जवाहरलाल नेहरू का मानवतावाद एवं राष्ट्रवाद

जवाहरलाल नेहरू

नेहरू का मानवतावाद

(Nehru’s Humanism)

नेहरू एक राजनीतिज्ञ थे, लेकिन नैतिक आदर्शवाद में उनकी गहन आस्था जीवन भर बनी रही। पीड़ित और शोषित लोगों के प्रति उनके हृदय में अगाध प्रीति और सहानुभूति थी। “एक मानव के रूप में उनके चिन्तन में सुकुमारता, भावना की अद्वितीय कोमलता और महान् एवं उदार प्रवृत्तियों का अद्भुत सम्मिश्रण था।” नेहरू जीवन-पर्यन्त मानव जीवन के उच्चतर स्तरों के लिए संघर्षशील रहे। उनका सन्देश था कि व्यक्ति को व्यावहारिक और अनुभव प्रधान, नैतिक एवं सामाजिक, परोपकारी तथा मानवतावादी होना चाहिए। उनकी दृष्टि में मानवतावाद आधुनिक युग का सर्वोत्तम आदर्श होना चाहिए था। मेकियावेलीय राजनीति, शोषण, अनाचार और अभाव को देखकर उनके हृदय को गहरी वेदना पहुँचती थी। नेहरू का मानव-अस्तित्व और उसकी सत्ता में गहन विश्वास था। उनकी अनुभूति थी कि मनुष्य को आत्म-बलिदान की शक्ति अपने भीतर विद्यमान किसी दिव्य तत्व से प्राप्त होती है। वास्तव में यदि नेहरू की अनुभूति आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर मुड़ जाती तो वे एक बहुत बड़े योगी या सन्त होते।

नेहरू मनुष्य के गौरव में विश्वास करते थे, इसीलिए, परिस्थितियों के अनुकूल होते हुए भी, वे एक तानाशाह बन जाने के प्रलोभन से बचे रहे। वे लोकतान्त्रिक समाजवादी बने रहे, मानवीय मूल्यों में उनकी आस्था कभी नहीं डगमगाई और साम्यवाद के हिंसक तथा अनैतिक साधनों के प्रति उन्हें कभी कोई आकर्षण नहीं रहा। जीवन भर उन्होंने अन्याय और शोषण से यथाशक्ति संघर्ष किया। नेहरू के मानवतावादी सेवावृती जीवन का चित्रांकन करते हुए डॉ० राधाकृष्णन ने लिखा है-“उन्होंने जनता के जीवन में ही अपने जीवन को खपा दिया और उनके जीवन को समृद्ध तथा सम्पूर्ण बनाने का प्रयत्न किया। वे महान् आत्मा थे और असली महानता इसी बात को समझने में है कि व्यक्ति केवल अपने लिए पैदा नहीं होता बल्कि वह अपने पड़ोसियों तथा अपनी जनता के लिए भी होता है। नेहरू केवल देश के महान् मुक्तिदाताओं में ही नहीं थे बल्कि उसके महान् निर्माताओं में भी थे। उन्होंने अपने जीवन में लोगों की राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिए ही प्रयत्न नहीं किया बल्कि सामाजिक और आर्थिक उन्नति के लिए भी प्रयत्न किया। उन्होंने कभी अपने आराम का ख्याल नहीं किया, सम्पदा-धन का ख्याल नहीं किया।”

नेहरू की दृष्टि दूरगामी थी और अपने देश तथा विश्व की ऊँची नियति में उन्हें विश्वास था। जीवन-भर मानवता के लिए उन्हें गहरा स्नेह रहा । अन्धविश्वासों, धार्मिक संकीर्णताओं, ईष्या द्वेष आदि दुर्गुणों से वे सदैव मुक्त रहे। देश की राजनीतिक समस्याओं के लिए उन्होंने यथाशक्ति नैतिक सिद्धान्तों का उपयोग करने की कोशिश की। दीन-हीन जनता से उन्हें प्यार रहा।

जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रवाद

(NEHRU AND NATIONALISM)

जवाहरलाल नेहरू ने देश को एक सन्तुलित, संयमशील और आदर्श राष्ट्रवाद के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। राष्ट्रीयता सम्बन्धी उनकी मान्यता संकुचित नहीं थी। उनका कहना था कि मातृभूमि के प्रति भावुकता से भरे सम्बन्ध को ‘राष्ट्रीयता’ कहते हैं। उन्होंने कहा “हिन्दुस्तान मेरे खून में समाया हुआ है और उसमें बहुत कुछ ऐसी बात है जो मुझे स्वभावतः उकसाती है ।” पर मातृभूमि के प्रति नेहरू का प्यार अन्धा नहीं था। मानवता के कल्याण में नेहरू भारत के कल्याण का दर्शन करते थे। वे टैगोर के समयात्मक, विश्ववाद और विश्वबन्धुत्व की भावना से प्रभावित थे।

