किसी न किसी कारणवश हर देश, काल और परिस्थिति में युद्ध होते रहे। नेहरू ने युद्ध के कारणों और स्वरूप का जो चित्र खींचा वह संकेत रूप में इस प्रकार है-

  1. एक समय वह था जब मनुष्य की धर्मान्धता युद्ध का स्रोत थी। यूरोप के धर्म युद्ध (Crusades) इसके प्रमाण हैं। भारत पर मुस्लिम आक्रमण भी बहुत कुछ धार्मिक भावना से ही प्रेरित था । बहुत से यूरोपीय देशों में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक मतावलम्बियों के बीच जो संघर्ष हुए उनका स्वरूप भी धार्मिक ही थी।
  2. युद्धों का दूसरा स्वरूप सामन्तवादी रहा था। उदाहरणार्थ, भारत में राजपूत नरेशों के बीच होने वाले युद्ध ,अपने चरित्र में मुख्यतः सामन्तवादी ही थे।
  3. मानव इतिहास में प्रत्येक युग में राजनीतिक सत्ता और गौरव के लिए युद्ध होते रहे हैं तथा आज भी हो रहे हैं।
  4. युद्धों का एक स्वरूप राजनीतिक भी रहा है। उदाहरणार्थ, सिकन्दर महान् की विजय का स्वरूप धार्मिक या आर्थिक अथवा सामंतवादी न होकर राजनीतिक ही था। ऐथेन्स और स्पार्टा के बीच जो युद्ध हुए वे भी अपने चरित्र में विशेष रूप से राजनीतिक ही थे।
  5. वर्तमान युग में युद्धों का कारण प्रधानतः आर्थिक है। यद्यपि राजनीतिक तथा अन्य कारण भी पर्याप्त प्रभावकारी हैं तथापि आर्थिक कारणों के समक्ष अन्य सभी कारण गौण हैं। राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद आर्थिक परिस्थितियों से जितने प्रभावित रहे हैं, उतने अन्य किसी कारण से नहीं।
  6. युद्धों का एक महत्वपूर्ण कारण विभिन्न राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच उपस्थित वैचारिक मतभेद हैं। इन वैचारिक और सैद्धान्तिक मतभेदों के फलस्वरूप ही शीतयुद्ध इतना प्रबल है कि वह कभी भी सशस्त्र युद्ध का रूप ले सकता है। नेहरू ही के शब्दों में, “शीत युद्ध का अभिप्राय सदैव युद्ध का चिन्तन करना है, युद्ध की तैयारी करना है जो गर्म युद्ध की विद्यमानता है।”

नेहरू ने युद्ध के कारणों और इतिहास का विवेचन करते हुए अपना यह विश्वास व्यक्त किया कि चाहे कुछ व्यक्ति युद्ध के अभिलाषी हों लेकिन वास्तव में कोई भी राष्ट्र युद्ध नहीं चाहता। नेहरू ने कहा कि विभिन्न राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं वाले देश परस्पर शान्ति और सहयोग से न रह सकें इसका कोई तर्कसंगत कारण नजर नहीं आता। विभिन्न राष्ट्रों में शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना मुख्यतः इसलिए नहीं पनप पाती कि प्रत्येक राष्ट्र के मन में दूसरे राष्ट्र के प्रति सन्देह और भय है। यदि हम इस भय, संदेह और घृणा का परित्याग कर दें तो शान्ति का वातावरण बनने में निश्चय ही सहयोग मिलेगा। नेहरू ने आग्रह किया कि संसार के सभी राष्ट्र एक दूसरे को समझने का प्रयास करें और अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों का निर्णय शक्ति के स्थान पर वार्ता तथा पंच निर्णय के शान्तिपूर्ण उपायों से किया जाए। नेहरू ने युद्धों की निरर्थकता में विश्वास प्रकट करते हुए संविधान सभा में अपने एक भाषण में कहा कि दास्तव में इस बात का कोई महत्व नहीं है कि विश्व-युद्ध में विजय किसकी होती है क्योंकि ऐसे किसी भी युद्ध का परिणाम ऐसा घोर विनाश होगा जिसमें उन सभी बातों का अन्त होगा जिन्हें हम मानवता की उन्नति और प्रगति के लिए आवश्यक मानते हैं। नेहरू की निश्चित धारणा थी कि युद्ध-नीति से साम्राज्यवादी प्रभुत्व और शासक जाति के विचारों को सहारा मिलता है। अपनी शान्तिवादी नीति के कारण ही नेहरू ने अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में गुटों से अलग रहने की नीति को स्वतन्त्र भारत की विदेश नीति की आधारशिला बनाया। उनका विश्वास था कि तटस्थता अथवा असंग्लनता की नीति पर चलकर ही अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को कम किया जा सकता है, सहयोग का वातावरण उत्पन्न कर संसार में शान्ति स्थापित करने की दिशा में ठोस योग दिया जा सकता है। नेहरू ने स्पष्ट शब्दों में कहा-“हमारी दृष्टि में शान्ति तथा स्वतन्त्रता अविभाज्य है और किसी भी स्थान में स्वतन्त्रता को दबाए जाने से दूसरे स्थान की स्वतन्त्रता को संकट उपस्थित हो जाता है और इसके परिणामस्वरूप मतभेद तथा युद्ध की स्थिति उत्पन्न होती है। औपनिवेशिक तथा पराधीन देशों एवं लोगों को मुक्त कराने और सिद्धान्त तथा व्यावहारिक रूप से सभी जाति के लोगों के लिए समान अवसरों को मान्यता देने में हमारी विशेष रुचि है। हम दूसरों पर शासन करना नहीं चाहते और न हम अन्य लोगों से अधिक ऊँचे स्थान को दावा करते हैं।”

