देतांत (तनाव शैथिल्य) का ह्रास तथा नये शीत युद्ध की उत्पत्ति

देतांत का ह्रास तथा नये शीत युद्ध की उत्पत्ति

1970 ई. के दशक का देतांत केवल दस वर्ष तक ही कार्यान्वित रहा। 1979 ई. में अफगानिस्तान में सोवियत संघ की भूमिका, सोवियत संघ के विरुद्ध सन्तुलन बनाए रखने के लिए अमरीका द्वारा चीन के साथ सम्बन्ध बनाने के प्रयत्नों तथा सम्बन्धों में विभिन्न दूसरे क्षेत्रों में असफलता से देतांत को गहरा धक्का लगा। परिणामस्वरूप देतांत काफी कमजोर हो गया। इस कारण दोनों महाशक्तियों ने कई ऐसे निर्णय लिए तथा कार्य किए जिन्होंने दीतां को बुरी तरह प्रभावित किया तथा इसके उद्देश्य को ही संकट में डाल दिया। सभी राज्यों तथा सम्बन्धों के सभी क्षेत्रों में दीतां के और प्रसार के लिए विश्व लोकमत को बिल्कुल दृष्टिविगत करते दोनों महाशक्तियों ने दुनिया के विभिन्न भागों में कई ऐसे कार्य किए जिससे फिर से शीत युद्ध शुरू हो गया- एक नया शीत युद्ध पहले से कहीं अधिक बड़ा तथा पहले से कहीं ज्यादा भयानक- अन्तः शक्तियों वाला शीत युद्ध।

बहुत से विद्वान् नए शीत युद्ध का प्रादुर्भाव 1978 ई. से मानते हैं जब इणियोपिया (Ethiopia) में सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को संयुक्त राज्य अमरीका ने विफल : गने का फैसला किया। संयुक्त राज्य के भूतपूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मि. वर्जेजन्सिकी ने अपनी पुस्तक ‘Power and Principle’ में लिखा कि 1078 ई. में संयुक्त राज्य अमरीका (USA) तथा सोवियत यूनियन (U.S.S.R.) में सम्बन्ध बिगड़ने शुरू हो गये थे। इथियोपिया में सोवियत संघ द्वारा क्यूबा के लोगों की नियुक्ति को पा ले तो अमरीका ने अनदेखा कर दिया परन्तु जब सोवियत संघ ने अमरीका के विरुद्ध अपनी सामरिक शक्ति को बढ़ाने के प्रयत्नों को जारी रखा तो रीगन प्रशासन ने सोवियत शक्ति पर रोक लगाने का फैसला किया। परिणामस्वरूप क्यूबा-सोवियत ब्रिगेड की स्थापना तथा SALT-II की असफलता से दीतां को गहरा धक्का लगा। बाद में (दिसम्बर 1979) अफगानिस्तान में सोवियत संघ का हस्तक्षेप तथा अमरीका की इसके विरुद्ध कड़ी प्रतिक्रिया ने दीतां के युद्ध को समाप्त प्रायः कर दिया तथा एक बार फिर अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में नया शीत युद्ध आरम्भ हो गया। 1980 के दशक में निम्नलिखित तथ्यों ने दीतां को समाप्त कर दिया तथा नये शीत युद्ध को पुनः आरम्भ कर दिया :

  1. राष्ट्रपति रीगन के अधीन संयुक्त राज्य की विदेश नीति में परिवर्तन
  2. अनुत्तरदायी सोवियत दृष्टिकोण
  3. सोवियत प्रभाव को नियन्त्रित करने के विचार से संयुक्त राज्य के पूर्वी यूरोप तथा चीन के साथ सम्बन्ध बनाने के प्रयत्न
  4. निकारागुआ, ऐल सैलवाडोर तथा ग्रेनाडा में संयुक्त राज्य की भूमिका
  5. अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप

(इन सभी तथ्यों के लिये नये शीत युद्ध की उत्पत्ति के शीर्षक के अधीन दिया गया ब्यौरा देखें।)

देतांत की समाप्ति तब आरम्भ हो गई जब दोनों महाशक्तियों ने एक बार फिर एक दूसरे के विरोध में अपनी शक्ति तथा नीतियों का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया।