नेहरू का विचार था कि राष्ट्रीयता एक परम्परागत शक्ति है जिसे प्रत्येक देशवासी स्वेच्छा से स्वीकार करता है। लोगों को यह नहीं समझना चाहिए कि राष्ट्रीयता की भावनाएँ उन पर लादी जा रही हैं, क्योंकि राष्ट्रीयता तो वह गम्भीर और शक्तिशाली चीज़ है जो लोगों को आपस में जोड़े रहती है। राष्ट्रवाद को नेहरू ने एक भावात्मक वस्तु बताया और विश्वास प्रकट किया कि विदेशी शासन के दौरान राष्ट्रीयता की भावना अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है तथा राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिशील बनाए रखने के लिए शक्तिशाली प्रेरणा का काम करती है। जब कभी देश पर संकट उपस्थित होता है तो राष्ट्रवाद अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेता है।

नेहरू को धार्मिक राष्ट्रवाद की सहानुभूति न थी। दयानन्द, विवेकानन्द, पाल और अरविन्द के राष्ट्रवाद सम्बन्धी धार्मिक दृष्टिकोण में उन्हें कोई आकर्षण नहीं था। ‘धार्मिक राष्ट्रीयता’ की धारणा उन्हें बेहूदा लगती थी। जिन्ना ने धर्म को लेकर ‘मुस्लिम राष्ट्रीयता’ के लिए पैरवी की थी और इस आधार पर उन्होंने भारत से अलग एक ‘मुस्लिम राष्ट्रीयता’ की माँग की थी। नेहरू को यह जानकर दुःख हुआ था और तब उन्होंने कहा था कि “यदि राष्ट्रीयता का आधार धर्म है तो भारत में न केवल दो वरन् तमाम राष्ट्र मौजूद हैं। भारत की राष्ट्रीयता न हिन्दू राष्ट्रीयता है, न मुस्लिम, वरन् यह विशुद्ध भारतीय है।”

नेहरू यद्यपि संशयवादी थे, लेकिन अत्यधिक भावुक और संवेदनशील होने के नाते उन्हें भारत माता के रोमाँसपूर्ण आदर्श ने अत्यधिक प्रभावित किया। उनके लिए राष्ट्रवाद  वास्तव में आत्म-विस्तार का ही एक रूप था। उन्हीं के शब्दों में “राष्ट्रवाद तत्वतः अतीत  की उपलब्धियों, परम्पराओं और अनुभवों की सामूहिक स्मृति है, और राष्ट्रवाद जितना पाक्तिशाली आज है उतना कभी नहीं था। जब कभी संकट आया है, तभी राष्ट्रवादी भावना का उत्थान हुआ है और लोगों में अपनी परम्पराओं से शक्ति तथा सान्त्वना प्राप्त किया है। अतीत और राष्ट्र का पुनरान्वेषण वर्तमान युग की एक आश्चर्यजनक प्रगति है।

नेहरू ने राष्ट्रीय आत्म-निर्णय (National Self-determination) के सिद्धान्त पर अत्यधिक बल दिया और साम्राज्यवाद का प्रबल विरोध किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिए संघर्षशील देश में एक स्वस्थ शक्ति होती है, लेकिन देश के स्वतन्त्र हो जाने के बाद वही राष्ट्रीयता प्रतिक्रियावादी और विकीर्ण भी बन सकती है, अतः ऐसी संकीर्ण राष्ट्रीयता से सदैव बचना चाहिए। नेहरू ने राष्ट्रवाद में मानवता का समावेश किया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद के नाम पर धर्म, जाति और संस्कृति का सहारा नहीं लेना चाहिए। नेहरू ने एक सच्चे राष्ट्रवादी के रूप में हर देश की आजादी को समर्थन दिया। उन्होंने मित्र, मोरक्को, इन्डोनेशिया, अल्जीरिया, काँगो आदि देशों की आजादी के वास्ते हुए राष्ट्रीय आन्दोलनों का स्वागत किया। अरब राष्ट्रवाद के अभ्युदय को उन्होंने बहुत ही शुभ लक्षण बताया। उन्होंने कहा-“हर गुलाम देश के लिए राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत होना सर्वथा स्वाभाविक है।” पुनश्च, “एक पराधीन देश के लिए शान्ति का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि शान्ति तो स्वतन्त्रता के बाद ही स्थापित हो सकती है। इसलिए साम्राज्यों को मिटाना ही चाहिए। उनका जमाना बीत चुका है।” नेहरू ने राष्ट्रवाद के आदर्श रूप को ग्रहण किया और ऐसे राष्ट्रवाद को ठुकरा दिया जो अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति में बाधक हो तथा अपने स्वरूप में आक्रामक हो। उनका यह विश्वास आजीवन बना रहा कि उग्र राष्ट्रवाद मानव हृदय संकीर्ण बना देता है तथा देश-भक्ति की भावना को इतना उभार देता है कि देशों में अलग-अलग रहने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है। उग्र राष्ट्रवाद से जातीयवाद, राष्ट्रों के प्रति घृणा, साम्राज्यवाद, युद्धवाद आदि बुराइयों का जन्म होता है।

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