नेहरू ने युद्ध और शान्ति के विषय में जो विचार प्रकट किए, शान्तिपूर्ण सहसस्तित्व और असंलग्नता की नीति की वकालत की, उससे हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि वे एक ऐसे शान्तिवादी थे जो शस्त्रों के प्रयोग को हर परिस्थिति में ठुकराने का उपदेश देते थे। नेहरू का आदर्शवाद यद्यपि बहुत ऊँचा था लेकिन एक यथार्थवादी राजनीतिज्ञ के रूप में उन्होंने अवसर पड़ने पर शत्रु का अथवा विद्रोह का यथासम्भव अपनी सम्पूर्ण शक्ति से मुकाबला करने में विश्वास प्रकट किया। पाकिस्तानी आक्रमण का, चीनी आक्रमण का मुकाबला करने में नेहरू ने जिस नीति का और जिस दृढ़ता का परिचय दिया वह हम भुला नहीं सकते। नेहरू ने एक ओर तो सम्पूर्ण सैनिक शक्ति के बल पर आक्रामण का सामना किया और दूसरी ओर बुराई का प्रतिकार करने के लिए बुरे मार्ग का संहार नहीं लिया। उनका कोई भी कदम नैतिकता से गिरा हुआ नहीं रहा, उनकी निष्ठा समस्या के सम्मानपूर्ण और शान्तिपूर्ण समाधान में बनी रही। नेहरू की विचारधारा का सही चित्रण हमें उन्हीं के इन शब्दों से होता है कि “हमें अपनी रक्षा करनी है अपने आपको प्रत्येक संकटकालीन स्थिति के लिए तैयार रखना है। हमें आक्रमण और अन्य प्रकार के अनाचार का सामना करना है। बुराई के समाने झुकना सदा बुरा होता है किन्तु बुराई का प्रतिरोध करते समय हमें मस्तिष्क का सन्तुलन नहीं खो देना चाहिए और भावावेश तथा उत्तेजना में आकर या भयभीत होकर कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जो स्वयं बुरा हो। बुराई और आक्रमण का प्रतिरोध करते समय भी हमें सदैव शान्ति के स्वभाव को बनाए रखना चाहिए और अपने विरोधियों के सामने मित्रता का हाथ बढ़ाये रखना चाहिए।”

नेहरू ने ऐसी शान्ति का उपदेश कभी नहीं दिया जो हमें कर्त्तव्य से विमुख करती हो। उनका दृष्टिकोण कितना व्यावहारिक और सन्तुलित था-इसका आभास हमें नेहरू के उन शब्दों से होता है जो उन्होंने 12 जून, 1945 को भारत की शान्तिवादी नीति के सन्दर्भ में कहे थे-“हमारी पहली नीति तो यह होनी चाहिए कि हम ऐसी भीषण आपत्ति (तृतीय महायुद्ध जैसी) को घटित होने से रोकें। दूसरी नीति इससे बचने की होनी चाहिए और तीसरी नीति ऐसी स्थिति बनाने की होनी चाहिए कि यदि युद्ध छिड़ जाए तो हम इसे रोकने में समर्थ हो सकें।” इस सन्दर्भ में नेहरू की चिन्तन धारा का और भी स्पष्टीकरण हमें उनके भाषण के निम्नलिखित अवतरणों से होता है-

“प्रत्येक सरकार को देश की रक्षा के काम को सबसे अधिक महत्व देना चाहिए, किन्तु रक्षा से तात्पर्य क्या है ? अधिकाँश लोग समझते हैं कि रक्षा से हमारा मतलब असंख्य लोगों के बन्दूकें लिए हुए एक स्थान से दूसरे स्थान को आने-जाने से है। यह सच है कि सशस्त्र व्यक्ति तथा अस्त्र आदि रक्षा के अंग हैं, किन्तु रक्षा का सम्बन्ध अन्य अनेक चीजों से भी हो सकता है। इसके अन्तर्गत देश की औद्योगिक क्षमता, देश का नैतिक चरित्र आदि भी आते हैं। इन सबके और देश की क्षमता तथा संसाधनों के बीच सन्तुलन स्थापित करना होता है और आप इस सन्तुलन को बहुत अधिक अस्त-व्यस्त नहीं कर सकते ।”

पुनश्च, “हमें आक्रमण का सामना और प्रतिकार करना है तथा इसके लिए लगाई गई शक्ति पर्याप्त होनी चाहिए, किन्तु आक्रमण का सामना करने की तैयारी करते समय भी हमें अपना उद्देश्य-शान्ति-समझौता तथा मेल-मिलाप का उद्देश्य-कभी नहीं भुलाना चाहिए और हमारा हृदय तथा मस्तिष्क इसी महान् उद्देश्य की पूर्ति में लगा रहना चाहिए, न कि यह घृणा अथवा भय से घिरा हुआ अथवा आच्छादित रहे ।”

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