सोवियत प्रभाव को विफल करने के लिए संयुक्त राज्य अमरीका की नीतियां

अमरीकी हितों तथा शक्ति के प्रति सोवियत संघ की चुनौती का सामना करने के लिये रीगन प्रशासन ने निम्नलिखित निर्णय किये-

  1. डियागो गारशिया को परमाणु अड्डा बनाकर तथा इसके साथ-साथ फारस की खाड़ी में अपनी सुरक्षा और प्रतिरक्षा को मजबूत बनाने तथा संगठित करने के लिए यहां अपना नौ-सैनिक अड्डा मजबूत करना।
  2. पश्चिमी एशिया में सोवियत संघ की विस्तारवाद की चुनौती के विरुद्ध पाकिस्तान को शस्त्र देना तथा इसे अपने अग्रिम सीमा राज्य के रूप में सुदृढ़ करना।
  3. फारस खाड़ी में शीघ्र तैनात बल को संगठित करना तथा तैनात करना।
  4. एशिया में सोवियत संघ की भूमिका को नियन्त्रित करने के लिए वाशिंगटन-बीजिंग-इस्लामाबाद-टोकियो सहयोग को सुदृढ़ करना तथा बढ़ते हुए भारत-सोवियत तथा सोवियत-वियतनाम सम्बन्धों तथा मास्को-काबुल सहयोग को नियन्त्रित करना।
  5. सितारा युद्ध प्रोग्राम या अन्तरिक्ष प्रोग्राम में सैन्यीकरण तथा सामरिक प्रतिरक्षा उपक्रम प्रोग्राम बनाना।
  6. SALT-II समझौते को लागू न करना।
  7. सोवियत खतरे के विरुद्ध पश्चिमी यूरोप में जल, थल तथा हवा में मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों की स्थापना करना।
  8. शस्त्र-दौड़ में श्रेष्ठ स्थिति प्राप्त करने के लिए शस्त्रों का अधिक उत्पादन करना तथा निःशस्त्रीकरण पर जेनेवा बातचीत से दूर रहना।
  9. हिन्द महासागर में अमरीकी शक्ति तथा उपस्थिति को बढ़ावा देना तथा इसे और शक्तिशाली बना देना।
  10. केनिया तथा सोमालिया को बड़े पैमाने पर सहायता देना ।
  11. 1980 ई. की मास्को ओलम्पिक खेलों में भाग न लेना तथा सोवियत संघ पर अनाज अवरोध लगाना।

संयुक्त राज्य की इन सभी नीतियों की सोवियत संघ ने यह कहकर कड़ी आलोचना की कि ये सभी नीतियां उसके सभी हितों को हानि पहुँचाने वाली तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शीत युद्ध को और अधिक भड़काने वाली थीं।

विश्व के विभिन्न भागों में संयुक्त राज्य का प्रभाव घटाने के लिए सोवियत नीतियां

बहुत-सी सोवियत नीतियों का अमरीका के कड़ा विरोध किया क्योंकि उनके अनुसार ये सभी नीतियां विश्व राजनीति में संयुक्त राज्य की भूमिका को सीमित करने वाली थीं। निम्नलिखित कुछ सोवियत नीतियां अमरीका के कड़े विरोध का कारण बनीं-

  1. अंगोला में सोवियत संघ द्वारा उत्साहित क्यूबियों की भूमिका ।
  2. अफगानिस्तान में सोवियत संघ का हस्तक्षेप तथा एशिया के इस सामरिक महत्व वाले क्षेत्र में बने रहने का उनका फैसला।
  3. इथियोपिया में सोवियत संघ द्वारा उत्साहित क्यूबा की भूमिका ।
  4. क्यूबा में सोवियत ब्रिगेड की उपस्थिति।
  5. पूर्वी यूरोपीय देशों में नई किस्म की SS-20 मध्य दूरी की मारक सोवियत मिसाइलों को लगाना।
  6. लैटिन अमरीका के विभिन्न राज्यों के वामपंथी दलों को सोवियत संघ की सहायता तथा समर्थन।
  7. पश्चिमी यूरोप में सोवियत संघ का बढ़ता प्रभाव व मास्को तथा नई दिल्ली एवं मास्को तथा हनोई के बीच बढ़ती मित्रता।
  8. अफ्रीका में अपने सैनिक अड्डों को सुदृढ़ करने का सोवियत संघ का निर्णय।
  9. हिन्द महासागर में सोवियत संघ की बढ़ती उपस्थिति।
  10. पश्चिमी एशिया में तथा खाड़ी क्षेत्रों में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए सोवियत संघ की नीति।

ये सभी नीतियां अमरीका की दृष्टि में खतरनाक थीं क्योंकि ये सभी विश्व राजनीति में अमरीकी हितों को साधारणतया तथा एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमरीका को विशेषरूप से, गम्भीर चुनौती थीं। अमरीकी यह महसूस करते थे कि सोवियत संघ की नीतियां एशिया में संयुक्त राज्य के विरोधी देशों के समूह का निर्माण करने वाली थीं तथा पाकिस्तान एवं चीन जैसे अमरीकी मित्रों की घेराबन्दी करने वाली थीं।

इन सभी बातों के साथ-साथ, निःशस्त्रीकरण की ओर NAM की असफलता, निरन्तर जारी इराक-ईरान युद्ध के परिणामस्वरूप पश्चिमी एशिया में शान्ति की अस्थिरता, निःशस्त्रीकरण के मुद्दे पर असफलता, जेनेवा बातचीत में बड़ी धीमी तथा बहुत कम प्रगति, अमरीकी राष्ट्रपति रीगन तथा मिखाईल गोर्बाच्योव के बीच पहले दो शिखर सम्मेलनों की असफलता, दोनों महाशक्तियों के बीच शस्त्र-दौड़ में बढ़ोत्तरी, संयुक्त राज्य द्वारा पाकिस्तान का बड़े पैमाने पर सैन्यीकरण, अफगानिस्तान में सोवियत संघ की निरन्तर उपस्थिति, एशिया की सुरक्षा तथा अमरीकी आशंकाओं की सोवियत योजना तथा निर्धन-विकासशील राष्ट्रों को प्रतिस्थापित करने की धनवान राष्ट्रों की अक्षमता, आदि इन सभी ने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में शीत युद्ध को पुनर्जीवित कर दिया।

देतांत के ह्रास ने 1971 ई. से पहले वाले शीत युद्ध से कहीं अधिक भयंकर, एक नए शीत युद्ध को जन्म दिया। इसने अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण को और अधिक उलझावपूर्ण एवं विस्फोटक बना दिया। इस नए शीत युद्ध से अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का स्वरूप एवं भविष्य, दोनों महाशक्तियों पर लगभग निर्भर हो गया। उनके गठबंधनों के सदस्यों की भूमिका में भी कमी आ गई। दोनों महाशक्तियों की नीतियां एक बार फिर अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का निर्धारक तत्व बन गईं। निःशस्त्रीकरण एवं शस्त्र-नियन्त्रण के कथित आदर्शों के विरुद्ध, शस्त्र दौड़ ने जो शक्ति प्राप्त कर ली उससे अन्तर्राष्ट्रीय नीति एवं सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया। चीन तथा सोवियत संघ के बीच की खाई ने नए शीत युद्ध को नए आयाम दिए । मास्को-हनोई-काबुल की गुटबन्दी बनाम वाशिंगटन-बीजिंग-पिंडी-टोकियो गुटबन्दी एक खतरनाक घटना सिद्ध हुई। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की बढ़ती जटिलता, उत्तर-दक्षिण के बीच बड़ा तथा हमेशा बढ़ता रहने वाला अन्तर, संयुक्त राष्ट्र संघ की बंटी हुई भूमिका, महाशक्तियों तथा उनके गुटों की तुलना में नाम (NAM) की इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति में अयोग्यता, इन सभी ने मिलकर नए शीत युद्ध को और अधिक भयानक बना दिया। दीतां युग की शान्ति के बाद सारा विश्व इस नए शीत युद्ध से परेशान हो गया। लेकिन सौभाग्य से 1985-87 ई. के समय में विश्व राजनीति में एक नया दीतां आरम्भ हो गया।

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